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अमेरिकी हमलों में ईरान के चाबहार पोर्ट को भी नुक़सान, भारत से क्या है इसका संबंध
ईरानी मीडिया ने पुष्टि की है कि अमेरिका के ताज़ा हवाई हमलों में चाबहार पोर्ट (बंदरगाह) के मेरीटाइम ट्रैफ़िक कंट्रोल टॉवर (समुद्री यातायात नियंत्रण टॉवर) को नुक़सान हुआ है.
बीबीसी फ़ारसी संवाददाता ग़ोंचे हबीबीज़ाद ने चाबहार पर हुए हमले का वीडियो एक्स पर शेयर किया है.
8 और 9 जुलाई की रात, इस्लामिक रिवोल्यूशनी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी ने चाबहार फ़्री ज़ोन संगठन के प्रबंध निदेशक मोहम्मद सईद अरबाबी के हवाले से बताया कि समुद्री यातायात नियंत्रण टॉवर पर हमला हुआ.
इस हमले में टावर को नुक़सान पहुँचा है. उन्होंने यह भी कहा कि इस हमले में चाबहार फ़्री ज़ोन का एक गोदाम (वेयरहाउस) भी क्षतिग्रस्त हुआ.
ईरान ने दावा किया कि बुधवार और गुरुवार को हुए अमेरिकी हमलों में उसके 14 नागरिक मारे जा चुके हैं.
उसने ये भी कहा कि जवाबी कार्रवाई में कुवैत, बहरीन और क़तर में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया है. बाद में गुरुवार को, सरकारी समर्थन वाले मीडिया के अनुसार, ईरान ने कुवैत, जॉर्डन और इराक़ में भी कई जगहों पर और हमले किए.
चाबहार को भारत के लिए भी बेहद अहम माना जाता रहा है. भारत ने साल 2017-18 से चाबहार बंदरगाह में निवेश शुरू किया था. लेकिन भारत ने इस साल अपने केंद्रीय बजट में इसके लिए कोई रक़म जारी नहीं की है.
पिछले साल के बजट में भारत ने चाबहार बंदरगाह के लिए चार सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया था.
यह पहली बार है जब भारत ने ईरान के साथ इस साझा परियोजना के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया है.
विश्लेषक मान रहे हैं कि भारत के चाबहार बंदरगाह से हाथ पीछे खींचने की बड़ी वजह अमेरिका की तरफ़ से बढ़ता दबाव और बदलते भू-राजनीतिक घटनाक्रम हैं.
पिछले दो साल में वैश्विक स्तर पर ईरान कमज़ोर हुआ है, विश्लेषक इसे भी भारत के चाबहार बंदरगाह में निवेश जारी नहीं रखने का बड़ा कारण मान रहे हैं.
ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध, क्षेत्रीय अस्थिरता और बदलती भू-राजनीति के कारण चाबहार की रफ्तार पहले भी धीमी रही है, लेकिन अब भारत के चाबहार के लिए फंड आवंटित ना करने से इसके ठप पड़ जाने की आशंका भी पैदा हो गई.
चाबहार बंदरगाह भारत के लिए अहम क्यों?
(ये रिपोर्ट बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा ने फ़रवरी 2026 में की थी)
चाबहार में दो पोर्ट हैं- शाहिद कलंतरी और शाहिद बहिश्ती.
यह होर्मुज़ जलसंधि से बाहर होने के कारण बड़े जहाज़ों के लिए सुरक्षित है और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से महज़ 170 किलोमीटर दूर स्थित है.
यह बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित वह समुद्री क्षेत्र है जिसे भारत लंबे समय से एक रणनीतिक वैकल्पिक मार्ग के रूप में देखता रहा है.
चाबहार पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी आईएनएसटीसी के लिए काफ़ी अहमियत रखता है.
इस रूट से भारत की यूरोप तक पहुँच आसान हो जाती, साथ ही ईरान और रूस को भी फ़ायदा होता.
मई 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान दौरा किया था. 15 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली ईरान यात्रा थी.
इस दौरे में मोदी ने भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच एक त्रिपक्षीय संबंध के लिए ईरान में चाबहार पोर्ट को विकसित और संचालित करने के लिए 55 करोड़ डॉलर निवेश का एलान किया था.
इसके बाद से चाबहार में भारत की हिस्सेदारी और दिलचस्पी में भू-राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से उतार-चढ़ाव आता रहा है.
भारत के लिए ये बंदरगाह और भी अहम इसलिए है क्योंकि यह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के बाज़ारों तक पहुंच देता है.
सामरिक अहमियत
इस बंदरगाह को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और ग्वादर पोर्ट के संतुलन के रूप में भी देखा जाता है.
भारत ने 13 मई 2024 को चाबहार बंदरगाह के शाहिद बहिश्ती टर्मिनल के दस साल तक संचालन के लिए समझौता किया था.
भारत ने इस बंदरगाह के शाहिद बहिश्ती टर्मिनल के संचालन में हिस्सेदारी इसलिए ली ताकि अफ़ग़ानिस्तान के साथ व्यापार, मानवीय मदद और क्षेत्रीय संपर्क बनाए रखा जा सके.
हालांकि, भारत साल 2016 में किए गए समझौते के तहत भी चाबहार बंदरगाह के शाहिद बहिश्ती टर्मिनल का हर साल रिन्यू होने वाले समझौते के आधार पर संचालन करता रहा था.
अमेरिका ने साल 2018 में चाबहार परियोजना को प्रतिबंधों से छूट दी थी लेकिन ट्रंप ने इन प्रतिबंधों को दोबारा लागू कर दिया था.
दिल्ली में हुए जी-20 सम्मेलन के दौरान जब एक नए ट्रेड रूट को बनाने पर सहमति बनी थी, तब इस परियोजना के भविष्य पर सवाल उठने लगे थे.
कहा गया कि अगर ये इंडिया-यूरोप-मिडिल ईस्ट कॉरिडोर बन गया, तो चाबहार पोर्ट की बहुत अहमियत नहीं रह जाएगी. इसे ईरान की उपेक्षा के तौर पर भी देखा गया था.
लेकिन जब साल 2024 भारत और ईरान के बीच चाबहार पर अहम समझौता हो गया, तो माना गया कि इसकी अहमियत कम नहीं हुई है. अब एक बार फिर यह बंदरगाह सवालों में है.
पिछले कुछ सालों में भारत ने इस बंदरगाह के ज़रिए अफ़ग़िस्तान को हज़ारों टन गेहूं भेजा है. हालांकि, ये अहम बंदरगाह ऑपरेशनल चुनौतियों से भी जूझता रहा है.
भारत पर क्या अमेरिकी दबाव है?
पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के संचालन में जुटे पक्षों पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था.
हालांकि, अमेरिका ने भारत को इन प्रतिबंधों से छह महीनों की छूट दी थी.
विश्लेषक मान रहे हैं कि केंद्रीय बजट में भारत का चाबहार के लिए फंड आवंटित ना करने का एक बड़ा और सबसे अहम कारण अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर आशंका है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिफ़ेंस स्टडीज़ में शोधकर्ता रहे डॉ. मुदस्सिर क़मर के मुताबिक़, “भारत को चाबहार बंदरगाह को लेकर अमेरिकी प्रतिबंधों से छह महीने की छूट मिली थी, ये अगले कुछ महीनों में ख़त्म हो जाएगी. भारत की सबसे बड़ी आशंका अमेरिकी प्रतिबंध ही हैं और इसी वजह से भारत ने इस बजट में चाबहार के लिए फंड आवंटित नहीं किया है.”
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान ख़ान भी भारत के चाबहार से क़दम पीछे खींचने का यही अहम कारण मानते हैं.
प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, “अमेरिका ने भारत को दी गई छूट वापस ले ली है. भारत, अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को तरजीह भी दे रहा है. ऐसे में भारत, अमेरिका को नाराज़ करने का कोई संकेत नहीं देना चाहता है.”
प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान तर्क देते हैं कि भले ही भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक तनाव नज़र आ रहा है लेकिन भारत अभी भी अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को तरजीह देता है और भारत नहीं चाहेगा कि वह अमेरिका को नाराज़ करे.
प्रोफ़ेसर फ़ज्ज़ुर्रहमान कहते हैं, “भारत को अमेरिका चाहिए, भारत दुनिया की एक महाशक्ति को नाराज़ करने के रिस्क से भी बच रहा है.”
हालांकि, मुदस्सिर क़मर कहते हैं कि यदि अमेरिकी प्रतिबंध हटने की संभावना होती तो भारत चाबहार में अपना निवेश ज़रूर जारी रखता.
क्या पीछे हट रहा है भारत
हाल ही में मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि भारत चाबहार बंदरगाह से रणनीतिक रूप से पीछे हट रहा है.
हालांकि, चाबहार के संचालन को लेकर उठे सवालों के बीच भारत ने इसी महीने एक अधिकारिक बयान में कहा था कि वह चाबहार के संचालन को जारी रखने के लिए अमेरिका के अलावा ईरान के साथ भी संपर्क बनाए हुए है.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था, "जैसा कि आप जानते हैं, 28 अक्तूबर 2025 को अमेरिकी वित्त विभाग ने एक पत्र जारी किया था, जिसमें 26 अप्रैल 2026 तक वैध सशर्त प्रतिबंध छूट के दिशा-निर्देश दिए गए थे. हम इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी पक्ष के साथ संपर्क में हैं. ईरान के साथ हमारा संबंध लंबे समय से चला आ रहा है. हम घटनाक्रम पर क़रीबी नज़र रखे हुए हैं और इस साझेदारी को आगे बढ़ाएंगे.''
लेकिन अब तक चाबहार में अरबों रुपए निवेश कर चुके भारत ने इस बजट में चाबहार बंदरगाह के लिए कोई रकम आवंटित नहीं की है.
विश्लेषक इसके पीछे अमेरिकी दबाव के अलावा भू-राजनीतिक कारण भी देख रहे हैं.
प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, “भूराजनैतिक अस्थिरता की वजह से जोख़िम बढ़ गया है. ईरान एक और युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, ऐसे में ईरान में किसी भी तरह के बड़े निवेश में भारी जोख़िम है. अभी ईरान को लेकर अस्थिरता बनी हुई है और स्थिति कभी भी नाज़ुक हो सकती है, ऐसे में भारत को ईरान में बड़ा निवेश जोख़िम भरा लग रहा है.”
वहीं डॉ. मुदस्सिर क़मर भी ऐसी ही राय रखते हैं. वो कहते हैं, “भू राजनीतिक स्थिति और ईरान में जारी अस्थिरता भी एक बड़ा कारण है. लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि भारत चाबहार से पूरी तरह पीछे हट रहा है.”
प्रोफ़ेसर मुदस्सिर क़मर कहते हैं, “इंडिया अभी पीछे हट रहा है ऐसा तो कहना मेरे ख्याल से सही नहीं होगा क्योंकि जो 2016 में 10 साल के लिए इंडिया- ईरान के बीच एक समझौता हुआ था चाबहार पोर्ट में इन्वेस्टमेंट के लिए उसे भारत ने लगभग पूरा कर लिया है. यही नहीं भारत ने साल 2024 में भी चाबहार के संचालन के लिए दस साल का समझौता किया है. भारत चाबहार से पूरी तरह पीछे नहीं हटेगा.”
डॉ. क़मर का मानना है कि चाबहार से पूरी तरह पीछे हटने के बजाय भारत अमेरिका के साथ इस पर बातचीत करेगा और इसका कोई कूटनीतिक रास्ता निकाल लेगा.
वो कहते हैं, “चाबहार भारत के लिए बहुत अहम है, ख़ासकर अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया से संपर्क के लिए, ऐसे में भारत इस अहम बंदरगाह से ऐसे ही पीछे नहीं हट जाएगा. भारत का यहां बहुत बड़ा निवेश है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.