कोरोना वायरस: मां के साथ वीडियो कॉल पर था, जब वो हमेशा के लिए सो गईं

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मां की मौत से कुछ घंटे पहले ही मैंने उनसे वीडियो कॉल पर बात की थी, तब वो अपने क़रीबियों और जिन्हें वो चाहती थीं उनके नाम ले रही थीं. मैं उनसे बातें करता रहा और धीरे धीरे वो चिरनिद्रा में सोने लगीं. अब वो कभी नहीं उठेंगी.

बीबीसी के प्रोड्यूसर एंड्रयू वेब अपनी माँ के अंतिम समय में उनसे मिलने अस्पताल नहीं जा पाए. हालांकि जब वो अस्पताल में भर्ती थीं तो अपनी माँ के साथ समय बिताने के लिए उन्होंने तकनीक का इस्तेमाल किया.

दुनिया भर में इसी तरह की कई कहानियाँ चल रही हैं, क्योंकि कोरोनो वायरस की वजह से लगे लॉकडाउन की वजह से कई परिवार गंभीर बीमारी की वजह से अस्पताल में दम तोड़ते अपने परिजनों तक उनके अंतिम समय में नहीं पहुंच पा रहे हैं.

ऐसी ही एक कहानी है एंड्रयू वेब और उनकी माँ कैथलीन वेब की है. एंड्रयू ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया की कैसे शारीरिक रूप से दूर होने के बावजूद वह अपनी माँ के साथ उनके अंतिम समय तक जुड़े रहे.

एंड्रयू बताते हैं, "हम अपने माता-पिता की 50वीं शादी की सालगिरह मनाने वाले थे, उसी दिन मेरी माँ को दिल का दौरा पड़ा था."

"परिवार के साथ लंच का प्रोग्राम हम पहले की रद्द कर चुके थे. मेरे भाई लारेंस और मैंने कोरोनो वायरस के ख़तरे पर चर्चा की. हमने ब्रिटेन में सोशल प्रतिबंधों के लगाए जाने से दो हफ़्ते पहले ही इस सेलिब्रेशन को रोककर किसी भी तरह इस वायरस के संपर्क में आने से अपने माता-पिता को दूर रखने का फ़ैसला किया."

पापा को भी मजबूरी में अस्पताल जाना बंद करना पड़ा

बीते वर्ष नवंबर 2019 में आंत की समस्या की वजह से मेरी मां की आपातकालीन सर्जरी हुई थी.

इस साल शादी की सालगिरह मनाने से कुछ दिन पहले ही माँ की आंत की समस्या फिर से उभर आयी जिसके चलते पिताजी माँ को अस्पताल ले गए.

डॉक्टरों का कहना था की ऐसी हालत में सर्जरी करने से माँ की जान जा सकती है और यदि वे बच भी गईं तो भी उनका जीवन काफ़ी अच्छा नहीं रहने वाला है.

आने वाले कुछ हफ़्तों में माँ की तबीयत और बिगड़ने लगी, उन्हें खाना खाने में तकलीफ़ होने लगी और उनकी हालत काफ़ी गंभीर हो गई, और अंततः उनकी मौत हो गई.

ब्रिटेन में अब तक कोरोना वायरस के चलते प्रतिबंध लागू नहीं किए गए थे, पर कोरोना वायरस ने अपना दायरा बड़ा कर लिया था. ऐसी मुश्किल घड़ी में मेरा परिवार एक दुविधा में था- हम अपने बीमार पड़े परिजन को अस्पताल में देखने कैसे जाएं? क्योंकि ऐसे तो हम ख़ुद उसके लिए ख़तरा बन सकते हैं और साथ ही वहां भर्ती अन्य मरीज़ों के लिए भी. इसके साथ ही ख़तरा हमें भी होता.

मेरे भाई ने ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य पर हो सकने वाले इन ख़तरों को देखते हुए अस्पताल नहीं जाने और अपने परिवार की सुरक्षा से समझौता नहीं करने का फ़ैसला किया.

75 वर्षीय मेरे पिता बर्नी, उन मास्क और दस्ताने को पहनकर माँ से मिलने अस्पताल गए जो मैंने उन्हें पोस्ट से भेजे थे.

धीरे-धीरे मैंने उन्हें इस बात के लिए राज़ी करना शुरू किया कि कैसे उनका अस्पताल जाना न सिर्फ़ उनके लिए बल्कि दूसरों के लिए एक संभावित ख़तरा हो सकता है, इसके अलावा अस्पताल जाने से रोके जाने को लेकर क़ानून बनाए जाने की भी संभावना थी.

जब पापा अस्पताल में होते तो हम अपनी मां से व्हाट्सऐप्प के ज़रिए बातें किया करते थे. पापा मां के सिरहाने बैठकर फ़ोन को ऊपर उठा लिया करते थे ताकि वो हमें ठीक से देख सकें.

वीडियो कॉल का ये सिलसिला कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा पर जैसे ही कोरोना वायरस के चलते देश में लॉकडाउन हुआ तो पापा को भी मजबूरी में ख़ुद अस्पताल जाना रोकना पड़ा.

मां कमज़ोर होती चली गईं

माँ की हालत इतनी कमज़ोर हो गयी थी कि जो फ़ोन उनके पास अस्पताल में रखा गया था वो उसे उठाने तक में असमर्थ थीं, ऐसे में हमें उनसे बातें करने के लिए अस्पताल कर्मियों से मदद लेनी पड़ती थी, उनसे माँ के पास रखे फ़ोन को उठाने के लिए कहना पड़ता था.

फिर अचानक एक दिन, मेरी मां को संदिग्ध कोरोना वायरस मरीज़ समझ एक अलग कमरे में ले जाया गया, नर्सों ने माँ के कमरे में जाने से पहले दस्ताने, मास्क और गाउन पहना शुरू कर दिया.

मैंने नर्सों की मदद से वीडियो कॉल के ज़रिए मां के पास जाने की व्यवस्था की. नर्स हमेशा मदद के लिए तैयार रहती थीं. वो यह जानती थीं कि फ़ोन लॉकडाउन के दौरान अस्पताल से बाहरी दुनिया के साथ जुड़ने का एकमात्र साधन है.

तकनीक ने आसान की मां से हमारी बातचीत

लेकिन फिर एक दिन फ़ोन ने काम करना बंद कर दिया था. वो टूट गया था, अब हमें माँ के लिए एक नया फ़ोन लेना था तो हमने तय किया की इस बार हम फ़ोन में कुछ ऐसे ऐप्प का इस्तेमाल करेंगे जिससे माँ से बात करने की पूरी व्यवस्था को सरल बनाया जा सके.

मेरे भाई और पिताजी ने स्काइप और एयर ड्रॉइड नामक ऐप फ़ोन में इंस्टॉल कर दिए.

स्काइप में एक ऑटो ऐन्सर फ़ंक्शन होता है जो इसे सरल बनाता है वहीं एयर ड्रॉइड ऐप नए फ़ोन की स्क्रीन को छोटे रूप से देखने और इसे संचालित करने में सक्षम बनाता है.

मेरे भाई अपने साथ ये नया फ़ोन लेकर अस्पताल गए और एक नर्स को इस फ़ोन को दे दिया.

माँ कुछ और दिनों तक जीवित थीं पर दिनों के गुज़रने के साथ वो बेहद कमज़ोर होती जा रही थी.

हम जब भी माँ को देखने के लिए स्काइप पर फ़ोन किया करते थे तो नर्स फ़ोन को उठा लेती थी और उनकी मदद से हम माँ को देख पाते थे.

मैंने ऑनलाइन एक फ़ोन ट्राइपॉड भी ऑर्डर किया लेकिन वो माँ के अंतिम संस्कार के समय ही पहुंच सका.

अलविदा माँ

स्काइप वीडियो पर, मेरी माँ ने मुझे, मेरे भाई और उनके पोते को अलविदा कह दिया, जिसमें मेरी छह साल की बेटी भी शामिल है जो अमरीका के वर्जीनिया में रहती है.

आधुनिक फ़ोन एप्लिकेशन के बिना, यह असंभव होता.

कोरोनोवायरस ने हमें संचार का एक तरीक़ा खोजने के लिए मजबूर तो कर ही दिया, ताकि ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी हम अपने परिवार के साथ रह सकें.

मेरे पापा ने फ़ोन कॉल पर ही 50 साल की अपनी पत्नी को अलविदा कहा, हालांकि वे माँ से केवल 30 किलोमीटर की दूरी पर थे.

अस्पताल की नर्सें काफ़ी अच्छी थीं. वो मदद के लिए हमेशा तैयार रहती थीं. हालांकि दो बार ऐसा भी हुआ जब माँ को उनके कमरे में मैंने अकेले दवाई मांगते सुना.

अंतिम संस्कार में भी वीडियो कॉल

माँ की मौत से कुछ घंटे पहले लगभग दो बजे मैंने उन्हें वीडियो कॉल की और उन्हें अपने क़रीबी और प्यारे लोगों का नाम पुकारते सुना.

मैंने फिर उन्हें 15 मिनट तक सांत्वना दी और तब तक बात की जब तक उन्हें नींद नहीं आ गयी.

माँ अब कभी नहीं उठेंगी

पापा और भाई का परिवार मां के अंतिम संस्कार में शामिल हुए. अंतिम संस्कार केवल 10 मिनट चला.

ब्रिटेन के क़ानून के मुताबिक़, अंतिम संस्कार में 10 लोग तक ही शामिल हो सकते हैं. लेकिन हमने कोरोना संक्रमण को ध्यान में रखते हुए फ़ैसला किया कि कुछ ही लोगों का जाना ज़्यादा सुरक्षित रहेगा और इसलिए दो पड़ोसियों के अलावा, कोई अन्य इस शोक सभा में उपस्थित नहीं था, मैं भी नहीं.

हम अब भी संक्रमण के ख़तरे को लेकर चिंतित थे इसलिए मेरे भाई के परिवार ने मास्क पहन रखा था.

श्मशान की तरफ़ से वीडियो की कोई सुविधा नहीं थी, इसलिए मेरे भाई और भतीजे ने अपने दोस्तों और मेरे साथ अंतिम संस्कार के पलों को साझा करने के लिए अपने फ़ोन पर ज़ूम ऐप का इस्तेमाल किया. मैंने इस ऐप के ज़रिये माँ के अंतिम संस्कार को उन लोगों के लिए रिकॉर्ड किया जो इसका हिस्सा नहीं बन पाए थे.

श्रद्धांजलि

जैसे ही अंतिम संस्कार ख़त्म हुआ मैंने वीडियो को एडिट किया और तस्वीरों का इस्तेमाल माँ का एक मेमोरियल बनाने में किया.

मैंने जानबूझकर अंतिम संस्कार के दौरान अलग-अलग शॉट्स लिए ताकि मैं उन सभी लोगों का जो इसमें ऑनलाइन शामिल हुए थे और श्मशान के शॉट्स को शामिल कर वीडियो बना सकूं.

फिर मुझे वो अहसास हुआ जो अब तक नहीं हो रहा था. अब मैं सही मायने में अपनी माँ को खोने पर दुखी था.

बीते तीन हफ़्ते से मैंने ख़ुद को संभाले रखा था और मुझे डर था कि कहीं मैं बाद में टूट न जाउं.

इस दौरान मैंने तकनीक में ख़ुद को उलझाए रखा और यह तकनीक ही थी जिसके कारण मैं ऐसे भावुक और कठिन समय में अपनी माँ के साथ जुड़ सका.

उम्मीद करता हूं कि ऐसी कठिन परिस्थिति में जिस तरह मैंने तकनीक का उपयोग किया है उससे ऐसी परिस्थितियों में पड़े कुछ अन्य लोगों को सीखने में मदद मिलेगी.

लोग यह समझ सकेंगे कि कैसे अत्यंत कठिन समय में भी आधुनिक तकनीक हमें अपनों के क़रीब रहने में मददगार साबित हो सकती है.

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