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भोपाल के बरकतुल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलने के प्रस्ताव का विरोध, कौन थे बरकतुल्ला भोपाली?
- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, भोपाल से बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम "मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय" करने की तैयारी शुरू हो गई है.
विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने इस संबंध में बुधवार को एक प्रस्ताव पारित कर राज्य सरकार और कुलाधिपति के पास भेज दिया है.
प्रस्ताव के मुताबिक़ राजा भोज की ऐतिहासिक विरासत के साथ ही साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा जाएगा.
बैठक में मौजूद कार्य परिषद सदस्य और विश्वविद्यालय की अरबी-पर्शियन विभाग की प्रमुख डॉक्टर ताहिरा अब्बासी ने प्रस्ताव का विरोध किया है.
उन्होंने कहा कि बरकतउल्ला भोपाली ख़ुद एक स्वतंत्रता सेनानी थे, इसलिए इस विश्वविद्यालय का नाम नहीं बदला जाना चाहिए.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने नाम बदलने से जुड़े प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.
हालांकि अंतिम रूप से नाम में बदलाव लागू होने के लिए राज्य सरकार और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं की औपचारिकताएं पूरी की जानी बाक़ी हैं.
यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार डॉक्टर एबी सिंह ने पत्रकारों को बताया कि नाम बदलने के संबंध में जो फ़ैसला लिया गया है उसका प्रस्ताव जल्द ही शासन की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा.
नाम बदलने को लेकर नई बहस
यह प्रस्ताव सामने आते ही प्रदेश में एक नई बहस शुरू हो गई है.
इस फै़सले के पक्ष में लोग जहां इसे भोपाल और मालवा की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से जोड़कर देख रहे है, तो दूसरी तरफ़ इसे देश की स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण सेनानी की विरासत को कमजोर करने का प्रयास बता रहे है.
बीबीसी से बात करते हुए डॉक्टर ताहिरा अब्बासी ने बताया, " बैठक में मैंने कहा था कि आप अगर राजा भोज के नाम पर रखना चाहते हैं तो उसके लिये एक बड़ा और नया विश्वविद्यालय बनाएं क्योंकि राजा भोज जैसे व्यक्ति बहुत बड़े थे उनके नाम के मुताबिक़ यह बनाया जाना चाहिए. साथ ही आप बरकतउल्ला भोपाली के योगदान को भी नहीं भुला सकते इसलिए इसका नाम वैसे ही रहने दें."
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय की स्थापना साल 1970 में भोपाल विश्वविद्यालय के तौर पर हुई थी.
बाद में साल 1988 में इसका नाम स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी चिंतक मौलाना बरकतउल्ला भोपाली के सम्मान में बदलकर बरकतउल्ला विश्वविद्यालय रखा गया था.
विश्वविद्यालय प्रबंधन और नाम परिवर्तन के समर्थकों का कहना है कि नया नाम क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करेगा.
प्रस्ताव का विरोध करने वाले क्या कह रहे हैं
लेकिन कई इतिहासकार, बुद्धिजीवी और राजनीतिक नेता नाम बदलने के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं.
इतिहासकार एस. इरफान हबीब ने एक्स पर लिखा है, ''यह अत्यंत पक्षपातपूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है. लेकिन आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि सत्ता में बैठे लोगों ने स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का सम्मान करना कब सीखा है? उनके लिए मौलाना बरकतुल्ला ख़ान केवल एक मुसलमान थे और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बना दी गई."
वही इतिहासकार और लेखिका राणा सफ़वी ने लिखा है, "मौलाना बरकतउल्ला ने अपने देश की आज़ादी के लिए जीवनभर संघर्ष किया और अंततः उसी उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. उन्होंने महासागरों और सीमाओं के पार रहकर भी करोड़ों भारतीयों की आशाओं और आकांक्षाओं को अपने साथ लेकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी. यही कारण है कि भोपाल के एक विश्वविद्यालय का नाम उनके सम्मान में रखा गया."
उन्होंने आगे लिखा, "आज मौलाना बरकतउल्ला को याद करना केवल इतिहास का स्मरण भर नहीं है. यह हमें याद दिलाता है कि भारत की स्वतंत्रता उन लोगों के साहस, त्याग और अटूट विश्वास का परिणाम थी, जिन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहकर संघर्ष का संगठन किया, महाद्वीपों के पार संबंध बनाए और तब भी उम्मीद नहीं छोड़ी जब स्वदेश लौटने की संभावना धुंधली दिखाई देती थी."
भोपाल में बरकतउल्ला यूथ फोरम चलाने वाले अनस अली भी इस फैसले से ख़ासे नाराज़ है.
उन्होंने कहा, "जब इसका नाम बदला जाएगा तो वो भोपाल की तारीख़ का सबसे बुरा या काला दिन होगा. उन्होंने देश के लिए जो किया है, उसे भुलाया नहीं जा सकता है. देश की आज़ादी के लिए उस समय के सोवियत यूनियन के लीडर लेनिन से उन्होंने मुलाक़ात की और उनसे मदद मांगी. इसी तरह से उस समय के दुनियाभर के बड़े प्रतिनिधियों ने उन्हें मदद की थी. उनके साथ महेंद्र प्रताप सिंह भी थे, लेकिन अब उनके योगदान को भुलाया जा रहा है."
वो आगे कहते हैं, " इतने बड़े शख़्स के नाम को आगे बढ़ाने के बजाय उसे मिटाने की कोशिश की जा रही है. आज उनके नाम पर भोपाल में कुछ भी नहीं है, सिर्फ़ एक विश्वविद्यालय है, लेकिन उसे भी मिटाया जा रहा है. हो सकता है आपको जानकारी न हो कि उन्होंने क्या किया है, लेकिन आप पता तो लगा सकते हैं. कुछ साल पहले राजा महेंद्र सिंह के नाम पर एक विश्वविद्यालय बनाया गया है तो दोनों ही साथ थे और बरकतउल्लाह भोपाल का कफ़न-दफ़न राजा महेंद्र सिंह ने ही किया."
कौन थे मौलाना बरकतउल्ला?
मौलाना मोहम्मद बरकतउल्ला भोपाली (1854–1927) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे और भारत की पहली निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री थे.
उनका जन्म भोपाल में हुआ था. वे ब्रिटिश शासन के कट्टर विरोधी थे और विदेशों में रहकर भारत की आजादी के लिए सक्रिय अभियान चलाते रहे. वे गदर आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेताओं में शामिल थे.
बरकतुल्ला भोपाली ने भारत की पहली निर्वासित सरकार का गठन 1 दिसंबर, 1915 को अफ़ग़ानिस्तान में किया और उस सरकार में उनके साथ राष्ट्रपति थे राजा महेंद्र प्रताप सिंह.
राजा महेंद्र प्रताप सिंह और बरकतउल्लाह भोपाली की दोस्ती हिंदू-मुस्लिम एकता की भी मिसाल रही है.
भोपाल से ताल्लुक रखने वाले बरकतुल्ला भोपाली वो क्रांतिकारी नेता थे जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई के लिये संघर्ष किया.
इतिहासकार और शहर से जुड़े लोगों का मानना रहा है कि बरकतुल्ला भोपाली को भुला देना वैसे ही रहा है जैसे अपने इतिहास से ऐसे व्यक्ति की यादों को मिटा देना है जिसने हिंदुस्तान की आज़ादी में एक अहम रोल अदा किया.
बरकतुल्ला भोपाली का जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल के इतवारे इलाके में हुआ था. उनके पिता शुजाअत उल्लाह खान भोपाल हुकूमत में पुलिस में थे.
बरकतुल्ला भोपाली ने अपनी तालीम भोपाल के रेतघाट स्थित सुलेमानिया स्कूल से की थी, जो आज भी मौजूद है. उसके बाद वो मुंबई चले गए.
बरकतुल्लाह भोपाली को कैलिग्राफ़ी भी आती थी. इसके अलावा अरबी, फ़ारसी, इंग्लिश, जापानी सहित उन्हें आठ भाषाओं का ज्ञान था.
शिक्षा प्राप्त करने के बाद शुरुआती दौर में उसी स्कूल में शिक्षक के तौर पर पढ़ाना शुरू कर दिया था. उसके बाद ब्रिटिश विरोधी नज़रिया रखने की वजह से वो भोपाल छोड़कर चले गए.
वो मुंबई पहुंच गए और वहां पर वो फिर से एक स्कूल में पढ़ने लगे ताकि अंग्रेज़ी की शिक्षा ले सकें.
1887 में वो लंदन चले गए और वहां पर उर्दू, अरबी और फ़ारसी पढ़ाने लगे.
साथ ही वो ख़ुद जर्मन, फ्रेंच और जापानी सीखने लगे. उसके बाद वो ओरिएंटल कॉलेज ऑफ यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल में पढ़ाने लगे.
इस दौरान वो इंडिया हाउस में लगातार भारतीय क्रांतिकारियों के संपर्क में आते रहे और वो वहां रहकर ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ झंडा बुलंद करते रहे.
इंग्लैंड के बाद वो अमेरिका (1903), जापान (1909), जर्मनी (1914), तुर्की ,अफ़ग़ानिस्तान (1915), सोवियत यूनियन (1919), फ्रांस और रोम (1924) गये.
उन्होंने जापान की टोक्यो यूनिवर्सिटी में अरबी की शिक्षा भी दी.
बरकतुल्ला भोपाली की मृत्यु अमेरिका के सैन फ़्रांसिस्को में 20 सितंबर 1927 को हुई.
उन्हें इस उम्मीद के साथ दफ़नाया गया था कि जब हिंदुस्तान आज़ाद हो जाएगा तो उनके जिस्म को हिंदुस्तान में दफ़न किया जाएगा लेकिन ऐसा न हो सका.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.