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सावरकर पर भिड़े राहुल-राउत, अब उद्धव की सरकार का क्या होगा अंजाम?: नज़रिया
- Author, राशिद किदवई
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
सावरकर पर कांग्रेस और शिवसेना में छिड़ा विवाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सेना-एनसीपी-कांग्रेस के शासन को अस्थिर नहीं कर सकेगा.
नई दिल्ली की रैली में राहुल गांधी ने सावरकर के ख़िलाफ़ जो कुछ भी कहा वो एनआरसी और नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर मदहोश नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के आगे कांग्रेस को वैचारिक विकल्प के रूप में पेश करने की रणनीति का एक हिस्सा है.
लेकिन शिवसेना के मुखपत्र सामना के एडिटर संजय राउत ने उन पर सीधा हमला करते हुए ट्विटर पर लिखा कि आप सावरकर का अपमान न करें.
अब भले ही नरेंद्र मोदी सरकार सावरकर को भारत रत्न देने की दिशा में आगे बढ़े, ताज़ा प्रकरण सेना-एनसीपी-कांग्रेस के तिकड़ी की सरकार को नहीं हिला सकेगी. ऐसा करने पर शिवसेना तो ख़ुश होगी लेकिन कांग्रेस उस आदमी को सम्मानित किए जाने की आलोचना करेगी जिसका नाम कुछ समय के लिए ही सही लेकिन महात्मा गांधी की हत्या में एक अभियुक्त के रूप में सामने आया था. उस दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल केंद्रीय गृह मंत्री थे.
फ़िलहाल राहुल गांधी न तो कांग्रेस अध्यक्ष हैं, न ही पार्टी में कोई पदाधिकारी और न ही संसद में विपक्ष के नेता. तो तकनीकी रूप से यह सेना-कांग्रेस के बचाव के लिए पर्याप्त है और इसकी कम ही गुंजाइश है कि उनकी सरकार गिरेगी.
निस्संदेह, अब अगर यहां से दोनों नेताओं के बीच वाकयुद्ध और बढ़ा तो उसे संभालने के लिए शरद पवार जैसा नेता भी मौजूद हैं जो दोनों के बीच शांतिदूत की तरह काम कर सकते हैं.
क्या राहुल को जानबूझ कर महाराष्ट्र से अलग रखा गया?
राहुल पूर्व अध्यक्ष हैं और संभव है वो भविष्य में दोबारा इस पद पर आसीन हों लेकिन सोनिया ने जानबूझकर बड़ी सूझबूझ के साथ महाराष्ट्र सरकार के गठन की क़वायद से राहुल गांधी को दूर रखा.
दिसंबर 2017 से जुलाई 2019 तक राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष थे लेकिन उस दौरान उन्होंने यूपीए के साझीदारों तक पहुंचने में या नई साझेदारी बनाने में अपनी कम ही दिलस्चपी दिखाई. उस दौरान गठबंधन के साझीदारों के प्रबंधन का उनका ट्रैक रिकॉर्ड कमोबेश निराशाजनक ही रहा.
इसके अलावा, यह भी अब तक रहस्य ही है कि शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन को लेकर राहुल की दिली इच्छा क्या थी. वो इसके पक्ष में थे भी या नहीं? कांग्रेस नेताओं का एक धड़ा इस बात को दोहराते थकता नहीं कि राहुल गांधी के सहयोगी केसी वेणुगोपाल और (एके एंटनी समेत) केरल के अन्य नेता शिवसेना के साथ गठबंधन के लिए तैयार नहीं थे.
इसके अलावा, समकालीन भारतीय राजनीतिक गठबंधन सरकारों पर एक सरसरी निगाह यह दर्शाती है कि कोई विचारधारा शायद ही कभी घातक कील बनती है. वैचारिक दिखावा तब घातक बन जाता है जब साझेदार आपसी विश्वास खो देते हैं और एक दूसरे से अलग होने का रास्ता तलाशने लगते हैं.
मतभेद से कब कब गिरी सरकारें?
दोहरी सदस्यता का हौआ खड़ा करके मोरारजी देसाई सरकार से जनसंघ-आरएसएस के सदस्यों को हटाने की चौधरी चरण सिंह की मांग से लेकर बीजेपी का महबूबा मुफ़्ती की सरकार को गिराने तक की कहानी यह बताती है कि विचारधारा तब आड़े आती है या यूं कहें की बिगाड़ती है जब एक दूसरे के प्रति एक तरह का अंतर्विरोध होता है या एक दूसरे पर श्रेष्ठता का विचार घर कर जाता है तब विचारधारा बिगाड़ने का काम करती है.
लेकिन यहां अंतर साफ़ दिखता है, मुंबई में फ़िलहाल मंत्रालय मज़बूत और वादों को पूरा करने की क़वायद में दिखते हैं.
मोरारजी देसाई सरकार हिंदू दक्षिणपंथी भारतीय जनसंघ और शिरोमणी अकाली दल और डीएमके जैसे कई समाजवादी समूहों का मिश्रण थी. सरकार में रहने के केवल दो साल बाद ही यह मिश्रण टूटने लगा.
प्रभावशाली किसान नेता चरण सिंह बाद में कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने. भारतीय लोकदल और कांग्रेस के नेताओं ने नारा लगाया, "चरण सिंह लाया ऐसी आंधी, देश की नेता इंदिरा गांधी."
राम मंदिर और वाजपेयी का केंद्र की सत्ता पर आसीन होना
बाद में वीपी सिंह सरकार भी बीजेपी के अयोध्या आंदोलन की वजह से गिरी थी. बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने 1990 में रथ यात्रा पर निकल कर लोगों से अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए जन समर्थन मांगा.
तब बीजेपी केंद्र में वीपी सिंह सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी. आडवाणी जब बिहार पहुंचे तो वहां लालू प्रसाद यादव की सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया. इस पर बीजेपी ने केंद्र में वीपी सिंह के लिए बिछाई कालीन को खींच लिया.
इसी तरह केंद्र में बहुत कम अंतराल में संयुक्त मोर्चा की दो सरकारें 1997 में गिरी थीं. तब कांग्रेस ने एचडी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल से समर्थन वापस ले लिया था. गौड़ा को तब के कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के साथ छत्तीस के आंकड़े का नुकसान झेलना पड़ा वहीं गुजराल की ज़मीं राजीव गांधी हत्याकांड में साजिश की जांच करने वाले जस्टिस मिलाप चंद जैन आयोग की रिपोर्ट की वजह से खिसकी.
जैन कमीशन की रिपोर्ट चुनिंदा रूप से मीडिया में लीक हुई. जिसमें डीएमके और लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल इलम (लिट्टे) के बीच संभावित निकटता का संकेत दिया गया था. गौरतलब है कि कट्टरपंथी अलगाववादी समूह लिट्टे को कथित रूप से राजीव गांधी की हत्या का ज़िम्मेदार माना जाता है.
जैन आयोग की रिपोर्ट में सिफ़ारिश की गई थी कि राजीव गांधी की हत्या में सहयोग के लिए तमिलनाडु के तब के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि और उनकी पार्टी डीएमके को ज़िम्मेदार ठहराया जाए. विडंबना यह है कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट में ऐसे किसी आरोप का ज़िक्र नहीं था.
तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी, गुजराल के प्रति सहानुभूति रखते थे और उनके नेतृत्व की सरकार को गिराना नहीं चाहते थे. लेकिन वे मूक दर्शक बने रहे और पार्टी के दो वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह और जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया गांधी की तरफ़ से इसे अंजाम दिया. इसकी वजह से केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के छह वर्षीय कार्यकाल का रास्ता साफ़ बना.
तो अब क्या होगा उद्धव का भविष्य?
सोनिया गांधी ने औपचारिक तौर पर राजनीति में प्रवेश किया और 1998 में पार्टी की कमान संभाली. छह साल बाद उन्होंने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई. तब डीएमके उनकी एक 'विश्वसनीय' सहयोगी पार्टी थी. यहां तक कि आज भी डीएमके कांग्रेस की एक सबसे विश्वसनीय और हर दम साथ खड़े रहने वाली सहयोगी पार्टी है.
जहां तक सवाल महाराष्ट्र का है तो सोनिया गांधी यहां उद्धव ठाकरे की गठबंधन सरकार को पूरे कार्यकाल के लिए चलाने को लेकर दृढ़ संकल्प दिखती हैं.
पार्टी के भीतर के सूत्रों के मुताबिक़ सोनिया और शरद पवार इस मामले में एक समान नज़रिया रखते हैं.
वे चाहते हैं कि शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के गठबंधन की सरकार को वो समर्थन दिया जाए कि यह अपना कार्यकाल पूरा कर सके.
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