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शिक्षा मंत्रालय में क्यों नहीं टिक पाया कोई चेहरा? मोदी शासन के चार शिक्षा मंत्रियों की कहानी
- Author, शिवांगी जायसवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, नई दिल्ली
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
स्टूडेंट प्रोटेस्ट के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया. इसके साथ ही वे मोदी सरकार के शिक्षा मंत्रालय में अपने पूर्ववर्तियों की सूची में शामिल हो गए हैं, जो अपने कार्यकाल के दौरान विवादों में रहे और फिर समय से पहले ही हटा दिए गए.
भारत की शिक्षा व्यवस्था को लेकर जंतर-मंतर से शुरू हुए सवालों ने एक हफ़्ते के भीतर देशव्यापी युवा प्रदर्शन का रूप ले लिया, जिसके समापन की घोषणा कॉकरोच जनता पार्टी की मांगें स्वीकार किए जाने के बाद कर दी गई है.
मगर इस आंदोलन ने भारत की शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और सरकार की प्राथमिकताओं पर एक नई बहस छेड़ दी है. सवाल सिर्फ़ मौजूदा शिक्षा मंत्री पर नहीं, बल्कि मोदी सरकार के दौरान शिक्षा मंत्रालय की पूरी दिशा को लेकर भी उठ रहे हैं.
2014 से अब तक स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल 'निशंक' और धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति, संस्थागत बदलाव और वैचारिक बहसों के कई दौर देखे हैं.
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आलोचकों का आरोप है कि इन वर्षों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार से अधिक वैचारिक बदलावों पर ज़ोर रहा, जबकि सरकार इसे लंबे समय से लंबित संरचनात्मक सुधारों की प्रक्रिया बताती है.
ऐसे में मौजूदा विवाद ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि मोदी युग के चारों शिक्षा मंत्रियों की भूमिका और विरासत को किस नज़रिए से देखा जाए.
12 साल की मोदी सरकार में शिक्षा मंत्रालय ही ऐसा प्रमुख मंत्रालय रहा, जिसकी कमान चार अलग-अलग मंत्रियों ने संभाली. वहीं, गृह, विदेश, वित्त, रक्षा और स्वास्थ्य जैसे मंत्रालयों में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही.
अहम बात यह है कि तीनों पूर्व शिक्षा मंत्री पद से हटाए जाने के कुछ वर्षों में अलग-अलग कारणों से केंद्रीय कैबिनेट से भी गायब हो गए.
बीजेपी और संघ की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "शिक्षा, संस्कृति और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (आईएनबी)... ऐसे कुछ चुनिंदा मंत्रालय हैं, जिन्हें सॉफ्ट पावर की तरह देखा जाता है और जो संघ की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए अहम रहे हैं. यही कारण है कि यहां विवाद ज़्यादा हुए और अस्थिरता भी उतनी ही दिखती है."
ग़ौर करें तो आईएनबी में 12 साल के भीतर सात केंद्रीय मंत्री और संस्कृति मंत्रालय में पांच केंद्रीय मंत्री बने.
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में स्मृति ईरानी और प्रकाश जावड़ेकर ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभाला. मोदी 2.0 में यह ज़िम्मेदारी रमेश पोखरियाल 'निशंक' को मिली.
मगर 2021 में हुए कैबिनेट शफ़ल के दौरान धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री बना दिया गया, जिनके इस्तीफ़े की मांग को लेकर एक महीने तक कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक जंतर-मंतर पर बैठे रहे और आख़िरकार केंद्र सरकार दबाव में आई.
इससे पहले, मोदी सरकार संसद में नीट लीक के मामले में वार्ता कराने पर सहमत थी, मगर वह विपक्ष से कह रही थी कि वे इस्तीफ़े की मांग को चर्चा की शर्त न बनाएं.
पत्रकार विजय त्रिवेदी का मानना है, "सरकार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के लिए इसलिए तैयार नहीं थी, क्योंकि उनके ऊपर संघ का हाथ है."
उन्होंने कहा, "नीट परीक्षा के लीक होने का मामला अलग कर दें, तो आप पाएंगे कि संघ से जुड़े उन सभी प्रमुख लक्ष्यों को धर्मेंद्र प्रधान बिना शोर-शराबा किए लागू करा पाने में सफल रहे हैं, जिनकी कोशिश उनके पूर्ववर्तियों ने ज़ोर लगाते हुए की और विवादों में फंसते गए."
ग़ौरतलब है कि 2014 में बनी पहली मोदी कैबिनेट में धर्मेंद्र प्रधान को पेट्रोलियम मंत्री बनाया गया, फिर मोदी 2.0 में वे शिक्षा मंत्री बने और मोदी 3.0 कार्यकाल में भी यह ज़िम्मेदारी जारी रही.
उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को बढ़ावा मिला. मातृभाषा और कई भाषाओं में शिक्षा को उन्होंने बढ़ावा दिया. मगर तीन-भाषा फ़ॉर्मूला पर तमिलनाडु राज्य सरकार के साथ लंबे समय तक वे विवाद के केंद्र में भी रहे. विरोधियों ने उन पर राजनीतिक हस्तक्षेप और 'हिंदी थोपने' का आरोप लगाया, जिससे शिक्षा नीति केंद्र बनाम राज्य के विवाद का मुद्दा बन गई.
हालांकि, द हिंदू की एसोसिएट और पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेबर ने बीबीसी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में कहा कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग के मामले में बीजेपी के पास बहुत ज़्यादा राजनीतिक विकल्प नहीं थे, क्योंकि यह मुद्दा मिडिल क्लास और न्यू मिडिल क्लास से जुड़ा है, जो नीट लीक और सीबीएसई ओएसएम के चलते प्रभावित हुआ है.
पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं, "मोदी के कार्यकाल के चारों शिक्षा मंत्रियों को एक ही पैमाने पर रखा जाना चाहिए, क्योंकि कोई भी अपना विज़न लागू करने के लिए स्वतंत्र नहीं था. रणनीतियां ऊपर से बनती थीं. हां, ये ज़रूर है कि हर मंत्री का उसे लागू करने का तरीक़ा अलग हो सकता है. जैसे, स्मृति ईरानी ज़्यादा मुख़र थीं, जावड़ेकर रणनीतिक चुप्पी वाले व्यक्ति थे."
शरद गुप्ता का कहना है कि मोदी के शासन में शिक्षा विभाग में जो भी नीतियां अपनाई गईं, वे सभी वाम विचारधारा को हटाने के मक़सद से लागू हुईं.
वे कहते हैं, "संघ का मक़सद भारत की शिक्षा व्यवस्था से वाम विचारधारा वाली शिक्षा-पद्धति को हटाना है, क्योंकि संघ के मुताबिक़, वे मुग़लों के समर्थक रहे हैं. उनकी नज़र में, मुग़ल घुसपैठिए हैं और देश की मुस्लिम आबादी उनकी वंशज है. वे ये काम अपनी कई शाखाओं में से एक, बीजेपी के ज़रिए करवा रहे हैं."
शरद गुप्ता का कहना है कि इसी पैमाने पर मोदी शासन के शिक्षा मंत्रालय से जुड़ी नीतियों को देखा जाना चाहिए. वहीं विजय त्रिवेदी संघ के इसी लक्ष्य को मोदी सरकार के चार शिक्षा मंत्रियों के चयन का पैमाना मानते हैं.
उनके मुताबिक़, "स्मृति ईरानी को छोड़ दें, तो बाकी तीनों शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल 'निशंक' और धर्मेंद्र प्रधान संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं. वे कहते हैं कि वाजपेयी के ज़माने में भी संघ से आने वाले मुरली मनोहर जोशी को शिक्षा मंत्री बनाया गया था, जो दर्शाता है कि संघ इस मंत्रालय में अपना दख़ल हमेशा चाहता रहा है."
ग़ौरतलब है कि जब 2014 में स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया, तब वह राहुल गांधी से हारकर कैबिनेट का हिस्सा बनी थीं.
उल्लेखनीय है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम मोदी के दूसरे कार्यकाल के दौरान बदला गया. तब केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्रमुख सिफ़ारिश बताते हुए बदला, ताकि 'शिक्षा पर फ़ोकस' रहे.
1985 से पहले इस मंत्रालय को 'शिक्षा मंत्रालय' ही कहा जाता था. इसका नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शासन में बदला गया. तब इसके पीछे का उद्देश्य 'शिक्षा को व्यापक रूप में देखना' बताया गया था.
स्मृति ईरानी के 2014 में लोकसभा चुनाव के लिए भरे पर्चे के हिसाब से वे 12वीं तक पढ़ी हैं. इसको कांग्रेस ने मुद्दा बनाया था. हालांकि, बीजेपी ने यह कहते हुए ख़ारिज़ किया कि वे संसद में हिंदी और अंग्रेज़ी में मुख़रता से अपनी बात रखती हैं.
स्मृति ईरानी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रमुख क़रीबी लोगों में से एक माना जाता था. बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद की 2016 की रिपोर्ट में इसकी तस्दीक़ होती है.
हालांकि, मोदी 1.0 कार्यकाल के कैबिनेट विस्तार में ईरानी को वस्त्र मंत्रालय दे दिया गया. इससे पहले उनके नाम पर डिग्री विवाद, जेएनयू विवाद और रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे विवाद जुड़ चुके थे.
त्रिवेदी कहते हैं, "स्मृति संघ से नहीं थीं. संघ के संदेशों को समझना आसान नहीं है. संघ शोर-शराबा नहीं करता. यही कारण है कि प्रकाश जावड़ेकर को मंत्रालय दिया गया, जो अपनी शांत छवि के लिए जाने जाते हैं."
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही नई शिक्षा नीति को लेकर काम शुरू हो गया था.
मंत्रालय में स्मृति ईरानी के कार्यकाल के दौरान नई शिक्षा नीति पर काम की शुरुआत हुई और मोदी के कार्यकाल के तीसरे शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' के समय इसे लागू किया गया.
बीबीसी की 2016 की ख़बर के मुताबिक़, "समझा जाता है कि नई शिक्षा नीति तैयार करने और उसे लागू करने में देरी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी उनसे (स्मृति) बहुत खुश नहीं था."
भारत में नई शिक्षा नीति 34 साल बाद 2020 में लागू हुई थी, जो मोदी कार्यकाल का एक बड़ा कदम माना जाता है. नई शिक्षा नीति में शिक्षा के बजट को जीडीपी के छह फीसदी रखने का लक्ष्य रखा गया था.
हाल में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया कि केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी पिछले 12 वर्षों में तेज़ी से घटी है.
यह हिस्सा 2013-14 में कांग्रेस-नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में 4.6% था, जो 2025-26 में घटकर 2.5% रह गया.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं कि शिक्षा का घटता बजट ही दर्शाता है कि मोदी सरकार शिक्षा में सुधार को लेकर गंभीर नहीं है.
वे कहते हैं कि "पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी विचारधारा पर बौद्धिकता की कमी का आरोप लगता है."
शरद गुप्ता ने कहा कि वामपंथ के गढ़ कहे जाने वाले जेएनयू में संघ लंबे समय से अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा था और आख़िरकार वे कामयाब हुए.
वे कहते हैं, "चारों शिक्षामंत्रियों के समय में लगभग हर विश्व विद्यालय में बड़े स्तर पर फ़ैकल्टी के चयन में विचारधारा को प्राथमिकता दी गई है. इस तरह भले आगे सरकार चली भी जाए तो भी कम से कम दो पीढ़ियों तक संघ शैक्षिक संस्थाओं पर अपना असर जमाए रख सकेगा."
त्रिवेदी कहते हैं कि "अब जो थीसिस हो रही हैं, वो सभी संघ विचारधारा से जुड़े विषयों पर हो रही हैं. फिर वो आगे लेक्चरर बन रहे हैं."
ग़ौरतलब है कि वामपंथ का गढ़ माने जाने वाले जेएनयू में 2022 में शांतिश्री धुलीपुडी पंडित को कुलपति बना गया था, अब इस पद को वहां 'कुलगुरू' कहा जाता है. ये विश्वविद्यालय के इतिहास की पहली महिला और खुले तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपने जुड़ाव को स्वीकारने वाली कुलपति मानी जाती हैं.
मोदी सरकार के दूसरे शिक्षा मंत्री (एचआरडी मंत्रालय) प्रकाश जावड़ेकर के कार्यकाल के दौरान वह दौर भी दिखा, जब पुलवामा चरमपंथी हमले के बाद देश के कई हिस्सों से कश्मीरी विद्यार्थियों के ख़िलाफ़ हिंसा की ख़बरें आईं.
बीबीसी ने तब इस पर जावड़ेकर से सवाल किया मगर उन्होंने इन घटनाओं से इनकार कर दिया. उनके दौर में सीबीएसई 10वीं और 12वीं का एक-एक पेपर लीक होने से जुड़े आरोपों का मामला सामने आया, जिसके बाद मंत्रालय ने इसे दोबारा कराने की घोषणा की. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ भी तब जंतर-मंतर पर स्टूडेंट्स ने प्रदर्शन किया था.
हालांकि उनके दौर को 'इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस', एनटीए की स्थापना जैसी पहल के लिए भी याद किया जाता है.
ध्यान रहे कि एनटीए वही बॉडी है, जिसके ओर से कराए गए नीट परीक्षा में लीक के मामलों के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन चला.
पत्रकार त्रिवेदी कहते हैं, "निशंक की बात करें, तो उनकी पहचान संघ से आने वाले एक विद्वान की रही है, जो संघ के मक़सद को आगे ले जा सकते थे."
हालांकि, अपने अवैज्ञानिक बयानों को लेकर भी वे विवादों में आए. उन्होंने यहां तक कहा कि 'चरक ऋषि ने अणु-परमाणु की खोज की थी.'
कोविड के समय जेईई-नीट की परीक्षा कराए जाने की घोषणा के बाद उनके ख़िलाफ़ काफ़ी ऑनलाइन विरोध हुआ था. विरोध में लोग कोर्ट भी गए, जहां सरकार के पक्ष में फ़ैसला आया. हालांकि, तब बड़ी संख्या में छात्र परीक्षा देने से रह गए, जिसे लेकर विवाद हुआ.
उनके समय भी आरोप लगे कि नई शिक्षा नीति के ज़रिए केंद्र सरकार शिक्षा पर नियंत्रण अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रही है, जिसे उन्होंने नकारा.
पत्रकार शरद गुप्ता का मानना है कि "दक्षिणपंथी विचारधारा के शिक्षा पर हावी होने के चलते ही कुछ मामलों में कहा गया कि भारतीय छात्र रोज़गार योग्य क्षमता नहीं रखते."
कहा जाता है कि कोविड-ग्रस्त होने के बाद बीमारी के चलते उन्होंने पद से इस्तीफ़ा दिया था. मगर फिर वे मोदी कैबिनेट से पूरी तरह बाहर हो गए और धर्मेंद्र प्रधान ने यह पद 2021 से जुलाई 2026 तक संभाला.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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