क्या अब जापान बन रहा है चीन का 'नंबर वन दुश्मन'?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के आधिकारिक न्यूज़पेपर पीपुल्स डेली से इस बात का साफ संकेत मिलता है कि पार्टी को किस बात की चिंता है.
इसके पन्नों पर नियमित रूप से छपने वाले लेख मौजूदा मुद्दों पर पार्टी के विचार और नीति को साफ तौर पर बताते हैं. इन मुद्दों में ताइवान, व्यापार और डोनाल्ड ट्रंप जैसे विषय शामिल हैं.
इस अख़बार में जोंग शंग (वॉइस ऑफ चाइना) नाम का एक अंतरराष्ट्रीय मामलों का कॉलम, अक्सर चीन के सबसे बड़े वैश्विक प्रतिद्वंद्वी अमेरिका की आलोचना करता रहा है.
लेकिन अक्तूबर 2025 से इसने एक पुराने प्रतिद्वंद्वी जापान को प्रमुखता से निशाना बनाया है.
यह आर्टिकल इस बात की पड़ताल करता है कि ऐसा क्यों है और इसका क्या मतलब है.
फ़ोकस क्यों बदला?

इमेज स्रोत, Getty Images
चीन का फ़ोकस बदलने की दो बड़ी वजहें हैं. एक वजह तो यह है कि अक्तूबर 2025 में जापान की प्रधानमंत्री बनने के बाद से दक्षिणपंथी नेता सनाई तकाइची ने सेना के पक्ष में अपना रुख़ और मज़बूत किया है.
इससे चीन में पुरानी चिंताएं और ऐतिहासिक नाराज़गी फिर से उभर गई है. साथ ही सीसीपी को देश के अंदर की निराशा को एक स्थापित बाहरी दुश्मन की ओर मोड़ने का मौक़ा भी मिला है.
जोंग शंग का कहना है कि उसका मक़सद देश के भीतर लोगों की राय और सोच को प्रभावी ढंग से दिशा देना है.
दूसरी वजह अमेरिकी पक्ष से देखें तो अमेरिका की आलोचना में आई कमी ऐसे समय में दिख रही है, जब 2025 के ज़्यादातर समय में चली टैरिफ़ जंग के बाद दोनों देश अपने संबंधों को स्थिर और बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
संपादकीय रुख़ में आया यह बदलाव कैसा दिखता है?

इमेज स्रोत, Getty Images
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
एपिसोड
समाप्त
तकाइची के पद संभालने के बाद जोंग शंग का संपादकीय फ़ोकस अचानक अमेरिका से हटकर जापान पर केंद्रित हो गया.
ताकाइची के सत्ता में आने के बाद से जोंग शंग ने जापान पर 27 आलोचनात्मक लेख प्रकाशित किए हैं. इसके अलावा अमेरिका पर 11 ऐसे लेख प्रकाशित हुए जिनका रुख़ मिला-जुला था.
वहीं केवल दो लेख ऐसे थे जिनमें अमेरिका की तीखी आलोचना की गई. अमेरिका और जापान के अलावा अन्य विषयों पर केवल 2 लेख प्रकाशित हुए.
14 नवंबर 2025 को प्रकाशित जापान-विरोधी लेखों की इस कड़ी के पहले लेख में तकाइची को चेतावनी दी गई थी कि वे "आग से न खेलें."
इसकी वजह यह थी कि उन्होंने यह संकेत दिया था कि अगर ताइवान से जुड़ा कोई संकट पैदा होता है, तो जापान सैन्य रूप से हस्तक्षेप कर सकता है. इससे चीन की चिंताएं बढ़ गई थीं.
चीन की इस रेड लाइन के पार होते ही तकाइची के उन दूसरे कदमों पर भी आलोचनाओं की बाढ़ आ गई, जिन्हें जापान की दूसरे विश्व युद्ध के बाद अपनाई गई शांतिवादी नीति से हटने के संकेत माना गया.
आलोचनाओं की इस लंबी कड़ी में तकाइची की कई नीतियों और कदमों को निशाना बनाया गया.
इनमें जापान के शांतिवादी संविधान में संशोधन की उनकी मंशा, देश में "सैन्यवाद की वापसी", पश्चिमी देशों का समर्थन पाने के लिए जापान की "भ्रामक लॉबिंग" शामिल है.
इसके अलावा दूसरे विश्व युद्ध के दौरान किए गए युद्ध अपराधों के इतिहास को "तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश", जापान की "परमाणु महत्वाकांक्षाएं", फिलीपींस के साथ उसकी "मिलीभगत", हथियार निर्यात के नियमों में ढील और केवल रक्षा तक सीमित सैन्य नीति से आगे बढ़कर आक्रामक सैन्य रुख अपनाने जैसी "खतरनाक नीतिगत बदलावों" को भी शामिल किया गया.
हमने यह भी देखा है कि चीन की सरकारी मीडिया में तकाइची के खिलाफ़ व्यक्तिगत आलोचनाओं और हमलों की भी बाढ़ आ गई है.
हालांकि जापान ने उस पर लगाए जा रहे "नए सैन्यवाद" के आरोपों को ख़ारिज किया है.
मई में आयोजित शांगरी-ला सुरक्षा सम्मेलन में जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी ने कहा था कि वास्तव में चीन की सैन्य गतिविधियां ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए "गंभीर चिंता" का विषय हैं.
वहीं कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि जापान अपनी सैन्य ताकत इसलिए बढ़ा रहा है ताकि उसकी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम हो सके.
उनका तर्क है कि अमेरिका की नीतियां अक्सर बदलती रहती हैं, इसलिए जापान अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अधिक आत्मनिर्भर बनाना चाहता है.
जोंग शंग में अमेरिका के बारे क्या लिखा गया?

इमेज स्रोत, Getty Images
चीन की मीडिया में अमेरिका एक बहुत महत्वपूर्ण विषय बना रहता है. चीन अक्सर अमेरिका को अपने विपरीत उदाहरण के रूप में पेश करता है.
चीन का कहना है कि चीन स्थिर, शांतिप्रिय, विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) का समर्थक, व्यापार के लिए खुला और बहुपक्षीय सहयोग में विश्वास रखने वाला देश है. वहीं चीन की नजर में अमेरिका धीरे-धीरे इन गुणों से दूर होता जा रहा है.
फिर भी चीन की बड़ी दिलचस्पी अमेरिका के साथ संबंधों को स्थिर बनाए रखने में है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि अमेरिका उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.
लेकिन अप्रैल 2025 में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगाए गए टैरिफ़ ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को झटका दिया और चीन पर सबसे कड़े शुल्क लगाए गए, तो जोंग शंग ने अमेरिका के खिलाफ आलोचनात्मक लेखों की बाढ़ ला दी.
केवल उसी महीने जोंग शंग ने अमेरिका की आलोचना करते हुए 11 लेख प्रकाशित किए. इन लेखों में अमेरिका पर "अत्यधिक टैरिफ" लगाने और "आर्थिक दबंगई" करने का आरोप लगाया गया.
साथ ही कहा गया कि अमेरिका "बहुपक्षीय वैश्विक व्यापार व्यवस्था का सबसे बड़ा विनाशक" बन गया है और उसने दुनिया को ऐसी स्थिति में धकेल दिया है, जहां "जो ज़्यादा फ़िट, वही टिकेगा (सर्वाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट)" जैसी सोच हावी हो रही है.
इसके बाद प्रकाशित लेखों में अमेरिका के साथ चीन की बातचीत को सकारात्मक तरीके से पेश किया गया. व्यापारिक विवादों को सुलझाने और रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए दोनों देशों के बीच कई दौर की वार्ताएं हुईं.
इसके बाद शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप के बीच इस साल मई में मुलाक़ात हुई.

इमेज स्रोत, Getty Images
इस शिखर सम्मेलन के बाद प्रकाशित लेखों में द्विपक्षीय संबंधों में "नई ऊर्जा" और "नए अध्याय" की बात की गई. हालांकि इन लेखों का उद्देश्य अमेरिका की सराहना करना कम और शी जिनपिंग को एक दूरदर्शी, कुशल नेता के रूप में पेश करना ज्यादा था.
उन्हें एक ऐसे नेता के तौर पर दिखाया गया जो मुश्किल परिस्थितियों के बीच दोनों देशों के रिश्तों को "रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता" की दिशा में ले जा रहे हैं.
फिर भी 2026 में प्रकाशित दो लेख खास तौर पर ध्यान खींचते हैं, क्योंकि वे ट्रंप की सैन्य कार्रवाइयों को लेकर चीन की गहरी चिंताओं को उजागर करते हैं.
जनवरी में प्रकाशित एक लेख में अमेरिका के वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने की कार्रवाई की आलोचना की गई. लेख में कहा गया कि इस तरह का "वर्चस्ववाद" वैश्विक स्थिरता की नींव को हिला सकता है.
अप्रैल में अमेरिका और इसराइल के ईरान पर किए गए हमलों के बाद इसी तर्क को और आगे बढ़ाया गया. उस समय जोंग शंग ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के अमेरिका के लिए इस्तेमाल किए गए शब्द "शिकारी वर्चस्ववादी शक्ति" का हवाला दिया. यह वर्णन अमेरिका को लेकर चीन की लंबे समय से चली आ रही आलोचनाओं के अनुरूप था.
क्या जापान, चीन का नंबर एक दुश्मन है?

इमेज स्रोत, Getty Images
डोमेस्टिक प्रोपेगेंडा के नजरिये से देखें तो 2026 में जोंग शंग की रिपोर्टिंग ने जापान को मुख्य विरोधी के रूप में पेश किया है.
चीन का मानना है कि जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किए गए अपने अत्याचारों के लिए पर्याप्त पश्चाताप नहीं किया है.
उस दौर की पीड़ा आज भी चीन के समाज में गहराई से मौजूद है और सरकारी मीडिया समय-समय पर उसे याद दिलाता रहता है. इसलिए जापान अक्सर लोगों की नाराजगी और असंतोष का आसान निशाना बन जाता है.
चीन संभवतः जापान के सैन्यवादी अतीत और वर्तमान में उसकी सैन्य ताकत बढ़ाने की कोशिशों को एक ही कहानी के दो हिस्सों के रूप में देखता है.
चीन के मुताबिक दोनों बातें मिलकर जापान को एक संभावित खतरे के रूप में पेश करने वाली कहानी को और मजबूत बनाती हैं.
जापान को "नव-सैन्यवादी" देश के रूप में पेश करना चीन की उस रणनीति का भी हिस्सा है, जिसके तहत वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर जापान को अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है.
इन सबके बावजूद अमेरिका चीन का कहीं अधिक महत्वपूर्ण वैश्विक प्रतिद्वंद्वी और रणनीतिक प्रतिस्पर्धी बना हुआ है. चीन के उदय के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा भी वही है.
अगर दोनों देशों के बीच कभी कोई संघर्ष छिड़ता है तो उसके बेहद खतरनाक रूप लेने की आशंका है.
शी जिनपिंग कई बार इस बात पर ज़ोर दे चुके हैं कि चीन और अमेरिका को अपने संबंधों को सावधानी से संभालना चाहिए, ताकि वे "थ्यूसीडाइड्स ट्रैप" से बच सकें.
"थ्यूसीडाइड्स ट्रैप" एक ऐसी स्थिति को कहा जाता है जिसमें एक स्थापित महाशक्ति और उभरती हुई शक्ति के बीच टकराव लगभग अपरिहार्य हो जाता है.
दूसरी ओर जापान चीन के लिए सबसे बड़ी क्षेत्रीय चिंता है. अगर टोक्यो वास्तव में अपने शांतिवादी संविधान में बदलाव करता है, परमाणु हथियार हासिल करता है या ताइवान के साथ अपने संबंधों को और मजबूत बनाता है, तो यह चिंता और बढ़ सकती है.
चीन की सरकारी मीडिया में अमेरिका और जापान, दोनों को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए "विरोधी" के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन फिलहाल ऐसा लगता है कि जापान को निशाना बनाने वाली आवाज़ें अमेरिका की तुलना में ज़्यादा तेज़ और मुखर हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.




















