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कोरोना वायरस उद्धव ठाकरे की कुर्सी के लिए कैसे ख़तरा बन सकता है?
- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
देश के लगभग सभी राज्य इस समय कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में हैं. कोई कम तो कोई ज़्यादा, लेकिन सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र में इस संकट के चलते राजनीतिक संकट भी पैदा होने के आसार दिखाई दे रहे हैं.
यह संकट है सूबे के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कुर्सी और उनकी सरकार के अस्तित्व पर.
पेंच संवैधानिक है और उसकी चाबी राज्यपाल यानी परोक्ष रूप से केंद्र सरकार के पास है.
मामला यह है कि उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री का पद संभाले छह महीने पूरे होने वाले हैं, लेकिन वे अभी तक राज्य विधानमंडल के सदस्य नहीं बन पाए हैं.
महाराष्ट्र में दो सदनों वाला विधानमंडल है- विधानसभा और विधान परिषद. मुख्यमंत्री या मंत्री बनने के लिए इन दोनों में से किसी एक सदन का सदस्य होना अनिवार्य है. उद्धव ठाकरे अभी न तो विधायक हैं और न ही विधान पार्षद (एमएलसी).
विधानमंडल के सदस्य नहीं, लेकिन बने मुख्यमंत्री
उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के ऐसे 8वें मुख्यमंत्री हैं, जो विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य निर्वाचित हुए बगैर ही मुख्यमंत्री बने हैं.
उनसे पहले 1980 में अब्दुल रहमान अंतुले, 1983 वसंतदादा पाटिल, 1985 में शिवाजीराव निलंगेकर पाटिल, 1986 शंकरराव चह्वाण, 1993 में शरद पवार, 2003 सुशील कुमार शिंदे और 2010 पृथ्वीराज चह्वाण भी मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानमंडल के सदस्य बने थे.
अंतुले, निलंगेकर पाटिल और शिंदे ने मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा का उपचुनाव लड़ा था और जीते थे, जबकि वसंतदादा पाटिल, शंकरराव चह्वाण, शरद पवार और पृथ्वीराज चह्वाण ने विधान परिषद के रास्ते से विधानमंडल का सदस्य बनने की संवैधानिक शर्त पूरी की थी.
उद्धव ठाकरे ने भी विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य निर्वाचित हुए बगैर ही 28 नवंबर 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.
संविधान की धारा 164 (4) के अनुसार उन्हें अपने शपथ ग्रहण के छह महीने के अंदर यानी 28 मई से पहले अनिवार्य रूप से राज्य के किसी भी सदन का सदस्य निर्वाचित होना है. विधानसभा का सदस्य बनने के लिए ठाकरे को किसी विधायक से इस्तीफ़ा दिलवाकर सीट ख़ाली करानी होगी.
फिर 28 मई से पहले 45 दिन पहले चुनाव आयोग को उपचुनाव की घोषणा करनी होगी, तभी वे चुनाव जीत कर विधानसभा के सदस्य हो सकते हैं.
कोरोना संकट के चलते ऐसा होना बिल्कुल संभव नहीं है, क्योंकि देशव्यापी लॉकडाउन के कारण 14 अप्रैल से पहले अधिसूचना जारी हो पाना कतई संभव नहीं है.
उनके सामने दूसरा विकल्प विधान परिषद की सदस्यता हासिल करने का है, जिसके चुनाव के लिए चुनाव आयोग को सिर्फ 15 दिन पहले अधिसूचना जारी करनी होगी. लेकिन 24 अप्रैल को खाली हो रही विधायकों के कोटे वाली विधान परिषद की नौ सीटों के चुनाव को आगे बढ़ाने की घोषणा भी चुनाव आयोग कर चुका है.
उद्धव ठाकरे ने विधानमंडल का सदस्य होने के लिए दूसरे विकल्प को ही चुना था, लेकिन चुनाव टल जाने की वजह यह विकल्प भी उनके लिए कारगर नहीं रहा.
विधायकों के कोटे से विधान परिषद की इन सीटों के लिए होने वाले द्विवार्षिक चुनाव में एक सीट पर ठाकरे का चुना जाना तय था, लेकिन कोरोना वायरस से उपजे संकट और देशव्यापी लॉकडाउन के चलते चुनाव आयोग ने चुनाव टाल दिए. ज़ाहिर है कि ऐसे में फिलहाल ठाकरे विधान परिषद के सदस्य नहीं बन सकते.
आगे अब विकल्प क्या है?
अब उनके सामने एक विकल्प और बचता है, वह है विधान परिषद में राज्यपाल द्वारा मनोनयन का.
वर्तमान में राज्यपाल के मनोनयन कोटे से विधान परिषद मे दो सीटें ख़ाली हैं, क्योंकि पूर्व में मनोनीत दो सदस्यों ने पिछले साल अक्तूबर में विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के लिए विधान परिषद से इस्तीफ़ा दे दिया था. इन दोनों ख़ाली सीटों का कार्यकाल जून मध्य तक है.
राज्य मंत्रिमंडल ने बीते गुरुवार को एक प्रस्ताव पारित कर राज्यपाल कोटे से उद्धव ठाकरे को विधानपरिषद का सदस्य मनोनीत किए जाने की सिफारिश राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को भेजी है. लेकिन इसमें भी संवैधानिक पेंच हैं.
यद्यपि राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाने विधान परिषद के सदस्यों के नामों की सिफारिश राज्य सरकार ही करती है, लेकिन राज्यपाल की अपेक्षा रहती है कि जिन नामों की सिफारिश राज्य सरकार कर रही है, वे ग़ैर राजनीतिक हो.
राज्यपाल के मनोनयन वाले कोटे की सीटों पर कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, खेल, समाजसेवा आदि क्षेत्रों से आने वाले विशिष्ट व्यक्तियों को मनोनीत किया जाता है.
अभी राज्यपाल के मनोनयन से भरी जाने वाली दोनों सीटें कला क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों के लिए हैं. ऐसे में सवाल है कि उद्धव ठाकरे को राज्य सरकार किस आधार पर विधान परिषद में मनोनीत कराना चाहती है?
अब यह राज्यपाल के विवेक पर निर्भर करेगा कि वे राज्य मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश मानें या न मानें. अगर राज्यपाल का ज़ोर कला क्षेत्र के व्यक्ति के मनोनयन पर ही रहता है तो ऐसे में उद्धव ठाकरे अपने फोटोग्राफी के शौक का सहारा ले सकते हैं.
ग़ौरतलब है कि मुंबई की मशहूर जहांगीर आर्ट गैलरी गैलरी में कई बार उद्धव ठाकरे की फोटो प्रदर्शनी आयोजित हो चुकी है, जिनसे होने वाली आय वे महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाक़ों के किसानों और अन्य ज़रूरतमंदों को देते आए हैं.
वे अपने छायाचित्रों के संकलन को 'महाराष्ट्र देशा' नामक एक किताब की शक्ल में भी पेश कर चुके हैं. यानी उद्धव ठाकरे की फोटोग्राफी उनके राजनीतिक करियर का संबल बन सकती है.
लेकिन मामला पूरी तरह राज्यपाल के विवेक पर निर्भर करेगा. सवाल यही है कि क्या राज्यपाल भगत सिह कोश्यारी मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश को आसानी से स्वीकार कर उद्धव ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत करेंगे?
न माने राज्यपाल तो क्या होगा?
पिछले साल अक्तूबर महीने में विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनने को लेकर पैदा हुए गतिरोध के दौरान राज्यपाल कोश्यारी ने जिस तरह से फ़ैसले लिए और राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की और फिर एक महीने बाद अचानक आनन-फानन में आधी रात को राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश कर देवेंद्र फडनवीस को मुख्यमंत्री और अजीत पवार को उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई, उससे उन पर यही आरोप लगा कि उन्होंने सारे फैसले केंद्र सरकार के निर्देश पर लिए.
इसलिए माना जा रहा है कि उद्धव ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत करने के मामले में भी केंद्र से मिलने वाले संकेतों के मुताबिक़ फ़ैसला लेंगे.
अगर राज्यपाल ने मंत्रिमंडल की सिफारिश को स्वीकार कर लिया तो ठाकरे की कुर्सी और उनकी सरकार बच जाएगी, अन्यथा उन्हें इस्तीफ़ा देना होगा.
उनका इस्तीफ़ा पूरी मंत्रिपरिषद का इस्तीफ़ा माना जाएगा. ऐसी स्थिति में अगर राज्य में कोई नई राजनीति जोड़-तोड़ नहीं होती है और ठाकरे की अगुवाई वाला मौजूदा गठबंधन अटूट रहता है तो वे अपनी मंत्रिपरिषद के साथ दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकेंगे.
ऐसा होने पर विधानमंडल का सदस्य बनने के लिए उन्हें फिर से छह महीने का समय मिल जाएगा.
अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर कोरोना की महामारी से सर्वाधिक प्रभावित यह सूबा एक बार फिर राजनीतिक जोड़-तोड़ और अस्थिरता का शिकार होगा या फिर निर्वाचित सरकार से वंचित होकर राष्ट्रपति शासन का सामना करेगा.
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