ईरान की जंग में अमेरिकी मिसाइलों का भारी इस्तेमाल, क्या घट रहा है हथियारों का ज़ख़ीरा?

    • Author, बेर्नड डेबुसमैन जूनियर
    • पदनाम, व्हाइट हाउस रिपोर्टर
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 13 मिनट

इस महीने की शुरुआत में जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पेंसिल्वेनिया डिफेंस एंड इनोवेशन समिट में मंच पर पहुंचे, तो उनके साथ अमेरिका की कुछ सबसे बड़ी रक्षा कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) भी मौजूद थे.

उनके सब के लिए डोनाल्ड ट्रंप का एक ही संदेश था-अधिक हथियार बनाइए और उन्हें तेजी से बनाइए.

ट्रंप ने 'यूएस आर्मी वॉर कॉलेज' में जुटे हथियार निर्माताओं से कहा, "हमारी गुणवत्ता दुनिया में सबसे अच्छी है. लेकिन हमें थोड़ी और तेजी की जरूरत है."

इस समिट में अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ भी मौजूद थे.

ट्रंप प्रशासन ने इस सम्मेलन को अमेरिकी उद्योग को पुनर्जीवित करने और अमेरिका की युद्ध क्षमता को मजबूत करने की दोहरी रणनीति का हिस्सा बताया.

लेकिन इस दौरान एक अहम तथ्य पर बहुत कम चर्चा हुई.

इस साल की शुरुआत में "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" के तहत ईरान में लगभग 40 दिनों तक चले सैन्य अभियानों में बड़ी मात्रा में अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ.

अमेरिकी सरकार के अनुसार अब तक, इस युद्ध का खर्च 37.5 अरब डॉलर रहा है, और इसका अधिकांश हिस्सा गोला-बारूद पर खर्च हुआ है.

व्हाइट हाउस के अनुसार, 8 अप्रैल को युद्धविराम लागू होने तक अमेरिकी सेना ने ईरान में 13 हज़ार से अधिक लक्ष्यों पर हमले किए थे. इस दौरान अमेरिकी एयर डिफ़ेंस सिस्टम ने 1,700 से अधिक ईरानी ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों को भी निष्क्रिय किया.

अब अमेरिका ने वार्ताओं को आगे बढ़ाने के लिए ईरान पर अपने हमलों को अस्थायी रूप से रोक दिया है.

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप को सलाह दी गई थी कि वे संघर्ष को और बढ़ाने की योजनाओं को फिलहाल स्थगित कर दें, क्योंकि इससे अमेरिकी हथियार भंडार पर और अधिक दबाव पड़ रहा है.

सोमवार को ट्रंप ने हथियारों की किसी भी तरह की कमी से इनकार करते हुए वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा, "हमारे पास दुनिया में किसी भी अन्य देश से कहीं अधिक गोला-बारूद है, और हमारी आवश्यकता से भी कहीं ज्यादा है."

यह मुद्दा कुछ समय से अमेरिकी प्रशासन के भीतर एक संवेदनशील विषय बना हुआ है. पिछले महीने रक्षा मंत्री ने इस बात से इनकार किया था कि हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति कम होती जा रही है.

हालांकि, ऐसा लगता है कि तब से उनका रुख बदल गया है. पिछले सप्ताह उन्होंने सीनेट एप्रोप्रिएशंस कमेटी को बताया कि पेंटागन को "गंभीर कमियों" को दूर करने के लिए 87 अरब डॉलर की आवश्यकता है.

गोला-बारूद के वास्तविक उपयोग और शेष भंडार की सटीक जानकारी अब भी गोपनीय रखी गई है. लेकिन वाशिंगटन डीसी स्थित सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (सीएसआईएस) के मुताबिक हालात चिंताजनक हैं.

सीएसआईएस के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी हथियार भंडार काफी हद तक घट चुके हैं और निकट भविष्य में उनकी भरपाई करना आसान नहीं होगा.

इस विषय पर शोध कर रहे सीएसआईएस के वरिष्ठ सलाहकार और सेवानिवृत्त मरीन कोर कर्नल मार्क कैंसियन कहते हैं, "यह इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार पर निर्भर करता है, लेकिन एक मिसाइल बनाने में आमतौर पर एक से पांच साल तक का समय लग सकता है. यही वास्तविकता है. और इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए बहुत अधिक कुछ नहीं किया जा सकता."

लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका वास्तव में इतनी तेजी से अपना गोला-बारूद खर्च कर रहा है कि भविष्य में उसे अपनी सैन्य जिम्मेदारियों पूरा करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है?

हथियारों की कमी

युद्ध में इस्तेमाल किए गए महत्वपूर्ण हथियार मुख्य रूप से दो श्रेणियों में आते हैं: लंबी दूरी तक ज़मीन पर हमला करने वाले हथियार और ईरान के हमलों को रोकने के लिए उपयोग की गई वायु और मिसाइल रक्षा प्रणालियां.

ज़मीनी हमलों के लिए इस्तेमाल होने वाले हथियारों में टॉमहॉक लैंड अटैक मिसाइल शामिल रही हैं. यह मिसाइल आमतौर पर युद्धपोतों या पनडुब्बियों से दागी जाती है और लगभग 1,600 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर स्थित लक्ष्यों को निशाना बना सकती है.

ये हथियार अमेरिका को कमांड बंकरों, मजबूत सैन्य ठिकानों और अन्य संरक्षित लक्ष्यों पर अत्यंत सटीक हमले करने की क्षमता देते हैं. साथ ही, इनके उपयोग से मानव-संचालित लड़ाकू विमानों और उनके चालक दल को सीधे खतरे में डाले बिना सैन्य अभियान चलाए जा सकते हैं.

सीएसआईएस के अनुमान के अनुसार, युद्ध के दौरान एक हज़ार से अधिक टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं. इस संस्था का आकलन है कि अमेरिकी भंडार को युद्ध-पूर्व स्तर तक वापस पहुंचने में 2031 तक का समय लग सकता है.

सीएसआईएस के अनुसार, टॉमहॉक मिसाइल के नए वेरियंट की कीमत लगभग 26 लाख डॉलर प्रति मिसाइल है.

युद्ध के दौरान इस्तेमाल की गई वायु रक्षा प्रणालियों में पैट्रियट सबसे अधिक उपयोग में लाई गई. यह एक जमीन से दागी जाने वाली मिसाइल प्रणाली है, जिसका इस्तेमाल विमानों के साथ-साथ बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों को मार गिराने के लिए किया जाता है.

सीएसआईएस के अनुमान के अनुसार, संघर्ष के दौरान लगभग 1,430 पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया. युद्ध से पहले अमेरिका के पास इनका अनुमानित भंडार लगभग 2,330 मिसाइलों का था.

हर पैट्रियट इंटरसेप्टर की कीमत करीब 40 लाख डॉलर है. यह एक महंगा लेकिन प्रभावी हथियार है, जिसका बार-बार इस्तेमाल उन ईरानी ड्रोन को मार गिराने के लिए किया गया जिनकी कीमत स्वयं केवल 20 हज़ार से 50 हज़ार डॉलर के बीच थी.

इन मिसाइलों की भरपाई करना आसान नहीं होगा.

मार्क कैंसियन कहते हैं, "एक मिसाइल बनाने में कई साल लग जाते हैं. अगर आप आज इस प्रणाली में पैसा लगाएं, तब भी आपको नई मिसाइलें मिलने में तीन या चार साल लगेंगे, और कभी-कभी पांच साल तक भी. अभी जो मिसाइलें हमें मिल रही हैं, वे वास्तव में 2023 में स्वीकृत और फंडेड परियोजनाओं का परिणाम हैं."

युद्ध में एक और अपेक्षाकृत नई और अधिक उन्नत प्रणाली 'टर्मिनल हाई अल्टीट्यूड एरिया डिफेंस' का भी उपयोग किया गया. इसकी मारक क्षमता और इंटरसेप्शन (अवरोध) की ऊंचाई पुराने पैट्रियट सिस्टम की तुलना में अधिक है.

हालांकि, इन मिसाइलों का भंडार पहले से ही सीमित था. सीएसआईएस के अनुसार, युद्ध से पहले उपलब्ध लगभग 360 थाड इंटरसेप्टरों में से 190 से 290 तक का इस्तेमाल किया गया. दुनिया में वर्तमान में केवल नौ थाड बैटरियां हैं, जिनमें से सात अमेरिका के पास हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस प्रणाली का इसी तरह बड़े पैमाने पर उपयोग जारी रहा, तो अमेरिकी सेना के पास ऐसे महत्वपूर्ण रक्षा संसाधनों की कमी हो सकती है. ये सिस्टम रूस, चीन या उत्तर कोरिया जैसे देशों से आने वाले बैलिस्टिक मिसाइल खतरों का मुकाबला करने के लिए बहुत अहम हैं.

सभी की नज़रें ताइवान और प्रशांत क्षेत्र पर

ईरान के साथ युद्ध ऐसे समय में हुआ है जब चीन के ताइवान पर हमले की संभावना बढ़ती जा रही थी.

इसे विश्लेषक इसे डेविडसन विंडो कहते हैं. यह विवादास्पद अवधारणा प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है. ये 2021 में हुई एक संसदीय सुनवाई से जुड़ी है.

उस समय क्षेत्र में अमेरिकी सेनाओं के प्रमुख एडमिरल फिलिप डेविडसन ने चेतावनी दी थी कि चीन अगले छह सालों के भीतर ताइवान पर हमला कर सकता है.

इसके बाद 2023 में तत्कालीन सीआईए निदेशक विलियम बर्न्स ने भी कहा था कि चीन वर्ष 2027 तक ताइवान पर आक्रमण करने की सैन्य तैयारी हासिल कर सकता है.

ताइवान की रक्षा के लिए अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप करेगा या नहीं और क्या वह चीन के साथ युद्ध का जोखिम उठाएगा, यह अमेरिकी राजनीति और रणनीतिक समुदाय में लंबे समय से बहस का विषय बना हुआ है.

कैंसियन इन हथियारों और गोला-बारूद की कमी को एक "कमजोर कड़ी" बताते हैं. उनका कहना है कि अगर प्रशांत क्षेत्र में कोई संघर्ष छिड़ जाता है, तो अमेरिका के पास उन उन्नत हथियारों का पर्याप्त भंडार नहीं होगा जिन्हें वह युद्ध की स्थिति में वह इस्तेमाल करना पसंद करता है.

उनके अनुसार, इससे यह जोखिम बढ़ जाता है कि अमेरिकी सेनाएं चीन के विशाल मिसाइल और वायु शक्ति भंडार का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होंगी.

प्रशांत क्षेत्र में संभावित संघर्ष की स्थिति में चीन अपने बड़े मिसाइल शस्त्रागार और उन्नत लड़ाकू विमानों का व्यापक उपयोग कर सकता है.

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन ईरान युद्ध के दौरान अमेरिकी वायु रक्षा प्रणालियों का बारीकी से अध्ययन कर रहा है. हाल के वर्षों में बीजिंग ने मिसाइल तकनीक में भारी निवेश किया है, जिसमें हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइलें भी शामिल हैं.

ये मिसाइलें ईरान की इस्तेमाल की गई पारंपरिक मिसाइलों और कम लागत वाले ड्रोन की तुलना में कहीं अधिक उन्नत और जटिल मानी जाती हैं.

इसके अलावा, चीन ने बड़ी संख्या में ड्रोन को एक साथ संचालित करने वाली "ड्रोन-स्वॉर्म" रणनीति पर भारी निवेश किया है.

हालांकि, सभी विशेषज्ञ अमेरिकी हथियार भंडार में कमी को केवल एक नकारात्मक स्थिति के रूप में नहीं देखते.

सीआईए के पूर्व अधिकारी और अमेरिकी रक्षा मंत्री के कार्यालय में मध्य पूर्व नीति सलाहकार रह चुके जैकब ओलिडॉर्ट का मानना है कि इन हथियारों का वास्तविक युद्ध में इस्तेमाल स्वयं एक शक्तिशाली संदेश देता है.

ओलिडॉर्ट अब अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट में अमेरिकी सुरक्षा नीति के निदेशक हैं.

उनका कहना है, "हथियार केवल इसलिए रक्षा क्षमता नहीं पैदा करते बल्कि ये उस देश की इस्तेमाल करने की इच्छा और क्षमता भी दिखाते हैं."

वे आगे कहते हैं कि अमेरिका ने बेहद कम समय में सटीक हमलों के जरिए ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने में जो सफलता हासिल की है, वह अन्य संभावित प्रतिद्वंद्वियों, विशेष रूप से चीन, को भी एक स्पष्ट संदेश देती है.

उनके अनुसार, ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी अभियानों ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका न केवल उन्नत सैन्य तकनीक रखता है, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उसका प्रभावी और तेज़ी से उपयोग भी कर सकता है. यह संदेश चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं सहित अन्य रणनीतिक चुनौतियों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

यूरोप के बारे में क्या?

सहयोगी देशों को हथियार उपलब्ध कराने और अमेरिकी सैन्य भंडार को सुरक्षित बनाए रखने के बीच का तनाव पहले ही यूक्रेन के मामले में सामने आ चुका है.

अक्तूबर 2025 में, यानी ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू होने से कई महीने पहले, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन को टॉमहॉक मिसाइलें देने से इनकार कर दिया था. उन्होंने इसके पीछे कारण यह बताया था कि अमेरिका अपने हथियार भंडार को कम नहीं करना चाहता.

यह घटना उन कठिन रणनीतिक फैसलों की एक झलक थी, जो अब ईरान युद्ध के बाद अमेरिकी रक्षा नीति और हथियार भंडार को लेकर चल रही बहस का हिस्सा बन चुके हैं.

यूक्रेनी अधिकारियों का कहना है कि उन्हें रूसी ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना करने के लिए पैट्रियट वायु रक्षा प्रणालियों और अन्य एयर डिफेंस उपकरणों की तत्काल आवश्यकता है.

मार्च में बीबीसी से बातचीत के दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने कहा, "ऊर्जा की कीमतों पर प्रभाव के अलावा, इसका (ईरान युद्ध का) मतलब अमेरिकी भंडार में कमी और वायु रक्षा प्रणाली बनाने वाली कंपनियों की क्षमता पर दबाव भी है. इसलिए हम संसाधनों की कमी का सामना कर रहे हैं."

ज़ेलेंस्की ने अपनी चिंता को आंकड़ों के साथ स्पष्ट किया. उनके अनुसार, अमेरिका हर महीने लगभग 60 से 65 मिसाइलों का उत्पादन करता है, यानी सालाना 700 से 800 मिसाइलें. जबकि केवल ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के पहले ही दिन 803 मिसाइलों का इस्तेमाल कर लिया गया था.

हालांकि, हाल के दिनों में ट्रंप ने कई यूरोपीय अधिकारियों को चौंका दिया, जब उन्होंने यूक्रेन को अपने देश में ही पैट्रियट मिसाइल प्रणाली के उत्पादन का अधिकार देने की पेशकश की.

इसी तरह की व्यवस्थाएं पहले से जर्मनी और जापान में मौजूद हैं, जहां इन प्रणालियों का स्थानीय स्तर पर उत्पादन या निर्माण सहयोग किया जाता है.

अमेरिकी रक्षा विभाग में 13 वर्षों तक कार्य कर चुकीं और मौजूदा समय में अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट से जुड़ी विशेषज्ञ एलेन मैककस्कर का मानना है कि यूक्रेन और ईरान से मिले अनुभव भविष्य में कम लागत वाले और बड़े पैमाने पर बनाए जा सकने वाले डिफ़ेंस सिस्टम के विकास में मदद कर सकते हैं.

मैककस्कर कहती हैं, "हम मालूम है कि 1,000 डॉलर की कीमत वाले ड्रोन को मार गिराने के लिए 60 लाख डॉलर के इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. मुझे लगता है कि अब इस समस्या के समाधान पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है. अधिक लोग ऐसे हथियार और रक्षा प्रणालियां विकसित करने पर काम कर रहे हैं जिन्हें बड़े पैमाने पर बनाया जा सके, जिन्हें युद्ध में खोने का जोखिम उठाया जा सके और जिनकी लागत भी इतनी अधिक न हो."

परिणाम और आगे की चुनौतियां

इन सब बातों के बावजूद, निकट भविष्य में गोला-बारूद खत्म हो जाने की संभावना को लेकर व्यापक चिंता नहीं दिखाई दे रही है.

इसकी वजह यह नहीं है कि अमेरिका के हथियार भंडार असीमित हैं, बल्कि यह है कि ईरान की स्थिति कहीं अधिक कमजोर मानी जा रही है.

बीबीसी को भेजे गए एक बयान में व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एना केली ने कहा, "अमेरिकी सेना के पास राष्ट्रपति ट्रंप के सभी रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने और उससे भी आगे जाने के लिए पर्याप्त से अधिक हथियार, गोला-बारूद और सैन्य भंडार मौजूद हैं. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई अमेरिका को चुनौती देता है, तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं."

"इसके बावजूद, राष्ट्रपति ने हमारे रक्षा ठेकेदारों से लगातार अधिक से अधिक अमेरिकी-निर्मित हथियारों का उत्पादन करने का आग्रह किया है."

हाल के दिनों में अमेरिकी सेंट्रल कमांड घोषित सैन्य कार्रवाइयों का मुख्य उद्देश्य तेहरान की उन क्षमताओं को कमजोर करना रहा है, जिनके जरिए वह स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में जहाजों के लिए खतरा पैदा कर सकता है.

अमेरिका और इसराइल के लगातार हमलों के बाद ईरान को अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक सैन्य नुकसान हुआ है, और निकट भविष्य में इन कमियों को पूरा करने की उसकी क्षमता बेहद सीमित है.

यूनाइटेड अगेंस्ट न्यूक्लियर ईरान के नीति निदेशक जेसन ब्रॉड्स्की कहते हैं, "कई टिप्पणियां ईरान को ऐसे दिखाती हैं, मानो उसके पास लगभग असीमित मात्रा में हथियार हों."

वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि हमें यह समझना होगा कि वहां भी सीमाएं हैं और अमेरिका ने उनके रक्षा औद्योगिक आधार को बहुत बड़े स्तर पर कमजोर कर दिया है."

वे आगे कहते हैं कि ईरान की "बड़े पैमाने पर उन प्रकार की मिसाइलों, ड्रोन और अन्य हथियार प्रणालियों का उत्पादन करने की क्षमता", जिनकी उसे आवश्यकता है, काफी हद तक नष्ट हो चुकी है.

ब्रॉड्स्की के अनुसार, ईरान के बचे हुए हथियार भंडार को उस दिशा में केंद्रित किया जा रहा है जिसे उन्होंने तेहरान का तुरुप का पत्ता बताया है, यानी स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़.

उनके अनुसार, यह क्षमता अब कमजोर पड़ती जा रही है यानी ईरानी शासन के पास अब समय तेजी से खत्म हो रहा है.

ब्रॉड्स्की के अनुसार, ईरान के साथ मौजूदा और नियंत्रित स्तर का संघर्ष, जिसे उन्होंने अमेरिकी सेना का "केंद्र बिंदु" बताया, फ़िलहाल अमेरिका की सर्वोच्च प्राथमिकता है.

वे कहते हैं, "इंडो-पैसिफिक इस समय अपेक्षाकृत दूर का खतरा है. नीति बनाने वालों को प्राथमिकताएं तय करनी पड़ती हैं, और फिलहाल मध्य-पूर्व राष्ट्रपति का ध्यान आकर्षित किए हुए है."

फिलहाल, ईरानी लक्ष्यों पर दागी जाने वाली, यूक्रेन के मोर्चों पर भेजी जाने वाली या ताइवान के लिए सुरक्षित रखी जाने वाली हर मिसाइल ऐसे भंडार से आती है जो लगातार घटता जा रहा है.

इसके बावजूद, अमेरिका को भरोसा है कि उत्पादन बढ़ने तक वह इस संघर्ष से निपटने में सफल रहेगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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