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मुस्लिम जज को क्यों मिल रहीं जान से मारने और रेप की धमकियां?
- Author, शेरिलान मोलान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
एक मुस्लिम महिला न्यायाधीश को सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और जान से मारने की धमकियों का सामना करना पड़ रहा है.
यह मामला मध्य प्रदेश की एक अदालत की अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम ख़ान से जुड़ा है. बीती 12 जून को उन्होंने लिंचिंग के एक मामले के दोषी 14 लोगों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई.
अदालत ने इन्हें हत्या, हत्या की कोशिश, दंगा करने और ग़ैरक़ानूनी रूप से किसी को रोकने जैसे अपराधों का दोषी ठहराया था. इस आदेश के बाद जज तबस्सुम ख़ान को उनकी धार्मिक पहचान के लिए घेरा जाने लगा.
पीट-पीटकर हत्या करने की यह घटना 2022 की है. उस समय 50 वर्षीय नज़ीर अहमद रात में मवेशियों को लेकर जा रहे थे. रास्ते में उन्हें खुद को 'गोरक्षक' बताने वाले लोगों के एक समूह ने रोक लिया. उनके पास लाठियां और लोहे की रॉड थीं.
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आरोपियों ने नज़ीर अहमद और उनके दो साथियों को गाड़ी से बाहर खींच लिया. उन पर गायों की तस्करी के शक में बेरहमी से हमला किया गया.
गंभीर चोटों के कारण बाद में नज़ीर अहमद की मौत हो गई, जबकि उनके दोनों साथी बच गए और उन्होंने अदालत में पूरी घटना की जानकारी दी.
अपने फ़ैसले में न्यायाधीश तबस्सुम ख़ान ने कहा कि यह मामला भीड़ द्वारा की गई हत्या का स्पष्ट उदाहरण है.
हालांकि, इस फ़ैसले के बाद तबस्सुम ख़ान धार्मिक नफ़रत का निशाना बन गईं. फ़ैसला आने के बाद सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ कई वीडियो सामने आए, जिनमें उन्हें गालियां और धमकियां दी गईं.
तबस्सुम ख़ान एक मुस्लिम हैं और सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ प्रसारित वीडियो में यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने आरोपियों को केवल इसलिए सज़ा दी क्योंकि वे हिंदू थे.
आमतौर पर अदालत के फ़ैसलों की आलोचना होती है, लेकिन तबस्सुम ख़ान के मामले में हमला उनके कानूनी तर्कों या फ़ैसले पर नहीं हुआ. इसके बजाय उनकी धार्मिक पहचान को निशाना बनाया गया.
धमकियों और अभद्र टिप्पणियों के बढ़ते मामलों को देखते हुए न्यायपालिका की कई प्रमुख संस्थाएं उनके समर्थन में सामने आई हैं. उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस सुरक्षा भी उपलब्ध कराई गई है.
फ़ैसले के तुरंत बाद शुरू हो गया था विरोध
फ़ैसले के तुरंत बाद विरोध शुरू हो गया था. दोषी ठहराए गए लोगों के परिजनों ने अदालत परिसर के बाहर प्रदर्शन किया.
ख़बरों के अनुसार, उन्होंने पुलिस के उस काफ़िले को रोकने की भी कोशिश की, जो दोषियों को जेल ले जा रहा था. उनका दावा था कि इन लोगों को 'गाय बचाने' के लिए सज़ा दी जा रही है.
इसके बाद सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू हुआ. कई दक्षिणपंथी हिंदू इन्फ्लुएंसर्स के वीडियो सामने आए, जिनमें तबस्सुम ख़ान के ख़िलाफ़ अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया. कुछ वीडियो में उन्हें बलात्कार और जान से मारने की धमकियां भी दी गईं.
एक वीडियो में एक व्यक्ति ने चेतावनी दी कि यदि दोषी ठहराए गए लोगों को 10 दिनों के भीतर रिहा नहीं किया गया, तो देशभर में "ख़ून-ख़राबा" हो सकता है.
यह लेख लिखे जाने तक ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद थे. इन वीडियो को हज़ारों लाइक मिल चुके हैं और सैकड़ों बार इन्हें शेयर किया जा चुका था.
वीडियो में बोलने वाले लोगों के चेहरे और उनके सोशल मीडिया अकाउंट स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे, जबकि वे खुलेआम धमकियां दे रहे थे और हिंसा भड़काने वाली बातें कर रहे थे.
दक्षिणपंथी हिंदी समाचार चैनल 'सुदर्शन न्यूज़' के एक एंकर ने भी दोषी ठहराए गए लोगों के परिवारों के प्रति समर्थन जताया. उन्होंने कहा, "शायद इन परिवारों ने कभी नहीं सोचा होगा कि गायों की रक्षा के लिए सब कुछ दांव पर लगाने वाले उनके परिजन जेल भेज दिए जाएंगे."
उन्होंने अपने दर्शकों से भी आवाज़ उठाने की अपील की और कहा कि "अब गोरक्षकों के लिए लड़ने का समय आ गया है."
कई स्वयंभू गोरक्षा संगठनों और हिंदुत्ववादी समूहों ने भी फ़ैसले के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए. 22 जून को गोरक्षा परिषद ने पंजाब में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया.
इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने न्यायाधीश तबस्सुम ख़ान के पुतले को आग के हवाले कर दिया. इसके तीन दिन बाद राष्ट्रीय बजरंग दल ने उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन किया और मांग की कि दोषी ठहराए गए 'गोरक्षकों' को रिहा किया जाए.
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने की निंदा
पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि ये वीडियो और प्रदर्शन केवल अदालत के फ़ैसले की आलोचना नहीं कर रहे हैं. उनके अनुसार, इनका उद्देश्य न्यायाधीश तबस्सुम ख़ान की न्यायिक वैधता को उनकी धार्मिक पहचान तक सीमित करके कमज़ोर करना है.
काटजू ने लिखा, "उनकी मुस्लिम पहचान को फ़ैसले की वैधता पर सवाल उठाने का मुख्य आधार बना दिया गया. यह न्याय की अवधारणा को उलट देने जैसा है. किसी न्यायिक फ़ैसले का मूल्यांकन कानूनी तर्कों के आधार पर होना चाहिए, न कि उसे सुनाने वाले व्यक्ति की धार्मिक पहचान के आधार पर."
बाद में काटजू ने बताया कि तबस्सुम ख़ान ने उन्हें एक संदेश भेजकर समर्थन के लिए धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि लगातार मिल रही गालियों और धमकियों ने उन्हें मानसिक रूप से झकझोर दिया है. उन्हें ऐसा महसूस होने लगा है, मानो उन्होंने अपना फ़ैसला सुनाकर कोई अपराध कर दिया हो.
तबस्सुम ख़ान को न्यायिक संस्थाओं का भी समर्थन मिला है. सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने उनके ख़िलाफ़ दी जा रही धमकियों की कड़ी निंदा की है.
इन संगठनों ने दोषियों के विरुद्ध सख़्त कार्रवाई की मांग भी की है.
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष विकास सिंह ने बीबीसी से कहा कि किसी न्यायाधीश को धमकी मिलना बेहद गंभीर मामला है क्योंकि न्यायपालिका लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था का अहम हिस्सा है.
उन्होंने कहा, "अगर हम ऐसी घटनाओं को होने देंगे तो कोई भी न्यायाधीश निष्पक्ष रूप से न्याय नहीं दे पाएगा."
उनके अनुसार, लोकतंत्र में किसी जज को बिना किसी डर या दबाव के अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होना चाहिए.
जज को दी जा रही पुलिस सुरक्षा
इस बीच, पुलिस अधिकारी सुधाकर बारस्कर ने बीबीसी को बताया कि इस मामले में संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज़ कर लिया गया है और दो लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.
उन्होंने बताया कि पुलिस की साइबर सेल भड़काऊ वीडियो साझा करने वाले लोगों की पहचान कर रही है. साथ ही सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री की लगातार निगरानी भी की जा रही है.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े का मानना है कि तबस्सुम ख़ान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार और न्यायपालिका को इससे भी अधिक ठोस क़दम उठाने चाहिए.
क़ानूनी समाचार वेबसाइट लाइव लॉ में प्रकाशित एक लेख में हेगड़े ने हाल के एक अन्य मामले का उदाहरण दिया, जिसमें एक पूर्व न्यायाधीश को धमकियां मिलने पर अदालत ने हस्तक्षेप किया था.
बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश गौतम पटेल और उनके परिवार को उनके साल 2024 में दिए गए एक फ़ैसले के बाद दस महीने से अधिक समय तक धमकियों का सामना करना पड़ा था. यह फ़ैसला मुस्लिम समुदाय के भीतर उत्तराधिकार विवाद से जुड़े एक मामले में दिया गया था.
इसके बाद तीन न्यायिक संगठनों ने जनहित याचिका दायर की. इस पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को गौतम पटेल को सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया.
अदालत ने मुंबई पुलिस आयुक्त को जांच की निगरानी करने और मामले की प्रगति रिपोर्ट पेश करने का भी आदेश दिया.
हेगड़े ने लिखा, "अगर किसी हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को राज्य की सुरक्षा और न्यायिक निगरानी मिल सकती है, तो ज़िला अदालत में कार्यरत एक सत्र न्यायाधीश भी उसी सुरक्षा की हक़दार हैं. यह सिद्धांत किसी व्यक्ति के पद, धर्म या किसी विशेष फ़ैसले के इर्द-गिर्द बने राजनीतिक माहौल के आधार पर नहीं बदल सकता."
पिछले सप्ताह मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी इस मामले का संज्ञान लिया. अदालत ने वरिष्ठ अधिकारियों से पूछा कि न्यायाधीश तबस्सुम ख़ान की सुरक्षा के लिए अब तक क्या क़दम उठाए गए हैं और धमकियां देने वालों की पहचान के लिए क्या कार्रवाई की गई है?
हाई कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि न्यायाधीश तबस्सुम ख़ान को दी गई पुलिस सुरक्षा फ़िलहाल जारी रखी जाए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.