You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मोरबी हादसा: अपनी शर्त मनवाकर भी ओरेवा कंपनी ने नहीं की पुल की मरम्मत- प्रेस रिव्यू
घड़ी बनाने वाली कंपनी ओरेवा ग्रुप ने मोरबी के ब्रिटिश राज के समय बने झूला पुल की साल 2020 में छोटी-मोटी मरम्मत कर के इसे लोगों की जान जोखिम में डालते हुए अगले दो सालों तक खोले रखा.
आज प्रेस रिव्यू में सबसे पहले अंग्रेज़ी अख़बार 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' की ये ख़बर पढ़ें. अख़बार के अनुसार दो साल पहले कंपनी ने लिखित में वादा किया था कि स्थायी कॉन्ट्रेक्ट मिलने के बाद पुल की पूरी तरह मरम्मत होगी.
कंपनी को इसी साल मार्च में 15 साल का अनुबंध मिला लेकिन इसके बावजूद कंपनी पर पुल को तय समय से पहले खोले जाने का आरोप लग रहा है.
साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि कंपनी ने बस फ्लोरिंग बदली और जिन केबल्स पर पुल टिका है उन्हें सिर्फ़ पेंट किया गया. यही कारण था कि केबल भार नहीं झेल पाए और पुल गिर गया.
रविवार को मच्छु नदी के ऊपर बने सस्पेंशन ब्रिज के गिरने से 135 लोगों की जान चली गई थी.
अख़बार के अनुसार, कंपनी ने कथित तौर पर आठ अगस्त 2020 को ज़िलाधिकारी और नगरपालिका बोर्ड के चीफ़ ऑफ़िसर को लिखी कथित चिट्ठी में कहा था कि वो इस पुल की मरम्मत करेंगे.
"स्थायी अनुबंध मिलने पर ही होगी पक्की मरम्मत"
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार इस चिट्ठी में लिखा था, "जब तक हमें स्थायी अनुबंध से जुड़े दस्तावेज़ नहीं मिलते तब तक हम सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत नहीं करेंगे, न ही इसके लिए सामान खरीदेंगे और न तो ठेकेदारों को रखेंगे."
ओरेवा की ये चिट्ठी अब बड़े पैमाने पर शेयर की जा रही है, कई सरकारी अधिकारियों ने भी इस चिट्ठी को सही बताया है.
कलेक्टर और नगरपालिका प्रमुख को लिखी चिट्ठी में साफ़ कहा गया है कि कंपनी थोड़ी-बहुत मरम्मत के बाद इस पुल को खोलने जा रही है.
इसी साल मार्च महीने में नगर निगम ने ओरेवा समूह के साथ पुल के रख-रखाव, संचालन और सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए 15 साल का समझौता किया था. इसके अगले सात महीनों तक ये पुल बंद रहा.
ओरेवा ग्रुप को निर्माण या मरम्मत के कामों से अधिक घड़ियां, पंखे और एलईडी लाइट बनाने के लिए जाना जाता है. इसके बावजूद कंपनी को साल 2007 से ही पुल के रख-रखाव का ज़िम्मा दिया गया था.
अख़बार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि कंपनी चाहती थी कि उसे पुल के रख-रखाव के लिए लंबे समय तक का अनुबंध मिले ताकि वो इसका इस्तेमाल व्यावसायिक मक़सद से कर सके. कंपनी टिकट के दामों पर भी अपना नियंत्रण चाहती थी.
ओरेवा की चिट्ठी के अनुसार 29 जनवरी 2020 को ज़िलाधिकारी, नगरपालिका के चीफ़ ऑफ़िसर और कंपनी के प्रतिनिधियों ने अनुबंध की शर्तें तय करने के लिए बैठक भी की थी.
नगरपालिका के अधिकारी के हवाले से अख़बार ने लिखा है, "बैठक में ये तय हुआ था कि ओरेवा ग्रुप अस्थायी तौर पर पुल का रखरखाव और मरम्मत का काम देखेगी. साल 2007 से कुछ-कुछ समय के लिए पुल के रख-रखाव का अनुबंध पाने वाली ओरेवा कंपनी उस समय एक और अस्थायी अनुबंध के पक्ष में नहीं थी."
इसके दो साल बाद ही ओरेवा को 15 साल का ठेका दे दिया गया, जिसमें साफ़तौर पर ये लिखा था कि पुल के रखरखाव में सरकार या सरकार की कोई भी इकाई हस्तक्षेप नहीं करेगी.
ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पतंजलि के साथ किया सौदा
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पतंजलि आयुर्वेद के साथ महिलाओं के स्वयंसहायता समूहों (एसएचजी) के बनाए उत्पादों की मार्केटिंग के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. ये समझौता मंत्रालय के राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका अभियान के तहत किया गया है.
अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि समझौते के अनुसार पतंजलि आयुर्वेद न सिर्फ़ इन उत्पादों की मार्केटिंग करेगा बल्कि महिला स्वयंसहायता समूहों को डीलरशिप पाने और उत्पादों के वितरण में भी मदद करेगा.
समझौते के लिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गिरिराज सिंह और पतंजलि की ओर से दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के सेक्रेटरी जनरल आचार्य बालाकृष्ण मौजूद थे.
इस दौरान केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा, "ये समझौता इस उद्देश्य के साथ किया गया है कि स्वयंसहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को सालाना कम से कम एक लाख रुपये कमाने में मदद मिल सके."
इस समझौते के साथ, मंत्रालय ने अब पतंजलि को अपने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के लिए राष्ट्रीय संसाधन संगठन के रूप में मान्यता दे दी है.
पतंजलि अब महिला एसएचजी के उत्पादों की ब्रांडिंग करेगा, अपनी दुकानों में इन उत्पादों को जगह भी देगा.
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के चीफ़ जस्टिस बनने पर रोक की मांग वाली अर्ज़ी ख़ारिज
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के देश के 50वें मुख्य न्यायाधीश बनने पर रोक की मांग करने वाली अर्ज़ी को ख़ारिज कर दिया.
चीफ़ जस्टिस यूयू ललित की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि ये याचिका पूरी तरह गलत है.
अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ़ के अनुसार सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच में जस्टिस एस. रविंद्र भट और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी भी शामिल थे.
इन दोनों ने भी याचिकाकर्ता और पेशे से वकील असिजित शेख की उस मांग को भी ठुकरा दिया कि मामले की सुनवाई से सीजेआई यूयू ललित को दूर रखा जाए, क्योंकि उन्होंने ही जस्टिस चंद्रचूड़ को अपना उत्तराधिकारी चुना है.
जस्टिस चंद्रचूड़ 9 नवंबर को भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश के पद की शपथ लेंगे. सीजेआई यूयू ललित महज़ 74 दिनों के अपने छोटे से कार्यकाल के बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं.
याचिकाकर्ता ने जस्टिस चंद्रचूड़ की तरफ़ से कोविड टीकाकरण से जुड़े मामले और बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ एक अर्ज़ी से जुड़े केस को कारण बताकर ये अर्ज़ी दायर की थी.
याची का कहना था कि बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ हुई सुनवाई में जस्टिस चंद्रचूड़ के बेटे अभिनव कोर्ट में वकील के तौर पर दलील दे रहे थे और मामले को जज चंद्रचूड़ ही सुन रहे थे.
जस्टिस चंद्रचूड़ के खिलाफ़ भारत की राष्ट्रपति के सामने राशिद ख़ान पठान की ओर से दायर एक अभ्यावेदन के आधार पर ये याचिका दायर की गई थी.
चीफ़ जस्टिस यूयू ललित ने याचिकाकर्ता से कहा कि वो अपने आरोपों को साबित करने के लिए सबूत दिखाएं और अगर उनके पास कुछ है तो कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार है. हालांकि, वकील के आगे दलील न दे पाने की वजह से पीठ ने याचिका को ख़ारिज कर दिया.
ये भी पढ़ें:
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)