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BBC Hindi: बीते हफ़्ते की वो ख़बरें, जो शायद आप मिस कर गए
नमस्कार!
आशा है कि आप स्वस्थ होंगे और आपके आस-पास सब अच्छा होगा.
हमें मालूम है कि हफ़्ते भर आपके पास वक़्त की कुछ कमी रही होगी.
इस वजह से आप देश दुनिया की अहम ख़बरों को देख या पढ़ नहीं पाए होंगे.
इसी के चलते हम लाए हैं आपके लिए बीते हफ़्ते की कुछ अहम ख़बरें. शायद इन ख़बरों में से कुछ पर आपकी नज़र नहीं गई होगी.
अगर आपने ये पांच ख़बरें पढ़ लीं तो समझिए कि आपको बीते हफ़्ते की ख़ास खबरें पता चल गईं.
क्या खुद को तीन साल तक दुनिया से काटकर रखना बीमारी का संकेत है?
राजधानी दिल्ली से सटे गुरूग्राम में एक अनोखा मामला सामने आया है, जहाँ एक माँ ने ख़ुद को और अपने बेटे को तीन साल तक घर में बंद रखा था.
पुलिस के अनुसार -
- इस महिला के बेटे को 2015-2016 में अस्थमा हुआ.
- कोरोना के बाद डर के मारे पति को घर आने से मना कर दिया.
- ये महिला होममेकर है और पति काम करते हैं.
- पति ने घर के नज़दीक ही किराए पर घर ले लिया
- घर का राशन भी पति ही मुहैया कराता था.
- कोरोना ख़त्म होने के बाद पति ने बच्चे को परीक्षा देने के लिए स्कूल भेजने को कहा था, तब महिला ने कहा कि वे टीचर से कहकर ऑनलाइन परीक्षा कराने की कोशिश करेंगीं.
गुरूग्राम ईस्ट की सहायक पुलिस आयुक्त डॉ कविता ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि परिवार की निजता का सम्मान होना चाहिए.
गुरूग्राम ईस्ट की सहायक पुलिस आयुक्त डॉ कविता ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि परिवार की निजता का सम्मान होना चाहिए.
मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकत्सकों का कहना है कि गुरूग्राम में जो मामला सामने आया है, वो पहला नहीं है.
डॉक्टरों के अनुसार जब आपको किसी बीमारी होने का डर बना रहता है, तो ऐसी स्थिति को हाइपोकॉन्ड्रिएसिस कहा जाता है. पूरी कहानी यहां पढ़ें.
सिएटल अमेरिका का पहला शहर बना जहां जातिगत भेदभाव पर लगा प्रतिबंध
अमेरिका का सिएटल शहर बन गया है जहां जाति आधारित भेदभाव को प्रतिबंधित कर दिया गया है.
सिएटल सिटी काउंसिल ने मंगलवार को शहर के भेदभाव विरोधी क़ानून में जाति को भी शामिल कर लिया है.
6-1 से पारित किए गए अध्यादेश के समर्थकों ने कहा कि जाति आधारित भेदभाव राष्ट्रीय और धार्मिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं और ऐसे क़ानून के बिना उन लोगों को सुरक्षा नहीं दी जा सकेगी जो जातिगत भेदभाव का सामना करते हैं.
सिएटल की सिटी काउंसिल (नगर परिषद) में एक हिंदू प्रतिनिधि ने एक प्रस्ताव पेश किया था जिसे लेकर भारतीय मूल के लोगों के बीच बहस छिड़ गई.
ये प्रस्ताव जाति आधारित भेदभाव पर रोक लगाने को अध्यादेश लाने से जुड़ा था.
प्रस्ताव पेश करने वाली प्रतिनिधि क्षमा सावंत हैं. काउंसिल में मंगलवार को प्रस्ताव पर वोटिंग हुई जिसके बाद सिएटल अमेरिका का पहला ऐसा शहर बन गया है जहां जातिगत भेदभाव ग़ैरक़ानूनी हो गया है. पूरी कहानी यहां पढ़ें.
बच्चे के जन्म के दिन ही परीक्षा देने क्यों पहुँच गईं रुक्मिणी?
बिहार में बांका ज़िले से एक महिला के साहस और विश्वास की कहानी सामने आई है. बिहार में आज कल मैट्रिक की परीक्षाएं चल रही हैं और इसकी एक परीक्षार्थी 22 वर्षीय रुक्मिणी हैं.
रुक्मिणी ने इस परीक्षा की तैयारी गर्भवती रहने के दौरान की और मंगलवार, 14 फ़रवरी को वे गणित की परीक्षा में शामिल हुई थीं.
इसके बाद उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई. परिवार के लोग उन्हें नज़दीक के सरकारी अस्पताल ले गए, जहां बुधवार की सुबह (15 फ़रवरी) क़रीब छह बजे उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया.
परिवार वाले अपने इस नए सदस्य के आगमन की ख़ुशियां ही बटोर रहे थे कि रुक्मिणी ने एक फ़ैसला लिया जो ख़बरों में छा गया.
बच्चे के जन्म के कुछ घंटे बाद ही मैट्रिक की परीक्षा का दूसरा पेपर होने वाला था और रुक्मिणी ने ये फ़ैसला लिया कि वो उस परीक्षा में शामिल होंगी. पूरी कहानी यहां पढ़ें.
पृथ्वी शॉ: एक होनहार क्रिकेटर, जिसका विवादों से रहा है नाता
भारतीय क्रिकेटर पृथ्वी शॉ के एक बार फिर विवादों में हैं.
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक लड़की के साथ उनकी लड़ाई होती दिख रही है.
इस मामले में पुलिस ने आठ लोगों को गिरफ़्तार किया है जिनमें से एक सोशल मीडिया इंफ़्लूएंसर सपना गिल भी शामिल हैं.
आरोप है कि इन आठ लोगों ने सेल्फ़ी के लिए क्रिकेटर पृथ्वी शॉ से बदसलूकी की और फिर उनकी कार पर हमला भी किया.
हालाँकि सपना गिल के वकील का दावा है कि पृथ्वी शॉ नशे में थे और उन्होंने पहले लड़की पर बैट से हमला किया था.
उन्होंने ये भी कहा कि वे पृथ्वी शॉ के ख़िलाफ़ केस दर्ज करेंगे.
अभी तक जो मामला दर्ज है, उसके मुताबिक़ पृथ्वी शॉ ने सपना गिल के साथ सेल्फ़ी के लिए इनकार कर दिया था. जिसके बाद उनकी सपना गिल और उनके दोस्तों के साथ कहासुनी हो गई थी.
शिकायत में ये भी कहा गया है कि सपना गिल और उनके दोस्त नशे में थे. ये तो अब पुलिस की जाँच से पता चलेगा कि सच्चाई क्या थी. पूरी कहानी यहां पढ़ें.
पाकिस्तान की इकोनॉमी डांवांडोल, क्या भारत को बढ़ाना चाहिए मदद का हाथ
पिछले कुछ महीने पाकिस्तान के लिए अच्छे नहीं रहे हैं. देश में लगातार राजनीतिक और आर्थिक संकट का दौर बना हुआ है.
इस दौरान मुश्किलें भी कई रही हैं. बाढ़ से करीब एक-तिहाई देश का डूब जाना, पाकिस्तानी रुपए का लगतार कमज़ोर होना, बस कुछ दिनों के आयात के लिए बचा विदेशी मुद्रा भंडार, देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन, महंगाई पर बढ़ती नाराज़गी, टीटीपी के घातक चरमपंथी हमलों में दर्जनों की मौत, जैसे संकट का सामना पाकिस्तान इन दिनों कर रहा है.
पाकिस्तान के मित्र देश भी आईएमएफ़ के साथ उसके क़रार का इंतज़ार कर रहे हैं, ऐसे वक्त जब यूनिसेफ़ की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में करीब 40 लाख बच्चे अभी भी बाढ़ वाले दूषित पानी के नज़दीक रह रहे हैं, जिससे उनकी सेहत को ख़तरा है.
पाकिस्तान के भीतर कमेंट्री सुनें तो वहां श्रीलंका जैसे हालात पैदा होने की बात हो रही है. परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान के ऐसे हालात पर भारत को कितना चिंतित होना चाहिए? पूरी कहानी यहां पढ़ें.
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