You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'मेरी आंखों पर पट्टी बांधी, गाड़ी में डाला और ले गए': जंतर-मंतर पर खाना बांटने वाले जुनैद
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जब शनिवार को जब अपने पद से इस्तीफ़ा दिया तब जंतर-मंतर पर पहले दिन से मौजूद रहे कार्यकर्ता जुनैद मौजूद नहीं थे.
जुनैद का दावा है कि उस समय वह दिल्ली पुलिस की अवैध हिरासत में थे और उनकी आंखों पर पट्टी बंधी थी.
दिल्ली पुलिस से जुनैद के दावे के बारे में बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनकी ओर से अब तक कोई जवाब नहीं आया है. जैसे ही पुलिस का पक्ष आएगा, उसे यहां शामिल कर लिया जाएगा.
20 जून को जंतर-मंतर पर सीजेपी का प्रदर्शन शुरू होने के बाद से जुनैद लगातार वहां मौजूद थे और प्रदर्शन में शामिल हो रहे लोगों के लिए खाने और पानी की व्यवस्था में जुटे थे.
जुनैद का आरोप है कि यूपी पुलिस ने उनके परिजनों को भी थाने ले जाकर पूछताछ की.
पुलिस का क्या कहना है ?
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने उनके परिवार से पूछताछ की बात तो स्वीकार की है लेकिन हिरासत में लेने से इनकार किया है.
मेरठ पुलिस ने बीबीसी के सवाल का जवाब नहीं दिया. वहीं दिल्ली पुलिस ने जुनैद को कथित हिरासत में लिए जाने के आरोपों से जुड़े सवाल पर बीबीसी को जवाब नहीं दिया.
इस बीच, जुनैद ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाख़िल की है.
याचिका में उन्होंने आरोप लगाया है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन की व्यवस्था करने की वजह से उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा गया, उनके परिवार को परेशान किया गया और यह सब बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए किया गया.
उन्होंने अदालत से मामले की स्वतंत्र जांच, अपने और परिवार के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की है.
इस घटनाक्रम के दौरान सीजेपी ने भी जुनैद से दूरी बनाई, हालांकि अब जुनैद का कहना है कि सीजेपी उनकी मदद कर रही है.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में जुनैद ने कहा कि उनका या उनके परिवार का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वे केवल प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए जंतर-मंतर पर भोजन बांट रहे थे.
परिवार से पूछताछ का दावा
जुनैद के अनुसार, 23 और 24 जुलाई को उत्तर प्रदेश पुलिस उनके घर पहुंची और उनके पिता को पूछताछ के लिए साथ ले गई.
उनका दावा है कि घर से बैंक पासबुक, आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज़ भी लिए गए.
जुनैद के मुताबिक़, देर रात उन्हें छोड़ दिया गया, लेकिन अगले दिन फिर पूछताछ के लिए बुलाया गया.
जुनैद का आरोप है कि बाद में मेरठ में रहने वाली उनकी बहन के ससुर और उनके देवर को भी स्थानीय थाने में बैठाया गया.
जब उनके परिवार के साथ यह सब हो रहा था तब जुनैद स्वयं जंतर-मंतर पर मौजूद थे, जहां वो प्रदर्शनकारियों को भोजन बांट रहे थे.
जुनैद ने बताया कि 24 जुलाई की रात जंतर-मंतर पर मौजूद रहने के दौरान उन्हें एक कुत्ते ने काट लिया था. इलाज के लिए वो अपने एक साथी के साथ दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल गए.
उनके मुताबिक, अस्पताल से इलाज कराकर लौटने के कुछ ही देर बाद उनकी ऑटो के सामने एक सफेद स्कॉर्पियो आकर रुकी.
जुनैद का आरोप है कि गाड़ी से उतरे लोगों ने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताया.
उनका कहना है कि वे सादे कपड़ों में थे, वाहन पर नंबर प्लेट नहीं थी और उन्हें कोई वारंट या लिखित आदेश नहीं दिखाया गया.
बीबीसी स्वतंत्र रूप से इन दावों की पुष्टि नहीं कर सका है.
'आंखों पर पट्टी बांध दी गई'
जुनैद का आरोप है कि उन्हें और उनके साथी को जबरन वाहन में बैठाने के बाद उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई और दोनों के मोबाइल फोन ले लिए गए.
उन्होंने बताया कि उन्हें एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया, जहां उनसे अगले दिन तक पूछताछ की गई.
जुनैद के मुताबिक़, पूछताछ के दौरान उनसे बार बार पूछा गया कि वो ग़ाज़ियाबाद से जंतर-मंतर क्यों आते हैं और प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन की व्यवस्था का खर्च कहां से आता है?
उनका कहना है कि उन्होंने जवाब दिया कि भोजन की व्यवस्था अलग-अलग लोगों और संगठनों की स्वैच्छिक मदद से हो रही थी.
उनके मुताबिक़, कोई ऑनलाइन फूड डिलीवरी के ज़रिए भोजन भेज रहा था, किसान संगठन खाना लेकर आ रहे थे और गुरुद्वारों से भी लंगर पहुंच रहा था.
'शाम को छोड़ दिया गया'
जुनैद का कहना है कि पूछताछ के बाद उन्हें कई घंटों तक वाहन में घुमाया गया और फिर शाम के समय उत्तराखंड में देहरादून के क़रीब एक अज्ञात स्थान पर छोड़ दिया गया.
उनके मुताबिक़, जाते समय उनसे कहा गया कि कुछ मिनट तक आंखों की पट्टी न खोलें और एक घंटे बाद ही मोबाइल फोन चालू करें.
जुनैद के मुताबिक़, शुरू में उन्होंने घटना के बारे में किसी को नहीं बताया क्योंकि उन्हें दोबारा इसी तरह उठा लिए जाने का डर था. बाद में उन्होंने अपनी आपबीती सार्वजनिक करने का फैसला किया.
प्रदर्शन के लिए फंडिंग से जुड़े सवाल पर जुनैद ने कहा कि उन्होंने पहले ही तय कर लिया था कि वो किसी से नकद या ऑनलाइन आर्थिक सहायता नहीं लेंगे और कोई क्यूआर कोड भी जारी नहीं करेंगे.
उन्होंने कहा कि उनके बैंक खाते में इस उद्देश्य से कोई धनराशि नहीं आई और अगर जांच एजेंसियां चाहें तो उनके रिकॉर्ड की जांच कर सकती हैं.
दावों के सबूतों को लेकर क्या कहते हैं जुनैद?
जुनैद का कहना है कि हिरासत के दौरान उनके पास मोबाइल फोन नहीं था.
उन्होंने दावा किया कि रिहा होने के बाद उन्होंने उस इलाके के पास स्थित एक थाने की तस्वीर ली जहां उन्हें छोड़ा गया था.
उनका कहना है कि उनके पास राम मनोहर लोहिया अस्पताल की पर्ची और दिल्ली लौटने का कैब का बिल भी है.
बीबीसी ने यह दस्तावेज़ देखे हैं.
जुनैद ने कहा कि जिस समय उन्हें कथित तौर पर हिरासत में रखा गया था, उसी दौरान उन्हें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे़ की ख़बर मिली.
उन्होंने कहा कि उन्हें लगा कि अगर उनके संघर्ष से छात्रों का भविष्य बेहतर होता है तो यह उनके लिए ख़ुशी की बात होगी.
जुनैद कहते हैं कि भविष्य में भी वो इस तरह के आंदोलनों में शामिल होते रहेंगे.
क़ानून की पढ़ाई कर रहे जुनैद ने कहा कि भविष्य में भी वो शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर काम करना चाहते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.