जब योगी ने की अपने कार्यकाल की तारीफ़ : नज़रिया

    • Author, शरत प्रधान
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के तीन वर्ष पूरे होने की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद ये है कि उन्होंने स्वयं ही कलम उठाकर अपने आप को लंबे-चौड़े प्रशंसा पत्र जारी कर दिए हैं.

कई छोटे-बड़े अख़बारों के संपादकीय पेज पर उनके लिखे गए लेख छाये हुए हैं. आज़ाद भारत में संभवतः ऐसे बहुत ही कम ही उदाहरण होंगे जब कोई मुख्यमंत्री अपनी तारीफ़ के पुल ख़ुद ही बांध डाले, अख़बारों में आर्टिकल लिखकर.

ये बात अलग है कि पूर्व में कुछ मुख्यमंत्रियों ने लेख के ज़रिए से किसी बड़े मामले पर अपने विचार प्रकट करे हों. पर अपनी सरकार के कार्यकाल की वर्षगांठ पर अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने के काम शायद ही किसी ने किया हो.

आमतौर पर अपने कार्यकाल की समीक्षा करने का काम दूसरे लोगों पर छोड़ दिया जाता है- चाहे पत्रकार हो, या राजनीतिक विश्लेषक.

कोई मुख्यमंत्री ख़ुद ही प्रेरित हो अपनी प्रशंसा करे तो उसके पीछे दो ही कारण हो सकते हैं. या तो वो अपने अतिरिक्त किसी को इस लायक नहीं समझते हैं कि उनके कार्यकाल का आंकलन कर सके, या उन्हें आदत नहीं है किसी प्रकार की आलोचना की जो कि कोई भी स्वतंत्र विश्लेषक कर सकता है.

कबीर के उस मशहूर दोहा- "निंदक नियरे राखिए..." में उनकी कोई आस्था नहीं दिखती.

जहां तक योगी जी का सवाल है, वो तो वर्षों से ऐसे माहौल में रहे हैं जहां रत्ती भर आलोचना का कोई प्रश्न नहीं उठता. जी हां हम उनके द्वारा संचालित बाबा गोरखनाथ मठ की बात कर रहे हैं.

देश-विदेश में इस मठ का बहुत नाम है, आस्था है और जगह-जगह से आए लाखों 'नाथ' पंथी इस 'मठ' के 'मठाधीश' योगी आदित्यनाथ के सामने नतमस्तक होते हैं.

धार्मिक मठाधीशों को 'ना' सुनने की आदत नहीं होती और क्योंकि उनके मुख से निकला हर शब्द भगवान के बोल के समान समझा जाता है, इसलिए सवालों और आलोचना से वो कोसों दूर रहते हैं. तो ऐसे में कोई भी मठाधीश अपनी कार्यशैली या उपलब्धियों के आंकलन का कार्य किसी दूसरे व्यक्ति को सौंप दे, ये नामुमकिन सा लगता है.

अर्धसत्य का चक्र

ऐसा भी नहीं है कि स्वयं लिखा हुआ लेख किसी प्रकार के झूठ पर आधारित है. लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि कुछ बातें अर्धसत्य की परिभाषा में आती हैं तो कुछ महत्वपूर्ण बातों का ज़िक्र तक नहीं है.

भारत के सबसे अधिक जनसंख्या (जो विश्व के सातवें और आठवें बड़े देश के बराबर है) वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री ने स्वयं के लेखों को दावों और सरकारी आंकड़ों से बाहर रखा है. हालांकि ये बात दीगर है कि दावे हमेशा कसौटी पर खरे नहीं उतरते.

उनके लेखों में इस बात पर बहुत ज़ोर दिया गया है कि उन्होंने तीन वर्षों में एक नए उत्तर प्रदेश की स्थापना कर दी है. इसमें कौन-सी चीज़ नई है ये समझना आसान नहीं है.

अब उनके पूंजी-निवेश के दावे को ही लीजिए. इसमें कोई दो राय नहीं है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में एक बहुत ही बड़े निवेशक समिट का आयोजन किया. उसमें बहुत सारे एमओयूज़ पर भी हस्ताक्षर हुए. लेकिन अपने लेख में ये कहना कि समिट से प्रदेश में 4.28 लाख करोड़ रुपये का निवेश आ गया तो ये बात सच से काफ़ी परे है.

दरअसल ये राशि 2018 के बजट के ठीक बराबर दर्शाई गई है और यह भी कहा गया है कि निवेश के ज़रिए लगभग 33 लाख लोगों को रोज़गार मिलेगा भी एक तरीके का ख्याली पुलाव ही है. ये दावा कि समिट के कारण 371 प्रोजेक्ट प्रदेश में लग गए, एक अर्द्धसत्य ही कहा जा रहा है.

क़ानून व्यवस्था उत्तर प्रदेश में हमेशा से ढीली-ढाली रही है और हर नई सरकार ये दावा करती है कि उन्होंने पिछली सरकार के मुक़ाबले में क़ानून व्यवस्था को बहुत सुधार दिया है. औरों की तरह योगीजी भी यही दावा कर रहे हैं. लेकिन बड़ी सफ़ाई से आकड़ों का खेल करके वो अपनी बात को विश्वसनीय बनाने के लिए यह कहते हैं कि 2016 के मुकाबले 2019 में डकैती के मामलों में 59.7 प्रतिशत की गिरावट आई है और इसी तरह से हत्याओं में भी 47.09 प्रतिशत की गिरावट हुई है.

और वैसे ही उन्होंने उन पुलिस इनकाउंटर के बारे में कुछ नहीं कहा जिसे वो अपराध कम करने का प्रभावी तरीका मानते हैं. लगभग 67 लोग इन इनकाउंटर में मारे गए और योगी सरकार की पुलिस द्वारा ये दावा किया गया कि बड़े-बड़े ईनामी अपराधी मार दिए गए जिससे प्रदेश में अपराध समाप्त हो जाएगा. पर अपराध और क़ानून व्यवस्था सुधरने की बजाए बिगड़ती हुई नज़र आई.

अब इसे कहते हैं अर्द्धसत्य. 2016 और 2019 की तुलना की गई है क्योंकि 2016 में किसी और पार्टी (समाजवादी पार्टी) की सरकार थी. बीच के दो सालों को ख़ासतौर पर गोल कर दिया गया है जिससे की अपनी सरकार की किरकिरी ना हो जाए. अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि बलात्कार का कोई ज़िक्र नहीं है. इस मामले में पिछली सरकार की तुलना में कोई कमी नहीं आई है.

पुरानी पार्टियों वाली संरक्षण नीति

अब यह बात अलग है कि योगी आदित्यनाथ महिला सुरक्षा की बात बहुत करते हैं. इस दिशा में उनके द्वारा बनाए गए एंटी-रोमियो स्कवायड कहां तक कामयाब हुई, उसकी कोई बात नहीं है.

इस संदर्भ में सत्ताधारी पार्टी के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद मामलों का ज़िक्र करना उचित होगा.

दोनों के ख़िलाफ़ बलात्कार के गंभीर आरोप के बाद भी पार्टी और सरकार का संरक्षण प्राप्त करते रहे. सेंगर जो कि खुलेआम लखनऊ में घूमते थे और पुलिस उन्हें ढूंढ नहीं पाती थी. फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सीबीआई भेजे जाने के बाद ही उनकी गिरफ्तारी हुई.

बुलंदशहर में हुई हिंसा में जब इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी गई तब बजरंग दल के एक आरोपी नेता को बचाने के लिए पुलिस ने क्या कुछ नहीं किया. ऐसे और भी मामले हैं.

ये समझ नहीं आता कि ऐसा करने के बाद योगी सरकार और दूसरी पार्टियों की पूर्व सरकारों में क्या अंतर है. जिस तरह वो अपने पार्टी वाले अपराधियों को आगे बढ़कर संरक्षण देते थे वैसे ही दोनों मामलों में हुआ. तो नया क्या है?

गेम चेंजर से नेम चेंजर

हां "नए" उत्तर प्रदेश में ये तो मानना पड़ेगा कि कुछ नया हुआ है. जब योगी आदित्यनाथ ने यूपी की बागडोर संभाली थी तब उनके समर्थक उन्हें "गेम चेंजर" के रूप में दर्शाया करते थे. पर तीन सालों में उन्होंने "नेम चेंजर" का काम ज़रूर कर दिखाया.

प्रदेश के कई शहरों के नाम बदल दिए. जैसे कि इलाहाबाद का प्रयागराज, फ़ैज़ाबाद को अयोध्या, मुग़ल सराय को दीन दयाल उपाध्याय नगर.

इन शहरों के नाम बदलने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं, वो जगज़ाहिर है. निसंदेह यही योगीजी की सबसे बड़ी उपलब्धि है जिसे लोग डिवाइड एंड रूल कहते हैं.

इस कड़ी से जुड़ी है उनके द्वारा की गई हालिया कार्रवाई उन लोगों के ख़िलाफ़ जिन्होंने नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध किया है.

लखनऊ समेत जिन शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए, वहां जो भी लोग पुलिस द्वारा आरोपी ठहराए गए उनमें अधिकतर मुसलमान थे.

मठाधीश की तरह फ़ैसले

लखनऊ पुलिस ने तो द हिंदू अख़बार के उत्तर प्रदेश संवाददाता उमर राशिद तक को काफ़ी तंग किया पर स्थानीय पत्रकारों के दख़ल के बाद उन्हें छोड़ा गया. बाद में डीजीपी ने कहा कि 'ग़लती' हो गई.

बाकियों को न सिर्फ़ जेल भेज गया बल्कि उन पर लाखों रुपये का जुर्माना लगाया गया और जुर्माना वसूलने के लिए उनकी फोटो और पते के साथ होर्डिंग शहरों के चौराहों पर लगा दिए गए.

आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसा कभी पहले नहीं हुआ. इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस गोविंद माथुर ने मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश प्रशासन को आदेश दिया कि होर्डिंग्स हटा दी जाए. पर योगी आदित्यनाथ ने दिखा दिया कि वे कोई आम मुख्यमंत्री नहीं हैं.

उनकी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. वैसे तो सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के ऑर्डर के ख़िलाफ़ स्टे नहीं दिया और मामले को बड़ी बेंच को रेफ़र कर दिया. फिर भी योगी सरकार ने होर्डिंग्स नहीं हटवाई और हाई कोर्ट में पूरक रिपोर्ट दाख़िल करने की बजाए और समय मांग लिया.

और आख़िर में उन्होंने एक बार फिर से दिखा दिया कि एक बार मठाधीश की तरह वो जो फ़ैसला ले लेते हैं उससे वे आसानी से बदलने वाले नहीं हैं. चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाए. जो उन्होंने सोच लिया और कह दिया वो पत्थर की लकीर हो जाती है. इसलिए यदि उन्होंने ये लिख दिया है कि उन्होंने एक नए उत्तर प्रदेश की नई नींव रखी है तो समझा जाए कि ये उनका अपना विश्वास है जिसे कोई बदल नहीं सकता, चाहे कुछ भी हो.

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