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डॉक्टर जो 92 साल की उम्र में भी करती हैं सर्जरी
- Author, बल्ला सतीश
- पदनाम, बीबीसी तेलगू संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
अब तक जिन डॉक्टरों से आप मिले हैं, उनमें सबसे ज़्यादा अनुभव किसके पास था? इस सवाल पर आपका जवाब क्या हो सकता है? 30 साल, 40 साल या फिर 50 साल?
मगर क्या आप कभी ऐसे डॉक्टर से मिले हैं, जिनके पास क़रीब 70 साल का अनुभव हो?
शायद नहीं..
मैं जिस डॉक्टर से मिला, वह एमबीबीएस करने के बाद बीते 68 से भी ज़्यादा साल से मेडिकल सेवाएं दे रही हैं.
ये हैं डॉक्टर सूरी श्रीमाथी, जो हैदराबाद में रहती हैं. 92 साल की उम्र में भी अब भी लगातार ऑपरेशन कर रही हैं.
1958 में सूरी श्रीमाथी ने एमबीबीएस की डिग्री हासिल करने के बाद अपना करियर शुरू किया था. आज भी वह पूरे जोश और उत्साह के साथ हर दिन मरीज़ों को देखती हैं. ज़रूरत पड़ने पर सिज़ेरियन डिलीवरी भी कराती हैं.
वह किसी युवा डॉक्टर की तरह चिकित्सा सेवाएं दे रही हैं.
जिस उम्र में बहुत से लोगों को चलने-फिरने और रोज़मर्रा के काम करने में दिक़्क़त होती है, उस उम्र में वह न सिर्फ़ मरीज़ों का इलाज करने के लिए स्टेथोस्कोप संभालती हैं, बल्कि पूरे भरोसे के साथ सर्ज़री भी करती हैं.
डॉ. सूरी श्रीमाथी ख़ुद कार चलाकर अस्पताल जाती हैं. 92 साल की उम्र में भी उनकी याददाश्त बेहद तेज़ है और उनके हाथ नहीं कांपते.
मैंने उनसे पूछा कि क्या ऑपरेशन करते समय उनके हाथ कभी कांपते हैं? उन्होंने जवाब दिया, "नहीं कांपते."
फिर उन्होंने कहा, "ये देखिए, आप ख़ुद मेरे हाथ देख सकते हैं..." और यह कहते हुए उन्होंने अपने हाथ मुझे दिखाए.
डॉ. सूरी श्रीमाथी ने बताया कि दूसरे डॉक्टरों की तरह उन्हें भी दवाओं के नाम अच्छी तरह याद रहते हैं.
तीन पीढ़ियों का इलाज करने वाली डॉक्टर
डॉ. सूरी श्रीमाथी की सहयोगी डॉक्टर रजनी कुमारी ने बीबीसी से कहा, "उनके हाथ कभी नहीं कांपते. हो सकता है हमारे हाथ कांप जाएं, लेकिन उनके हाथ बिल्कुल स्थिर रहते हैं."
उन्होंने कहा, "योग, ध्यान, संतुलित खानपान, अपने पेशे के प्रति अटूट समर्पण, तनाव मुक्त स्वभाव और अनुशासित जीवनशैली ही इसकी वजह हैं. वह कई बार नींद की परवाह किए बिना भी लगातार काम कर सकती हैं."
डॉ. सूरी श्रीमाथी को यह विशेष सम्मान हासिल है कि उन्होंने एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों यानी दादी, मां और बेटी तक का प्रसव कराया है.
डॉ. श्रीमाथी कहती हैं, "बहुत से लोग मुझे अपने बचपन की तस्वीरें दिखाते हैं. फिर कहते हैं, 'मेरा जन्म आपने ही कराया था."
उनकी मरीज़ रही तुलसी डॉक्टर श्रीमाथी का ज़िक्र होने पर भावुक हो गईं. बीबीसी के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए वह कहती हैं, "वह मरीज़ों की समस्याएं बहुत धैर्य से सुनती हैं. 24 घंटे में कभी भी फ़ोन करें, वह बिना झुंझलाए जवाब देती हैं."
"जब मैंने पहली बार उन्हें देखा था तो मुझे थोड़ा डर लगा था. मैंने सोचा कि 'इतनी उम्र की डॉक्टर क्या ठीक से सिज़ेरियन ऑपरेशन कर पाएंगी?"
"लेकिन समय के साथ मैंने दूसरे मरीज़ों के अच्छे अनुभव सुने. मैंने यह भी देखा कि वह हमारी कितनी अच्छी देखभाल करती हैं. इसके बाद मेरा डर पूरी तरह ख़त्म हो गया और मेरा भरोसा बढ़ गया."
"ऑपरेशन के दौरान उनके साथ सहायक ज़रूर होते हैं, लेकिन सबसे अहम भूमिका वह खुद निभाती हैं."
"मेरी तीसरी डिलीवरी के समय अचानक इमरजेंसी के हालात बन गए थे. जैसे ही उन्हें इसकी ख़बर मिली, वह चाय तक पिए बिना तुरंत अस्पताल पहुंच गईं."
"उन्होंने मेरे प्रसव के पूरा होने तक खाना नहीं खाया. मां और बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद ही वह भोजन करने गईं."
लगातार ख़ुद को बेहतर बनाते रहने की आदत
मेडिकल फ़ील्ड बहुत तेजी से बदलता है. इसमें नई दवाएं, शोध के नतीजे और नई जांच पद्धतियां लगातार आती रहती हैं. ऐसे माहौल में डॉ. सूरी श्रीमाथी हमेशा ख़ुद को अपडेट रखती हैं.
उन्होंने कहा, "मैं मेडिकल कॉन्फ़्रेंस और बैठकों में हिस्सा लेती हूं. इसके अलावा मेडिकल लेख और शोध पत्रिकाएं भी पढ़ती हूं. जब मेडिकल प्रतिनिधि नई दवाओं के बारे में बताते हैं तो मैं उनसे जुड़ी ताज़ा जानकारियां हासिल करती हूं."
डॉ. श्रीमाथी के साथ ऑपरेशन करने वाली स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रजनी कुमारी ने बताया, "आज भी वह इस क्षेत्र में होने वाली नई प्रगति के बारे में लगातार सीखती रहती हैं. जब कोई नई तकनीक आती है, तो वह उसे अच्छी तरह समझना सुनिश्चित करती हैं."
उन्होंने यह भी कहा, "वह हर मरीज़ को पर्याप्त समय देती हैं. सभी सवालों का धैर्यपूर्वक जवाब देती हैं और कभी झुंझलाती नहीं हैं."
सरकारी डॉक्टर के रूप में...
डॉ. सूरी श्रीमाथी ने 1958 में उस्मानिया विश्वविद्यालय से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की.
इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक सरकारी डॉक्टर के रूप में काम किया. फिर स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञता में एमडी की डिग्री हासिल की. उसके बाद उन्होंने हैदराबाद में लंबे समय तक चिकित्सा सेवा दी.
अपनी शुरुआती नौकरी को याद करते हुए उन्होंने कहा, "एमबीबीएस पूरा करने के बाद मैं संगारेड्डी के एक अस्पताल में डॉक्टर बनी थी. वहां मेरे सामने जो पहला मामला आया, वह 13 या 14 साल की एक लड़की का था."
"उसकी मां उसे मेरे पास लाई और बोली, 'मेरी बेटी गर्भ से है, कृपया इसकी जांच कीजिए.' जब मैंने उसे जांचा तो मैं हैरान रह गई. वह लड़की गर्भावस्था के आठवें महीने में थी. यही मेरे करियर का पहला मेडिकल केस था."
वह आगे बताती हैं, "मैंने बेहोशी की दवा देकर सिज़ेरियन ऑपरेशन किया. उस अस्पताल में कोई दूसरा डॉक्टर नहीं था, इसलिए सर्जन, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ और बच्चों के डॉक्टर, तीनों की ज़िम्मेदारियां मुझे ही निभानी पड़ीं."
आज डॉ. श्रीमाथी हैदराबाद स्थित अपने घर से ही प्राइवेट मेडिकल सेवाएं दे रही हैं.
वे ओपीडी में मरीज़ों को देखने के लिए 300 रुपये फ़ीस लेती हैं. हालांकि उनका कहना है कि जो लोग फ़ीस देने में सक्षम नहीं होते, वे उनसे कोई रुपया नहीं लेती हैं.
उन्होंने कहा, "मेरे लिए यह सिर्फ़ कमाई का मामला नहीं है. मैंने किसी को नुक़सान पहुंचाए बिना ठीकठाक कमाई की है. ये संतुष्टि ही मेरे लिए सबसे बड़ी बात है."
हालांकि अब डॉ. श्रीमाथी ने सिज़ेरियन ऑपरेशन करने की संख्या धीरे-धीरे कम कर दी है.
इन सिज़ेरियन के दौरान उनके साथ असिस्टेंस के लिए कोई अन्य स्त्री रोग विशेषज्ञ भी मौजूद रहती हैं. हालांकि उन्होंने बताया कि ऑपरेशन की मुख्य प्रक्रिया आज भी वे खुद करती हैं.
डॉ. श्रीमाथी को लेकर क्या कहते हैं सहयोगी डॉक्टर
डॉ. रजनी कुमारी ने बीबीसी से कहा, "मैं 1986 में मैडम के पास सीनियर हाउस सर्जन के रूप में शामिल हुई थी. तब से आज तक मैं उनके साथ काम कर रही हूं."
उन्होंने कहा, "सर्जरी मुझे उन्होंने ही सिखाई है. वह मेरी गुरु हैं. बड़े अस्पतालों में मेरे पास कितना भी काम हो, मैं हमेशा डॉ. श्रीमाथी के मरीज़ों को अहमियत देती हूं. जब तक हम दोनों काम कर रहे हैं, यह सिलसिला जारी रहेगा."
जब डॉ. श्रीमाथी से पूछा गया कि पिछले सात दशकों में सर्ज़री के तरीकों में क्या बदलाव आए हैं? इस पर उन्होंने कहा, "ऑपरेशन की तकनीक, टांके लगाने की सामग्री और बेहोशी की दवा देने के तरीक़े, सब कुछ बहुत बदल गया है."
उन्होंने कहा, "मैंने समय के साथ ख़ुद को भी बदला और नई तकनीकों को सीख लिया."
डॉ. रजनी कुमारी ने याद करते हुए कहा, "मरीज़ों का उन पर बहुत भरोसा है. उन्होंने उस दौर में भी बेहतरीन काम किया, जब बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं."
उन्होंने आगे कहा, "एक समय ऐसा था जब हम हर महीने लगभग 120 गर्भवतियों की डिलीवरी करते थे, जिनमें ज़्यादातर ऐसे ग्रामीण इलाकों से आती थीं जहां सुविधाएं नहीं थीं."
"लोग सिर्फ़ उनकी चिकित्सकीय क्षमता की वजह से ही नहीं, बल्कि उनके व्यवहार और बात करने के तरीके की वजह से भी उनके पास आते हैं."
जब डॉ. श्रीमाथी से पूछा गया कि उन्होंने चिकित्सा को अपना पेशा क्यों चुना, तो उन्होंने एक दिलचस्प जवाब दिया.
उन्होंने कहा, "उस ज़माने में बच्चे वही पढ़ते थे जो उनके माता-पिता चाहते थे. मेरे पिता चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं, इसलिए मैंने मेडिकल की पढ़ाई की."
"उस समय कोई प्रवेश परीक्षा नहीं होती थी. दाखिला केवल अंकों के आधार पर मिलता था."
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "असल में मैं बाल रोग विशेषज्ञ बनना चाहती थी. लेकिन मेरी सभी सहेलियों ने प्रसूति और स्त्री रोग विशेषज्ञता चुनी. मैं भी उनके साथ उसी क्षेत्र में चली गई."
डॉ. श्रीमाथी ने शादी नहीं की. जब उनसे इसकी वजह पूछी गई, तो उन्होंने बहुत सादगी से जवाब दिया, "बस, ऐसा हो नहीं पाया."
इसके बाद उन्होंने इस विषय पर और कुछ नहीं कहा.
शादी न करने पर क्या बोलीं डॉ. श्रीमाथी
डॉ. श्रीमाथी के छोटे भाई सूरी रामनाथ शास्त्री उनसे 19 बरस छोटे हैं. रामनाथ ने बीबीसी से कहा, "जब से होश संभाला है, मैं अपनी बहन को एक डॉक्टर के रूप में ही देखता आया हूं. उनके पास हमेशा बहुत सारे मरीज़ आते थे और वह उनका इलाज करती थीं."
शास्त्री एक रिटायर्ड लेक्चरर हैं और उनकी बड़ी बहन श्रीमाथी उनके परिवार के साथ ही अपने पुश्तैनी घर में रहती हैं.
उन्होंने बहन को लेकर बताया कि "इलाज करने का उनके लिए कोई तय समय नहीं होता था. जब भी किसी को ज़रूरत पड़ती, वह उसकी मदद के लिए तैयार रहती थीं."
मेडिकल क्षेत्र में आने की इच्छा रखने वाले युवाओं को सलाह देते हुए डॉ. श्रीमाथी ने कहा, "अगर आप ज्ञान बढ़ाने पर ध्यान देंगे, तो सफलता और समृद्धि अपने आप आपके पास आएगी."
उन्होंने कहा, "फ़ीस और कमाई के पीछे मत भागिए. ईमानदारी से अपनी सेवा करते रहिए, बाकी सब चीज़ें अपने आप सही हो जाएंगी."
जब उनसे पूछा गया कि इतने लंबे मेडिकल सफ़र को वह एक शब्द में कैसे बयान करेंगी, तो उन्होंने जवाब दिया- "ख़ुशी और आत्मसंतुष्टि."
अपनी बहन की सक्रियता को लेकर रामनाथ शास्त्री कहते हैं कि वे नहीं चाहते कि इस उम्र में भी उनकी बहन इतनी मेहनत करें, मगर फिर भी वे उन्हें काम छोड़ने के लिए नहीं कह पाते.
उन्होंने कहा, "मुझमें इतना साहस नहीं है कि मैं उनसे काम बंद करने को कहूं. उनकी ऊर्जा और समर्पण वास्तव में आश्चर्यजनक है. लोग इमरजेंसी की हालत में इलाज के लिए उनके पास आते हैं फिर मैं यह कैसे कह सकता हूं कि वह उस मरीज़ को न देखें?"
डॉ. श्रीमाथी से पूछा गया कि अब जबकि दुनिया भर में लोग जल्दी रिटायरमेंट लेने की बात कर रहे हैं, फिर भी वे 90 साल की उम्र पार करने के बाद भी काम क्यों कर रही हैं?
इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "जब तक ईश्वर मुझे शक्ति देता रहेगा, मैं काम करती रहूंगी."
फिर उन्होंने एक सवाल के साथ अपनी बात ख़त्म की, "जब हम खाना और आराम करना नहीं छोड़ते, तो फिर केवल काम करना ही क्यों छोड़ दें?"
डॉ. श्रीमाथी की सेहत का राज़
डॉ. श्रीमाथी ने बताया, "मैं रोज़ सुबह जल्दी उठती हूं, योग और प्राणायाम करती हूं. कभी-कभी टीवी भी देखती हूं."
डॉ श्रीमाथी सेहतमंद रहने के लिए कुछ सुझाव भी देती हैं.
वे कहती हैं, ऐसा कोई भी भोजन खाया जा सकता है जो आसानी से पच जाए. तला-भुना खाना सिर्फ़ ज़ायके के लिए अच्छा होता है, शरीर के लिए नहीं. वे कहती हैं कि समय पर खाना खाना और समय पर सोना बहुत ज़रूरी है.
उन्होंने कहा, "हमारे समय में आउटडोर खेल, घर के काम और रंगोली बनाने जैसी गतिविधियों के कारण हमें भरपूर धूप मिलती थी."
अच्छी सेहत के लिए विटामिन डी और कैल्शियम बेहद ज़रूरी है मगर आजकल लोग पैदल चलना नहीं चाहते.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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