नागरिकता संशोधन विधेयक: शिवसेना राज्यसभा में बीजेपी का खेल बिगाड़ पाएगी?

    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, दिल्ली
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर शिवसेना के रुख़ में आए बदलाव ने राज्यसभा के समीकरण को रोचक बना दिया है. हालांकि मोदी सरकार ये दावा कर रही है कि राज्यसभा से भी ये विधेयक पास कराने में उसे कोई परेशानी नहीं होगी.

दरअसल पहले भाजपा की सहयोगी रही शिवसेना और अभी एनडीए की प्रमुख सहयोगी जनता दल (यू) के समर्थन को लेकर थोड़ा संदेह पैदा हो गया है. एक ओर शिवसेना ने कहा है कि अगर उनकी आपत्तियों का जवाब नहीं दिया गया, तो वो अपने रुख़ पर फिर से विचार करेगी.

शिवसेना ने लोकसभा में इस विधेयक को लेकर कुछ सवाल तो ज़रूर उठाए, लेकिन आख़िरकार इस विधेयक को अपना समर्थन दे दिया. हाल ही में महाराष्ट्र में जो राजनीतिक उठापटक हुई थी, उसके बाद ऐसा लग रहा था कि इस विधेयक को लेकर शिवसेना का समर्थन आसान नहीं होगा.

दूसरी ओर कांग्रेस ने भी शायद यही सोचा था कि शिवसेना लोकसभा में उसके साथ खड़ी होगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मंगलवार को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने विधेयक को लेकर कड़ी टिप्पणी की और उसका समर्थन करने वालों को भी फटकार लगाई.

राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा- नागरिकता संशोधन विधेयक भारतीय संविधान पर हमला है. जो भी इसका समर्थन कर रहे हैं, वे देश की बुनियाद पर हमला कर रहे हैं और उसे नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं.

कांग्रेस नेताओं ने लोकसभा में विधेयक पर बहस के दौरान भी सरकार की जम कर आलोचना की थी. अब शिवसेना ने अपने रुख़ को कड़ा किया है.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि शिवसेना अपनी मांगों पर स्पष्टीकरण चाहती है. इन मांगों में एक मांग नागरिकता लेने वालों को 25 साल तक मतदान का अधिकार न देना है.

उद्धव ठाकरे ने कहा, "हम इस सोच को बदलना चाहते हैं कि बीजेपी और इस बिल का समर्थन करने वाले देशभक्त हैं और बिल का विरोध करने वाले देशद्रोही. इस विधेयक को लेकर जो मुद्दे उठाए गए हैं, सरकार को उन सब पर जवाब देना चाहिए."

माना जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी राज्यसभा में कई छोटे दलों के साथ मिलकर रणनीति बना रही है. कांग्रेस खेमा उस समय ज़रूर उत्साहित हुआ, जब जनता दल (यू) के वरिष्ठ नेता पवन वर्मा ने भी विधेयक को समर्थन देने के पार्टी के फ़ैसले पर आपत्ति जताई.

पवन वर्मा ने ट्वीट कर कहा, "मैं नीतीश कुमार से अपील करता हूं कि राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक के समर्थन पर दोबारा विचार करें. ये बिल पूरी तरह से असंवैधानिक है और देश की एकता के ख़िलाफ़ है. बिल जेडीयू के मूल विचारों के भी ख़िलाफ़ हैं, गांधी जी इसका पूरी तरह से विरोध करते."

दूसरी ओर जानकार ये भी मान रहे हैं कि कुछ पार्टियाँ और कुछ नेता इस विधेयक के ख़िलाफ़ वोट कर सकते हैं, जिनके समर्थन को लेकर पहले बीजेपी आश्वस्त थी. लेकिन क्या इससे बीजेपी का गणित गड़बड़ा जाएगा?

इस समय राज्यसभा के कुल सदस्यों की संख्या 240 है. बीजेपी को उम्मीद है कि उसे 125-130 सदस्यों का समर्थन मिल जाएगा. जनता दल (यू) में विरोध के स्वर के बावजूद इस विधेयक को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन हासिल है. पार्टी प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विरोध पर कोई बयान नहीं दिया है.

राज्यसभा में बीजेपी के 83 सदस्य हैं, जबकि जनता दल (यू) के छह और अकाली दल के तीन सांसद हैं. बीजेपी को उम्मीद है कि लोकसभा की तरह उसे टीडीपी, वाईएसआरसीपी, बीजेडी, एआईएडीएमके के साथ-साथ कुछ अन्य सांसदों का भी समर्थन मिलेगा.

कहा जा रहा है कि सदस्यों की संख्या को लेकर चल रही मंत्रणा के बीच पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को भी मैड्रिड से वापस बुलाया जा रहा है. बीजेपी के अनिल बलूनी की तबीयत ख़राब है और अमर सिंह भी अस्वस्थ हैं. माना जा रहा है कि ये दोनों सदस्य वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रह सकते हैं.

अब अगर वोटिंग के दौरान अगर कुछ सांसद वॉकआउट कर जाते हैं तो बहुमत का आंकड़ा कम हो जाएगा.

कांग्रेस के मोतीलाल वोरा बीमार है. वे वोटिंग के दौरान राज्यसभा में अनुपस्थित रह सकते हैं.

विपक्ष की नीति क्या होगी?

नंबर की बात करें तो राज्यसभा में पलड़ा बराबर की स्थिति में दिख रहा है जो वोटिंग के दौरान किसी भी तरफ झुक सकता है.

यह पूरी तरह से उस स्थिति पर निर्भर करता है कि क्या सभी पार्टियां अपनी विचारधारा और अब तक के रुख के अनुरूप वोटिंग में शामिल होती हैं या इस संशोधन विधेयक के पारित होने की राह आसान करने के लिए सदन से वाकआउट करती हैं.

अपने 46 राज्यसभा सांसदों के साथ विरोधियों की अगुवाई करेगी कांग्रेस पार्टी. वहीं तृणमूल कांग्रेस के 13 राज्यसभा सांसद, समाजवादी पार्टी के 9, वाम दल के 6, टीआरएस के 6, डीएमके के 5, आरजेडी के 4, आम आदमी पार्टी के 3, बीएसपी के 4 और अन्य 21 सांसद अब तक के अपने रुख के मुताबिक इसका विरोध करेंगे.

यानी कुल मिलाकर इस विधेयक पर राज्यसभा में 110 सांसद ख़िलाफ़ हैं.

क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक?

नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amendment Bill) को संक्षेप में CAB भी कहा जाता है और यह बिल शुरू से ही विवाद में रहा है.

इस विधेयक में बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव है.

मौजूदा क़ानून के मुताबिक़ किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है.

लेकिन इस विधेयक में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर छह साल कर दी गई है.

इसके लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में कुछ संशोधन किए जाएंगे ताकि लोगों को नागरिकता देने के लिए उनकी क़ानूनी मदद की जा सके.

मौजूदा क़ानून के तहत भारत में अवैध तरीक़े से दाख़िल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती है और उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने के प्रावधान है.

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