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होर्मुज़ स्ट्रेट: टोल वसूलने पर पहले हां फिर ना, ट्रंप की इस उलझन के क्या हैं मायने
- Author, एंथनी जर्चर
- पदनाम, उत्तर अमेरिका संवाददाता
- Author, केयला एपस्टीन
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
डोनाल्ड ट्रंप की ईरान युद्ध को लेकर ताज़ा डिमांड महज़ 24 घंटे तक ही बनी रह सकी. इससे यह संकेत मिलता है कि राष्ट्रपति ट्रंप इस मुश्किल हालात से निकलने के लिए असामान्य रास्ते की तलाश में हैं.
सोमवार सुबह सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में उन्होंने ईरानी शिपिंग पर अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी फिर से शुरू करने का एलान किया.
उन्होंने कहा कि होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने वाले सभी जहाज़ों, जिनमें अमेरिका के सहयोगी देशों के जहाज़ भी शामिल होंगे, उन्हें 20 फ़ीसदी शुल्क देना होगा.
उन्होंने कहा कि यह शुल्क दुनिया के इस बेहद अस्थिर हिस्से में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका की ओर से किए गए सभी ख़र्चों की भरपाई के लिए होगा.
अगले ही दिन उन्होंने इस प्रस्ताव को पूरी तरह वापस ले लिया. इसके बजाय उन्होंने कहा कि वह अमेरिका के खाड़ी क्षेत्र के सहयोगी देशों के साथ "व्यापार और निवेश समझौते" करेंगे.
इससे संकेत मिला कि अमेरिका इस समझौते के बदले में उन्हें होर्मुज़ स्ट्रेट से सुरक्षित आवाजाही की सुविधा देगा.
होर्मुज़ स्ट्रेट: ईरान के लिए अहम हथियार
यह अचानक बदला रुख़ उस संघर्ष का ताज़ा मोड़ है, जो चार महीने से अधिक समय से जारी है.
अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम और बातचीत का ढांचा तैयार करने के लिए एक महीने पहले हुए 'एमओयू (समझौता ज्ञापन)' के बावजूद संघर्ष के ख़त्म होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं.
यह युद्ध अब भी लोगों के लिए मुश्किल बना हुआ है. इससे ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है. अमेरिका की सेना और उसके सहयोगियों पर फिर से ईरानी हमलों का जोखिम भी मौजूद है.
ऐसे में ट्रंप युद्ध को और बढ़ाने से बचना चाह सकते हैं. हालांकि, वह ऐसे किसी समझौते के बिना युद्ध ख़त्म करने के विचार को भी पसंद नहीं करेंगे, जिसे वह साल 2015 में बराक ओबामा प्रशासन की ओर से किए गए समझौते से बेहतर बता सकें.
डिफेंस प्रायोरिटीज़ में मिडिल ईस्ट कार्यक्रम की निदेशक रोज़मेरी केलैनिक ने कहा, "मुझे लगता है कि सबसे संभावित नतीजा यही है कि इसका कोई स्पष्ट अंत नहीं होगा. यह अब थकाने वाला युद्ध बन चुका है और ऐसे युद्ध अक्सर बहुत लंबे समय तक चलते हैं."
अमेरिका-ईरान एमओयू और उसके साथ युद्ध ख़त्म होने की जो उम्मीदें जुड़ी थीं, उनका अंत मंगलवार को पूर्वी अमेरिकी समयानुसार सुबह 10:16 बजे ट्रुथ सोशल पर हो गया.
ट्रंप ने वहां ईरानी शिपिंग पर अमेरिकी नाकेबंदी फिर से शुरू करने का एलान किया. इसी दौरान अमेरिका ने ईरान के कई ठिकानों पर नए सैन्य हमले भी किए.
इसके जवाब में ईरान ने अमेरिका के सहयोगी देशों और क्षेत्र में व्यावसायिक जहाज़ों पर हमले तेज़ कर दिए. इससे होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने वाला समुद्री यातायात एक बार फिर लगभग ठप हो गया.
क़रीब एक महीने तक दोनों देशों के बीच रुक-रुक कर बातचीत चली. इस दौरान बीच-बीच में ऐसी झड़पें भी हुईं जिन्होंने 'युद्धविराम' के हर मतलब को ख़त्म कर दिया.
अब ट्रंप और अमेरिका फिर उसी तरह की चुनौतियों का सामना करते दिखाई दे रहे हैं, जो ईरान युद्ध के अधिकांश समय मौजूद थीं.
सैन्य स्तर पर अमेरिका अपने लक्ष्य हासिल करता दिख रहा था.
इसका आकलन ईरानी जहाज़ों, विमानों और ठिकानों के नष्ट होने के साथ ही उसकी रक्षा क्षमताओं के कमज़ोर पड़ने से किया जा सकता है.
लेकिन राजनीतिक स्तर पर यह संघर्ष सुलझने से काफ़ी दूर था.
सैन्य रूप से कमज़ोर होने के बावजूद, ईरान अब भी होर्मुज़ स्ट्रेट तक जहाज़ों की पहुंच रोकने की क्षमता रखता है
जब तक अमेरिका इस क्षेत्र में अपने सैन्य अभियान को बहुत बड़े स्तर पर बढ़ाने के लिए तैयार नहीं होता, तब तक उसके पास ईरान को रोकने के लिए बहुत ज़्यादा विकल्प नहीं हैं.
ट्रंप के सामने उलझन
20 फ़ीसदी शुल्क लगाने का ट्रंप का नया प्रस्ताव, जो संभवतः अमेरिकी जनता के लिए इस सैन्य कार्रवाई को अधिक स्वीकार्य बनाने का एक तरीका माना जा रहा था, ताकि जनता इस पर होने वाले ख़र्च को लेकर ज़्यादा सवाल न करे.
हालाँकि यह पूरी तरह नया नहीं था. युद्ध के दौरान वह कई बार इस तरह की व्यवस्था का सुझाव दे चुके थे.
लेकिन पिछले महीने ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने वाले जहाज़ों पर "शुल्क" लगाने की ईरान की योजना की आलोचना की थी.
उन्होंने कहा था, "किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर टोल या शुल्क वसूलने की अनुमति नहीं है. यही मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानून है. दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में यही व्यवस्था लागू है और यहां भी हमारी यही अपेक्षा है."
होर्मुज़ को लेकर ट्रंप का यू-टर्न इस बात का ताज़ा संकेत है कि उन्हें आगे बढ़ने का कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है.
जिस एमओयू को अमेरिका और ईरान दोनों ने अपनी-अपनी जीत बताया था, उसे जानबूझकर काफ़ी अस्पष्ट रखा गया था ताकि कई मुद्दों पर बाद में बातचीत हो सके.
इस दस्तावेज़ में होर्मुज़ में शिपिंग की निगरानी में ईरान की कुछ भूमिका तय की गई थी.
इसमें लिखा था, "ईरान अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल करते हुए बिना किसी शुल्क के व्यावसायिक जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की व्यवस्था करेगा."
यह वही भूमिका है, जिस पर ईरान लंबे समय से अपना अधिकार जताने की कोशिश करता रहा है. समझौता ज्ञापन में ईरान में अरबों डॉलर के प्रस्तावित 'निवेश' और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाने का भी वादा किया गया था.
अमेरिका को शायद लगा था कि ये रियायतें और समझौते का पालन न करने की स्थिति में परिणाम भुगतने की चेतावनी, ईरान को होर्मुज़ पर अधिक सख्ती से नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश से रोकने के लिए काफ़ी होंगी.
ईरान को भौगोलिक तौर पर होर्मुज़ के मामले में बढ़त हासिल है.
तेल की कीमतों पर असर
अब ट्रंप और ईरान दोनों ख़ुद को एक बार फिर जानी-पहचानी मुसीबत में पा रहे हैं. ईरान को फिर से अपने पूरे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य हमलों का सामना करना पड़ रहा है.
इससे अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा करने में उसकी असमर्थता उजागर हो रही है. नाकेबंदी दोबारा लागू होने से ईरानी शासन की जीवनरेखा यानी तेल से कमाई एक बार फिर रुक गई है.
वहीं दूसरी ओर ट्रंप के सामने फिर वही विकल्प है. या तो वह संघर्ष को और बढ़ाएं, जिसकी घरेलू आर्थिक और राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है, या फिर किसी ऐसे समाधान पर सहमत हों जिसमें ईरान की मौजूदा सरकार सत्ता में बनी रहे.
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस में मिडिल ईस्ट अध्ययन के वरिष्ठ फेलो इलियट अब्राम्स ने कहा, "हम फिर वहीं पहुंच गए हैं जहां शुरुआत में थे. सवाल यही है कि किसके पास ज़्यादा धैर्य है. ईरान के पास, जो तेल निर्यात नहीं कर पाएगा, या अमेरिका और वे दूसरे देश जो फ़ारस की खाड़ी के तेल पर निर्भर हैं?"
कई महीनों तक इस चिंता के बाद कि ईरान युद्ध, महंगाई की एक नई लहर पैदा कर सकता है. उधर ट्रंप को मंगलवार को राहत देने वाली ख़बर मिली कि उपभोक्ता कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है.
यदि पूर्ण पैमाने पर युद्ध फिर शुरू होता है या संघर्ष और बढ़ता है, तो तेल की कीमतें फिर पहले के उच्च स्तर की ओर बढ़ना लगभग तय है.
इससे यह सकारात्मक रुझान ख़त्म हो सकता है और नवंबर में होने वाले मध्यावधि संसदीय चुनावों से पहले रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति फिर कमजोर हो सकती है.
सोमवार को ट्रंप की ट्रुथ सोशल पोस्ट के बाद कच्चे तेल की कीमत लगभग 10% बढ़ गई. यह पिछले छह वर्षों में एक दिन की सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी.
पहली बार लागू की गई ट्रंप की नाकेबंदी ने ईरान पर बातचीत की मेज़ पर आने का दबाव बनाया था और उसी से समझौता ज्ञापन और अधिक स्थायी शांति के लिए एक रूपरेखा तैयार करने का रास्ता बना था.
अब केलैनिक के मुताबिक़, ईरान पर ट्रंप का प्रभाव पहले की तुलना में कमज़ोर पड़ सकता है.
उन्होंने कहा, "जो कदम वह आसानी से उठा सकते थे और जिन पर भरोसा किया जा सकता था, वे पहले ही उठा चुके हैं. वह सैन्य ठिकानों और शासन से जुड़े ठिकानों पर हमला कर सकते हैं. वह पहले भी ऐसा कर चुके हैं, लेकिन इससे भी ईरान ने आत्मसमर्पण नहीं किया."
वियतनाम युद्ध की तरह लंबी लड़ाई की आशंका
ट्रंप ने हाल में जिस नए लक्ष्य का उल्लेख किया है, वह तेहरान के दक्षिण में स्थित पिकऐक्स माउंटेन है. यह एक बेहद सुरक्षित परमाणु अनुसंधान केंद्र है.
हालांकि इस केंद्र के वास्तविक महत्व को लेकर अलग-अलग दावे हैं. साथ ही इस बात पर भी मतभेद है कि क्या अमेरिकी हवाई हमले ग्रेनाइट चट्टानों के काफ़ी नीचे बनी सुरंगों को गंभीर नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
यदि ट्रंप के ताज़ा कदमों का अंत एक और युद्धविराम और आमने-सामने की बातचीत में भी होता है, तब भी मूल और कठिन मतभेद बने रहेंगे.
इनमें होर्मुज़ का मुद्दा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य और मिडिल ईस्ट में ईरान के प्रभाव जैसे सवाल शामिल हैं.
अब्राम्स ने कहा, "मुझे लगता है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर किसी समझौते की संभावना अभी भी है. लेकिन समझौता ज्ञापन की वापसी की नहीं."
युद्ध अब अपने पांचवें महीने में प्रवेश करने वाला है. सोमवार को ट्रंप ने फिर कहा कि अमेरिका के दूसरे युद्ध, जिनमें वियतनाम युद्ध भी शामिल है. कई वर्षों तक चले थे.
हालांकि, वियतनाम युद्ध ऐसा दलदल साबित हुआ जिसने अंततः राष्ट्रपति लिंडन बेन्स जॉनसन के कार्यकाल को कमज़ोर कर दिया और कम से कम एक दशक तक दुनिया में अमेरिका की साख को नुक़सान पहुंचाया. ट्रंप निश्चित रूप से ऐसी स्थिति से बचना चाहेंगे.
उनके समर्थक भी मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक चलने वाले उन "अनंत युद्धों" को दोहराना नहीं चाहते, जिनकी ट्रंप ने अपने पिछले राष्ट्रपति चुनाव अभियानों के दौरान आलोचना की थी.
लेकिन दोनों पक्षों के बीच एमओयू लगभग समाप्त हो चुका है, युद्धविराम ख़त्म हो गया है और संघर्ष फिर बढ़ने की आशंका बनी हुई है.
ऐसे में ईरान युद्ध के समाधान की संभावना उतनी ही दूर दिखाई देती है, जितनी उसके शुरू होने के कुछ सप्ताह बाद थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.