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बांकीपुर उप चुनाव: बीजेपी उम्मीदवार के नाम वापस लेने के पीछे क्या ये वजह है
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
बिहार के बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव में बीजेपी की ओर से घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा ने शुक्रवार शाम को अपना नामांकन वापस ले लिया है. उन्होंने गुरुवार को ही बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाख़िल किया था.
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी बांकीपुर में अभिषेक कुमार के लिए लोगों से वोट मांग रहे थे और कुछ ही घंटों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई.
अचानक हुई इस घटना ने बिहार में सियासी महौल को गर्म कर दिया और इसे लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं.
हालाँकि अभिषेक सिन्हा ने नाम वापस लेने के पीछे पारिवारिक वजह बताई है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि कुछ घंटों में आख़िर क्या हुआ जो उन्हें अपना नामांकन वापस लेना पड़ा.
अभिषेक कुमार के नामांकन वापस लेने के बाद बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उप चुनाव में नामांकन की अंतिम तारीख़ सोमवार यानी 13 जुलाई है.
इस सीट से बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन विधायक थे. राज्यसभा के लिए सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफ़ा दे दिया था.
मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट के साथ ही बांकीपुर सीट पर उप चुनाव के लिए 30 जुलाई को वोट डाले जाएंगे और वोटों की गिनती 3 अगस्त को होगी.
पार्टी की आपसी गुटबाज़ी का नतीजा
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी का मानना है कि अभिषेक कुमार सिन्हा बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन की पसंद थे.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "यह बीजेपी की आपसी गुटबाज़ी का नतीजा है. पार्टी में कुछ लोग जैसे आगे बढ़े हैं वह कई लोगों को हज़म नहीं हो रहा है. आप ख़ुद सोच कर देखिए क्या किसी ने कल्पना की होगी कि नितिन नबीन बीजेपी के अध्यक्ष बन जाएंगे."
कन्हैया भेलारी कहते हैं कि बिहार में जानबूझकर सियासी गलियारों में यह चर्चा छेड़ी गई है कि अभिषेक कुमार के पिताजी का नाम चारा घोटाले में था और ऐसा केवल इसलिए किया गया ताकि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को मैसेज भेजा जा सके कि 'देखिए आपके अध्यक्ष की क्या पसंद है.'
हालांकि वह कहते हैं, "जबकि भ्रष्टाचार आज की राजनीति में कोई मुद्दा नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा भी चारा घोटाले के अभियुक्त थे और उनके बेटे राज्य सरकार में मंत्री हैं. शुभेंदु अधिकारी, हेमंत बिस्वा सरमा, अजित पवार ऐसे कई नाम हैं जिनके ख़िलाफ़ ख़ुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने न जाने क्या-क्या कहा था."
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा मानते हैं कि अभिषेक कुमार सिन्हा के नामांकन वापस करने के पीछे वजह पारिवारिक ही है.
वह कहते हैं, "अभिषेक कुमार के माता-पिता को सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने चारा घोटाले से जुड़े मामले में दोषी ठहराया था. बीजेपी ने लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ अपना पूरा कैंपेन चारा घोटाले को लेकर ही चलाया था, ऐसे में यह उसके लिए बहुत ही शर्मिंदगी वाला होता कि अभिषेक कुमार उनके उम्मीदवार होते."
बांकीपुर सीट से जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने चुनाव लड़ रहे हैं.
प्रशांत किशोर लगातार बांकीपुर के वोटरों से कह रहे हैं कि केंद्रीय नेतृत्व को अपनी नाराज़गी का संदेश देने के लिए वे बीजेपी को इस सीट पर हरा दें.
बीजेपी के सामने चुनौती
बांकीपुर का क्षेत्र पहले पटना पश्चिम विधानसभा सीट के अंतर्गत आता था. इस क्षेत्र से नितिन नबीन पांच बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं, इससे पहले उनके पिताजी यहां से विधायक होते थे.
नितिन नबीन ने साल 2006 में पहली बार इस सीट से चुनाव जीता था. उसके बाद बांकीपुर सीट बनने पर साल 2010 से नितिन नबीन ही लगातार यहां से बीजेपी के विधायक रहे.
लेकिन बीजेपी के लिए यह सीट जितनी मज़बूत दिखती है, उसमें उतना ही जोख़िम भी नज़र आता है.
बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से काफ़ी कम वोटिंग के लिए जानी जाती रही है.
पिछले साल हुए चुनाव में भी इस सीट पर क़रीब 41 फ़ीसदी वोट डाले गए थे.
बीजेपी को साल 2025 में यहां क़रीब 25 फ़ीसदी वोट मिले थे और नितिन नबीन ने क़रीब 52 हज़ार वोटों से जीत दर्ज की थी.
यानी बीजेपी को इस सीट पर क़रीब 75 फ़ीसदी वोटरों ने वोट नहीं दिया और यह बीजेपी के लिए ख़तरा बन सकता है.
कन्हैया भेलारी कहते हैं, "बीजेपी के सामने यहां से अब तक कोई मज़बूत उम्मीदवार खड़ा नहीं हुआ था. इस बार बीजेपी को डर था कि प्रशांत किशोर चारा घोटाले को मुद्दा बना लेंगे. लेकिन किसी के पिता के काम के लिए बेटे को सज़ा क्यों."
हालाँकि कन्हैया भेलारी मानते हैं, "फिर भी मज़बूत उम्मीदवार होने मतलब चुनाव में जीत नहीं है. आजकल चुनाव में कई फ़ैक्टर काम करते हैं. हमने पश्चिम बंगाल और इससे पहले बिहार में यह देख लिया है."
बांकीपुर से विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने रेखा कुमारी उर्फ़ रेखा गुप्ता को अपना उम्मीदवार बनाया है. यानी बीजेपी के सामने अपने परंपरागत वोट कटने का ख़तरा भी हो सकता है.
इस बीच बीजेपी उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा के नाम वापस लेने पर प्रशांत किशोर ने कहा, "आप ही लोग (मीडिया) कह रहे थे कि बांकीपुर में बीजेपी को कोई हरा नहीं सकता. जनता खड़ी हो गई तो उन्हें कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा."
ख़ासकर बीजेपी के समर्थक वोटर माने जाने वालों में बीते कुछ समय में बिहार में हुई कई घटनाओं को लेकर लोगों में कुछ नाराज़गी देखी जा रही है.
इनमें बिहार में भोजपुर ज़िले के भरत भूषण तिवारी के 'एनकाउंटर' का मामला पिछले कुछ दिनों से लगातार सुर्ख़ियों में है.
7 जून को पुलिस ने भरत तिवारी का 'एनकाउंटर' किया, जिसके बाद इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी.
बांकीपुर उप चुनाव पर पूरे देश की नज़र
साल 2006 में अपने पिताजी के देहांत के बाद नितिन नबीन उप चुनाव लड़ कर ही विधायक बने थे. ठीक 20 साल से बाद एक बार फ़िर से इस सीट पर विधानसभा उप चुनाव हो रहा है.
ख़ास बात यह है कि आमतौर पर वोटर, राजनीतिक विश्लेषक या मीडिया किसी की भी उप चुनावों को लेकर ज़्यादा दिलचस्पी नहीं होती है.
लेकिन एक तो यह सीट पार्टी के तौर पर बीजेपी के सबसे बड़े नेता की सीट रही है और दूसरा अब तक अन्य उम्मीदवारों को चुनाव लड़वाने वाले प्रशांत किशोर ख़ुद पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं.
इन वजहों ने बांकीपुर सीट को चर्चा में ला दिया है.
वरिष्ठ पत्रकार फ़ैजान अहमद कहते हैं, "बीजेपी ने इस सीट पर अपना उम्मीदवार तय किया था और उनका हट जाना अभूतपूर्व है. प्रशांत किशोर हारें या जीतें लेकिन उन्होंने इस सीट को पूरे देश की नज़र में ला दिया है क्योंकि उन्हें पूरे देश में लोग जानते हैं."
वह कहते हैं, "कई तरह के बातें कही जा रही हैं. लेकिन अभिषेक कुमार को टिकट देना फिर उनका नाम वापस लेना बीजेपी के नेतृत्व की ग़लती है. बीजेपी के नेताओं को क्यों नही मालूम था कि चारा घोटाले में जिन 40-45 लोगों को अभियुक्त बनाया गया या सज़ा दी गई, उनमें अभिषेक कुमार के पिताजी का भी नाम था."
हालाँकि क़रीब 8 महीने पहले हुए बिहार विधानसभा चुनावों में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा था.
उन चुनावों में पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी और उसके 238 में से 236 उम्मीदवार अपनी ज़मानत तक नहीं बचा पाए.
फ़ैजान अहमद कहते हैं, "प्रशांत किशोर के पास खोने के लिए अब कुछ नहीं बचा है और राजनीति में वो अब तक दूसरों को चुनाव लड़वाते रहे हैं और पहली बार ख़ुद चुनाव मैदान में हैं. इससे बीजेपी पर भी दबाव है कि प्रशांत किशोर एक कड़ी टक्कर दे सकते हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.