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राहुल गांधी ने मनुस्मृति को लेकर जो कहा, क्या उसमें महिलाओं पर वैसा ही लिखा है?
महाराष्ट्र के पुणे में कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने शनिवार को पुणे में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में मनुस्मृति का ज़िक्र किया. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजपी) ने उनकी आलोचना की है.
राहुल ने मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में लिखे गए एक उद्धरण को शर्मनाक बताया. उन्होंने कहा, "महिलाएं किसी के अधीन नहीं हो सकती हैं."
राहुल गांधी ने कहा, "एक समस्या है और काफ़ी बड़ी समस्या है. जब भी मैं पुरुषों से बात करता हूं, महिलाओं को तीन बॉक्स में रखा जाता है. महिलाओं को बेटी, पत्नी या मां के रूप में."
"मां, पत्नी और बेटी के रूप में देखे जाने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन सिर्फ़ यही एक आपकी पहचान नहीं हो सकती."
राहुल गांधी ने कहा, "महिलाएं प्रोफ़ेशनल, खिलाड़ी, लीडर, क्रिएटर, आंतरप्रेन्योर और भी बहुत कुछ हैं. फिर भी पुरुष उन्हें ये तीन पहचान ही देते हैं. इन तीनों पहचानों का पुरुषों के साथ रिश्ता है. चाहे मां हो, पत्नी हो, या बेटी हो."
"मैं यहां मनुस्मृति को कोट करना चाहता हूं, जिसमें कहा गया है कि बचपन में महिला को अपने पिता के अधीन होना चाहिए. युवावस्था में अपने पति के अधीन होना चाहिए और जब पति नहीं रहे तब, अपने बेटों के अधीन रहना चाहिए. एक महिला कभी भी आज़ाद नहीं हो सकती है."
उन्होंने दावा किया, "ये बात सीधे मनुस्मृति में लिखी गई है. इन शब्दों पर शर्म आनी चाहिए. ये शब्द कभी भी नहीं कहे जाने चाहिए थे."
इस बीच सवाल उठता है कि आखिरकार मनुस्मृति में महिलाओं के लिए लिखा क्या है?
मनुस्मृति में महिलाओं पर क्या लिखा गया है?
दरअसल, मनुस्मृति के पांचवें अध्याय के 148वें श्लोक में महिलाओं के संरक्षण और स्वतंत्रता को लेकर एक श्लोक मिलता है.
इसमें लिखा है, "एक लड़की हमेशा अपने पिता के संरक्षण में रहनी चाहिए, शादी के बाद पति उसका संरक्षक होना चाहिए, पति की मौत के बाद उसे अपने बच्चों की दया पर निर्भर रहना चाहिए, किसी भी स्थिति में एक महिला आज़ाद नहीं हो सकती."
पंजाब यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ा चुके प्रोफ़ेसर राजीव लोचन ने बताया था कि मनुस्मृति में लिखा है कि एक महिला का कल्याण तभी होगा, जब एक पुरुष का कल्याण होगा.
उन्होंने बताया, "ये किताब बताती है कि किसी भी स्थिति में ब्राह्मणों का सम्मान किया जाना चाहिए. किसी भी महिला का कल्याण तभी हो सकता है, जब एक पुरुष का कल्याण हो जाए. एक महिला को किसी तरह के धार्मिक अधिकार नहीं हैं. वह अपने पति की सेवा करके स्वर्ग प्राप्त कर सकती है. मनुस्मृति में यही सब लिखा है."
राजीव लोचन के अनुसार औरतों के बारे में भी कुछ बातें कही गईं. यह बताया गया कि वे किस तरह आदमियों से गौण हैं.
वो कहते हैं, "किसी को गौण बोलना एक बात है, उसका असल में गौण होना दूसरी बात है. सो आदमियों को चेताया गया कि घर की सारी इज़्ज़त घरवाली के हाथ है. नाराज़ हो गई तो अतिथि का ठीक से स्वागत नहीं करेगी और घरवाले की बड़ी नाक कटेगी. ठीक से नहीं रखा तो किसी और के साथ भाग भी सकती है."
मनुस्मृति क्या है और इसमें क्या-क्या है?
इतिहासकार नराहर कुरुंदकर मनुस्मृति का अर्थ बताते हुए कहते हैं स्मृति का मतलब धर्मशास्त्र होता है.
वो कहते हैं, "ऐसे में मनु की ओर से लिखा गया धार्मिक लेख मनुस्मृति कही जाती है. मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं जिनमें 2684 श्लोक हैं. कुछ संस्करणों में श्लोकों की संख्या 2964 है."
कुरुंदकर अब तक मनुस्मृति पर तीन लेक्चर दे चुके हैं. इन तीनों भाषणों को एक किताब की शक्ल दी गई है जो मनुस्मृति के अंदर की दुनिया के बारे में बताती है.
कुरुंदकर मनुस्मृति पर अपनी सोच को बताते हुए कहते हैं, "मैं उन लोगों में शामिल हूं जो मनुस्मृति को जलाने में विश्वास करते हैं."
मनुस्मृति के फ़ॉर्मेट को समझाते हुए कुरुंदकर कहते हैं, "इस किताब की रचना ईसा के जन्म से दो-तीन सौ सालों पहले शुरू हुई थी. पहले अध्याय में प्रकृति के निर्माण, चार युगों, चार वर्णों, उनके पेशों, ब्राह्मणों की महानता जैसे विषय शामिल हैं.
"दूसरा अध्याय ब्रह्मचर्य और अपने मालिक की सेवा पर आधारित है."
"तीसरे अध्याय में शादियों की किस्मों, विवाहों के रीति रिवाजों और श्राद्ध यानी पूर्वज़ों को याद करने का वर्णन है. चौथे अध्याय में गृहस्थ धर्म के कर्तव्य, खाने या न खाने के नियमों और 21 तरह के नरकों का ज़िक्र है."
"पांचवें अध्याय में महिलाओं के कर्तव्यों, शुद्धता और अशुद्धता आदि का ज़िक्र है.
छठे अध्याय में एक संत और सातवें अध्याय में एक राजा के कर्तव्यों का ज़िक्र है.
आठवां अध्याय अपराध, न्याय, वचन और राजनीतिक मामलों आदि पर बात करता है.
नौवें अध्याय में पैतृक संपत्ति, दसवें अध्याय में वर्णों के मिश्रण, ग्यारहवें अध्याय में पापकर्म और बारहवें अध्याय में तीन गुणों व वेदों की प्रशंसा है. मनुस्मृति की यही सामान्य रूपरेखा है."
"मनुस्मृति में अधिकार, अपराध, बयान और न्याय के बारे में बात की गई है. ये वर्तमान समय की आईपीसी और सीआरपीसी की तरह लिखी गई है."
आंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाया था
गौरतलब है कि डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने 25 जुलाई, 1927 को महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले में (वर्तमान में रायगड) के महाद में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया था.
आंबेडकर अपनी किताब 'फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ हिंदूइज़्म' में लिखते हैं, "मनु ने चार वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी."
वो कहते हैं, "मनु ने इन चार वर्णों को अलग-अलग रखने के बारे में बताकर जाति व्यवस्था की नींव रखी. हालांकि, ये नहीं कहा जा सकता है कि मनु ने जाति व्यवस्था की रचना की है. लेकिन उन्होंने इस व्यवस्था के बीज ज़रूर बोए थे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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