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क्या आईवीएफ़ से हमेशा जुड़वां या तीन बच्चे ही पैदा होते हैं? जानिए इसके बारे में सबकुछ
- Author, ओंकार करंबेलकर
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 14 मिनट
माता-पिता बनना आमतौर पर हर दंपती का सपना होता है, कुछ जोड़ों के लिए यह काफ़ी मुश्किल होता है.
दुनिया भर में बांझपन (इनफ़र्टिलिटी) को एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या माना जाता है. ऐसे में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ़) कई दंपतियों के लिए उम्मीद की एक किरण बनकर सामने आता है.
आईवीएफ़ एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें महिला के शरीर से अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु लेकर उन्हें प्रयोगशाला में भ्रूण बनाया जाता है. इसके बाद तैयार भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है.
आईवीएफ़ को लेकर लोगों के मन में कई सवाल और गलतफहमियां हैं. क्या आईवीएफ़ कराने पर हमेशा जुड़वां या तीन बच्चे होते हैं? उम्र, मोटापा, धूम्रपान या तनाव का आईवीएफ़ की सफलता पर कितना असर पड़ता है?
आईवीएफ़ के एक चक्र पर कितना ख़र्च आता है और इसकी सफलता की संभावना कितनी होती है?
आधुनिक तकनीक के कारण आईवीएफ़ की सफलता दर लगातार बढ़ रही है, लेकिन इस मामले में हर दंपती का अनुभव अलग हो सकता है.
इस लेख में हम संतान पाने की कोशिश कर रहे लोगों के मन में उठने वाले ऐसे ही कई ज़रूरी सवालों के जवाब जानने की कोशिश करेंगे.
विज्ञान, धैर्य और हक़ीकत
आईवीएफ़ उपचार पर विचार करने से पहले बांझपन के कारणों को समझना जरूरी है.
कुछ दंपतियों में महिला की फैलोपियन ट्यूब में समस्या हो सकती है और कुछ मामलों में एंडोमेट्रियोसिस या बढ़ती उम्र बच्चा न होने की वजह हो सकती है.
वहीं कुछ मामलों में पुरुषों में शुक्राणुओं की कम संख्या, उनकी कम गतिशीलता या खराब गुणवत्ता जैसे कारण सामने आते हैं.
इसलिए आईवीएफ़ केवल महिला से जुड़ा उपचार नहीं है, बल्कि यह दोनों जीवनसाथियों के स्वास्थ्य से जुड़ी प्रक्रिया है. विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार पुरुषों की जांच देर से होती है, जिससे उपचार की अवधि और ख़र्च दोनों बढ़ सकते हैं.
आईवीएफ़ क्या है और यह प्राकृतिक गर्भधारण से कैसे अलग है?
प्राकृतिक गर्भधारण में महिला का अंडाणु और पुरुष का शुक्राणु महिला के शरीर के भीतर, आमतौर पर फैलोपियन ट्यूब में मिलते हैं.
आईवीएफ़ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) में यह प्रक्रिया शरीर के बाहर, प्रयोगशाला में की जाती है.
महिला के अंडाशय से अंडाणु निकाले जाते हैं. उन्हें प्रयोगशाला के नियंत्रित वातावरण में शुक्राणुओं के साथ मिलाया जाता है. इसके बाद विकसित हुए भ्रूण को कुछ दिनों बाद महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है.
आमतौर पर अगर एक साल तक नियमित प्रयास करने के बाद भी प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं होता, या महिला की उम्र 35 वर्ष से अधिक होने पर छह महीने तक प्रयास के बाद भी गर्भधारण नहीं होता है तो आईवीएफ़ की सलाह दी जाती है.
इसके साथ ही फैलोपियन ट्यूब बंद हो, पुरुष में गंभीर स्तर का बांझपन हो, बांझपन का कारण स्पष्ट न हो, या अन्य सरल उपचार सफल न हुए हों, तो आईवीएफ़ कराने की सलाह दी जाती है.
किन कारणों से दंपती को आईवीएफ़ की जरूरत पड़ती है?
यह एक ऐसा सवाल है, जो अक्सर पूछा जाता है. इस विषय पर नवी मुंबई के वाशी स्थित फोर्टिस हीरानंदानी अस्पताल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के प्रमुख और निदेशक डॉक्टर प्रशांत भामरे ने बीबीसी मराठी के सवालों के विस्तार से जवाब दिए.
डॉ. भामरे के अनुसार, आईवीएफ़ से जुड़े लगभग एक-तिहाई मामलों में कारण महिलाओं से जुड़े होते हैं, लगभग एक-तिहाई मामलों में पुरुषों से जुड़े कारण होते हैं, जबकि बाकी मामलों में दोनों की समस्याएं या फिर बांझपन का कारण स्पष्ट नहीं होता.
उन्होंने आईवीएफ़ की जरूरत पड़ने के प्रमुख कारण बताए-
• फैलोपियन ट्यूब का बंद होना या क्षतिग्रस्त होना (पहले हुए संक्रमण या सर्जरी के कारण).
• अंडाणुओं के उत्सर्जन से जुड़ी समस्याएं.
• एंडोमेट्रियोसिस.
• बढ़ती उम्र के साथ अंडाणुओं की संख्या या गुणवत्ता में कमी आना.
• शुक्राणुओं की संख्या कम होना या उनकी गतिशीलता कम होना.
• गर्भाशय में फाइब्रॉइड या पॉलिप जैसी समस्याएं.
• सभी जांचों के बाद भी बांझपन का स्पष्ट कारण सामने न आना.
आईवीएफ़ की प्रक्रिया कैसी होती है?
चरण 1 – अंडाशय को उत्तेजित करना
क़रीब 8 से 12 दिनों तक रोज हार्मोन के इंजेक्शन दिए जाते हैं, ताकि सामान्य रूप से बनने वाले एक अंडाणु की जगह कई अंडाणु विकसित हो सकें. उनकी वृद्धि की निगरानी अल्ट्रासाउंड और रक्त जांच के जरिए की जाती है.
चरण 2 – अंडाणु निकालना
जब फॉलिकल पूरी तरह विकसित हो जाते हैं, तब 'ट्रिगर' इंजेक्शन दिया जाता है. इसके लगभग 36 घंटे बाद अल्ट्रासाउंड की मदद से और हल्की बेहोशी की अवस्था में अंडाणु निकाले जाते हैं. यह एक छोटी डे-केयर प्रक्रिया होती है.
चरण 3 – फर्टिलाइजेशन
प्रयोगशाला में अंडाणु और शुक्राणुओं को मिलाया जाता है. शुक्राणुओं की गुणवत्ता के आधार पर पारंपरिक आईवीएफ़ या आईसीएसआई (एक अंडाणु में एक ही शुक्राणु प्रविष्ट कराना) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है.
चरण 4 – भ्रूण का विकास
निषेचित अंडाणुओं को 3 से 5 दिनों तक प्रयोगशाला में विकसित किया जाता है और उनके विकास पर लगातार नजर रखी जाती है.
चरण 5 – भ्रूण प्रत्यारोपण
एक भ्रूण (कभी-कभी चिकित्सकीय जरूरत के अनुसार दो) एक पतले कैथेटर की मदद से गर्भाशय में रखा जाता है. यह प्रक्रिया तेज और आमतौर पर बिना दर्द वाली होती है.
चरण 6 – गर्भावस्था जांच
भ्रूण प्रत्यारोपण के लगभग दो सप्ताह बाद रक्त जांच के जरिए यह पता लगाया जाता है कि गर्भधारण हुआ है या नहीं.
क्या आईवीएफ़ से महिला या बच्चे को कोई ख़तरा या दुष्प्रभाव होता है?
इस सवाल के जवाब में डॉ. प्रशांत भामरे ने कहा, "हार्मोन उपचार के दौरान कुछ महिलाओं को पेट फूला हुआ महसूस हो सकता है, मूड में बदलाव आ सकता है या इंजेक्शन लगाने वाली जगह पर हल्की परेशानी हो सकती है."
"ये सामान्य और अस्थायी दुष्प्रभाव हैं. कुछ महिलाओं में ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम (ओएचएसए) हो सकता है, लेकिन इसकी निगरानी और उपचार किया जाता है."
उन्होंने आगे कहा, "जहां तक बच्चे का सवाल है, अब तक हुए बड़े शोध बताते हैं कि आईवीएफ़ से जन्म लेने वाले अधिकांश बच्चे पूरी तरह स्वस्थ होते हैं. हालांकि प्राकृतिक गर्भधारण की तुलना में समय से पहले जन्म या जन्म के समय कम वजन होने का ख़तरा थोड़ा बढ़ सकता है."
"लेकिन यह जोखिम मुख्य रूप से बांझपन के मूल कारणों और एक से अधिक भ्रूण वाली गर्भावस्था से जुड़ा होता है, आईवीएफ़ प्रक्रिया से नहीं. उपचार शुरू करने से पहले दंपती को इसकी पूरी जानकारी दी जाती है."
आईवीएफ की सफलता दर क्या है?
डॉ. प्रशांत भामरे के अनुसार, आईवीएफ़ की सफलता दर हर इंसान में अलग-अलग होती है. ऐसा कोई एक आंकड़ा नहीं है, जो सभी पर समान रूप से लागू हो.
आईवीएफ़ की सफलता इन बातों पर निर्भर करती है-
• महिला की उम्र (यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है. 35 वर्ष के बाद और विशेष रूप से 40 वर्ष के बाद सफलता की संभावना घटने लगती है).
• अंडाशय की क्षमता.
• शुक्राणुओं की गुणवत्ता.
• गर्भाशय और हार्मोन का स्वास्थ्य.
• भ्रूण की गुणवत्ता.
• बांझपन का मूल कारण.
क्या गर्भधारण में देरी करने से आईवीएफ़ की जरूरत पड़ने की संभावना बढ़ जाती है?
बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्षमता से जुड़े उपचारों की जरूरत बढ़ सकती है, लेकिन इसका जवाब इतना सीधा नहीं है.
आज पहले की तुलना में कई लोग देर से माता-पिता बनने का फैसला कर रहे हैं. इसकी कई वजहें हैं. पढ़ाई पूरी करने में समय लगता है, करियर बनाने में समय लगता है और सही जीवनसाथी चुनने में भी समय लगता है.
इसके अलावा आर्थिक और भावनात्मक रूप से तैयार होना भी जरूरी होता है.
ऐसे में अक्सर 30 की उम्र के मध्य तक पहुंचते-पहुंचते लोगों के मन में एक सवाल उठने लगता है, "क्या मैंने बहुत देर कर दी? क्या अब मुझे आईवीएफ़ की जरूरत पड़ेगी?"
इस सवाल का जवाब मुंबई के जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में असिस्टेड रिप्रोडक्शन एंड जसलोक फर्टिलिटी विभाग की निदेशक डॉक्टर फिरोजा पारिख ने दिया.
डॉक्टर पारिख कहती हैं, "इस सवाल का संक्षिप्त जवाब यह है कि गर्भधारण में देरी करने पर बांझपन के इलाज और ख़ासकर आईवीएफ़ की जरूरत पड़ने की संभावना बढ़ सकती है."
वह कहती हैं, "लेकिन ऐसा नहीं है कि 35 वर्ष की उम्र होते ही प्रजनन क्षमता अचानक खत्म हो जाती है. इसमें बदलाव धीरे-धीरे आता है, हर व्यक्ति में अलग होता है और यह पूरी प्रजनन क्षमता का केवल एक हिस्सा है."
उन्होंने आगे कहा, "आमतौर पर 30 वर्ष के बाद प्रजनन क्षमता कम होने लगती है. 34 वर्ष के आसपास यह बदलाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता है और 40 वर्ष के बाद इसमें तेजी से गिरावट आती है. लेकिन 34 वर्ष कोई ऐसी सीमा नहीं है, जिसके बाद अचानक सब कुछ बदल जाए."
"36 साल की एक स्वस्थ महिला कुछ महीनों में प्राकृतिक रूप से गर्भवती हो सकती है. वहीं इससे कम उम्र की महिला को फैलोपियन ट्यूब बंद होने, एंडोमेट्रियोसिस, अंडोत्सर्जन संबंधी समस्याओं या पुरुषों से जुड़े कारणों की वजह से गर्भधारण में दिक्कत हो सकती है."
गर्भावस्था के दौरान भी उम्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. मां की बढ़ती उम्र के साथ उच्च रक्तचाप, गर्भावधि मधुमेह और कुछ अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि स्वस्थ गर्भावस्था संभव नहीं है. इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि गर्भधारण से पहले सही योजना और गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल और भी अधिक जरूरी हो जाती है.
क्या देर से गर्भधारण करने का मतलब है कि आईवीएफ़ कराना ही पड़ेगा?
इस सवाल पर डॉक्टर फ़िरोजा पारिख कहती हैं, "नहीं. देर से गर्भधारण करने वाली कई महिलाओं को प्राकृतिक रूप से गर्भधारण हो जाता है और उन्हें कभी आईवीएफ़ की जरूरत नहीं पड़ती."
"कुछ मामलों में केवल सही समय पर शारीरिक संबंध बनाना, थायरॉयड या अंडोत्सर्जन से जुड़ी समस्याओं का इलाज कराना या चुनिंदा मामलों में इंट्रायूटेरिन इन्सेमिनेशन (आईयूआई) जैसी सरल चिकित्सा सहायता ही पर्याप्त होती है."
उन्होंने कहा, "आईवीएफ़ की सलाह तभी दी जाती है, जब वह किसी विशेष समस्या का सबसे उपयुक्त समाधान हो या अन्य सरल उपचारों से सफलता मिलने की संभावना बहुत कम हो."
डॉक्टर पारिख ने एक महत्वपूर्ण बात कही, "आईवीएफ़ प्रभावी जरूर है, लेकिन यह 'टाइम मशीन' नहीं है. यह सोच लेना कि जरूरत पड़ने पर बाद में आईवीएफ़ करा लेंगे, इसलिए गर्भधारण को कितनी भी देर तक टाला जा सकता है, सही नहीं है."
डॉ. पारिख के अनुसार, "आईवीएफ़ ने प्रजनन चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति जरूर लाई है, लेकिन इसकी सफलता आज भी काफ़ी हद तक महिला के अंडाणुओं की उम्र और गुणवत्ता पर निर्भर करती है."
बढ़ती उम्र के साथ अंडाणुओं की संख्या कम हो सकती है. उनमें सफल निषेचन की संभावना भी घट जाती है. उपयोग योग्य भ्रूण कम बनते हैं और गुणसूत्र संबंधी असामान्यताओं का खतरा बढ़ जाता है.
ऐसी स्थिति में कुछ मरीजों को आईवीएफ़ के एक से अधिक चक्र कराने पड़ सकते हैं, जबकि कुछ को अंततः डोनर एग (दान) का विकल्प अपनाना पड़ सकता है.
क्या बांझपन सिर्फ महिलाओं की समस्या है?
यह भी एक बड़ा भ्रम है कि बांझपन केवल महिलाओं से जुड़ी समस्या है.
वास्तव में बड़ी संख्या में मामलों में पुरुषों से जुड़े कारण भी बराबर जिम्मेदार होते हैं. इसलिए प्रजनन क्षमता का आकलन करते समय दोनों जीवनसाथियों की जांच करना बेहद जरूरी है.
ठाणे स्थित किम्स हॉस्पिटल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रमुख डॉक्टर विद्या शेट्टी कहती हैं, "पुरुषों की प्रजनन क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. बांझपन के लगभग आधे मामलों में केवल पुरुषों से जुड़े कारण या दोनों जीवनसाथियों से जुड़े कारण सामने आते हैं."
उन्होंने आगे कहा, "इसलिए गर्भधारण में दिक्कत आने पर सबसे पहले वीर्य जांच कराने की सलाह दी जाती है. यदि जांच में कोई समस्या सामने आती है या अंडकोष की सर्जरी, संक्रमण, अंडकोष का नीचे न उतरना, कीमोथेरेपी या शारीरिक संबंधों से जुड़ी समस्याओं का इतिहास हो, तो आगे की जांच जल्द करानी चाहिए."
"केवल महिला की जांच करने के बजाय दोनों जीवनसाथियों का एक साथ मूल्यांकन करने से उपचार अधिक प्रभावी होता है."
क्या आईवीएफ़ से जुड़वां या तीन बच्चे होते हैं?
यह सबसे बड़ा भ्रम है कि आईवीएफ़ कराने पर हमेशा जुड़वां या तीन बच्चे पैदा होते हैं.
डॉ. विद्या शेट्टी कहती हैं, "पहले गर्भधारण की संभावना बढ़ाने के लिए गर्भाशय में एक से अधिक भ्रूण प्रत्यारोपित किए जाते थे. लेकिन अब भ्रूण चयन की आधुनिक तकनीकों की मदद से कई मरीजों में सफलता की संभावना कम किए बिना केवल एक स्वस्थ भ्रूण प्रत्यारोपित करना संभव हो गया है."
उन्होंने कहा, "इससे जुड़वां या तीन बच्चों वाली गर्भावस्था के मामलों में काफी कमी आई है."
आईवीएफ़ के लिए जीवनशैली कैसी होनी चाहिए?
डॉक्टर विद्या शेट्टी के अनुसार, आईवीएफ़ की तैयारी उपचार शुरू होने से पहले ही शुरू कर देनी चाहिए.
उन्होंने कहा, "दोनों जीवनसाथियों को स्वस्थ वजन बनाए रखना चाहिए, संतुलित आहार लेना चाहिए, नियमित व्यायाम करना चाहिए, धूम्रपान पूरी तरह छोड़ देना चाहिए, शराब का सेवन सीमित रखना चाहिए और पर्याप्त नींद लेनी चाहिए."
उन्होंने आगे कहा, "अगर डायबिटीज, थायरॉयड विकार या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां हैं, तो उपचार शुरू होने से पहले उन्हें नियंत्रित करना जरूरी है. डॉक्टर की बताई दवाएं समय पर लेना और सभी तय जांच व फॉलो-अप पूरे करना भी बेहद महत्वपूर्ण है."
आईवीएफ़ केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है, बल्कि कई लोगों के लिए यह एक भावनात्मक यात्रा भी होती है.
इस उपचार के दौरान हार्मोन के इंजेक्शन, बार-बार स्कैन, विभिन्न चिकित्सकीय प्रक्रियाएं और लंबे इंतजार का सामना करना पड़ता है. इसलिए तनाव महसूस होना स्वाभाविक है. इस दौरान दंपती उम्मीद, चिंता और निराशा जैसी कई भावनाओं से गुजर सकते हैं.
शारीरिक तैयारी जितनी जरूरी है, मानसिक तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. वास्तविक उम्मीदें रखना, एक-दूसरे से खुलकर बात करना, किसी भी शंका पर डॉक्टर से सलाह लेना और जरूरत महसूस होने पर परामर्श (काउंसलिंग) लेना इस पूरे सफर को आसान बना सकता है.
भारत में आईवीएफ़ का ख़र्च कितना होता है?
यह एक महत्वपूर्ण सवाल है. आईवीएफ़ शुरू करने से पहले दंपती को इसके संभावित खर्च और उपचार के दौरान होने वाले अतिरिक्त खर्चों की जानकारी होना जरूरी है.
डॉक्टर विद्या शेट्टी कहती हैं, "भारत में आईवीएफ के एक चक्र की औसत लागत 1.5 लाख रुपये से 2.5 लाख रुपये के बीच है. यह लागत उपचार केंद्र और किसी ख़ास मामले के आधार पर अलग-अलग हो सकती है."
"इसके अलावा, प्रजनन दवाओं, आईसीएसआई जैसी प्रक्रियाओं, भ्रूण को फ्रीज करने, भंडारण शुल्क और कुछ मामलों में आनुवंशिक परीक्षण के लिए अतिरिक्त ख़र्च भी हो सकते हैं."
वह कहती हैं, "कुछ दंपतियों को एक से अधिक आईवीएफ चक्र की ज़रूरत हो सकती है. इसलिए, उपचार शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से संभावत ख़र्च और संभावित अतिरिक्त प्रक्रियाओं के बारे में विस्तार से चर्चा करना महत्वपूर्ण है."
पिछले कुछ वर्षों में आईवीएफ़ उपचार को मरीज की व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार अधिक अनुकूल बनाया जाने लगा है.
भ्रूण संवर्धन की उन्नत तकनीकों, ब्लास्टोसिस्ट ट्रांसफर, विट्रिफिकेशन जैसी आधुनिक भ्रूण फ्रीजिंग तकनीकों और अत्याधुनिक प्रयोगशाला सुविधाओं के कारण गर्भधारण की सफलता दर में सुधार हुआ है.
चुनिंदा मरीजों में प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (पीजीटी) के जरिए भ्रूण में मौजूद कुछ आनुवंशिक दोषों की पहले ही पहचान की जा सकती है. इन तकनीकी प्रगतियों की मदद से अब प्रत्येक दंपती की जरूरत के अनुसार उपचार की योजना बनाना संभव हो गया है.
यदि जीवनशैली में कोई महत्वपूर्ण बदलाव करना हो, आहार बदलना हो, दवाएं शुरू करनी हों या नियमित व्यायाम करना हो, तो यह सब डॉक्टर और योग्य प्रशिक्षकों की सलाह से ही करना चाहिए.
अपने शरीर और उससे जुड़े लक्षणों की उचित जांच डॉक्टर से कराकर, उनकी सलाह के अनुसार ही जीवनशैली में बदलाव करना सही रहता है. डॉक्टर की सलाह के बिना स्वयं उपचार करना नुकसानदायक हो सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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