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सीजेपी क्या एक राजनीतिक दल बन सकती है, इसके प्रवक्ताओं के बयानों से क्या मिले संकेत?
25 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन खत्म करने के बाद अब वहां प्रदर्शन के सभी निशान तकरीबन मिटाए जा चुके हैं. दीवारों पर 'जेन ज़ी' की बनाई ग्रैफिटी सफ़ेद पेंट से छिपा दी गई है, सीजेपी के जश्न की पार्टी के वीडियो भी आ चुके हैं.
जो जंतर-मंतर 36 दिनों तक गर्मी और बारिश के बीच हाथ वाले पंखों, छातों, भीगे टेंट और नारों का गवाह रहा, वही बीते शनिवार को खुशी, मिठाइयों और नौजवान जेन ज़ी के नाचते कदमों से भर गया.
इसमें अब कोई दोराय नहीं है कि जंतर-मंतर पर हुआ ये प्रदर्शन मोदी सरकार के कार्यकाल में हुआ सबसे असरदार प्रदर्शन रहा.
जंतर-मंतर के प्रदर्शन ने वो हासिल कर लिया है जिसकी मांग 6 जून को अभिजीत दीपके के भारत लौटने के साथ शुरू हुई थी.
सीजेपी की कोर टीम क्या कह रही है
इससे पहले, जिस प्रदर्शन के आगे मोदी सरकार को झुकना पड़ा था वो था साल 2020-21 का किसान आंदोलन, जिसमें किसानों को अपनी मांगों के साथ लगभग डेढ़ साल तक सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर बैठना पड़ा.
ऐसे में जब शनिवार को सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ये बताया कि उनकी सभी मांगें मान ली गई हैं तो इसे एक हैरत के रूप में भी देखा गया.
मोदी सरकार जो किसी आंदोलन या विपक्ष की मांग को सिरे से ख़ारिज करने के लिए जानी जाती है, उससे जेन ज़ी ने रिकॉर्ड टाइम में एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफ़ा ले लिया.
साथ ही इस आंदोलन में सीजेपी जिस तरह से अग्रणी भूमिका में नज़र आई है उससे बाद लोग सीजेपी के भविष्य के बारे में भी बात करने लगे हैं.
क्या सीजेपी इस हासिल के बाद युवा पीढ़ी का राजनीतिक चेहरा बनेगी? या क्या सीजेपी से सामने आए चेहरे राजनीति में आएंगे?
सौरव दास जो एक महीने से सीजेपी की तमाम प्रेस कॉन्फ्रेस में अपनी बात रखते थे वो एक इंटरव्यू में पूछे गए इस सवाल पर कहते हैं, "इस आंदोलन को हम लोग ग्रासरूट लेवल पर ले जाना चाहते हैं और लोगों के बीच जागरूकता लाना चाहते हैं ताकि सत्ता में जो भी लोग हों उनसे जनता अपना काम करा ले."
"मुझे लगता है कि टाइम आ चुका है कि जो युवा है वो ज़्यादा से ज़्यादा राजनीति में आएं. क्योंकि सत्ता में जो लोग हैं उनकी उम्र 70 साल हो रही है, उन्हें नहीं पता कि जेन ज़ी की परिभाषा क्या है. जेन ज़ी क्या और कैसे सोचता है. आप वो रात में 12 बजे एक रील बना देंगे और 'हैलो फ्रैंड्स' बोल देंगे तो वो भी जनता एक्सेप्ट नहीं करेगी."
इंडिया टुडे के एक इंटरव्यू में सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका में कहा, "हमारे कई सपने हैं और महत्वकांक्षाएं हैं. शिक्षा हमारा मुद्दा तो है ही लेकिन जवाबदेही और सुधार भी हमारा मुद्दा है. सीजेपी के गठन के पीछे हमारी मंशा रही कि नौजवानों को अपने मुद्दे उठाने का एक प्लेटफॉर्म मिले और उन्हें समाधान भी मिले. हम इस प्लेटफॉर्म को इसी तरह बनाए रखने के लिए जो बन पड़ेगा, करेंगे."
जब उनसे पूछा गया कि क्या वो राजनीति में आने की संभावनाओं को नकार नहीं रहें हैं तो उनका कहना था, "मैंने अपने छोटे से राजनीतिक करियर से एक ही चीज़ सीखी है कि किसी भी संभावना को सिरे से ख़ारिज नहीं करना चाहिए."
इन दो प्रवक्ताओं ने भले ही राजनीति में आने के सवाल को ख़ारिज नहीं किया लेकिन इस आंदोलन के सबसे अहम किरदार, सीजेआई के कॉकरोच शब्द को कॉकरोच जनता पार्टी मूवमेंट बनाने वाले अभिजीत दीपके राजनीतिक जीवन को कठिन मानते हैं.
अभिजीत दीपके ने इंडियन एक्सप्रेस के एक वीडियो में राजनीति में आने के सवाल पर कहा था, "मैं राजनीति में नहीं आना चाहता, सार्वजनिक जीवन बहुत मुश्किल है. अभी लोगों ने हमें इतना समर्थन दिया है, वो हमसे उम्मीद लगाए बैठे हैं. अगर हम कुछ ना करते तो ये अफ़सोस होता कि हमारे पास कुछ करने का मौका था और हमने नहीं किया."
हालांकि ये बयान उन्होंने 20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च के पहले दिया था.
सीजेपी अब तक इस सवाल का स्पष्ट जवाब देने से बचती रही है कि उसकी आगे की रणनीति क्या होगी.
इस मूवमेंट की शुरुआत इसी साल मई में हुई थी, जब दीपके ने सोशल प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर सहज अंदाज़ में लिखा था, "क्या हो अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएँ?"
'कॉकरोच जनता पार्टी' एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया आंदोलन है, जो चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद उभरा. मुख्य न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि ऑनलाइन सक्रियता की आड़ में व्यवस्था पर हमला करने वाले बेरोज़गार युवाओं को 'कॉकरोच' जैसा माना जा सकता है.
सोशल मीडिया के अपने वर्चुअल समर्थन को ज़मीन पर लाने के लिए 6 जून को दीपके भारत पहुंचे और इसके बाद इस आंदोलन ने जो किया वो अब इतिहास है.
अभी सीजेपी क्या कर रही है?
अभी सीजेपी के प्रवक्ताओं का कहना है कि असम और बिहार में प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिए गए स्टूडेंट्स को रिहा कराने के लिए वो सरकार और इन राज्यों की पुलिस से बात कर रहे हैं.
सोमवार की रात प्रवक्ता सौरव दास और रत्ना सिंह ने एक्स पर कहा, "हमारी प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ ही घंटों बाद सरकार के प्रतिनिधियों ने हमसे मुलाक़ात की. यह बैठक लगभग दो से तीन घंटे तक चली. उन्होंने बिहार और असम सरकारों की नोटिफिकेशन की कॉपी शेयर कीं, जिनमें सभी एफ़आईआर वापस लेने, भविष्य में कोई कार्रवाई न करने और सभी हिरासत में लिए गए और गिरफ़्तार लोगों को रिहा करने की गारंटी दी गई है."
"उन्होंने यह भी दोहराया है कि केंद्र सरकार और अन्य बीजेपी शासित राज्यों की ओर से भी इसी तरह की गारंटी देने वाले नोटिफिकेशन कल तक जारी कर दिए जाएंगे. उम्मीद है कि जिस भाषा पर सहमति बनी है, उसी का इस्तेमाल किया जाएगा"
"किसी भी प्रदर्शनकारी को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा. हम सब इस संघर्ष में एक साथ हैं."
सीजेपी एक पॉलिटिकल फोर्स बनेगी या नहीं ये आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन इससे उभर कर सामने आए चेहरों ने इन संभावनाओं से इनकार तो नहीं किया है.
भारत में राजनीतिक पार्टी कैसे गठित होती है
भारत में राजनीतिक दलों का पंजीकरण जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के प्रावधानों के तहत किया जाता है.
इस धारा के तहत पंजीकरण कराने के लिए किसी भी राजनीतिक दल को अपने गठन की तारीख़ से 30 दिनों के भीतर निर्धारित प्रारूप में चुनाव आयोग के पास आवेदन देना होता है.
आवेदन में दल से जुड़ी बुनियादी जानकारी देनी होती है, जैसे दल का नाम, पता, विभिन्न इकाइयों की सदस्यता का विवरण, पदाधिकारियों के नाम और धारा 29A की उपधारा (4) में मांगी गई अन्य जानकारी. इसके अलावा, आयोग उपधारा (6) के तहत जिन अतिरिक्त जानकारियों की मांग करे, उन्हें भी उपलब्ध कराना होता है.
आयोग ने राजनीतिक दलों के पंजीकरण की व्यवस्था और प्रक्रिया की समीक्षा करने के बाद अब कुछ नए दिशा-निर्देश, शर्तें और आवश्यक विवरण तय किए हैं.
नए दिशा-निर्देशों की एक प्रमुख शर्त यह है कि आवेदन जमा करने के बाद संबंधित राजनीतिक दल को दो राष्ट्रीय और दो स्थानीय दैनिक समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित कराना होगा.
इस विज्ञापन में दल का नाम, पता और उसके प्रमुख पदाधिकारियों की जानकारी देनी होगी. इसका उद्देश्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति को उस दल के पंजीकरण पर कोई आपत्ति हो, तो वह अपनी आपत्ति चुनाव आयोग के सामने प्रस्तुत कर सके.
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