जब दो दिन नहीं दिखा सूरज: इतिहास का सबसे तेज़ धमाके वाला ज्वालामुखी विस्फोट

    • Author, डेज़ी स्टीफंस
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

इंडोनेशिया का एक ज्वालामुखीय द्वीप अनाक क्राकाटाउ इस हफ्ते कई बार फटा. स्थानीय मीडिया के मुताबिक, ज्वालामुखी से निकलने वाले राख़ के ग़ुबार क़रीब 250 मीटर तक आसमान में उठे.

ख़बरों के मुताबिक़, इंडोनेशिया की भूवैज्ञानिक एजेंसी ने बताया कि मंगलवार को एक बार और बुधवार को दो बार अनाक क्राकाटाउ में विस्फोट हुआ.

हालांकि, इलाके़ में ज्वालामुखी की गतिविधियों पर नज़र रखने वाले एक निगरानी समूह का कहना है कि फ़िलहाल आसपास रहने वाले लोगों के लिए कोई ख़तरा नहीं है.

अनाक क्राकाटाउ साल 1927 में समुद्र के नीचे बने एक विशाल गड्ढे यानी काल्डेरा से बना था.

यह काल्डेरा 1883 में क्राकाटोआ ज्वालामुखी के भीषण विस्फोट के बाद बना था, जिसे इतिहास की दूसरी सबसे घातक ज्वालामुखी त्रासदियों में से एक माना जाता है.

साल 1883 में हुए इस भयानक विस्फोट ने महज़ 48 घंटों के भीतर 36 हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान ले ली थी और इससे 165 गांव पूरी तरह तबाह हो गए थे.

इतना ही नहीं, इस विस्फोट से निकली आवाज़ को आज भी दुनिया की सबसे तेज़ दर्ज की गई आवाज़ माना जाता है. इसकी गूंज हज़ारों मील दूर तक सुनाई दी थी.

वहीं, इतनी ज़्यादा राख़ वातावरण में फैल गई थी कि कई सालों तक दुनिया भर के तापमान पर इसका असर पड़ा और वैश्विक तापमान में गिरावट दर्ज की गई.

बीबीसी की यह रिपोर्ट इतिहास की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक की कहानी पर नज़र डालती है.

दो दिनों से भी ज़्यादा समय तक अंधेरा छाया रहा

मई 1883 में इस आपदा के शुरुआती संकेत दिखाई देने शुरू हो गए थे. अमेरिका के नेशनल सेंटर्स फॉर एनवायरनमेंटल इंफॉर्मेशन (एनसीईआई) के मुताबिक, उस वक्त एक जर्मन युद्धपोत का कप्तान वहां से गुज़र रहा था, तभी उसने क्राकाटोआ से उठते राख़ और धूल के विशाल गुबार देखे.

उस समय तक यह ज्वालामुखीय द्वीप क़रीब 200 सालों से शांत पड़ा था.

अगले कुछ महीनों में व्यापारिक और दूसरे जहाज़ों के चालक दल ने भी ऐसे ही नज़ारे देखने की बात कही.

फिर 26 अगस्त को वह विनाशकारी सिलसिला शुरू हुआ, जिसने इतिहास की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में अपनी जगह बना ली.

क्राकाटोआ के पहले विशाल विस्फोट से लावा, झांवा पत्थर (प्यूमिस) और राख़ का तेज़ बहाव समुद्र में जा गिरा. इसके चलते एक भीषण समुद्री लहर यानी सुनामी उठी, जो उत्तर की ओर बढ़ी और इससे हज़ारों लोगों की मौत हो गई.

विस्फोट के महज़ एक घंटे के भीतर राख़ का ग़ुबार क़रीब 48 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच गया और चारों दिशाओं में फैलने लगा.

यह राख़ का बादल क़रीब 80 किलोमीटर तक आसमान में फैल गया. एनसीईआई के मुताबिक, इसने लगभग 3 लाख वर्ग मील इलाके को अपनी चपेट में ले लिया और पूरे क्षेत्र में दो दिनों से भी ज़्यादा समय तक अंधेरा छाया रहा.

धमाके की आवाज़ ऑस्ट्रेलिया तक सुनी गई थी

जब सिडनी बेकर छोटे थे, तब उन्होंने अपने पिता के जहाज़ से क्राकाटोआ का वह भयानक विस्फोट अपनी आंखों से देखा था.

ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में उन्होंने उस मंज़र को याद करते हुए अपनी कहानी सुनाई.

उन्होंने 1946 में बीबीसी से कहा, "हवा राख़ और धूल से इस कदर भर गई थी कि हमें लगा अब दम घुट जाएगा."

उन्होंने बताया,"चारों तरफ़ इतना घना अंधेरा छा गया था कि अपने सामने हाथ तक नहीं दिख रहा था. राख़ लगातार जहाज़, समुद्र और हमारे ऊपर गिर रही थी. पूरे जहाज़ पर क़रीब छह से सात इंच मोटी राख़ की परत जम गई थी."

बेकर ने बताया कि धमाकों की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि भरोसा नहीं किया जा सकता.

उन्होंने कहा, "उस शोर और तबाही को बयान करने के लिए शब्द ही कम पड़ जाते हैं."

'क्राकाटोआ: द डे द वर्ल्ड एक्सप्लोडेड' किताब के लेखक साइमन विनचेस्टर के मुताबिक़, 27 अगस्त को सुबह 10 बजकर 2 मिनट पर हुए एक "टाइटैनिक धमाके" से पहले भी कई बड़े विस्फोट हुए थे.

अमेरिका के एनसीईआई के मुताबिक़, उस धमाके की आवाज़ ऑस्ट्रेलिया और मॉरीशस तक सुनी गई थी, जो वहां से क़रीब 4,600 किलोमीटर दूर हैं.

साल 2010 में बीबीसी के 'विटनेस हिस्ट्री' पॉडकास्ट में साइमन विनचेस्टर ने कहा, "पूरे द्वीप की कई किलोमीटर चट्टानें इस विस्फोट में मानो भाप बनकर उड़ गईं. प्यूमिस और राख़ 17 से 18 मील की ऊंचाई तक आसमान में पहुंच गई और पूरा द्वीप मानो ग़ायब हो गया."

उन्होंने आगे बताया, "कुछ सेकंड के लिए समुद्र के बीच एक विशाल गड्ढा बन गया. फिर उसमें खरबों टन पानी भर गया. नीचे का हिस्सा इतना गर्म था कि पानी पलभर में भाप बन गया और इसी वजह से एक के बाद एक कई विशाल सुनामी लहरें पैदा हुईं."

इस त्रासदी में 36 हज़ार लोग मारे गए थे

इस पूरी त्रासदी में सबसे ज़्यादा तबाही सुनामी ने मचाई. इसमें 36 हज़ार लोग मारे गए थे और करीब 34 हज़ार लोगों की जान सिर्फ सुनामी की वजह से गई थी.

सिडनी बेकर ने बताया कि वह अपने पिता के साथ इंडोनेशिया के बांटेन प्रांत के पश्चिमी तट पर बसे अंजर शहर की ओर गए थे.

उन्होंने कहा, "पूरा शहर समुद्र के पानी में डूब चुका था."

बेकर ने अपने पिता की बात याद करते हुए बताया, "वो कहा करते थे कि जिस होटल में वे ठहरे थे, वह इतना डूब गया था कि जहाज़ उसके ऊपर से निकल सकता था और उसकी चिमनी में लंगर डाला जा सकता था."

कुछ लोग किसी तरह सुनामी से बचकर पहाड़ियों की तरफ भागने में कामयाब रहे.

लेकिन वहां भी वे पूरी तरह सुरक्षित नहीं थे. इसके बाद ज्वालामुखी से निकले पायरोक्लास्टिक फ्लो यानी बेहद तेज़ रफ्तार से ज़मीन के साथ बहने वाली गर्म गैसों, राख़ और चट्टानों की घातक लहरें उनकी ओर बढ़ीं और कई लोगों की जान ले ली.

क्राकाटोआ का असर सिर्फ़ उन 48 घंटों तक सीमित नहीं रहा.

विस्फोट से निकली राख़ पूरी दुनिया में फैल गई. इससे सूरज और चांद के चारों ओर एक चमकीला घेरा दिखाई देने लगा और वातावरण में मौजूद राख़ ने सूरज की किरणों को फ़िल्टर करना शुरू कर दिया.

अमेरिका के एनसीईआई के मुताबिक़, इसकी वजह से दुनिया का औसत तापमान क़रीब 0.5 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया. हालात सामान्य होने में क़रीब पांच साल लगे.

वातावरण में फैले इन महीन कणों की वजह से दुनिया भर में सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग असामान्य रूप से गहरा लाल दिखाई देने लगा, क्योंकि ये कण रोशनी को सामान्य से अलग तरीके़ से बिखेर रहे थे.

उस दौर की कई पेंटिंग्स में यह लाल आसमान साफ़ नज़र आता है. कुछ विशेषज्ञ तो यह भी मानते हैं कि मशहूर चित्रकार एडवर्ड मंक की फ़ेमस पेंटिंग 'द स्क्रीम' में दिखाया गया लाल आसमान भी क्राकाटोआ के इसी विस्फोट से प्रेरित था.

इस विस्फोट ने वैज्ञानिकों को सिखाई नई बात

इतनी भारी तबाही मचाने के बावजूद क्राकाटोआ के इस विस्फोट ने वैज्ञानिकों को हमारी धरती के बारे में एक बेहद अहम बात भी सिखाई.

इस विस्फोट से पहले दुनिया जेट स्ट्रीम के बारे में नहीं जानती थी. ये वायुमंडल की ऊपरी परतों में बहने वाली बेहद तेज़ और अदृश्य हवाओं की धाराएं होती हैं, जो दुनिया के मौसम को तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं.

लेकिन क्राकाटोआ के विस्फोट के बाद जब उसकी राख़ और उसके असर पूरी दुनिया में दिखाई दिए, तब वैज्ञानिकों को समझ आया कि वायुमंडल में ऐसी तेज़ हवा की धाराएं मौजूद हैं, जो इन कणों को हज़ारों किलोमीटर दूर तक ले जा सकती हैं.

विनचेस्टर कहते हैं, "यह पहली ऐसी घटना थी, जिसने वैज्ञानिक सोच रखने वाली दुनिया को एहसास कराया कि इसका असर पूरी पृथ्वी पर पड़ा है."

इतनी भारी तबाही मचाने के बावजूद क्राकाटोआ के इस विस्फोट ने वैज्ञानिकों को हमारी धरती के बारे में एक बेहद अहम बात भी सिखाई.

इस विस्फोट से पहले दुनिया जेट स्ट्रीम के बारे में नहीं जानती थी. ये वायुमंडल की ऊपरी परतों में बहने वाली बेहद तेज़ और अदृश्य हवाओं की धाराएं होती हैं, जो दुनिया के मौसम को तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं.

लेकिन क्राकाटोआ के विस्फोट के बाद जब उसकी राख़ और उसके असर पूरी दुनिया में दिखाई दिए, तब वैज्ञानिकों को समझ आया कि वायुमंडल में ऐसी तेज़ हवा की धाराएं मौजूद हैं, जो इन कणों को हज़ारों किलोमीटर दूर तक ले जा सकती हैं.

'क्राकाटोआ: द डे द वर्ल्ड एक्सप्लोडेड' के लेखक साइमन विनचेस्टर कहते हैं, "यह पहली ऐसी घटना थी, जिसने वैज्ञानिक सोच रखने वाली दुनिया को एहसास कराया कि इसका असर पूरी पृथ्वी पर पड़ा है."

वह आगे कहते हैं, "यहीं से लोगों को समझ आने लगा कि पूरी दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी हुई है. आज हम जिस तरह ग्लोबल वॉर्मिंग, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और पूरी धरती पर पड़ने वाले पर्यावरणीय असर की बात करते हैं, उसकी सोच की शुरुआत भी कहीं न कहीं क्राकाटोआ के इसी विस्फोट से हुई थी. इसी घटना ने दुनिया को एक आपस में जुड़ी हुई इकाई के रूप में देखने का नज़रिया दिया."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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