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कॉकरोच जनता पार्टी क्या बड़े आंदोलन का रूप ले पाएगी, क्या कहते हैं विशेषज्ञ
- Author, शिवांगी जायसवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, New Delhi
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने शनिवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया. चंद दिनों में दो करोड़ से अधिक फॉलोवर हासिल कर लेने वाले इस सोशल मीडिया अकांउट (कॉकरोच इज़ बैक) की कॉल पर काफ़ी लोग इकट्ठा हुए.
प्रदर्शनकारियों ने एक आवाज़ में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की. सीजेपी ने इसके लिए सरकार को एक सप्ताह का अल्टीमेटम भी दिया है.
ऐसे में सवाल है कि सीजेपी के लिए आगे की राह क्या होगी?
कुछ राजनीतिक जानकार इसे अभी अपरिपक्व और दिशाविहीन आंदोलन मान रहे हैं, जिसमें बड़ी वजह किसी अनुभवी चेहरे का न होना मान रहे हैं.
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हालांकि सीजेपी के उठाए मुद्दे के प्रति आम जनता का जुड़ाव देखकर कुछ विश्लेषक इसमें संभावना देख रहे हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के संवाददाता दिलनवाज़ पाशा ने सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास से बात की.
प्रमुख मांग पूरी हो जाने की स्थिति के बाद सीजेपी का अगला कदम क्या होगा, इस पर सौरव दास ने कहा कि 'आगे की राह सभी मिलकर तय करेंगे. ये सभी पीड़ित युवाओं का मंच है.'
उन्होंने कहा, "आगे की राह हम सभी मिलकर तय करेंगे. अभी हमारा जो फ़्यूचर है, वो फ़्यूचर है आज का. और आज हम लोग डिमांड कर रहे हैं कि धर्मेंद्र प्रधान रिज़ाइन करें या फिर प्रधानमंत्री मोदी जी उन्होंने इस्तीफ़ा देने पर मजबूर करें."
प्रदर्शन ने सीजेपी को स्वीकार्यता दी?
सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों ने आकर हमारे आंदोलन को वेलिडेशन (स्वीकार्यता) दे दी है.
उन्होंने कहा, "यहां इतने लोगों का इकट्ठा होना आपेक्षित था, कुछ लोग दूसरे शहरों में होने के चलते नहीं आ सके. मगर हम लोगों को वेलिडेशन मिल चुका है कि ये मूवमेंट एक सही राह पर है."
हालांकि प्रदर्शन में पहुंचे लोगों की तादाद को लेकर भी सोशल मीडिया पर बहस देखी जा रही है. बीबीसी के संवाददाता के मुताबिक़, शनिवार को यहां सैकड़ों लोग जुटे.
सीजेपी के एक अन्य प्रवक्ता अभिषेक रांका ने मीडिया के सवाल के जवाब में दावा किया, "उन्होंने लोगों की गिनती तो नहीं की है पर ये संख्या आसानी से हज़ारों में होगी."
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता कहते हैं, "शनिवार को जंतर-मंतर पर जिस तरह लोग इकट्ठे हुए, यह दर्शाता है कि लोगों के अंदर व्यवस्था के प्रति असंतोष और आक्रोश का असर है."
"वे इसे निर्भया कांड के समय मौसम की परवाह न करते हुए लोगों के सड़कों पर उतरने से भी जोड़ते हैं."
शरद गुप्ता का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था की एक रणनीति अभी भी उनके फ़ेवर में है.
वो कहते हैं, "बीजेपी ने हर जगह पर युवाओं को जोड़कर रखा है. पीएम मोदी खुद कई मौकों पर युवाओं को संबोधित करते हैं, परीक्षा पर चर्चा करते हैं."
हालांकि उन्हें नहीं लगता कि फ़िलहाल यह किसी वीपी सिंह, जेपी या अन्ना हजारे की तरह का कोई आंदोलन बन पाएगा.
दूसरी ओर, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक स्मिता गुप्ता का कहना है कि यह आंदोलन ऐसे समय आया है जब मोदी सरकार का हनीमून पीरियड ख़त्म हो गया है.
वो कहती हैं, "देश में जो आर्थिक हालात हैं, चाहे आप पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से इसे जोड़ना चाहें, लोग अब इस हालात से थोड़ा तंग हो रहे हैं."
सीजेपी क्या बड़े आंदोलन का रूप ले सकेगी?
आंदोलन तो अपनी मांग पूरी हो जाने के बाद ख़त्म हो जाते हैं, तो इसके बाद भी क्या इसकी कोई नई रूप रेखा सामने आएगी?
इस सवाल पर सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "देखिए ये शुरुआत है, युवाओं की इतनी दिक्कतें हैं, इतने मुद्दे हैं, उन्हें जब-जब उठाने की कोशिश की गई, उन्हें धर्म या जाति की लड़ाई में फंसा दिया गया. इन सब मुद्दों में अभी सबसे अहम मुद्दा धमेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा है."
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता का कहना है कि जंतर-मंतर का प्रदर्शन भले व्यवस्था के ख़िलाफ़ लोगों के ग़ुस्से का असर हो, लेकिन वे मानते हैं कि इसके किसी गंभीर राजनीतिक आंदोलन में बदलने की संभावनाएं बहुत कम हैं.
वे तर्क देते हैं कि इन लोगों के पास कोई सोची-समझी रणनीति नहीं है. वे युवाओं के भीतर दबे हुए आक्रोश को हवा दे रहे हैं. लेकिन जब तक इसको दिशा नहीं मिलेगी, तब तक ये दिशाहीन कभी इधर-कभी उधर भटकता रहेगा.
वे कहते हैं, "युवाओं का यह आक्रोश अभी धर्मेंद्र प्रधान के ख़िलाफ़ और अभिजीत दीपके के साथ में है, कल को किसी और के साथ में होगा."
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक स्मिता गुप्ता का भी मानना है कि अभी सीजेपी को किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन के रूप में देखना जल्दबाज़ी होगी.
वो कहती हैं, "यह राजनीतिक आंदोलन बनेगा या नहीं बनेगा.. ये तो नहीं कहा जा सकता है. लेकिन इसमें काफ़ी पोटेंशियल है. वे कहती हैं कि इससे पहले जिन मुद्दों पर आंदोलन हुए हैं वे सब समग्र विषय हैं. वे सीधे आम लोगों की रोजी-रोटी से नहीं जुड़ते. जबकि कॉकरोच जनता पार्टी का मूवमेंट लोगों को सीधे जोड़ता है."
वे जेएनयू में हुए कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद व शहला राशिद वाले आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहती हैं, "ये लार्जर इश्यूज़ पर आधारित मूवमेंट था, जैसे लोकतंत्र और बोलने की आज़ादी जैसे मुद्दे, सब जानते हैं कि उस आंदोलन के चेहरों के साथ क्या हुआ."
वे समझाती हैं, "ये वैचारिक मुद्दे देश के लिए महत्वपूर्ण तो हैं लेकिन ये सीधे आम लोगों को प्रभावित नहीं करते. सीजेपी का जो मुद्दा है, इसमें किसी न किसी तरीके से इन युवाओं के मां-बाप भी जुड़ेंगे. जबकि लार्जर आइडिया वाला आंदोलन एक सीमित समूह के दायरे में ही रह जाते हैं."
हालांकि वह ऐसे ही एक वैचारिक आंदोलन के असर को भी अपनी बात में शामिल करती हैं.
उनके अनुसार, "नागरिकता संशोधन कानून को लेकर हुए शाहीन बाग़ आंदोलन में भी काफ़ी दम था लेकिन कोरोना महामारी के चलते वह जल्दी बंद करा दिया गया."
यह भी कहती हैं कि शाहीन बाग़ से जुड़ने के चलते उसे सिर्फ़ मुसलमानों का आंदोलन बताया गया जो सही नहीं था."
हालांकि कुछ विश्लेषक चिलचिलाती गर्मी में दिल्ली की सड़कों पर लोगों का उतरना, निर्भया कांड के दौरान मौसम की परवाह किए बिना लोगों के सड़कों पर आने जैसा बताते हैं.
जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "इसे (सीजेपी) नज़रअंदाज़ करना या पारंपरिक राजनीति के पैमाने से इसका आकलन करना ग़लती होगी."
वह इसे दुर्लभ ऊर्जा की झलक मानते हुए कहते हैं, "कॉकरोच जनता पार्टी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है. यह न इससे ज़्यादा है और न कम. यह बस आम जनता ही है. यह कोई आंदोलन नहीं, बल्कि एक क्षण है. और यही वजह है कि यह महत्वपूर्ण है."
लेकिन कुछ विश्लेषक सीजेपी के नेतृत्व की अनुभवहीनता की ओर इशारा करते हैं.
राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता का कहना है, "बिना राजनीतिक अनुभव के यह समूह एक बड़े आंदोलन का रुप शायद न ले पाए. कॉकरोच जनता पार्टी के तीनों प्रवक्ताओं का कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है."
क्या चुनावी राजनीति की ओर बढ़ेगी सीजेपी?
बीबीसी ने प्रवक्ता रांका से पूछा कि क्या फ़िलहाल वे राजनीति में नहीं आ रहे हैं?
इसके जवाब में वह कहते हैं, "सब कुछ राजनीतिक है. जिस हवा में हम सांस ले रहे हैं, जो पानी हम पी रहे हैं, जिन स्कूलों में हम पढ़ रहे हैं, सब कुछ राजनीतिक है. तो क्या पॉलिटिकल और क्या एपॉलिटिकल (अराजनैतिक)."
शरद गुप्ता का मानना है कि जिस तरह अरविंद केजरीवाल को चैलेंज किया गया था और फिर वे राजनीति में उतर आए थे, यहां भी ऐसी किसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.
वे कहते हैं, "जब अरविंद केजरीवाल ने अपना आंदोलन शुरू किया था तो कहा गया था कि प्रेशर बनाना अलग बात है और राजनीति करना और चुनाव लड़ना अलग बात. फिर उन्होंने चुनाव लड़कर दिखा दिया था."
शरद गुप्ता के अनुसार, "हो सकता है कि यह समूह भी उसी तरह ही आगे बढ़ जाए. यह भी है कि इस समूह को अरविंद केजरीवाल से ज़्यादा स्वीकार्यता मिले लेकिन फ़िलहाल आज के दिन ये बहुत ही कम अनुभवी नौजवान दिखाई दे रहे हैं."
सीजेपी ख़ुद को कैसे देखती है?
जंतर-मंतर पर मीडिया से बात करते हुए सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने इसे "प्रो यूथ, प्रो एजूकेशन, प्रो कॉस्टीट्यूशन, प्रो इंडिया ऑर्गनाइजेशन" बताया.
यानी ऐसा संगठन जो युवाओं, शिक्षा, संविधान और भारत को सर्वोपरि मानता है या उसका पैरोकार है.
इस मौके पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के संवाददाता ने रांका से पूछा, "पहले आप सीजेपी को सामाजिक अभियान कह रहे थे, अब आंदोलन बता रहे हैं?"
इस पर उन्होंने कहा, "हमें जो भी नाम देना चाहें, दे सकते हैं. यह युवाओं का कलेक्टिव है, युवाओं का आंदोलन है."
रांका से यह भी पूछा गया कि क्या आगे चलकर वे कॉकरोच जनता पार्टी का नाम बदलेंगे या ये यही रहेगा?
वे जवाब देते हैं, "देखिए नाम से संदर्भ को नहीं हटा सकते. तीस दिन पहले एक व्यंग (कॉकरोच) के तौर पर इसकी शुरूआत हुई थी. इसमें जनता और पार्टी जोड़ा गया, इस पर आप बात कर सकते हैं पर संदर्भ को नहीं हटा सकते."
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दीपके, बीबीसी न्यूज़ मराठी से हुई एक बातचीत में बता चुके हैं कि सीजेपी को उन्होंने क्यों शुरू किया था.
उन्होंने कहा था, "मैं ट्विटर (अब एक्स) पर सीजेई (भारत के मुख्य न्यायाधीश) का बयान देख रहा था जहां पर वो सिस्टम की आलोचना करने और राय देने के लिए देश के युवाओं की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से कर रहे थे. इसने मुझे ग़ुस्से और निराशा से भर दिया और ट्विटर पर मैंने इस पर अपनी राय दी."
"मैंने पूछा कि सब कॉकरोच एक साथ आ जाएं तो क्या होगा. मुझे जेन ज़ी और 25 साल तक के युवाओं के कमाल के जवाब मिले और उन्होंने कहा कि हमें साथ आना चाहिए और एक प्लेटफ़ॉर्म बनाना चाहिए."
बीते शनिवार को जंतर मंतर पर जो प्रोटेस्ट हुआ उसे देखते हुए कभी अन्ना आंदोलन में सक्रिय रहे जाने माने विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा, "यह कोई आंदोलन नहीं, बल्कि एक क्षण है. और यही वजह है कि यह महत्वपूर्ण है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.