बिहार: गिरफ़्तार प्रदर्शनकारियों की रिहाई के लिए महाधिवक्ता ने दिए निर्देश, इंतज़ार में हैं परिजन

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

बिहार सरकार ने 27 जुलाई की देर शाम नीट प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुक़दमे वापस लेने की घोषणा की थी.

इस घोषणा के अगले दिन मंगलवार को दोपहर तीन बजे तक गिरफ़्तार प्रदर्शनकारियों की रिहाई नहीं हो सकी थी जिसके बाद बिहार राज्य के महाधिवक्ता एसडी संजय ने सभी ज़िलाधिकारी और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर से छात्रों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने का निर्देश दिया है.

पटना हाई कोर्ट में बिहार के महाधिवक्ता कार्यालय की ओर से जारी नोटिस में सभी ज़िलाधिकारियों और सभी लोक अभियोजकों (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर्स) से कहा गया है कि 26 जुलाई 2026 शाम छह बजे से पहले विरोध प्रदर्शन करने वाले सभी स्टूडेंट्स के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों को वापस लेने के बिहार सरकार के फ़ैसले का पालन करें.

इस नोटिस में सभी ज़िलाधिकारियों से कहा गया है कि वे अपनी से सभी संबंधितों को इसको लेकर निर्देश जारी करें.

इससे पहले गृह विभाग की ओर से कहा गया था कि राज्य भर में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान 26 जुलाई की शाम छह बजे तक दर्ज सभी एफ़आईआर वापस ली जाएंगी और जल्द ही सभी गिरफ़्तार लोग रिहा कर दिए जाएंगे.

चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी की लीगल एड यूनिट के रमन कुमार ने कहा, "हम लोग बेऊर और गांधी मैदान थाने के चक्कर लगाकर थक चुके है. कोई कुछ बता नहीं रहा है. थाना कह रहा है कि उसे कोई ऑर्डर अब तक नहीं आया है. हम लोग परेशान हो गए हैं."

रमन चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी के दो गिरफ़्तार छात्रों प्रशांत प्रखर और अंकित कुमार की रिहाई की कोशिश कर रहे हैं.

बांकीपुर उप चुनाव को लेकर कर रहे रोड शो के दौरान तेजस्वी यादव ने आंदोलन की चेतावनी देते हुए कहा, "अगर सरकार बुधवार शाम 7 बजे तक स्टूडेंट्स को रिहा नहीं करती है, उन पर दर्ज मुकदमे वापस नहीं लेती है तो 30 जुलाई की सुबह 7 बजे से पूरे बिहार में आंदोलन होंगे."

तेजस्वी यादव के बड़े भाई तेज प्रताप यादव भी विद्यार्थी आंदोलन के दौरान उन पर हुई एफ़आईआर के चलते पटना के बेऊर जेल में बंद हैं.

वहीं सीपीआई (एमएल) के राज्य सचिव कुणाल ने भी कहा है कि पार्टी मुकदमा वापसी की प्रक्रिया में किसी भी तरह का टालमटोल या नौकरशाही बाधा स्वीकार नहीं करेगी.

जेल के बाहर डटे अभिभावक

22 जुलाई से शुरू हुए स्टूडेंट्स आंदोलन के दौरान हुई गिरफ़्तारियों के बाद बिहार सरकार आलोचना के घेरे में है. जैसा कि अपने छोटे भाई राहुल कुमार को जेल से रिहा करने की कोशिश में लगे देवेन्द्र कुमार बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहते हैं, "ये तो तानाशाही है. हम लोग अपने हक़ की लड़ाई भी नहीं लड़ सकते."

बिहार पुलिस मुख्यालय से मिली सूचना के मुताबिक़, विद्यार्थियों के आंदोलन के दौरान राज्य भर में 59 एफ़आईआर हुईं, जिनमें 999 नामजद अभियुक्त थे. इनमें से 407 की गिरफ़्तारी हुई.

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने पटना के बेऊर जेल में अपनों की रिहाई का इंतज़ार करते कई अभिभावकों से 27 जुलाई की दोपहर बात की थी. पटना के बेऊर जेल के दरवाज़े पर परेशान अभिभावकों की लाइन लगी थी. इनमें उमस भरी गर्मी में पसीने से नहाई नूतन भी थीं.

उनका छोटा भाई दीपक कुमार जेल में है. नूतन के पिता इस वक़्त मुंगेर में हैं और पटना स्थित घर पर सिर्फ़ उनकी मां हैं.

नूतन ने इस बात की जानकारी अपनी मां को नहीं दी. उन्होंने दावा किया, "मेरा भाई तो दो मिनट की रील बनाने गया था जो इस वक़्त भी मेरे मोबाइल में है. पुलिस ने उसका कॉलर पकड़ा और ज़बरदस्ती घसीटते हुए बंद कर दिया. मैंने अभी तक ये बात अपनी मम्मी को नहीं बताई है. मम्मी परेशान हो जाएगी तो फिर मैं भाई को छुड़ाने के लिए भागदौड़ कैसे करूंगी."

सुपौल के त्रिवेणीगंज से सुरेश कुमार नीट की तैयारी कर रहे अपने बेटे को जेल में छुड़ाने आए थे. रूआंसे होकर उन्होंने दावा करते हुए कहा, "हमारे परिवार ने आज तक जेल नहीं देखा. लेकिन हम देख रहे हैं. मेरा बेटा तो मोबाइल ठीक कराने गांधी मैदान गया था. वो जैसे ही टेंपो से उतरा, पुलिस ने उसे अपनी गाड़ी में बैठा लिया. हम बहुत पता किए कि बेटा कहां है लेकिन पुलिस ये बताने के लिए भी तैयार नहीं थी कि मेरा बेटा कहां है."

बिहार की अलग-अलग जेल में इसी तरह से अभिभावक अपने बच्चों के लिए परेशान हैं.

एफ़आईआर पर सवाल

पटना प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स का हब है. यही वजह है कि बेऊर जेल के मुख्य दरवाज़े पर पटना के अलावा सुपौल, देवघर, मुज़फ़्फ़रपुर, वैशाली से आए अभिभावक मिलते हैं. ये सभी वकालतनामा पर अपने क्लाइंट (प्रदर्शनकारी) के साइन कराने आए हैं.

यहां अपने भाई को छुड़ाने विवेक तेजस्वी भी पहुंचे हैं. उनके भाई पटना की चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई कर रहे हैं.

वो दावा करते हैं, "वो तो कॉलेज से रूम पर आ रहा था. उसको ऐसे ही ज़बरदस्ती उठा लिया कि एक कम पड़ रहा है. मेरा कहना है कि जिसने हिंसा की है उसको उठाइए. स्टूडेंट को क्यों परेशान कर रहे हैं. एक थाना प्रभारी का सिर फूट गया तो क्या एक हज़ार लोगों पर एफ़आईआर हो जाएगी?"

देवघर से आए आलोक कुमार दीक्षित अपने छोटे भाई कुंदन कुमार दीक्षित को छुड़ाने आए थे. कुंदन ने ग्रेजुएशन किया है और वो बीपीएससी की 72वीं परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं.

आलोक का दावा है, "मेरा भाई अपने दोस्त के साथ एसपी वर्मा रोड कंप्यूटर ठीक कराने गया था. वहां एक पुलिस वाले ने उससे कहा कि यहीं चुपचाप बैठे रहो, आगे मत बढ़ो. ये लोग डर कर बैठ गए. थोड़ी देर बाद दूसरा पुलिस वाला आया और उन दोनों को गाड़ी पर बैठाकर, उनका मोबाइल छीन लिया."

बिहार के 20 ज़िलों में असर

राज्य पुलिस मुख्यालय में मिले आंकड़ों के मुताबिक, इस आंदोलन में राज्य के कुल 20 ज़िले प्रभावित रहे. स्टूडेंट्स के विरोध प्रदर्शन का सबसे ज़्यादा असर पटना, सिवान, सारण, जहानाबाद, भागलपुर और दरभंगा में दिखा.

राज्य में कुल 407 की गिरफ़्तारी हुई. इसके अलावा 73 नाबालिग को भी जेल भेजा गया. इस आंदोलन में 19 सरकारी वाहन क्षतिग्रस्त हुए. 164 पुलिसकर्मी और अधिकारी घायल हुए. वहीं 19 छात्र और आमजन भी घायल हुए.

सबसे ज़्यादा एफ़आईआर पटना ज़िले में हुईं. यहां 24 एफ़आईआर हुईं जिसमें 266 नामजद अभियुक्त थे. वहीं सारण में 5 एफ़आईआर हुईं जिनमें 255 नामजद अभियुक्त और सिवान में 6 एफ़आईआर हुईं जिनमें 82 नामजद अभियुक्त थे. पटना में 35 पुलिसकर्मी और सरकारी अधिकारी घायल हुए.

इस स्टूडेंट आंदोलन को लेकर उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा, "विधायकों और पत्रकारों को चिन्हित करके हिंसा फैलाने वाले स्टूडेंट नहीं हो सकते. ये स्टूडेंट्स की आड़ में असामाजिक तत्व थे. उनका कोई राजनीतिक मकसद हो सकता है. ये भी संभव है कि वो सरकार को अस्थिर करना चाहते हो, इसी मकसद से उन्होंने स्टूडेंट्स के बीच घुसकर हिंसा फैलाई हो."

वहीं एडीजी (लॉ एंड आर्डर) के एस अनुपम ने बीबीसी से कहा, "बिहार पुलिस ने इस पूरे मामले में स्टूडेंट्स के साथ बहुत ही संयम बरता है. जब प्रदर्शन में असामाजिक तत्व घुसे और प्रदर्शन हिंसक हुआ तब ही पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया है."

एके 47 का इस्तेमाल, तेजस्वी ने कहा- पुलिस स्टेट

बिहार में स्टूडेंट आंदोलन तीन दिन हुआ. 22 जुलाई को छात्र संगठन आइसा ने जंतर मंतर पर हुए लाठीचार्ज के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था. इस दिन प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले, वॉटर कैनन और लाठीचार्ज का इस्तेमाल करना पड़ा था.

22 जुलाई को हुए प्रदर्शन के बाद 23 जुलाई को कटिहार, जहानाबाद, बेगूसराय सहित कई ज़िलों में हिंसक प्रदर्शन हुए. 25 जुलाई को पुलिस के रवैये को लेकर आइसा ने 'बिहार बंद' का आह्वान किया था.

सिवान में एसआईटी के एक जवान अभिषेक पटेल ने एके 47 का इस्तेमाल किया जिसका वीडियो वायरल होने के बाद उन्हें सस्पेंड कर दिया गया.

आख़िर प्रदर्शनकारियों पर एके 47 का इस्तेमाल क्यों किया गया? जब ये सवाल सिवान के एसपी पूरण झा से किया तो उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, "जान-माल और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा के लिए 4 राउंड फायरिंग की गई थी लेकिन एके 47 से हवा में गोली चलाई गई थी. जिन तीन प्रदर्शनकारियों को गोली लगी है उनमें से किसी को एके 47 से चली गोली नहीं लगी है. तीनों घायलों का इलाज चल रहा है और उनकी हालत ख़तरे से बाहर है."

यहां ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि क्या एसआईटी जवान ने किसी के आदेश पर एके 47 का इस्तेमाल किया था? राज्य सरकार के एडीजी (लॉ एंड आर्डर) केएस अनुपम ने कहा, "इस मामले में सिवान में गृह विभाग ने प्रमंडलीय आयुक्त और डीआईजी से रिपोर्ट तलब की है."

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने एके 47 के इस्तेमाल पर सम्राट चौधरी की सरकार को घेरते हुए कहा, "सम्राट चौधरी बिहार को गुंडों के सहारे चलाने वाला पुलिस स्टेट बनाने की कोशिश कर रहे हैं."

वहीं 27 जुलाई को पटना दौरे पर आई आइसा राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा ने बीबीसी से कहा, "किसके आदेश पर एके 47 का इस्तेमाल किया गया? ये आदेश अगर ऊपर से आया है तो निचले स्तर पर काम करने वालों पर इंक्वायरी के बजाए ऊपर वाले अधिकारियों पर इंक्वायरी होनी चाहिए."

"ये आदेश अगर ऊपर से नहीं भी आया है तो भी एके 47 का इस्तेमाल कैसे हुआ? इस मामले में बर्खास्तगी ऊपरी स्तर के अधिकारियों की होनी चाहिए."

सम्राट सरकार बैकफुट पर है?

बिहार सरकार ने 26 जुलाई को शाम 6 बजे तक दर्ज सभी मुकदमों को वापस लेने की घोषणा कर दी थी. लेकिन आंदोलनों को लेकर सरकार के रवैये, आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद हुई गिरफ़्तारियों ने कई सवाल पैदा किए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह कहते हैं, "इस आंदोलन ने पहले से ही अपने कामकाज को लेकर आलोचना झेल रही सम्राट सरकार को बैकफुट पर ला दिया है."

"पहले सरकार का प्रशासन प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें निकालता है, उन पर ईनाम घोषित करता है और उसके बाद सभी को छोड़ देने की घोषणा कर देता है. जबकि प्रदर्शनकारियों की इस तरह की हिंसा हम लोग पहली बार देख रहे हैं. सारे मुक़दमे वापस लेने की घोषणा से प्रशासनिक मशीनरी का मनोबल गिरा है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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