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'ट्रंप को मारने' की ईरान में लगातार उठती मांग किस तरह का संकेत है?
- Author, सरबस नज़ारी
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार और शोक से जुड़े आयोजन एक सप्ताह तक चले, मगर ये केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहे.
इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ख़िलाफ़ बदले की मांगें लगातार सुनाई देती रहीं. समय के साथ ये मांगें और अधिक संगठित, मुखर और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होती नज़र आईं.
ईरान के राजनीतिक नेतृत्व और धार्मिक प्रतिष्ठान ने ख़ामेनेई की मौत के लिए ज़िम्मेदार माने जाने वाले लोगों के ख़िलाफ़ प्रतिशोध को 'राष्ट्रीय कर्तव्य और धार्मिक ज़िम्मेदारी' के रूप में प्रस्तुत किया है.
यही संदेश इन दिनों देश के मीडिया, राजनीतिक भाषणों और सार्वजनिक विमर्श में प्रमुखता से दिखाई दे रहा है.
यह घटनाक्रम केवल शोक या भावनात्मक प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति नहीं है. इसमें धार्मिक प्रतीकों, घरेलू राजनीति और रणनीतिक संदेशों का स्पष्ट मेल दिखाई देता है.
यही कारण है कि इन धमकियों और बयानों को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उठ खड़े हुए हैं.
क्या ट्रंप के ख़िलाफ़ दी जा रही चेतावनियां और प्रतिशोध की मांगें ख़ामेनेई के बाद के ईरान की राजनीतिक दिशा का संकेत हैं?
साथ ही, इस पूरी बयानबाज़ी में शिया विचारधारा की भूमिका क्या है? और क्या ऐसे माहौल में ईरान और अमेरिका के बीच भविष्य में फिर से कूटनीतिक रिश्ते बेहतर होने की संभावना बची है? यही सवाल अब अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में हैं.
बदला लेना क्यों बन गया केंद्रीय मुद्दा?
ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई ने अपने पिता के अंतिम संस्कार के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया दी. लेकिन उनके संदेश का केंद्र युद्ध के बाद मेल-मिलाप, राष्ट्रीय एकता या देश के पुनर्निर्माण की बात नहीं थी. इसके बजाय उन्होंने साफ़तौर पर प्रतिशोध की राजनीति पर ज़ोर दिया.
11 जुलाई को जारी एक बयान में मोजतबा ख़ामेनेई ने कहा कि वो अपने दिवंगत पिता के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे. यह बयान एक सप्ताह तक चले शोक समारोहों के समापन के एक दिन बाद सामने आया. उल्लेखनीय है कि मोजतबा ख़ुद इन सार्वजनिक समारोहों में शामिल नहीं हुए थे.
अपने संदेश में उन्होंने कहा, "मैं अपने पिता के पवित्र ख़ून और दो युद्धों के सभी शहीदों के ख़ून का बदला हत्यारों से लूंगा."
उन्होंने इस प्रतिशोध को 'राष्ट्र की इच्छा' बताया और कहा कि इसे हर हाल में पूरा किया जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि इसके लिए ज़िम्मेदार लोग "कभी भी शांति से नहीं मर पाएंगे."
विश्लेषकों के मुताबिक़, यह बयान सिर्फ़ एक बेटे की अपने पिता को दी गई भावनात्मक श्रद्धांजलि नहीं थी, बल्कि यह उस व्यापक राजनीतिक संदेश का हिस्सा था, जो अंतिम संस्कार और शोक समारोहों के दौरान लगातार उभरकर सामने आए.
ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रमों का समापन उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में उनके दफ़न के साथ हुआ. इन आयोजनों में शोक और राजनीतिक संदेश बार-बार एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई दिए. दुख और श्रद्धांजलि की अभिव्यक्तियों के साथ-साथ प्रतिशोध की मांग भी प्रमुख रूप से सामने रखी गई.
ईरान के सरकारी टेलीविजन चैनलों ने बार-बार ऐसे नारों का प्रसारण किया, जिनमें बदले की मांग की जा रही थी. वहीं, कई शोक यात्राओं में लोगों को ऐसे बैनर और पोस्टर लिए देखा गया, जिनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू को ख़ामेनेई की मौत के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया था.
कुछ पोस्टरों में अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत या समझौते का स्पष्ट विरोध भी दर्ज था. इन संदेशों का उद्देश्य यह संकेत देना था कि तेहरान की प्रतिक्रिया का आधार अब कूटनीति नहीं, बल्कि न्याय और प्रतिशोध होना चाहिए.
अंतिम संस्कार के दौरान और उसके बाद के दिनों में कई वरिष्ठ राजनेताओं, सांसदों, जुमे की नमाज़ के प्रभावशाली धर्मगुरुओं और रूढ़िवादी मीडिया संस्थानों ने भी इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल किया.
इससे यह धारणा और मज़बूत हुई कि ख़ामेनेई के बाद के ईरान में प्रतिशोध की राजनीति को एक केंद्रीय राष्ट्रीय नैरेटिव के रूप में स्थापित करने की सुनियोजित कोशिश की जा रही है. बदले का संदेश अब केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि नए राजनीतिक नेतृत्व की पहचान और रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है.
बदले के संदेश को कैसे बढ़ावा दिया गया?
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था लंबे समय से बड़े राष्ट्रीय संकटों के बाद प्रतीकों और भावनात्मक नारों का इस्तेमाल करती रही है. लेकिन ख़ामेनेई की मौत के बाद जिस तरह अलग-अलग राजनीतिक, धार्मिक और मीडिया समूहों ने एक साथ बदले की मांग को आगे बढ़ाया, वह विशेष रूप से ध्यान खींचने वाला है.
ईरान के पूर्व परमाणु वार्ताकार और कट्टरपंथी नेता सईद जलीली ने कहा कि "शहीद नेता" का बदला लेना न केवल देश का अधिकार है, बल्कि अधिकारियों का कर्तव्य भी है. उनके अनुसार, देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पूंजी की रक्षा करने के लिए प्रतिशोध की राह पर चलना ज़रूरी है.
कट्टरपंथी सांसद अमीरहुसैन साबेती ने संसद सदस्यों से उस प्रस्तावित क़ानून को प्राथमिकता देने की अपील की, जो पहले ही संसद में पेश किया जा चुका है. इस क़ानून का उद्देश्य डोनाल्ड ट्रंप समेत अन्य अमेरिकी और इसराइली नेताओं को जवाबदेह ठहराना है.
संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य अली खेज़रियान ने संसद की समाचार एजेंसी आईसीएएनए में प्रकाशित एक लेख में लिखा कि वरिष्ठ धर्मगुरुओं की ओर से जारी धार्मिक आदेश अब "बदले के तूफ़ान की सामूहिक इच्छा" में बदल चुके हैं. उन्होंने दावा किया कि "कोई भी आयरन डोम इसे रोक नहीं पाएगा."
यही संदेश देश के कई शहरों में जुमे की नमाज़ के दौरान भी सुनाई दिया.
मशहद में अति-रूढ़िवादी धर्मगुरु अहमद आलमोलहोदा ने नमाज़ियों से कहा कि "शहीद नेता" का बदला लेने का प्रश्न हमेशा जनता की नज़रों के सामने रहना चाहिए.
वहीं बुशेहर में जुमे की नमाज़ के नेता यूसुफ़ जमाली ने कहा कि जनता प्रतिशोध की मांग कर रही है. उन्होंने वादा किया कि यह मांग पूरी होने तक वे इसे लगातार उठाते रहेंगे.
अर्दबील में एक अन्य जुमे के इमाम हसन आमेली ने कहा कि बदला लिया जाना लगभग तय है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि "हज़ार ट्रंपों की मौत भी दिवंगत नेता के ख़ून की क़ीमत की बराबरी नहीं कर सकती."
कट्टरपंथी अख़बारों और सरकार समर्थक मीडिया संस्थानों ने भी इस संदेश को और अधिक ताक़त दी है. कई संपादकीय लेखों में प्रतिशोध को देश की सबसे बड़ी जनभावना और प्रमुख मांग के रूप में पेश किया गया.
सरकारी और संबद्ध प्रसारकों ने बार-बार ऐसे वीडियो दिखाए हैं, जिनमें शोक मनाने वाले लोग लाल झंडे लिए हुए हैं और बदले के नारे लगा रहे हैं. कुछ रूढ़िवादी मीडिया संस्थानों ने तो ट्रंप की तस्वीर वाले प्रतीकात्मक "वांटेड" पोस्टरों को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है.
कुल मिलाकर, ख़ामेनेई की मौत के बाद बदले की मांग केवल कुछ नेताओं के बयानों तक सीमित नहीं रही. इसे राजनीतिक नेताओं, धर्मगुरुओं, सांसदों और मीडिया के एक बड़े वर्ग ने मिलकर आगे बढ़ाया है, जिससे यह संदेश ईरान के सार्वजनिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा बन गया है.
ट्रंप इस पूरे नैरेटिव का प्रतीक क्यों बन गए हैं?
हालांकि ईरानी अधिकारी अब भी अमेरिका और इसराइल, दोनों की खुलकर आलोचना करते हैं, लेकिन ख़ामेनेई की मौत के बाद सामने आए अधिकांश बयानों और नारों का केंद्र धीरे-धीरे डोनाल्ड ट्रंप बनते गए हैं. बदले और जवाबी कार्रवाई की मांगों को भी अब अधिक व्यक्तिगत रूप से ट्रंप से जोड़कर पेश किया जा रहा है.
ईरान के आधिकारिक नैरेटिव में ट्रंप को केवल एक पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में नहीं देखा जाता. उन्हें उस व्यक्ति के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है, जिसने हालिया संघर्ष के शुरुआती चरण में ख़ामेनेई की हत्या करने वाले हमले को कथित रूप से मंज़ूरी दी थी.
ईरानी कट्टरपंथियों की नज़र में ट्रंप को लेकर एक और वजह भी है, जो इस ग़ुस्से को और गहरा बनाती है. वे वर्षों से यह मानते रहे हैं कि जनवरी 2020 में बग़दाद में हुए अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के सबसे प्रभावशाली सैन्य कमांडरों में से एक क़ासिम सुलेमानी की हत्या का बदला अब तक नहीं लिया गया है. चूंकि उस हमले का आदेश ट्रंप प्रशासन के दौरान दिया गया था, इसलिए कट्टरपंथी वर्ग उन्हें लंबे समय से प्रतिशोध के प्रमुख लक्ष्य के रूप में देखता रहा है.
किसी एक व्यक्ति पर ज़िम्मेदारी केंद्रित करने से एक जटिल भू-राजनीतिक टकराव को नैतिक संघर्ष के रूप में पेश करना आसान हो जाता है. इससे सरकार को एक ऐसा स्पष्ट चेहरा मिल जाता है, जिसके माध्यम से वह अपनी व्यापक शिकायतों, नाराज़गी और राजनीतिक संदेशों को जनता तक पहुंचा सकती है.
इसी कारण ट्रंप अब केवल एक राजनीतिक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस व्यापक टकराव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिसे ईरानी अधिकारी एक सरकार या एक देश तक सीमित नहीं मानते.
उनके मुताबिक़, यह संघर्ष कहीं बड़ा और लंबे समय से चला आ रहा वैचारिक तथा रणनीतिक मुक़ाबला है, और ट्रंप उसी संघर्ष के सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में उभरकर सामने आए हैं.
क्या ये धमकियां वास्तव में सरकारी नीति का संकेत हैं?
ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार और शोक जुलूसों के दौरान कई लोगों को लाल झंडे उठाए देखा गया. इन झंडों पर 'या ला-थारात अल-हुसैन' लिखा था, जिसका अर्थ है - "हुसैन का बदला लेने वालों, उठो"
यह शिया परंपरा का सदियों पुराना नारा है, जो कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन की शहादत का बदला लेने की पुकार का प्रतीक माना जाता है.
इसी धार्मिक प्रतीकवाद को आगे बढ़ाते हुए कई जगह "ख़ामेनेई के ख़ून का बदला" जैसे पोस्टर और बैनर भी दिखाई दिए. इनके माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि इमाम हुसैन की शहादत और ख़ामेनेई की मृत्यु के बीच एक वैचारिक और धार्मिक निरंतरता मौजूद है.
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान की सत्ता बार-बार ऐसे धार्मिक प्रतीकों और ऐतिहासिक संदर्भों का इस्तेमाल करती रही है. विशेष रूप से संकट के दौर में इनका उपयोग बलिदान, प्रतिरोध और कथित अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष को वैध ठहराने के लिए किया जाता रहा है.
हालांकि, ईरानी नेताओं का इतिहास यह भी बताता है कि वे टकराव के समय अक्सर बेहद कड़े और आक्रामक बयान देते हैं, लेकिन साथ ही रणनीतिक लचीलापन भी बनाए रखते हैं. इसके बावजूद, मौजूदा अभियान अपनी तीव्रता और व्यापकता के कारण अलग नज़र आता है.
यह केवल कुछ अलग-अलग नेताओं या समूहों के बयान नहीं लगते, बल्कि एक सुनियोजित और समन्वय वाला नैरेटिव उभरता दिखाई देता है. बदले की मांग केवल शोक जुलूसों में शामिल लोगों, सांसदों या धर्मगुरुओं तक सीमित नहीं रही है. इसे देश के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई ने भी सार्वजनिक रूप से समर्थन दिया है.
यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान के संविधान के तहत सर्वोच्च नेता के पास विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रमुख मामलों पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार होता है. इसलिए उनके बयानों को महज़ भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जाता.
फ़िलहाल ईरानी अधिकारियों ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि कोई कार्रवाई कब, कैसे या किस रूप में की जा सकती है. फिर भी, मोजतबा ख़ामेनेई की धार्मिक स्थिति इस चर्चा को और गंभीर बना देती है. अगर वे भविष्य में डोनाल्ड ट्रंप के ख़िलाफ़ कोई फ़तवा जारी करते हैं, तो उससे किसी भी संभावित प्रतिशोधी अभियान को अधिक वैचारिक और धार्मिक वैधता मिल सकती है.
यही वजह है कि विश्लेषक इन धमकियों को सिर्फ़ भावनात्मक बयानबाज़ी के रूप में नहीं, बल्कि ख़ामेनेई के बाद के ईरान की राजनीतिक दिशा, धार्मिक वैचारिकी और विदेश नीति के संभावित संकेत के रूप में भी देख रहे हैं.
कूटनीति पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
फ़िलहाल यह कहना मुश्किल है कि यह तीखी बयानबाज़ी सीधे तौर पर ईरान की आधिकारिक नीति में बदल जाएगी या नहीं. लेकिन इतना साफ़ है कि इसने भविष्य में होने वाली किसी भी कूटनीतिक पहल के लिए राजनीतिक माहौल को प्रभावित करना शुरू कर दिया है.
ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार और शोक समारोहों के दौरान बदले की मांग वाले नारे अक्सर अमेरिका के साथ बातचीत के विरोध से भी जुड़े दिखाई दिए.
कई मौक़ों पर प्रतिशोध और कूटनीति-विरोधी संदेश एक साथ सुनाई दिए, जिससे यह संकेत मिला कि ईरान के कट्टरपंथी वर्ग का एक हिस्सा अमेरिका के साथ किसी नए समझौते के पक्ष में नहीं है.
रूढ़िवादी अख़बार कयहान के संपादक ने तो यहां तक कहा कि ईरानी अधिकारियों को ट्रंप को "क़त्ल के योग्य" घोषित कर देना चाहिए.
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अमेरिका के साथ किसी भी बातचीत की शर्त यह होनी चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति को मुक़दमे के लिए ईरान के हवाले किया जाए.
भले ही यह मांग व्यावहारिक राजनीति से अधिक प्रतीकात्मक और बयानबाज़ी का हिस्सा लगे, लेकिन यह ईरान के राजनीतिक प्रतिष्ठान के कुछ वर्गों की सोच को ज़रूर दर्शाती है.
इस तरह के संदेश अमेरिका के साथ संवाद या समझौते की कोशिशों की घरेलू राजनीतिक क़ीमत बढ़ा देते हैं. नतीजतन, भविष्य में अगर कोई ईरानी नेता अमेरिका के साथ नई बातचीत या समझौते की कोशिश करता है, तो उसे रूढ़िवादी और कट्टरपंथी तबकों को मनाने में अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है.
इस बीच, अमेरिकी मीडिया नेटवर्क सीएनएन ने ख़ुफ़िया सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि इसराइल ने अमेरिका को ट्रंप को निशाना बनाने की एक कथित ईरानी साज़िश के बारे में चेतावनी दी थी.
खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी है. न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अगर उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होती है, तो उन्होंने पहले से ही अमेरिका की ओर से जवाबी कार्रवाई के निर्देश छोड़ रखे हैं. उनके अनुसार, इसका जवाब बेहद व्यापक सैन्य हमलों के रूप में दिया जाएगा.
11 जुलाई को अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने एक अलग पोस्ट में दावा किया कि इस उद्देश्य के लिए "1,000 मिसाइलें तैयार रखी गई हैं."
फ़िलहाल यह कहना असंभव है कि ईरान का यह अभियान मुख्य रूप से प्रतीकात्मक बना रहेगा या भविष्य में वास्तविक नीतिगत फ़ैसलों को प्रभावित करेगा.
लेकिन एक बात स्पष्ट है. नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई के स्पष्ट बयानों, शिया धार्मिक प्रतीकों के व्यापक इस्तेमाल और वरिष्ठ अधिकारियों व सरकारी मीडिया के समन्वय वाले संदेशों ने प्रतिशोध को ख़ामेनेई के बाद के ईरान के प्रमुख राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बना दिया है.
यही कारण है कि कई विश्लेषक मानते हैं कि यह माहौल भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच रिश्तों में सुधार या किसी नए समझौते की संभावनाओं को और सीमित कर सकता है.
ऐसे समय में, जब दोनों देशों के बीच भरोसा पहले से ही बेहद कमज़ोर है, बदले की राजनीति और आक्रामक बयानबाज़ी कूटनीतिक रास्तों को और अधिक संकरा बना सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.