You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
उत्तर प्रदेश की गवर्नर आनंदीबेन पटेल का लंबा कार्यकाल चर्चा में क्यों है?
- Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
आनंदीबेन पटेल की चर्चा होते ही लोग अक्सर 1987 की उस घटना को याद करते हैं जिसने उन्हें आम शिक्षिका से असाधारण साहस की मिसाल बना दिया था.
स्कूल पिकनिक के दौरान दो छात्राएं नर्मदा नदी की लहरों में फंस गईं थीं. आसपास खड़े लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले ही आनंदीबेन नदी में कूद चुकी थीं.
कुछ ही देर बाद वे दोनों छात्राओं को सुरक्षित किनारे तक ले आईं. इस बहादुरी ने उन्हें पूरे गुजरात में चर्चा का विषय बना दिया.
आनंदीबेन के बारे में कहा जाता है कि उन्हें जो सही लगता है, उसे करने के लिए वो तनिक भी नहीं सोचतीं. तब पूरे गुजरात में उनके इस स्वभाव और बहादुरी की चर्चा हो रही थी.
वे फिर चर्चा में हैं लेकिन इस बार मामला उत्तर प्रदेश का है. राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने प्रदेश के सभी राजकीय विश्वविद्यालयों में यूनिफॉर्म पहनकर आना अनिवार्य कर दिया है.
इस आदेश के बाद उत्तर प्रदेश में राजकीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स का यूनिफ़ॉर्म पहनना अनिवार्य हो गया है.
इससे पहले सिर्फ़ बारहवीं तक पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स के लिए ही यूनिफ़ॉर्म पहनना अनिवार्य था. स्नातक और उससे ऊपर की शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों के लिए यूनिफ़ॉर्म की ज़रूरत नहीं समझी जाती थी.
लिहाज़ा, राज्यपाल के इस आदेश का विरोध भी हो रहा है. समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद एसटी हसन का मानना है कि विश्वविद्यालयों में यूनिफ़ॉर्म को अनिवार्य करना व्यवहारिक तौर पर सही नहीं है.
दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने राज्यपाल के आदेश का समर्थन किया है.
उन्होंने कहा, "विश्वविद्यालयों के बच्चे एक समान दिखें और दूर से देखकर पता चले कि ये बच्चे उस विश्वविद्यालय के हैं तो यह बहुत अच्छा है."
लंबे वक्त से राज्यपाल
आनंदीबेन पटेल 29 जुलाई 2019 से उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं. इस पद पर रहते हुए उन्हें तकरीबन सात साल होने वाले हैं.
उत्तर प्रदेश से पहले 2018 में उन्हें मध्य प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया था. उनका कार्यकाल 28 जुलाई 2019 तक था. उन्होंने कुछ समय तक छत्तीसगढ़ की कार्यवाहक राज्यपाल के रूप में भी काम किया.
यूँ तो राज्यपाल यानी गवर्नर का कार्यकाल 5 साल का होता है. संविधान के जानकार बताते हैं कि नए राज्यपाल की नियुक्ति ना होने पर, यह कार्यकाल चलता रहता है.
उत्तर प्रदेश में 1950 से नियुक्त सभी गवर्नरों में आनंदीबेन पटेल का कार्यकाल सबसे लंबा है. उनसे पहले के कुछ ही राज्यपाल ऐसे हैं जो पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सके.
मसलन, विश्वनाथ दास 1962-67, बी गोपाला रेड्डी 1967-72, बीडी जत्ती 1980-1985 और मोहम्मद उस्मान आरिफ़ 1985-1990, कुछ ऐसे राज्यपाल हैं जिनका कार्यकाल लगभग पांच साल का रहा.
इनके बाद टीवी राजेश्वर, बीएल जोशी और 2014 में केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद राम नाइक ने तकरीबन पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है.
ऐसे में चर्चा है कि आख़िर आनंदीबेन पटेल का कार्यकाल इतना लंबा क्यों दिया गया है. क्या इसका कोई राजनीतिक संबंध है.
शिक्षक से राज्यपाल बनने का सफ़र
आनंदीबेन पटेल राजनीति में आने से पहले शिक्षक थीं. उनका जन्म गुजरात के मेहसाणा में 1941 में हुआ था.
1987 में आनंदीबेन पटेल ने राजनीति में प्रवेश किया. इसकी पृष्ठभूमि वही घटना बनी थी जो आनंदीबेन पटेल की शख़्सियत को बेहतर तरीके से रेखांकित करती है.
यह घटना स्कूल पिकनिक के दौरान घटी थी, जब उन्होंने सरदार सरोवर जलाशय में डूब रही दो लड़कियों को बचाने के लिए जान की बाज़ी लगा दी थी.
जान की परवाह किए बिना पानी में कूदने के लिए उनकी खूब चर्चा हुई. इसके लिए आनंदीबेन को राज्य सरकार ने वीरता पुरस्कार से नवाज़ा था.
इस घटना के बाद गुजरात के उस वक्त के बीजेपी के कद्दावर नेता केशुभाई पटेल ने आनंदीबेन को राजनीति में लाने की कवायद शुरू कर दी.
आनंदीबेन पटेल गुजरात में पहली बार 1998 में विधायक बनी थीं. इससे पहले 1994 में राज्यसभा की सदस्य निर्वाचित हुईं. वे गुजरात बीजेपी महिला मोर्चा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं.
गुजरात में बीजेपी के पूर्व नेता जय नारायण व्यास का कहना है कि आनंदीबेन पटेल के राजनीति में बड़े नेता के रूप में स्थापित होने का असली श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है
जय नारायण व्यास अब गुजरात कांग्रेस के उपाध्यक्ष हैं.
साल 2014 में नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद आनंदीबेन पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था. वह अगस्त 2016 तक इस पद पर रहीं, लेकिन 2017 में उन्होंने गुजरात विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा.
गुजरात की मुख्यमंत्री बनने से पहले, आनंदीबेन पटेल ने कई साल तक प्रदेश के मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण मंत्रालयों की बागडोर संभाली थी. वो नरेंद्र मोदी के तत्कालीन गुजरात सरकार में मंत्री थीं.
राजनीति के जानकारों का मानना है कि 2001 में नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद वे राजनीतिक तौर पर उनके करीब हो गईं थीं.
नरेंद्र मोदी गुजरात के सबसे लंबे वक्त तक यानी 2014 तक मुख्यमंत्री रहे. उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद राज्य की कमान आनंदीबेन के हाथ में चली गई.
कांग्रेस के पूर्व नेता और मौजूदा गुजरात सरकार में कैबिनेट मंत्री अर्जुन मोडवाडिया का कहना है, "आनंदीबेन पटेल बहुत ही समझदार और कुशल प्रशासक हैं. गुजरात में मंत्री रहते हुए शिक्षा और राजस्व विभाग में उन्होंने आमूल चूल परिवर्तन किया था, किस तरह पारदर्शी तरीके से काम हो इस पर उनका ध्यान अधिक था."
अर्जुन मोडवाडिया तब विपक्ष के नेता थे. आनंदीबेन के बारे में वो याद करते हुए कहते हैं, "विपक्ष की महिला विधायकों के साथ उनके रिश्ते काफ़ी अच्छे थे. वह सीधी बात करने में यक़ीन रखती हैं."
हालांकि उनके साथ काम कर चुके लोगों का दावा है कि राजनीति में उनके उभार के कई कारण हैं.
जय नारायण व्यास अभी कांग्रेस के नेता हैं. वे पहले बीजेपी में थे और राज्य सरकार में मंत्री थे.
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "नरेंद्र मोदी जैसे राजनीति में आगे बढ़ते गए, वैसे ही आनंदीबेन पटेल भी आगे बढ़ती रही हैं."
व्यास का कहना है, "उस समय बीजेपी में मुखर महिलाओं की कमी थी, वो भी एक वजह है, लेकिन राजनीति में नरेंद्र मोदी उनके गॉड फ़ॉदर हैं."
जय नारायण व्यास ये बताना भी नहीं भूलते हैं, "गुजरात की राजनीति में वो अमित शाह की विरोधी मानी जाती हैं. जबकि अहमदाबाद में दोनों एक ही इलाके में रहते हैं."
राज्यपाल के कार्यकाल को लेकर सवाल
साल 2025 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के कार्यकाल को लेकर सवाल उठाया था.
इस बारे में प्रदेश कांग्रेस के मीडिया सेल के चेयरमैन सीपी राय ने कहा, "राज्यपाल का कार्यकाल पांच साल का होता है. इससे अधिक अगर राज्यपाल का कार्यकाल दोबारा बढ़ाया गया हो तो इसकी स्पष्टता होनी चाहिए."
राज्यपाल के तौर पर लंबे कार्यकाल के सवाल पर समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहम्मद आज़म कहते हैं, "राज्यपाल सरकार से कोई सवाल नहीं पूछती हैं, चाहे बुलडोज़र से किसी बेगुनाह का घर गिर रहा हो या फिर फर्ज़ी एनकाउंटर हो रहा हो या फिर 69 हजार शिक्षकों की भर्ती में आरक्षण का विषय हो, वो मौन हैं."
देश में राज्यपाल का कार्यकाल पांच साल का होता है.
वरिष्ठ पत्रकार और क़ानून के जानकार प्रभाकर मिश्रा के मुताबिक़, "संविधान के अनुच्छेद 155 के तहत, राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र सरकार की सलाह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है."
उन्होंने बताया, "अनुच्छेद 156 में व्यवस्था है कि राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है लेकिन राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत अपना पद धारण करते हैं, इसका मतलब है कि राष्ट्रपति कभी भी उन्हें पद से हटा सकते हैं. राष्ट्रपति जब तक चाहें राज्यपाल अपने पद पर बने रह सकते हैं. "
लखनऊ स्थित वरिष्ठ पत्रकार सैयद क़ासिम ने कहा, "इतना लंबा कार्यकाल देने के कोई मायने नहीं हैं. क्या देश में और कोई इस लायक नहीं है. इसका मतलब गुजरात के संबंधों की वजह से उनका कार्यकाल खिंचता जा रहा है."
कुछ लोग इस बात का ज़िक्र करते हैं कि लंबे कार्यकाल के बाद भी आनंदीबेन पटेल विवादों से दूर रही हैं.
लखनऊ स्थित वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "प्रधानमंत्री का विश्वास उनको हासिल है. इसलिए पांच साल के कार्यकाल के बाद भी उनकी जगह किसी और को नियुक्ति नहीं किया गया है."
उन्होंने कहा, "अब तक उनको लेकर प्रदेश में कोई राजनीतिक विवाद नहीं हुआ है. वो सबके लिए सुलभ हैं. प्रदेश सरकार पर पैनी नज़र है लेकिन कोई हस्तक्षेप नहीं है."
वरिष्ठ पत्रकार सैयद क़ासिम इसकी वजह का आकलन करते हुए कहते हैं, "क्योंकि केंद्र और राज्य में दोनों जगह बीजेपी की सरकार है, ऐसे में राज्यपाल के दख़ल का सवाल नहीं उठता है."
वे कहते हैं, "लेकिन उनका सरकार से कोई जवाब तलब ना करना भी एक सवाल खड़ा करता है. चाहे वो क़ानून व्यवस्था पर हो या फिर एनकाउंटर ."
आनंदीबेन और आचार्य देवव्रत का लंबा कार्यकाल
नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता में आने के बाद पूर्ववर्ती यूपीए सरकार में नियुक्त राज्यपालों को हटने के बाद से ही नए राज्यपालों की नियुक्ति होने लगी थी.
मोदी सरकार के कार्यकाल में जो राज्यपाल नियुक्त किए गए, उनमें आचार्य देवव्रत 22 जुलाई 2019 से गुजरात के राज्यपाल हैं.
इससे पहले भी वह कई राज्यों के राज्यपाल रह चुके हैं. आचार्य देवव्रत और आनंदीबेन पटेल का कार्यकाल पांच साल से अधिक हो गया है.
कई अन्य राज्यपाल हैं जो पांच साल पूरा करने वाले हैं. इनमें उप राज्यपाल यानि लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यकाल को नहीं जोड़ा गया है.
उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह, मध्य प्रदेश के गवर्नर मंगू भाई पटेल, कर्नाटक के गवर्नर थावर चंद गहलोत का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने वाला है. इन सभी की नियुक्ति जून-जुलाई 2021 में हुई थी.
राज्यपाल का रोल
राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होने के साथ-साथ केंद्र सरकार और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं.
प्रभाकर मिश्रा के मुताबिक़, "राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति या किसी आपात स्थिति मसलन धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश पर राज्यपाल सीधे गृह मंत्रालय को रिपोर्ट भेजते हैं."
हालांकि लोकतांत्रिक ढांचे में विधायिका का ही रोल अहम है. राज्यपाल सिर्फ केंद्र का नुमाइंदा होता है लेकिन जहां अल्पमत या कई दलों की गठबंधन सरकार हो, उस राज्य में राज्यपाल की भूमिका बढ़ जाती है.
विपक्ष शासित राज्यों में अक्सर राज्यपाल और प्रदेश सरकार के बीच तनातनी देखने को मिलती रही है.
हाल-फिलहाल की बात करें तो पश्चिम बंगाल में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनकड़ के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे.
पहले के राज्यपालों को लेकर विवाद
उत्तर प्रदेश में 2007 से पूर्ण बहुमत की सरकार बन रही है. ऐसे में गवर्नर का रोल सीमित हो गया है लेकिन 1990- 2007 के बीच उत्तर प्रदेश में कई अल्पमत सरकारें रही हैं. उस दौर में राज्यपालों की सक्रियता भी रही है.
रोमेश भंडारी के राज्यपाल रहते हुए कई ऐसे फ़ैसले हुए, जिन्हें कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बदला गया था.
वे पहले नौकरशाह थे, जो जुलाई 1996 में राज्यपाल बने थे और 1998 तक इस पद पर रहे.
उन्होंने अल्पमत में आई बीजेपी के अगुवाई वाली कल्याण सिंह की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था और लोकतांत्रिक कांग्रेस के जगदंबिका पाल को शपथ दिला दी थी.
हालांकि कोर्ट ने इस फ़ैसले को पलट दिया था और कहा सरकार के बहुमत का परीक्षण विधानसभा में होना चाहिए. जगदंबिका पाल 2014 से बीजेपी के लोकसभा सांसद हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल ही प्रशासक होता है, इसलिए जब मोती लाल वोरा राज्यपाल थे तो वो राजभवन में जनता से बकायदा मिलते थे. उन्होंने राजभवन को आम आदमी के लिए खोला था."
मोतीलाल वोरा 1993 से 1996 के बीच उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.