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पूर्वी एशिया के आसमान क्यों होते जा रहे ख़तरनाक़?
- Author, प्रतीक जाखड़
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
- प्रकाशित
पूर्वी एशिया में पहले ही समुद्री सीमा विवाद काफ़ी हैं लेकिन अब यहां हवाई सीमा पर भी विवाद बढ़ रहा है.
पिछले हफ़्ते ही दक्षिण कोरियाई लड़ाकू विमान का सामना सिओल के एयर डिफ़ेंस आईडेंटिफ़िकेशन ज़ोन में (एडीआईज़ेड) चीनी और रूसी लड़ाकू विमानों के साथ हो गया.
इस घटना के बाद आसमान में बढ़ती सैन्य गतिविधियों की वजह से सुरक्षा चुनौतियां भी बढ़ गई हैं.
हालांकि चीन और रूस की ये पहली संयुक्त हवाई सुरक्षा उड़ान थी, लेकिन दोनों देशों के विमान लगातार दूसरे देशों की हवाई सीमा में प्रवेश करते रहे हैं, भले ही ये जानबूझकर हो या अनजाने में.
इस तरह की गतिविधियों के कई कारण हो सकते हैं, मसलन ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करना या पॉयलट की रीयल टाइम ट्रेनिंग के लिए, लेकिन इसके पीछे क्षेत्रीय यथास्थिति के उल्लंघन का भी मक़सद हो सकता है.
एडीआईज़ेड एक शुरुआती वॉर्निंग सिस्टम है जो शीत युद्ध के ज़माने में बनाया गया था. लेकिन पूर्वी एशिया में इसके बहाने विवादित इलाक़े पर अपना दावा करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाने लगा है.
असल में एडीआईज़ेड एक ऐसा हवाई क्षेत्र है जो देश की हवाई सीमा के पास होता है जहां किसी भी अज्ञात विमान से पहचान के प्रोटोकॉल मानने के लिए कहा जा सकता है और अगर विमान निर्देश का पालन नहीं करता तो ज़रूरी कार्रवाई की जा सकती है.
कब हुई एडीआईज़ेड की शुरुआत
दिलचस्प बात ये है कि ऐसे हवाई ज़ोन स्थापित करने से रोकने के लिए कोई नियम क़ानून नहीं है और ना ही ऐसा कोई अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी दिशा निर्देश है.
ताज़ा घटना में बीजिंग और मॉस्को ने सबसे पहले इसी बात की ओर ध्यान दिलाया.
जब दक्षिण कोरिया ने कहा कि चीनी जेट ने सियोल के हवाई ज़ोन में घुसपैठ की है तो चीन ने तुरंत कहा कि ये अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र है जिसमें हर देश हवाई संचालन के लिए आज़ाद है.
अमरीका पहला देश है जिसने 1950 के दशक में एडीआईज़ेड स्थापित किया था और उसी दशक में उसने दक्षिण कोरिया और जापान के एडीआईज़ेड भी स्थापित किए.
इसके अलावा इस क्षेत्र में वियतनाम, फ़िलीपींस और ताईवान के पास भी एडीआईज़ेड हैं और इंडोनेशिया अपना ज़ोन बनाने की सोच रहा है.
साल 2010 में जापान ने अपने एडीआईज़ेड को योनागुनी द्वीप तक फैला दिया जिस पर ताईवान भी दावा करता रहा है.
इन देशों के समूह में चीन बाद में शामिल हुआ और साल 2013 में उसने पूर्वी चीन सागर में अपना पहला एडीआईज़ेड स्थापित किया.
हालांकि इसके हवाई ज़ोन में एक विशेषता ये है कि यहां से गुज़रने वाले सभी विमानों को अपनी पहचान बतानी होगी, चाहे वो कहीं जा रहे हों.
इस ज़ोन में जापान प्रशासित सेनकाकू द्वीप भी शामिल है जिस पर चीन अपना दावा करता रहा है और इसे डियाओयू द्वीप कहता है. इसके साथ ही दक्षिण कोरिया नियंत्रित लियोडो द्वीप भी इसी ज़ोन में आता है.
जब चीन ने अपना एडीआईज़ेड घोषित किया तो उसके कुछ दिन बाद सियोल ने अपने ज़ोन का विस्तार करते हुए लियोडो को भी शामिल कर लिया. माना जाता है कि दक्षिण कोरिया अपने दावे को मज़बूत करना चाहता था.
एक रूसी दैनिक अख़बार इज़ेवस्तिया में 25 जुलाई को एक लेख छपा जिसमें लिखा था, "पिछले दशक में अंतरराष्ट्रीय हवाई सीमा को मनमाने तरीक़े से अधिग्रहित करने और आइडेंटिफ़िकेशन ज़ोन के विस्तार का एक ढर्रा सा बन चुका है."
लेख के अनुसार, "इसका ज़मीनी सीमा से शायद ही कोई लेना देना है. लेकिन कुछ देशों ने समंदर के ऊपर अपनी सीमा के पास के न्यूट्रल हवाई क्षेत्र को भी अपना स्पेशल हवाई ज़ोन घोषित करना शुरू कर दिया है."
इस ट्रेंड के पीछे क्या वजहें हैं?
एडीआईज़ेड स्थापित करने के पीछे देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा हवाला दिया जाता है.
हालांकि इसका कैसे नियमन होगा, इस पर बहुत स्पष्टता नहीं है और इसके इस्तेमाल की इजाज़त को दावेदारी के रूप में देखा जाता है, ख़ासकर पूर्वी एशिया में जहां बहुत सारे सीमा विवाद हैं.
इसके पीछे का तर्क ये है कि एडीआईज़ेड में अगर किसी देश का सीमित प्रभाव है तब भी लंबे समय में इस इलाक़े पर उसकी दावेदारी को पुष्ट करने के काम आ सकता है.
हालांकि चीनी एडीआईज़ेड को अमरीकी सेना नज़रअंदाज़ करती है लेकिन उस रास्ते का इस्तेमाल करने वाली 60 वाणिज्यिक एयरलाइंस और कुछ अमरीकी युद्धपोत भी अपनी पहचान बताते हैं.
सिंगापुर में एस राजरत्नम स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में डिफ़ेंस एक्सपर्ट कोलिन कोह स्वी लीन के अनुसार, विवादित इलाक़ों पर अपना दावा जताना प्रत्यक्ष से ज़्यादा अप्रत्यक्ष तौर पर होता है.
उन्होंने बीबीसी मॉनीटरिंग को बताया, "एक विदेशी विमान अगर एडीआईज़ेड के अंदर रडार पर आ गया, भले ही वो वास्तविक हवाई सीमा से बाहर ही क्यों न हो, इलाक़े पर दावा जताने के लिए उसपर दबाव डाला जा सकता है और उसे लौटाया जा सकता है."
एडीआईज़ेड से जुड़ी घटनाएं
ऐसी स्थिति 2015 में पैदा हुई थी जब लाओ एयरलाइंस की एक उड़ान को चीन के हवाई सीमा नियंत्रकों ने इसलिए लौटा दिया कि उसके पास पूर्वी चीन सागर के एडीआईज़ेड से गुज़रने का पास नहीं था.
इसके अलावा एडीआईज़ेड कुछ हद तक विवादित इलाक़ों के ऊपर हवाई संचालन की वैधता भी प्रदान करता है.
उदाहरण के लिए चीन के सैन्य विमान अगर सेनकाकू या डियोयू द्वीप के ऊपर उड़ान भरे तो वो दावा कर सकते हैं कि वो चीनी एडीआईज़ेड में हैं और जापान के हवाई ज़ोन का उल्लंघन नहीं कर रहे.
ग्रिफ़िथ एशिया इंस्टीट्यूट में फ़ेलो और रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फ़ोर्स के पूर्व अधिकारी पीटर लेटन के अनुसार, "चीन का एडीआईज़ेड असल में सेनकाकू द्वीप पर दावे को मज़बूत करने की रणनीति का हिस्सा है."
उनके मुताबिक़, "इसके अलावा, अगर चीन की हवाई गतिविधियों को चुनौती नहीं मिलती, अन्य देश भी धीरे-धीरे इसे स्वीकार कर लेंगे या कम से कम जापान की बजाय इस क्षेत्र पर चीन के दावे को वरीयता देंगे."
एडीआईज़ेड स्थापित करना एक बात है और इसे लागू करना दूसरी बात क्योंकि इसके लिए सैन्य संसाधन लगाने की ज़रूरत पड़ती है.
एडीआईज़ेड उल्लंघन की घटनाएं
दक्षिण कोरियाई रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस साल ही चीन और रूसी सेना के विमान अलग-अलग कोरियाई एडीआईज़ेड में 39 बार घुसे थे.
यूएस नावेल कॉलेज के चाइना मैरीटाइम स्टडीज़ इंस्टीट्यूट में स्ट्रेटेजिक रीसर्चर पीटर डटन एक और बात बताते हैं कि क्यों देश एडीआईज़ेड को लेकर अधिक संवेदनशील हैं.
उनके मुताबिक़, "हालांकि एडीआईज़ेड ज़मीनी सीमा से जुड़ी हवाई सीमा नहीं है, लेकिन नक्शे पर कभी भी सीमा खींची जा सकती है और इसे सार्वजनिक किया जा सकता है. और इसका असर ये हो सकता है कि इसकी रक्षा के लिए लोगों की चाहत बढ़ जाएगी."
जापान एयर सेल्फ़ डिफ़ेंस फ़ोर्स को अपने एडीआईज़ेड में अज्ञात विमानों की निगरानी के लिए लगभग हर रोज़ अपने विमान भेजने पड़ते हैं. 2018 में इसके विमानों ने 999 बार उड़ान भरी.
लेटन का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता ये है कि जापानी डिफ़ेंस फ़ोर्स की तुलना में चीन के पास छह गुना लड़ाकू विमान हैं और जब भी वो चाहें घुसपैठ कर सकते हैं.
आसमान में सैन्य गतिविधियों के बढ़ने पर ये भी ख़तरा है कि किसी दुर्घटना से मामला अधिक बिगड़ जाए.
सियोल के एक अख़बार 'द कोरिया हेराल्ड' में 24 जुलाई को छपे एक लेख के अनुसार, "इस तरह की संयुक्त सैन्य अभ्यास के नियमित होने की आशंका है और रूस और चीन अन्य देशों के हवाई सुरक्षा ज़ोन को लगातार नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. इसकी वजह से वास्तविक भिड़ंत का ख़तरा मौजूद है."
चीन ने दक्षिण चीन सागर पर भी एडीआईज़ेड स्थापित करने का संकेत दिया है, अगर ऐसा होता है तो आसमान में तनाव बढ़ सकता है.
हालांकि ये जल्द नहीं होने जा रहा है क्योंकि इसको लागू करना कठिन है और सीमा को लेकर चीन के रणनीतिक लक्ष्य के लिहाज़ से भी उलटा दांव पड़ सकता है.
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