ख़ामेनेई की अंतिम विदाई में इतनी देर क्यों, शव इराक़ क्यों ले जाया जा रहा है?

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फ़रवरी में अमेरिका और इसराइल के हवाई हमलों में मारे गए ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के सदस्यों अंतिम विदाई की रस्में क़रीब चार महीने बाद शुक्रवार को शुरू हुईं.
बीते 13 जून को ईरान ने अंतिम विदाई की रस्मों का शेड्यूल बताया था जो तीन जुलाई से 9 जुलाई तक चलेगा. उम्मीद है कि चार जुलाई को कई देशों के प्रतिनिधि श्रद्धांजलि सेरेमनी में शामिल होंगे.
शुक्रवार को ईरानी झंडे वाले ताबूत में अली ख़ामेनेई और उनके परिवार के तीन सदस्यों को 'ग्रैंड मोसाल्ला' में ले जाया गया है.
बीबीसी उर्दू के मुताबिक़, अंतिम विदाई की रस्में तेहरान के एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र, इमाम खुमैनी मस्जिद में आधिकारिक तौर पर शुरू हो गया है. अंतिम विदाई से पहले के समारोह में काले कपड़े पहने लोगों की भीड़ दिखी, जबकि ताबूत को लाल फूलों और हवा में लटकी सफेद तितलियों के बीच रखा गया.
ईरान इस अंतिम विदाई समारोहों को सिर्फ़ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि जंग के बाद अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक ताक़त के बड़े प्रदर्शन के तौर पर भी देख रहा है.
ईरान में सरकार की तरफ़ से आयोजित कार्यक्रमों को अक्सर सत्तारूढ़ व्यवस्था के समर्थन के प्रदर्शन के रूप में पेश किया जाता है.
6 जुलाई को राष्ट्रीय अवकाश

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आयोजन समिति के प्रमुख और उपराष्ट्रपति मोहम्मद रज़ा आरिफ़ ने कहा कि 4 और 5 जुलाई को तेहरान में सार्वजनिक अवकाश रहेगा, जबकि 6 जुलाई को पूरे देश में छुट्टी रहेगी.
तेहरान में इन रस्मों की निगरानी कर रहे आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडर ब्रिगेडियर जनरल हसन हसनज़ादेह ने कहा कि प्रशासन को 1.2 करोड़ से 1.5 करोड़ लोगों के शामिल होने की उम्मीद है, जबकि यह संख्या 2 करोड़ तक पहुंच सकती है.
सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद अकरामिनिया ने कहा कि सुरक्षा और सहायता के लिए 10 हज़ार से ज़्यादा सुरक्षाकर्मियों और 10 सैन्य अस्पतालों को तैनात किया गया है. इस दौरान 1.5 लाख पुलिसकर्मी अलर्ट पर रहेंगे. 6 जुलाई को तेहरान और 9 जुलाई को मशहद का हवाई क्षेत्र बंद रहेगा.
शव को इतने दिनों कैसे संरक्षित किया गया

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अली ख़ामेनेई और उनके परिजनों के शवों को इतने दिनों किस तरह रखा गया और उन्हें दफ़नाने में इतनी देरी पर सवाल उठे हैं लेकिन ईरान की ओर से इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है.
लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि आम तौर पर मृत्यु की स्थिति में दफ़नाने की प्रक्रिया शुरू की जाती है क्योंकि रासायनिक लेप से शव को संरक्षित करने को इस्लाम में प्रोत्साहित नहीं किया जाता.
फॉक्स न्यूज डिज़िटल ने एक काउंटर टेररिज़्म एक्सपर्ट डॉ ओमर मोहम्मद के हवाले से कहा, "इसके लिए लगभग निश्चित रूप से रेफ़्रिजरेटेड कोल्ड स्टोरेज का इस्तेमाल किया जा रहा है, न कि एम्बामिंग का, क्योंकि इस्लाम में केमिकल एम्बामिंग (रासायनिक लेप) की मनाही है."
उन्होंने कहा, "शिया क़ानून में ख़ास मामलों में दफ़नाने में देरी करने और ठंड में शव को सुरक्षित रखने की इजाज़त है और सुप्रीम लीडर के लिए धार्मिक अधिकारियों से छूट आसानी से मिल जाती है."
यह भी माना जा रहा है कि अमेरिका और इसराइल के साथ 40 दिनों तक चली जंग के कारण अंतिम विदाई की रस्मों को टाला गया था.
बीते 15 जून को अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिनों के संघर्ष विराम को लेकर एक एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे. इससे दो दिन पहले ईरान ने अंतिम विदाई के शेड्यूल के बारे में जानकारी दी थी.
मोजतबा ख़ामेनेई की मौजूदगी पर सस्पेंस

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अली ख़ामेनेई की अंतिम विदाई समारोहों में मोजतबा ख़ामेनेई की मौजूदगी को लेकर असमंजस बना हुआ है.
बीती 28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर के परिवार के कई सदस्य मारे गए थे, जिनमें उनके दामाद, एक पोता, एक बेटी और मोजतबा ख़ामेनेई की पत्नी शामिल थीं.
बीबीसी उर्दू के मुताबिक़, अली ख़ामेनेई की पत्नी के भाई हसन खोजस्ता बाकिरज़ादेह ने एक टीवी कार्यक्रम में जनता से 'नेता की दूसरी बेटी' के लिए प्रार्थना करने की अपील की थी. इससे परिवार के कुछ सदस्यों के स्वास्थ्य को लेकर अटकलें तेज हो गईं.
अली ख़ामेनेई के चार बेटों के अलावा उनकी दो बेटियाँ भी थीं. उनकी बेटी बुशरा ख़ामेनेई की हमले वाले दिन मौत हो गई थी.
इसलिए, पर्यवेक्षकों का मानना है कि हसन खोजस्ता बाकिरज़ादेह शायद हुदा ख़ामेनेई का जिक्र कर रहे थे, जिनके पति मिस्बाह अल-हुदा बाकिर कानी की भी उसी दिन मौत हो गई थी.
मोजतबा ख़ामेनेई के स्वास्थ्य को लेकर भी विरोधाभासी रिपोर्टें आई हैं.
हालांकि आयोजन समिति के सचिव अली अकबर पोरजमशीदियन ने कहा कि मोजतबा ख़ामेनेई की भागीदारी का मुद्दा 'समिति के अधिकार क्षेत्र और जानकारी के दायरे में नहीं आता."
अभी भी स्पष्ट नहीं है कि अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की नमाज़ कौन पढ़ाएगा.
शिया धार्मिक परंपरा में, विशेष रूप से मरजाई-ए-तकलीद के समुदाय में, अंतिम संस्कार की नमाज़ पढ़ाने वाले व्यक्ति का चुनाव न केवल धार्मिक बल्कि प्रतीकात्मक और राजनीतिक महत्व रखता है.
कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर मोजतबा ख़ामेनेई महीनों बाद सार्वजनिक रूप से लौटकर जनाज़े की नमाज़ पढ़ाते हैं, तो इसके कई राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं. हालांकि, अली ख़ामेनेई की वसीयत के आधिकारिक रूप से जारी न होने के कारण, इस समय निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता.
मशहद के शुक्रवार की नमाज़ के इमाम अहमद आलम अल-हुदा ने पिछले महीने कहा था उनको अली ख़ामेनेई की वसीयत की जानकारी नहीं है.
प्रमुख तारीख़ें

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3 जुलाई- अंतरराष्ट्रीय श्रद्धांजलि समारोह
उप गृह मंत्री ब्रिगेडियर जनरल अली अकबर पूरजमशीदियान ने कहा कि विदेशी गणमान्य लोग एक विशेष समारोह में श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बक़ाई ने कहा कि विदेशी सार्वजनिक प्रतिनिधिमंडलों के लिए कार्यक्रम स्थानीय समयानुसार सुबह 8 बजे शुरू होंगे. इसके बाद दूसरे देशों के वरिष्ठ अधिकारी स्थानीय समयानुसार दोपहर 2 बजे श्रद्धांजलि देंगे.
4-5 जुलाई- तेहरान में जनाज़े की नमाज़
तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला में दो दिन का शोक समारोह आयोजित किया जाएगा. 4 जुलाई को स्थानीय समयानुसार सुबह 6 बजे प्रवेश द्वार खुलेंगे और 5 जुलाई को रात 8 बजे बंद होंगे. मुख्य जनाज़े की नमाज़ 5 जुलाई की सुबह अदा की जाएगी.
ख़ामेनेई के अलावा उनकी बेटी बुशरा हुसैनी ख़ामेनेई, बहू ज़हरा हद्दाद-आदिल (मुजतबा ख़ामेनेई की पत्नी), दामाद मिस्बाह अल-हुदा बाक़ेरी और उनकी पोती ज़हरा मोहम्मदी गोलपायगानी के ताबूत भी लोगों की अंतिम श्रद्धांजलि के लिए रखे जाने की उम्मीद है.
6 जुलाई- तेहरान में अंतिम यात्रा
अंतिम यात्रा स्थानीय समयानुसार सुबह 6 बजे शुरू होगी. आयोजकों ने राजधानी से होकर गुज़रने वाला लंबा मार्ग चुना है. उनका कहना है कि अनुमानित भीड़ को समायोजित करने के लिए कोई एक सड़क काफ़ी नहीं होगी. प्रशासन को उम्मीद है कि कार्यक्रम शाम तक पूरा हो जाएगा.
7 जुलाई- क़ुम में अंतिम यात्रा
ईरान के प्रमुख धार्मिक शहर क़ुम में यह रस्म स्थानीय समयानुसार सुबह लगभग 5 बजे शुरू होगी. जमकरान मस्जिद में एक वरिष्ठ धर्मगुरु की अगुवाई में नमाज़ अदा की जाएगी.
8 जुलाई- नजफ़ और कर्बला में अंतिम यात्रा
इराक़ में ईरान के सांस्कृतिक अताशे ग़ुलामरज़ा अबाज़री ने कहा कि पार्थिव शरीर 7 जुलाई की शाम नजफ़ पहुंचेगा. 8 जुलाई को स्थानीय समयानुसार सुबह 6 बजे नजफ़ और शाम 4 बजे कर्बला में अंतिम यात्रा निकाली जाएगी. इसके बाद पार्थिव शरीर को वापस ईरान ले जाया जाएगा.
9 जुलाई- मशहद में दफ़्न
ख़ामेनेई को उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में आठवें शिया इमाम, इमाम रज़ा के रौज़े में सुपुर्द-ए-ख़ाक़ किया जाएगा.
शव को क्यों ले जाया जा रहा इराक़?

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मक्का और मदीना के बाद नजफ़ और कर्बला शिया इस्लाम के सबसे पवित्र शहरों में गिने जाते हैं.
नजफ़ में पहले शिया इमाम और पैग़ंबर मुहम्मद के चचेरे भाई इमाम अली का रौज़ा है. वहीं कर्बला में इमाम हुसैन का मज़ार है, जिनकी कर्बला की जंग में शहादत शिया पहचान और धार्मिक परंपरा का केंद्रीय आधार मानी जाती है.
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि इन रस्मों का आयोजन इराक़ के क़बायली नेताओं, धर्मगुरुओं, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक हस्तियों के अनुरोध पर किया गया.
28 जून को बग़दाद की यात्रा के दौरान विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने इन कार्यक्रमों के आयोजन में सहयोग के लिए इराक़ी प्रशासन का शुक्रिया अदा किया और कहा कि ये दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्तों की मज़बूती को दर्शाते हैं. उन्होंने तैयारियों पर चर्चा के लिए नजफ़ और कर्बला के गवर्नरों से भी मुलाक़ात की.
इन रस्मों को ईरान से बाहर शिया समुदायों के बीच ख़ामेनेई के प्रभाव को रेखांकित करने और शिया इस्लाम के प्रमुख केंद्रों में तेहरान की धार्मिक और राजनीतिक पहुंच दिखाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है.
ईरान के विदेश मंत्री कुछ दिन पहले आयोजनों के तालमेल के लिए बग़दाद गए थे. उन्होंने इन आयोजनों को 'प्रतीकात्मक महत्व' वाला बताया और कहा कि नजफ़ और कर्बला में इनका आयोजन यह दर्शाता है कि शियाओं के बीच अली ख़ामेनेई की स्थिति ईरान की सीमाओं से परे तक फैली हुई है.
इराक़ सरकार इस देश में ऐसे आयोजनों के मुख्य आयोजकों में से एक है.
मेहर समाचार एजेंसी के अनुसार, नजफ़ और कर्बला के राज्यपाल, इराकी परिवहन मंत्रालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय उन संस्थानों में शामिल हैं जो इस कार्यक्रम की देख रेख करेंगे.
तेहरान, क़ोम, नजफ़ और कर्बला में समारोहों के बाद, अंतिम चरण मशहद में आयोजित किया जाएगा और अली ख़ामेनेई को आठवें शिया इमाम के मकबरे में दफ़नाया जाएगा.
आयोजकों ने कहा है कि अंतिम विदाई के बाद चालीस दिनों तक विभिन्न प्रांतों में धार्मिक सभाएं, प्रार्थनाएं आदि आयोजित की जाएंगी और अगले साल तक भी कार्यक्रम और सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे.
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