कोरोना वायरस: अमरीका में अंतिम संस्कार में हो रही हैं मुश्किलें

    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन से
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कोरोना वायरस की वजह से अमरीका में हर रोज़ मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.

इस बढ़ती संख्या ने अपने क़रीबी लोगों को गंवाने वालों के दर्द को और बढ़ा दिया है. वो अपने परिजनों को ठीक से अंतिम विदाई भी नहीं दे पा रहे हैं.

अमरीका में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या 10 हज़ार को पार कर गई है जबकि, इस नए वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या अमरीका में 3,70,000 को पार कर गई है.

अमरीका में वायरस के सारे बड़े विशेषज्ञ, वैज्ञानिक मॉडल के आधार पर ये अनुमान लगा रहे हैं कि, नए कोरोना वायरस से अमरीका में एक लाख से लेकर दो लाख चालीस हज़ार लोगों की जान जा सकती है.

कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए, अमरीका में बड़ी तादाद में लोगों के इकट्ठे होने पर पाबंदियां लगी हैं.

इसी वजह से अंतिम संस्कार के बड़े आयोजनों, पारिवारिक समूहों में गले मिलने और मरने वाले की याद में होने वाले कार्यक्रमों की जगह, बस जैसे तैसे अंतिम संस्कार किए जा रहे हैं.

इसी वजह से मेमोरियल सर्विस के ज़रिए अलविदा कहने वाले बड़ी संख्या में नहीं जुटते. बस ये वादा किया जाता है कि जब हालात सामान्य होंगे, तो मरने वाले को याद करने के लिए जुटेंगे.

अमरीका में बीमारियों की रोकथाम की सरकारी संस्था, सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल के दिशा निर्देश कहते हैं कि, 'अगर किसी की मौत कोविड-19 वायरस के संक्रमण से होती है, तो लोगों को चाहिए कि वो मरने वाले के शरीर को छूने से बचें.'

सीडीसी (CDC) की गाइडलाइन कहती हैं कि, 'कुछ ख़ास तरह के स्पर्श जैसे, हाथ पकड़ने और शव को अंतिम संस्कार के लिए तैयार होने के बाद गले लगाने से वायरस के संक्रमण का ख़तरा कम है.'

लेकिन, इसी के साथ सीडीसी के दिशा निर्देश ये भी कहते हैं कि, 'अंतिम संस्कार के लिए शव को तैयार करने से पहले या बाद में चुंबन लेने या शव को धोने या कपड़े पहनाने से जहां तक संभव हो बचना ही चाहिए.'

ऐसे में सवाल ये है कि कोरोना वायरस की महामारी ने अमरीका में अंतिम संस्कार के आयोजनों को किस तरह बदल डाला है? जो लोग अपने परिजनों को गंवा रहे हैं, वो सुरक्षित रहते हुए मृतकों के प्रति अपने स्नेह या लगाव का इज़हार कैसे करें?

अमरीका में रह रहे मुस्लिम समुदाय के लोग कोरोना वायरस के संकट के दौरान ऐसी चुनौतियों का सामना कैसे कर रहे हैं, इस बारे में इमाम अदम जमाल कहते हैं, ''पहले हम मरने वाले के जनाज़े के साथ क़ब्रिस्तान तक जाते थे. इसके बाद हम शव को दफ़न करने से पहले उस पर बारी बारी से मिट्टी डाला करते थे. लेकिन, अब दफ़नाने से पहले के ये सारे रिवाज बंद कर दिए गए हैं.''

इमाम अदम जमाल का कहना है, ''अब मस्जिदें बंद हैं. अब आप इकट्ठे हो ही नहीं सकते. अब तो व्यावहारिक तौर पर ही छह फीट की दूरी बना कर रखनी पड़ती है.''

दफ़नाने से पहले शव को नहलाने की परंपरा पर भी कोरोना संकट का असर पड़ा है.

सीडीसी के दिशा निर्देश कहते हैं, 'अगर दफ़नाने या अंतिम संस्कार से पहले शव को नहलाना या कफ़न पहनाना एक अहम धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है. तो, इसका पालन करते हुए मरने वाले के परिजनों को चाहिए कि वो अपने समुदाय के सांस्कृतिक और धार्मिक नेताओं के साथ-साथ अंतिम संस्कार कराने वाली संस्था से मिलकर ये कोशिश करें कि वो शव के संपर्क में कम से कम आएं.'

इमाम अदम जमाल कहते हैं, 'आज कल शव को ठीक से नहलाने के बजाय पानी से छू कर प्रतीकात्मक रूप से नहलाया जाता है, ताकि ये मान लिया जाए कि शव की तदफ़ीन से पहले सारी मज़हबी रिवाज निभाए गए है. अगर शव से संक्रमित होने का अंदेशा है, तो फिर हम शव को कम से कम छू कर जल्दी से जल्दी दफ़न कर देते हैं. फिर मरने वाले के रिश्तेदारों को कहा जाता है कि वो नमाज़-ए-जनाज़ा घर पर ही पढ़ लें.'

अन्य धार्मिक समुदायों के हालात भी कुछ ख़ास अलग नहीं हैं.

अमरीका के फेडरेशन ऑफ़ इंडियन एसोसिएशन्स के अध्यक्ष अनिल बंसल कहते हैं, 'हिंदुओं को भी अंतिम संस्कार में उन्हीं परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे ईसाई या मुसलमान जूझ रहे हैं.'

श्मशान घरों में शवों की बाढ़, स्मृति सभाओं के आयोजन में देरी

अमरीका में अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया एक बड़ा कारोबार है. पिछले साल तक ये कारोबार लगभग 17 अरब डॉलर का था.

अमरीका में इक्कीस हज़ार से ज़्यादा श्मशान गृह या फ्यूनरल होम (Funeral Home) हैं. और, इन दिनों इन श्मशान घरों में इनमें अंतिम संस्कार कराने की अर्ज़ियों की बाढ़ सी आई हुई है.

अमरीका का न्यूयॉर्क राज्य, कोरोना वायरस की महामारी का गढ़ बना हुआ है. एक रिपोर्ट कहती है कि, न्यूयॉर्क के श्मशान घर दिन-रात लगातार काम कर रहे हैं.

वहीं, मरने वालों के शवों को सुरक्षित रखने के लिए अस्पताल, रेफ्रिजरेशन ट्रकों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

अमरीका में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी की जाती है. पहले तो अंतिम संस्कार से पहले मेमोरियल सर्विस होती है. जिसमे मरने वाले के इष्ट मित्र इकट्ठे हो कर उसे याद करते हैं और श्रद्धांजलि देते हैं. फिर, शव को दफ़नाया जाता है या जलाया जाता है.

जानकार कहते हैं कि अमरीका में एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार करने में औसतन एक हज़ार से सात हज़ार डॉलर यानी 76 हज़ार रुपए से लेकर साढ़े पांच लाख रुपए तक का ख़र्च आ सकता है.

ये इस बात पर निर्भर करता है कि किसी ने शव के लिए कैसा ताबूत चुना. क़ब्र खोदने में मज़दूरी कितनी लगी और क़ब्रिस्तान में जगह कितने की मिली.

2019 के आंकड़े कहते हैं कि अमरीका में 55 प्रतिशत लोग शव को जलाते हैं. जबकि, 39 फ़ीसद लोग शव को दफ़नाते हैं.

शव को दफ़न करने की बढ़ती लागत, इससे पर्यावरण को होने वाले नुक़सान की चिंता और पारंपरिक मज़हबी बेड़ियों के कमज़ोर होने के कारण ही आज औसत अमरीकी नागरिक अपने परिजनों को दफ़नाने के बजाय शव को जलाने को तरज़ीह देते हैं.

कोरोना वायरस की महामारी फैलने के बाद से शव दफ़नाए या जलाए तो जा रहे हैं. लेकिन, मेमोरियल सर्विस होने में देर हो रही है.

कोरोना वायरस से प्रभावित प्रमुख अमरीकी राज्यों में से एक, वॉशिंगटन के फ्यूनरल डायरेक्टर्स एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक रॉब गॉफ़ कहते हैं, 'श्मशान घर, अंतिम संस्कार के बाद शव के अवशेष सीधे क़ब्रिस्तान में पहुंचा देते हैं. जहां पर क़ब्र पहले से तैयार रखी जाती है. शव के अवशेष या तो शव ढोने वाली गाड़ी या फिर किसी माल ढुलाई करने वाली गाड़ी से सीधे क़ब्र तक ले जाए जाते हैं. और या तो उन्हें फ़ौरन दफ़ना दिया जाता है, या अंतिम क्रिया कर दी जाती है.'

रॉब गॉफ़ कहते हैं, 'क़ब्रिस्तान के कर्मचारियों के अलावा उस मौक़े पर कोई नहीं होता. न तो मरने वाले के परिजन होते हैं, और न कोई और. परिवार वाले बाद में क़ब्र पर आ सकते हैं. लेकिन, उन्हें बड़ी संख्या में आने की इजाज़त नहीं होती. यानी कोई अंतिम सभा नहीं होती. न ही अंतिम संस्कार के वक़्त का कोई अन्य रिवाज निभाया जाता है.'

इस दौर में कई लोग अपने परिजनों के शव को रेफ्रिजरेशन में रखने का विकल्प भी चुन रहे हैं. इस उम्मीद में कि जब हालात बेहतर होंगे, तो उनका अंतिम संस्कार भली भांति और अमरीकी परंपरा के अनुसार किया जाएगा. ऐसा आम तौर पर उन मौतों के मामले में हो रहा है, जब किसी की मौत कोरोना वायरस के बजाय किसी अन्य बीमारी या कारण से हुई हो.

फ्नूरल होम डे स्प्रिंग ऐंड फिच के अध्यक्ष विक्टर फिच कहते हैं, 'अगर परिजनों की ख़्वाहिश है कि उनके अज़ीज़ के शव को सर्द माहौल में सुरक्षित रखा जाए, तो हम शव को सुरक्षित रखने के लिए उस पर रसायनों का लेप करते हैं. इसका मतलब ये है कि शव से ख़ून व अन्य द्रव निकाल कर, केमिकल डाला जाता है, ताकि लाश के सड़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाए.'

इससे अंतिम संस्कार का ख़र्च तीन सौ से एक हज़ार डॉलर तक और बढ़ जाता है.

कामगारों की सुरक्षा, ज़रूरी संसाधनों की कमी

अमरीका में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के चलते, अंतिम संस्कार के वक़्त, यानी शव को साफ़ करने, नहलाने धुलाने के वक़्त, श्मशान घरों के कर्मचारियों की सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा बन गई है.

विक्टर फिच कहते हैं, 'जिस वक़्त शव को धोया और नहलाया जा रहा होता है, उस वक़्त हम पानी के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं. क्योंकि, शरीर से निकलने वाले स्राव से संक्रमित होने का ख़तरा रहता है. इसीलिए अलग अलग तौलिये और दूसरे सामानों का इस्तेमाल किया जाता है. इन्हें अलग तरह से सैनिटाइज़ करना पड़ता है. तो हम इन चीज़ों को उन अन्य सामानों से अलग रखते हैं, जिन्हें बाद में धोने की ज़रूरत होती है.'

हो सकता है कि निजता का हवाला देकर मरने वाले के बारे में अस्पताल ये जानकारी दें, या शायद न भी दें कि उसकी मौत नए कोरोना वायरस से हुई या किसी और वजह से.

इसका नतीजा ये हुआ है कि अंतिम संस्कार करने वालों को हर शव को कोरोना वायरस से संक्रमित मान कर हर बार ज़रूरी एहतियात से काम करने को मजबूर होना पड़ा है.

पूरे अमरीका में शवदाह गृहों में कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी संसाधनों जैसे फेस मास्क, दस्तानों, गाउन वग़ैरह की वैसी ही किल्लत से जूझना पड़ रहा है. जैसे, डॉक्टर या अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को.

विक्टर फिच कहते हैं, 'हम अपने राज्य के जन प्रतिनिधियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, ताकि निजी सुरक्षा उपकरण यानी पीपीई को हमें भी प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराया जाए. इन दिनों में नाइट्रो ग्लव्स, एन-95 मास्क, सुरक्षित गाउन, और चेहरे को ढँकने वाले उपकरण हासिल कर पाना बेहद मुश्किल है.'

सबसे मुश्किल चरण

अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया में सबसे मुश्किल हिस्सा वो होता है, जब मरने वाले के परिजनों को ये बताना होता है कि अंतिम संस्कार के वक़्त वो क्या कर सकते हैं और क्या नहीं.

सिएटल में मुस्लिम समुदाय के संसाधन केंद्र के ख़िज़्र शरीफ़ कहते हैं, 'ये बड़ा ही जज़्बाती दौर है. अक्सर लोग दिशा निर्देशों का पालन कर लेते हैं. लेकिन, कई बार वो ऐसा नहीं भी करते हैं.'

विक्टर फिच एक ऐसे इंसान की मौत के वक़्त को याद करते हैं, जिसकी वॉशिंगटन राज्य में अच्छी ख़ासी विरासत है. फिच बताते हैं, 'उस इंसान का संबंध हमारे एक विश्वविद्यालय, यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉशिंगटन से था. वो व्यक्ति हमारे राज्य की फुटबॉल टीम सिएटल हॉक्स से भी जुड़ा हुआ था.'

हालांकि, फिच ने निजता का हवाला देते हुए उस भले इंसान का नाम नहीं बताया. लेकिन ये बताया कि, उम्मीद की जा रही थी कि उसके जनाज़े में हज़ारों लोग शामिल होंगे, ताकि उसकी ज़िंदगी की तमाम उपलब्धियों को याद कर सकें.

लेकिन, हालात ऐसे हैं कि, उस जैसे असाधारण इंसान के अंतिम संस्कार में भी ऐसा कुछ नहीं हो सका.

इस मुश्किल दौर का लोगों ने तकनीकी हल निकाल लिया है. अब अंतिम संस्कार का वेबकास्ट किया जाता है. या ऑनलाइन प्रसारण किया जाता है. और बाद में उसकी वीडियो क्लिप बनाकर आपसी लोगों से फ़ोन पर शेयर की जाती है.

अब आगे क्या होगा?

जैसे जैसे मरने वालों का आँकड़ा बढ़ रहा है, तो इस बात की फ़िक्र भी बढ़ती जा रही है कि आख़िर साझा दर्द के इस दौर का लोगों की ज़हनियत पर क्या असर होगा? उनकी मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

रॉब गॉफ़ कहते हैं, 'जो लोग कोरोना वायरस से संक्रमित होते हैं, उन्हें क्वारंटीन में रखा जाता है. बीमारी के दौरान, परिजन आस पास रह कर उनकी देख भाल नहीं कर पाते. और अगर बाद में उनकी मौत हो जाती है. तो, अंतिम समय में भी क़रीबी परिजन उस इंसान के पास नहीं होते. और जब वो अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घर पहुंचते हैं, तो उनसे कहा जाता है कि वो ये काम कर सकते हैं और वो नहीं कर सकते.'

अंतिम संस्कार के इस उद्योग में विक्टर फिच अपने परिवार की दूसरी पीढ़ी की नुमाइंदगी करते हैं. और उन्हें मरने वालों के बढ़ते आँकड़े का असर साफ़ तौर पर महसूस होने लगा है.

फिच कहते हैं, 'हमें इस दौर से बाहर निकलने में काफ़ी वक़्त लग जाएगा. हम न तो अपने परिजनों की बीमारी के दौरान उसके पास होते हैं. न उसके अंतिम समय में. और अंतिम संस्कार भी हम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं. तय है कि, इन मुश्किलों को लेकर ख़ुद को तसल्ली देने में हमें काफ़ी वक़्त लगेगा. कोरोना वायरस की महामारी आज नहीं तो कल ख़त्म हो ही जाएगी. लेकिन, ये बुरी यादें लंबे समय तक लोगों का पीछा नहीं छोड़ेंगी.'

इमाम अदम जमाल कहते हैं, '23 अप्रैल से रमज़ान का मुक़द्दस महीना शुरू होने जा रहा है. ये वो समय होता है, जब हर रात सैकड़ों लोग मस्जिद में जमा होते हैं. लेकिन, इन हालात में कोई मस्जिद में नहीं आएगा. सब लोग अपने अपने घरों में ही रहेंगे. हर इंसान को अपने घर में ही नमाज़ पढ़नी पड़ेगी. और शायद बहुतों को ये पता ही नहीं कि वो ऐसा कैसे कर पाएंगे. इन हालात का सामना करने में बहुत से लोगों को मुश्किल होगी. इसलिए, एक समुदाय के तौर पर हमें जल्द ही इन हालात के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेना होगा. और हम ऑनलाइन जो भी मदद मुमकिन होगी वो मुहैया कराने की कोशिश करेंगे.'

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