कोरोना वायरस: क्या प्रवासी मज़दूरों का संकट संभालने में सेना का इस्तेमाल होना चाहिए था?

    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

विदेश से लौट रहे भारतीयों या कोरोना वायरस से संक्रमित होने के संदिग्ध विदेशियों को लाने-ले जाने, आइसोलेट करने, क्वारंटीन करने, पनाह देने और इलाज करने के लिए भारत सरकार ने काफ़ी पहले ही आर्मी, नेवी और एयरफ़ोर्स की काबिलियत पर भरोसा करते हुए उन्हें इन चीज़ों की ज़िम्मेदारी सौंप दी थी. इस काम में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) को भी लगाया गया था.

क्या इन संस्थानों का इस्तेमाल राष्ट्रीय राजधानी में पैदा हुए प्रवासी मज़दूरों के संकट से निबटने में भी किया जा सकता था? अगर ऐसा ही कोई संकट देश के किसी दूसरे हिस्से में पैदा होता है तो क्या ये एक भूमिका निभा सकते हैं?

सरकार किस तरह से आर्म्ड फ़ोर्सेज़ का इस्तेमाल कर सकती थी?

सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (सीआरपीएफ़) के डायरेक्टर जनरल ए.पी माहेश्वरी के मुताबिक, 'अभी तक इस तरह की कोई चर्चा नहीं हुई है. लेकिन हम इस आइडिया को लेकर ओपन हैं.' सीआरपीएफ़ सबसे बड़ा केंद्रीय आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स है.

केंद्रीय निर्देशों के अभाव में, हर फ़ोर्स अपने ख़ुद के तरीक़े से सहयोग करने की कोशिश कर रही है.

मिसाल के तौर पर, सीआरपीएफ़ ने पूरे देश में अपनी फ़ॉर्मेशंस को लिखा कि वे राज्य सरकारों के संपर्क में रहें और उनकी मदद करें.

प्रवासी मज़दूरों के लिए सीआरपीएफ़ ने ट्रांसपोर्टेशन, लॉजिस्टिक सपोर्ट, टेंट्स लगाने और हाइवे के किनारे जहां फ़ोर्स उन्हें पानी और खाना मुहैया कराने जैसी मदद दे सकती थी, ऐसी चीज़ों की पहचान की.

वो कहते हैं, "अभी भी हम अपने कुछ कैंपस में खाना बनाकर ज़रूरतमंदों को खिला रहे हैं. हम प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट वितरित कर रहे हैं. हम एक असाधारण वक्त से गुज़र रहे हैं और हमें हर मुमकिन मदद की कोशिश करनी चाहिए."

क्या सरकार चूक गई?

नेशनल डिज़ास्टर रेस्पॉन्स फ़ोर्स (एनडीआरएफ़) बिहार के कई हिस्सों में प्रवासी मज़दूरों के बोझ को मैनेज करने में राज्य सरकार की मदद कर रही है. इसके डायरेक्टर जनरल एस.एन प्रधान ने कहा, "अगर हमसे कहा गया तो हम देश के दूसरे हिस्सों में भी चीज़ों को संभालने में मदद दे सकते हैं. हम स्टैंडबाई पर हैं."

भारतीय सेना के प्रवक्ता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन हमने जिन अफ़सरों से बात की उन्होंने कहा कि आर्मी को मदद करने के लिए कोई रिक्वेस्ट नहीं मिली.

चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ (सीओएएस) जनरल एम एम नरवणे ने हाल में ही कोविड-19 के मसले पर कहा था, 'जब भी आह्वान किया जाता है तब भारतीय सेना नागरिक प्रशासन की मदद करती है.'

उन्होंने कहा, "आने वाले दिनों में भारतीय सेना में और नागरिक प्रशासन की ओर से मेडिकल सेवाओं की मांग में इज़ाफ़ा होने की संभावना है. ज़रूरी निर्देश कमांड हेडक्वार्टर्स को जारी कर दिए गए हैं."

हालांकि, सरकार प्रवासी मज़दूरों के संकट को पहले से समझ नहीं पाई और इस संबंध में ज़रूरी क़दम उठाए नहीं जा सके.

2013 में उत्तराखंड में बतौर चीफ़ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफ़ेंस स्टाफ़ राहत कामकाज की निगरानी कर चुके लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चैत (रिटायर्ड) कहते हैं, "मुझे यह देखकर अचरज हो रहा है कि क्यों प्रवासी मज़दूरों की समस्या का पहले से अंदाज़ा नहीं लगाया गया और इसे रोकने के कदम नहीं उठाए गए. हमारा आपदाओं से निबटने का अनुभव है और 2013 में उत्तराखंड में हम क़रीब एक लाख लोगों को निकाल चुके हैं. लेकिन, पीएम के एक बेहतरीन मक़सद से उठाए गए क़दम के ख़राब एग्जिक्यूशन को देखकर मुझे दुख हो रहा है."

आर्म्ड फ़ोर्सेस कैसे मदद कर सकती थीं?

नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) के पूर्व डायरेक्टर जनरल और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अफसर रहे रंजन मेधेकर बताते हैं, "हमारे पास पूरे देश में मैन-पावर है. यह एक ट्रेंड मैन-पावर है. साथ ही हमारे पास बड़े पैमाने पर ज़मीन भी है जिसका इस्तेमाल फ़ैसिलिटीज लगाने में किया जा सकता है. इनमें हज़ारों लोगों को रखा जा सकता है. यह एक सबक के तौर पर सीखा जा सकता है. केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और आर्म्ड फ़ोर्सेज की एक्सपर्टीज़ के इस्तेमाल से ऐसे संकटों से ज़्यादा अच्छी तरह से निबटा जा सकता है."

आर्म्ड फ़ोर्सेज के लैंड बैंक का हो सकता है इस्तेमाल

देश में डिफ़ेंस मिनिस्ट्री के पास सबसे बड़ा लैंड बैंक है. आर्म्ड फ़ोर्सेज के पास क़रीब 1.6 लाख एकड़ ज़मीन इसके कैंटोनमेंट इलाक़ों के भीतर मौजूद है. इसके अलावा 16.35 लाख एकड़ ज़मीन इन कैंटोनमेंट्स के बाहर है. इनमें भी आर्मी के पास सबसे ज़्यादा 14.14 लाख एकड़ जमीन है.

आईटीबीपी, सीआरपीएफ़ जैसे दूसरे आर्म्ड पुलिस फ़ोर्सेज के पास देशभर में कैंपस हैं.

मदद का इरादा

नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर सेंट्रल आर्म्ड फ़ोर्सेज के कई अफ़सरों ने कहा कि अगर इजाजत दी जाए तो वे मदद करना चाहते हैं.

मिसाल के तौर पर, एक सीआरपीएफ़ अफ़सर ने कहा, "हम हर साल अमरनाथ यात्रा कराते हैं जिसके अपने चैलेंज होते हैं. ऐसे में हमारे पास बड़ी भीड़ को संभालने में विशेषज्ञता है."

एक अन्य अफ़सर ने कहा, "केंद्र को राज्यों को इन प्रवासी मज़दूरों को मैनेज करने से फ्री कर देना चाहिए. इनकी देखभाल हम कर सकते हैं."

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