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फ़र्रुख़ाबाद बंधक कांड: सुभाष बाथम की क़ैद से कैसे छूटे बच्चे - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, फ़र्रुख़ाबाद से बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
"अंकल ने हम सबको तहख़ाने में बंद कर दिया था. बच्चों के रोने पर डांटते और जो बहुत छोटे बच्चे थे, उन्हें बिस्किट देकर चुप करा देते. काफ़ी देर बाद वो सबसे छोटी बच्ची जो एक साल की थी और दूध के लिए रो रही थी, उसे लेकर तहख़ाने से बाहर निकले तो मैंने अंदर से कुंडी लगा ली. आंटी भी बाहर ही थीं. उसके बाद हम लोग वहीं बैठे रहे. काफ़ी अँधेरा था लेकिन कुछ लाइट वाले खिलौने थे जिनसे हम बहुत छोटे बच्चों को चुप कराते रहे और उनके साथ खेलते रहे. उन्होंने काफ़ी देर तक दरवाज़ा पीटा, बोले बम से उड़ा देंगे, फिर भी हमने दरवाज़ा नहीं खोला."
15 साल की अंजलि जब ये बता रही थी तो उसकी आँखों में एक दिन पहले का ख़ौफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था. लेकिन उसकी इसी होशियारी ने सुभाष बाथम की गिरफ़्त में आए सभी 23 बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने में सबसे अहम भूमिका अदा की.
नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली अंजलि बंधक बनाए गए बच्चों में सबसे बड़ी थी.
अंजलि को ये पता नहीं है कि यह कितने बजे की बात है क्योंकि तहख़ाने में घड़ी नहीं थी और वहां अंधेरा इतना था कि दिन और रात की भी पहचान मुश्किल थी.
अंजलि बताती हैं, "घर के बाहर पहले सभी बच्चे डांस कर रहे थे लेकिन जब वो हमें घर के अंदर केक काटने और खाना खिलाने के लिए ले गए तो नीचे वाले कमरे में बुलाकर बंद कर दिया. वहां केक-वेक कुछ नहीं था. बंदूक़ रखे थे और हम लोगों को डरा रहे थे. उनकी बेटी भी हम लोगों के ही साथ थी."
फ़र्रुख़ाबाद ज़िले में मोहम्मदाबाद क़स्बे के करथिया गांव में गुरुवार शाम को सुभाष बाथम ने अपनी बेटी के जन्मदिन पर आस-पास के बच्चों को बुलाया था.
डांस कर रहा था परिवार
गांव के ही रहने वाले नरेश कहते हैं, "दोपहर ढाई बजे से ही बाहर म्यूज़िक सिस्टम लगाकर सुभाष बाथम और उनकी पत्नी रूबी बच्चों के साथ ख़ुद भी डांस कर रहे थे. काफ़ी ख़ुशनुमा माहौल था. क़रीब दो घंटे तक नाचने-गाने के बाद सुभाष बाथम केक काटने के बहाने बच्चों को अंदर लेकर गया."
बबली देवी का घर सुभाष बाथम के घर के ठीक बगल में है. दोनों के घरों की छतें बिल्कुल मिली हुई हैं. उनके भी तीन बच्चे इस कथित बर्थडे पार्टी में गए थे. बबली देवी के पति आदेश कुमार पंजाब के भटिंडा में नौकरी करते हैं. घटना की जानकारी होने के बाद तुरंत वहां से चल पड़े और अगले दिन दोपहर को पहुंच गए.
बबली देवी कहती हैं, "पिछले साल भी सुभाष ने बेटी का जन्मदिन मनाया था और बच्चे गए थे. इसलिए हमने इस बार भी भेज दिया. वैसे इनके घर हम लोगों का आना-जाना नहीं था. बच्चों को वहां भेजकर मैं कुछ सामान लेने चली गई. वापस आने पर घर को अंदर से बंद देखा तो मैंने आवाज़ दी. अंदर से सुभाष बोला कि सारे बच्चों को मैंने किडनैप कर लिया है. तुम पुलिस को बुलाओ नहीं तो मैं सबको बम से उड़ा दूंगा."
इतना सुनते ही बबली देवी के होश उड़ गए. उन्होंने आस-पास के लोगों के अलावा पुलिस को भी सूचना दी. गांव वालों के मुताबिक़, सूचना देने के क़रीब दो घंटे बाद पुलिस आई और काफ़ी देर तक सुभाष से बातचीत करने की कोशिश करती रही. इस दौरान बच्चों के परिजनों की साँसें अटकी रहीं. सत्यवती के भी दो बच्चे सुभाष की गिरफ़्त में थे. बेटे की उम्र दस साल और बेटी की उम्र सात साल है.
बच्चों के साथ नहीं की मारपीट
सत्यवती बताती हैं, "हम लोगों को पुलिस वाले उधर जाने नहीं दे रहे थे. कह रहे थे जिनके बच्चे हैं, वो न जाएं उधर. हमारे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें. भगवान से यही दुआ कर रहे थे कि बच्चे सही सलामत आ जाएं. अंदर से बच्चों के चिल्लाने की आवाज़ आती तो और डर लगता. बच्चे तो अभी भी डरे हुए हैं और उसके घर की ओर नहीं जा रहे हैं."
हालांकि बंधक बनाए गए बच्चों के मुताबिक़, सुभाष ने या फिर उसकी पत्नी ने किसी भी बच्चे को परेशान नहीं किया और न ही किसी को मारा पीटा. यहां तक कि छोटे बच्चे जब रो रहे थे तो उन्हें बिस्किट और कुछ अन्य खाने की चीज़ें भी दीं लेकिन जिस तरीक़े से उसने घर के भीतर गोला-बारूद और असलहा जमा कर रखा था और जिस तरीक़े से अपनी मांगें रख रहा था, उसे देखकर पुलिस भी हैरान है.
ज़िले के पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार मिश्र कहते हैं, "हमें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि यह इतनी शातिराना हरक़त कर सकता है. लेकिन जब अंदर से उसने गोली चलाई और बम फेंका तो समझ में आ गया कि इसने काफ़ी तैयारी कर रखी है. चूंकि इसके घर पर कोई जाता नहीं था इसलिए अंदर की भौगोलिक स्थिति भी स्पष्ट नहीं हो पा रही थी और पीछे के आंगन को भी इसने ढक रखा था. हमारी प्राथमिकता बच्चों को सुरक्षित बचाने में थी. इसलिए हमने उसे बातों में उलझाए रखा."
योगी आदित्यनाथ ने भी की मॉनिटरिंग
शाम होते-होते बच्चों के बंधक बनाए जाने की ख़बर फैल चुकी थी. लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भी ये बात पहुंची. हालांकि ज़िले के आला अधिकारी वहां पहुंच गए थे और बच्चों को सुरक्षित निकालने की कोशिश में लगे थे.
लेकिन मुख्यमंत्री ने कानपुर परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल को भी वहां पहुंचने, एटीएस के कमांडोज़ को भेजने और ज़रूरत पड़ने पर एनएसजी के कमांडोज़ को भी बुलाने के निर्देश दिए थे.
मुख्यमंत्री ख़ुद पूरी कार्रवाई की मॉनिटरिंग कर रहे थे.
इन सबके बावजूद रात 12 बजे तक पुलिस को कोई सफलता हाथ नहीं लगी.
इस दौरान वहां मौजूद दिनेश सिंह बताते हैं, "बंधक बनाए गए बच्चों के परिजनों का बुरा हाल था. यहां काफ़ी भीड़ लग गई थी. पुलिस के कुछ लोग छत पर भी चढ़ गए थे और सुभाष को समझाने की कोशिश कर रहे थे पर वो सुनने के तैयार नहीं था. गांव वालों ने आगे बढ़कर ग़ुस्से में उसके लोहे के दरवाज़े पर धक्का देना शुरू किया और पत्थर फेंकने लगे."
"सुभाष और पत्नी दोनों दरवाज़े के पास ही खड़े थे. धक्के से दरवाज़ा टूट गया और उसकी पत्नी बाहर आ गई. लोगों ने जमकर पीटना शुरू किया. सुभाष दूसरे दरवाज़े से भागने की कोशिश करने लगा और फ़ायरिंग भी की लेकिन उसे भी पकड़कर लोगों ने ख़ूब पीटा और जब फ़ायरिंग करने लगा तो पुलिस ने भी फ़ायरिंग की और उसी में वो मारा गया."
बच्चों ने दिखाई बहादुरी
गांव के लोगों की मानें तो अंजलि के दरवाज़ा बंद कर लेने और बाहरी दरवाज़ा टूट जाने से ही सुभाष और उसकी पत्नी पकड़ में आए.
सुभाष के घर के ठीक पीछे रहने वाले नीरज कुमार बताते हैं, "सुभाष ने अपना ज़्यादातर सामान तहख़ाने में ही रखा था और बच्चों को भी वहीं क़ैद कर रखा था. जब तहख़ाना बंद हो गया तो, एक तरफ़ बच्चे उसकी पहुंच से बाहर हो गए तो दूसरी तरफ़ उसका गोला-बारूद भी वहीं रखा रह गया. इसके अलावा मुख्य दरवाज़ा टूटने के बाद उसे भी कहीं भागने की जगह नहीं मिली."
अंजलि और कुछ अन्य बच्चों की हिम्मत और बहादुरी की प्रशंसा फ़र्रुख़ाबाद के पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार मिश्र भी कर रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "निश्चित तौर पर लड़की ने बहादुरी और बुद्धिमानी दिखाई. उसकी इस बुद्धिमत्ता ने सुभाष की तमाम शातिर योजनाओं पर पानी फेर दिया. हम लोग इन बच्चों को सम्मानित करने की भी सिफ़ारिश करेंगे."
सुभाष बाथम और उनकी पत्नी रूबी की मौत के बाद तहख़ाने का दरवाज़ा तोड़कर बच्चों को निकाला गया.
शनिवार को कानपुर ज़ोन के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल ने लखनऊ में प्रेस क़ॉन्फ़्रेंस की और बताया कि सुभाष फ़िल्म देखकर बच्चों को बंधक बनाने की योजना पर पिछले दो महीने से काम कर रहा था.
आईजी मोहित अग्रवाल का कहना था, "सुभाष के मोबाइल से बम बनाने के वीडियो और गूगल पर सर्च करने के लिंक भी मिले हैं. सुभाष ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर यह योजना बनाई थी. घर के भीतर ही उसने नया टॉयलेट बनाया था और कई दिनों तक बच्चों को बंधक बनाए रखने की उसकी योजना थी. उसके पास से इतना गोला बारूद मिला है कि वो 10 से 15 दिन तक मोर्चा ले सकता था."
गांव वालों की मानें तो सुभाष बिल्कुल भी पढ़ा लिखा नहीं था लेकिन इतनी तकनीकी जानकारी उसने कैसे हासिल की, इस बात पर सभी हैरान हैं.
गांव के ही एक बुज़ुर्ग कहते हैं, "जब से उसने दूसरी जाति में शादी की थी, न तो उसके घर कोई आता-जाता था और न ही कोई उसे बुलाता था. इतना हंगामा करके वो यही चाहता था कि लोगों ने जो सामाजिक बहिष्कार किया हुआ है, उसे वापस ले लें. इतना गोला-बारूद, बम-पिस्तौल कहां से लाया इस बारे में हम लोगों को कुछ नहीं पता."
पुलिस के मुताबिक़, सुभाष बाथम शातिर किस्म का अपराधी था और कई बार जेल भी जा चुका था. उसके ऊपर हत्या का भी मुक़दमा चल रहा था.
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