महिलाओं से जुड़ी बीमारियों के डायग्नोसिस में क्यों होती है देरी?

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- Author, कीर्ति रावत
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
मई महीने में पीसीओएस यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम का नाम बदलकर पीएमओएस यानी पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम कर दिया गया. इस नाम को बदलने में एक दशक का वक़्त लगा.
पीएमओएस दरअसल एक क्रोनिक फुल बॉडी हार्मोनल और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है, जिससे दुनिया भर में क़रीब 17 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं प्रभावित हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान बताता है कि इसकी चपेट में आने वाली क़रीब 70 फ़ीसदी महिलाएं इस बात से अनजान हैं, जो इन दिक्कतों को और गंभीर बनाती हैं.
पीसीओएस का नाम बदलकर उसे पीएमओएस करना इस बात पर ज़ोर देता है कि ये सिर्फ़ रिप्रोडक्शन या ओवेरी (अंडाशय का) तक ही सीमित नहीं है. बल्कि ये शरीर के कई सारे सिस्टम पर असर डालता है.
शरीर पर इसका असर:
- मेटाबॉलिक हेल्थ: इसमें इंसुलिन रेसिस्टेंस का काफ़ी ख़तरा रहता है. इसके अलावा मोटापा और टाइप 2 डायबिटीज़ का जोखिम भी बना रहता है.
- हॉर्मोनल बदलाव: इसमें मेंस्ट्रुएल का अनियमित होना और एंड्रोजन लेवल बढ़ना शामिल है, जिससे एक्ने, चेहरे और शरीर पर बाल ज़्यादा आते हैं.
- मेंटल हेल्थ: एंजाइटी और डिप्रेशन का ख़तरा बढ़ता है.
- लंबी समय के लिए होने वाली दिक्कतें: जिन मामलों को संभाला नहीं जाता, उनमें स्लीप एपनिया या अनिद्रा, प्रेग्नेंसी के समय होने वाली जेस्टेशनल डायबिटीज़ और एंडोमेट्रियल कैंसर जैसे समस्याएं हो सकती हैं. एंडोमेट्रियल, यूट्रस या गर्भाशय की सबसे भीतर की परत या लेयर को कहा जाता है, जिसमें कैंसर हो सकता है.
- पीएमओएस के लक्षणों के मुताबिक इसे कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है. ये एक ऐसा सिंड्रोम है, जो हर महिला को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करता है.
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, साल 1993 तक महिलाओं को ज़्यादातर क्लीनिकल ट्रायल से बाहर रखा जाता था. तब से अब तक मेडिकल साइंस और महिलाओं ने लंबा सफ़र तय किया है, लेकिन महिलाओं की बीमारियों के पीछे की सही वजह पता लगाने में दशकों का वक़्त लगने से चुनौतियां खड़ी होती रही हैं.
गायनोकॉलोजिस्ट डॉ. सुचित्रा दलवी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मॉडर्न मेडिसिन और मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में लंबे समय तक पुरुषों के शरीर, उनके लक्षणों और उनके अनुभवों के आधार को मानक माना गया था, जबकि महिलाओं के दर्द, थकान, हार्मोनल बदलावों और दूसरी परेशानियों को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया."
डॉ. सुचित्रा दलवी 'एशिया सेफ़ एबॉर्शन पार्टनरशिप' नाम के एक एनजीओ के साथ भी काम करती हैं.
क्या नाम बदलने से आएगा बदलाव?

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कई बार तो लड़कियों और महिलाओं को उन्हें होने वाली असल दिक्कतों का पता चलने में लंबा समय लग जाता है, जिसका खामियाज़ा उनके शरीर को उठाना पड़ता है.
मुंबई में रहने वाली 43 साल की आस्था के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से अपना अनुभव साझा करते हुए बताया, "जब मुझे पहली बार पता चला कि मुझे पीसीओएस है, तब मैं टीनएज में थी. मुझे डॉक्टर ने बताया भी नहीं कि मुझे पीसीओएस है और सीधे मुझे कॉन्ट्रासेप्टिव पिल (गर्भनिरोधक दवा) दे दी. बिना यह बताए कि पीसीओएस क्या है, क्यों होता है और इसका शरीर पर क्या असर होता है."
आस्था इस सिंड्रोम का नाम बदलने पर ख़ुशी जताते हुए कहती हैं, "आज तो इसके बारे में कहीं ज़्यादा जानकारी उपलब्ध है. वहीं अगर नाम बदलने की बात है तो ये कदम ज़रूरी था, क्योंकि जैसा कि हम जानते हैं, यह सिर्फ़ अंडाशय (ओवरी) से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक पूरा मेटाबॉलिक सिंड्रोम है."
आस्था का मानना है कि महिलाओं को अब इस डिसऑर्डर को समझने में पहले से ज़्यादा आसानी होगी.
वो कहती हैं, 'जैसा कि अब ये साफ हो गया है कि पीएमओएस एक मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है, तो महिलाओं के लिए इसे समझना आसान है और वे इसे अलग नज़रिए से लेती हैं और उसी तरह से इसका इलाज भी करवाती हैं. अगर सही समय और सही तरीके से बीमारी का पता चल जाता, तो चीज़ें अलग हो सकती थीं. मुझे कभी गर्भनिरोधक दवाइयां खानी नहीं पड़तीं.'
पीएमओएस पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने गायनोकॉलोजिस्ट डॉ दुरु शाह से भी बातचीत की, जो पिछले 11 साल से इसे लेकर जागरुकता अभियान चला रही हैं.
डॉ शाह ने कहा, "हमने क़रीब 11 साल पहले पीसीओएस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया बनाई थी. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह थी कि हम सब जानते थे कि बहुत सी महिलाएं इससे प्रभावित हो रही हैं. इसलिए हमें लगा कि इस पर मिलकर काम करने की ज़रूरत है. इसी सोच के साथ हमने इस सोसाइटी को बनाया, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को जोड़ा गया, ताकि इस समस्या को हर पहलू से समझा जा सके और महिलाओं को बेहतर मदद मिल सके. क्योंकि जब भी महिलाओं की सेहत की बात आती है, अक्सर उसे हल्के में लिया जाता है."
उनका कहना है कि नाम बदलने से ये समझाने में आसानी होगी कि पीएमओएस सिर्फ़ ओवरी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा इससे कहीं ज़्यादा बड़ा है. ये महिलाओं के पूरे शारीरिक सिस्टम को प्रभावित करता है.
मेडिकल क्षेत्र में पितृसत्ता का किरदार

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अक्सर महिलाओं के दर्द को गंभीरता से नहीं लिया जाता. यहां तक महिलाएं ख़ुद अपने परिवार के सदस्यों की ज़रूरतों को अपने स्वास्थ्य से ज़्यादा अहमियत देती हैं.
मेडिकल क्षेत्र में भी महिलाओं के लक्षणों को गलत समझ लिया जाता है और कई बार उनकी बीमारी का देर से पता चलता है. इसकी वजह एक ऐसी मेडिकल व्यवस्था है, जो महिलाओं की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई थी.
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा जीती हैं. एक महिला की औसत उम्र 73.8 साल और पुरुष की 68.4 साल होती है. लेकिन इसके बावजूद महिलाएं अपनी ज़िंदगी का 25 फ़ीसदी से ज़्यादा समय ख़राब सेहत के साथ बिताती हैं.
अंग्रेज़ी में एक टर्म है मेडिकल पेट्रियार्की. इसका मतलब है गहरी जड़ें जमाई हुई ऐसी व्यवस्था, जहां पुरुषों का वर्चस्व और दृष्टिकोण ना केवल मरीज़ों के इलाज को, बल्कि मेडिकल अनुसंधान की नीतियों को भी प्रभावित करता है.
इस बारे में डॉ. सुचित्रा दलवी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, 'महिलाओं के पीएमएस, पीसीओएस और दूसरी प्रजनन स्वास्थ्य समस्याओं के डायग्नोसिस में देरी के पीछे की वजह बड़े सामाजिक ढांचे हैं. सबसे पहला है पितृसत्ता. इस व्यवस्था में महिलाओं की ज़रूरतों को हमेशा पुरुष और परिवार की ज़रूरतों के हिसाब से देखा गया.'
और ये दिक्कतें बहुत पहले से हैं. शुरुआत में मेडिकल कॉलेज में महिलाओं को स्टूडेंट के तौर पर एडमिशन नहीं लेने दिया जाता था.
उदाहरण के लिए, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल ने महिलाओं को 1945 तक प्रवेश नहीं दिया था और जब बाद में महिलाएं इस क्षेत्र में आईं तो उन्हें डॉक्टर से ज़्यादा नर्स और केयरटेकर की भूमिका के लिए सही माना गया. इस पूरी व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि महिलाओं की सेहत को कभी प्राथमिकता मिलने में काफ़ी देर लग गई.
2023 में आई दसरा की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य क्षेत्र में महिलाएं बड़ी संख्या में काम करती हैं, लेकिन सीनियर पदों तक बहुत कम पहुंच पाती हैं. इसी के साथ दुनिया भर में स्वास्थ्य और देखभाल से जुड़े काम का 67 फ़ीसदी हिस्सा महिलाएं संभालती हैं, लेकिन सिर्फ़ 25 फ़ीसदी महिलाएं सीनियर पदों पर हैं और लीडरशिप की भूमिकाओं में उनकी हिस्सेदारी केवल 5 फ़ीसदी है.
रिपोर्ट "एन अनबैलेंस्ड स्केल: एक्सप्लोरिंग द फीमेल लीडरशिप गैप इन इंडियाज़ हेल्थकेयर सेक्टर के मुताबिक, भारत में भी यही स्थिति है. यहां 29 फ़ीसदी महिलाएं डॉक्टर हैं और 80 फ़ीसदी महिलाएं नर्स हैं. लेकिन लीडरशिप वाले पदों पर खासकर एग्जीक्यूटिव और बोर्ड लेवल पर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है. महिलाओं की हिस्सेदारी इन पदों पर मात्र 18 फ़ीसदी है. साथ ही, उन्हें पुरुषों के मुकाबले 34 फ़ीसदी कम वेतन मिलता है.

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डॉ. सुचित्रा कहती हैं, "आधुनिक कामकाजी व्यवस्था पुरुषों के शरीर और उनकी दिनचर्या को मानक मानकर बनाई गई. जबकि महिलाओं का शरीर हर महीने हार्मोनल बदलाव और पीरियड्स से गुज़रता है. और उपनिवेशवाद भी इसके लिए ज़िम्मेदार है. उपनिवेशवाद ने ऐसे संस्थान और नियम बनाए जिनमें महिलाओं के अनुभव, उनके शरीर और ज़रूरतें केंद्र में नहीं थीं."
दसरा की रिपोर्ट के मुताबिक, "आज भी महिलाओं की क्षमता पर शक किया जाता है और महिलाओं के काम को कम गंभीर मानने वाले पूर्वाग्रह इस व्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं. तो कई जगह महिलाओं की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर काम करने की नीतियां नहीं बनाई गई हैं."
अगर हम मेडिकल क्षेत्र के इतिहास में झांक कर देखें तो 'हिस्टीरिया' ये बताता है कि किस तरह से मेडिकल क्षेत्र स्त्री विरोधी रहा है. जिसमें महिलाओं की शारीरिक और भावनात्मक तकलीफ़ों को अक्सर अतार्किक या मानसिक बीमारी के तौर पर पेश किया जाता था.
क्या मेडिकल क्षेत्र में महिलाओं को मिली जगह?
डॉ. सुचित्रा कहती हैं कि मॉडर्न मेडिसिन और मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय तक पुरुषों के शरीर, उनके लक्षणों और उनके अनुभवों के आधार को मानक माना गया था, जबकि महिलाओं के दर्द, थकान, हार्मोनल बदलावों और लंबे समय तक नजरअंदाज़ किया गया था.
नई दिल्ली के सेंटर फॉर यूरोगायनेकोलॉजी एंड पेल्विक हेल्थ में प्रैक्टिसिंग न्यूरोगायनेकोलॉजिस्ट डॉ. करिश्मा थारियानी भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखती हैं. वो बताती हैं कि दवाओं को लेकर रिसर्च सिर्फ़ पुरुषों पर की गई थी. इसकी वजह ये थी कि रिसर्च के लिए पुरुष ज़्यादा आसानी से मिल जाते थे.
डॉ. करिश्मा कहती हैं, "उस समय आबादी में महिलाओं की संख्या उतनी ज़्यादा नहीं थी. पिछले 20-30 सालों में बहुत सारी रिसर्च हुई हैं, जिनमें ज़्यादातर पुरुष और महिलाओं को बराबर संख्या में शामिल किया गया है. कहीं न कहीं ये भी महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर गंभीरता दिखाने की ओर एक क़दम है."
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक आज भी पेल्विक की जांच में इस्तेमाल होने वाला उपकरण स्पेकुलम लगभग वैसा ही दिखता है जैसा 19वीं सदी में पहली बार बनाया गया था. यानी आज भी उस वक़्त के उपकरण इस्तेमाल में हैं, जब ज़्यादातर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार भी नहीं था.
डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में हर 10 में से 1 महिला एंडोमेट्रियोसिस से प्रभावित है यानी क़रीब 19 करोड़ महिलाएं.
ये एक क्रोनिक कंडिशन है, जिसमें यूट्रस की लाइनिंग जैसा एक टिश्यू, यूट्रस के बाहर डेवलप हो जाता है. ये मिसप्लेस टिश्यू, रेगुलर यूटेरिन लाइनिंग की तरह बिहेव करने लगता है.
हर मेंस्ट्रुएल साइकिल के साथ ये मोटा होता है और ब्लीडिंग भी करता है. लेकिन इस खून को शरीर से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता, जिसकी वजह से महिलाओं के शरीर में इनफ्लेशन, दर्द जैसी दिक्कतें होने लगती हैं.
आज भी इसका डायग्नोसिस करने और इलाज करवाने में औसतन 4 से 12 साल लग जाते हैं.
लेकिन धीरे-धीरे हालात बदल भी रहे हैं.
डॉ. सुचित्रा दलवी का कहना है कि अब महिलाएं आत्मनिर्भर हैं, कमा रही हैं और अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान भी दे रही हैं. ऐसे में आने वाले सालों में मेडिकल क्षेत्र में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर होने वाली रिसर्च में सुधार आने की उम्मीद है.
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