बीजेपी की 'दो-तिहाई की रणनीति' में सुप्रिया सुले के रुख़ से बढ़ी हलचल

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संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है. मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का यह मॉनसून सत्र बिल्कुल अलग होगा क्योंकि संसद के भीतर की तस्वीर बदल चुकी है.

तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद एनडीए को समर्थन की घोषणा कर चुके हैं.

शिव सेना यूबीटी के छह सांसद भी एनडीए के समर्थन में आ गए हैं.

राज्यसभा की तस्वीर भी बदल गई है क्योंकि आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हो गए हैं और टीएमसी के भी कई राज्यसभा सांसद एनडीए के खेमे में आ गए हैं.

मॉनसून सत्र से पहले बीजेपी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने संविधान संशोधन बिल पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिशें तेज़ कर दी हैं.

सरकार एक नया संविधान संशोधन बिल लाने की तैयारी में है, जिसके तहत महिला आरक्षण को 2029 तक लागू करने का प्रस्ताव होगा.

इसके साथ ही लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 तक करने के लिए परिसीमन बिल भी लाया जाएगा. यही दोनों बिल अप्रैल में संसद के विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में पारित नहीं हो पाए थे.

कहा जा रहा है कि नया संविधान संशोधन बिल संसद में तभी पेश किया जाएगा, जब सरकार को पूरा भरोसा हो जाएगा कि उसके पास इसे पारित कराने के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत मौजूद है.

टीएमसी के 20 बाग़ी लोकसभा सांसदों और शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के समर्थन से एनडीए की संख्या 293 से बढ़कर 319 हो सकती है.

इसके बावजूद, अगर सदन में सभी सांसद मौजूद होकर मतदान करते हैं, तो यह संख्या संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए ज़रूरी 360 सांसदों के दो-तिहाई बहुमत से अब भी कम होगी.

सुप्रिया सुले की शर्त

महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन बिल को दोबारा पारित कराने की कोशिशों ने बुधवार को तब ज़ोर पकड़ा, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले ने कहा कि अगर प्रस्तावित विधेयक में सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत वृद्धि का स्पष्ट प्रावधान किया जाता है, तो उनकी पार्टी इसका समर्थन करने पर विचार कर सकती है.

सुप्रिया सुले ने कहा कि चर्चा का केंद्र एक ऐसा प्रस्ताव था, जिसके तहत जनसंख्या की परवाह किए बिना हर राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ाई जाएं.

उन्होंने कहा, "इसे लागू करने का स्पष्ट फार्मूला लिखित रूप में दिया जाना चाहिए. दक्षिणी राज्यों को लगता है कि अगर केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाई गई, तो उनके साथ अन्याय होगा. केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा था कि हर राज्य में सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ाई जाएगी, लेकिन जो विधेयक सदन में पेश किया गया, उसमें इसका कहीं उल्लेख नहीं था."

सुले ने कहा कि अगर इन शर्तों को विधेयक में शामिल किया जाता है, तो इसका विरोध करने की कोई ख़ास वजह नहीं होगी. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि विधेयक का समर्थन करने या न करने का अंतिम फ़ैसला इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों से चर्चा के बाद ही लिया जाएगा.

उन्होंने कहा, "अगर 50 प्रतिशत वृद्धि के प्रावधान पर चर्चा होती है, तो हम समर्थन करने पर विचार करेंगे. लेकिन यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि बिल को लागू करने का तरीका क्या होगा."

सुप्रिया सुले ने महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रस्तावित फॉर्मूले के तहत राज्य की लोकसभा सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी.

उन्होंने कहा, "इन 72 सीटों में से तीन सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के लिए आरक्षित होंगी. इसके बाद बची 69 सीटों में से कुछ महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी. ऐसे में सामान्य श्रेणी के लिए केवल 48 सीटें बचेंगी. सवाल यह है कि इसके लिए कौन-सा फॉर्मूला अपनाया जाएगा?"

इसी साल 15 अप्रैल को केंद्र सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने द हिन्दू से कहा था, ''परिसीमन के बाद सभी राज्यों की लोकसभा सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि होगी और किसी भी राज्य का संसद में मौजूदा आनुपातिक प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा.''

हालांकि, सरकार की ओर से बाँटे गए दोनों बिलों के मसौदे में इस आश्वासन का कहीं उल्लेख नहीं था.

सुप्रिया सुले की आसान शर्त?

सुप्रिया सुले ने यह बात तब कही है, जब चर्चा है कि सरकार पिछले संसद सत्र में ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल न कर पाने वाले इस बिल को फिर से पेश करने की तैयारी कर रही है.

राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा कहते हैं कि सुप्रिया सुले ने बीजेपी के सामने बहुत ही आसान शर्त रखी है. विनोद शर्मा ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''सुप्रिया सुले जो मांग रख रही हैं, उसे तो अमित शाह पहले से ही कह रहे थे. ये अलग बात है कि ड्राफ्ट बिल में इसका ज़िक्र नहीं था. सुप्रिया सुले ने एक तरह से बता दिया है कि उनका रुख़ क्या होने जा रहा है.''

विनोद शर्मा कहते हैं, ''असल मुद्दा 50 प्रतिशत का नहीं है. असल मुद्दा है कि ये अपने हिसाब से लोकसभा सीटों का पुनर्गठन करेंगे. इस पर सुप्रिया कुछ नहीं बोल रही हैं. असल मुद्दा है कि परिसीमन आयोग का अध्यक्ष कौन होगा? मुद्दा मनमानी रोकने का है.''

शरद पवार की एनसीपी के रुख़ को लेकर राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशिकर ने एक्स पर लिखा, ''परिसीमन के मुद्दे पर शरद पवार की एनसीपी और बीजेपी में सहयोग की ख़बरें एक बार फिर इस बात की पुष्टि करती हैं कि मौजूदा दौर केवल राजनीतिक दलों के संकट का नहीं, बल्कि राजनीति के विचार और उसके मूल मक़सद के गहरे संकट का भी है.''

सुप्रिया सुले ने जब यह बात नहीं कही थी, तभी से अटकलें तेज़ थीं कि महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी की सहयोगी एनसीपी (एसपी) एनडीए के क़रीब पहुँच रही है. मंगलवार रात एनसीपी (एसपी) के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाक़ात की. इस बैठक में एनसीपी के नेता प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे भी मौजूद थे. इसके बाद दोनों गुटों के फिर से एक होने की अटकलें तेज़ हो गईं.

मुंबई में सुप्रिया सुले ने कहा, "नया परिसीमन विधेयक अभी तक पेश नहीं किया गया है. अगर इसमें सभी राज्यों की सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि सुनिश्चित करने का प्रावधान होगा, तो हम इस पर इंडिया गठबंधन के भीतर चर्चा करेंगे. अगर यह जनता के हित में होगा, तो हम इसका समर्थन करने पर विचार करेंगे."

कांग्रेस को भी इस बात का अंदाज़ा है कि विपक्षी खेमे में भी इसे लेकर हलचल है और इंडिया ब्लॉक के भीतर टूट-फूट हो सकती है.

पी चिदंबरम ने क्या कहा?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एक्स पर लिखा है, ''बीजेपी अप्रैल 2026 में संसद के पिछले सत्र में 131वाँ संविधान संशोधन बिल पारित नहीं करा पाई थी. अब इसे फिर से लाने की तैयारी कर रही है.''

''यह बिल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण के नाम पर लाया गया था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसका वास्तविक मक़सद परिसीमन का रास्ता साफ़ करना और संभवतः निर्वाचन क्षेत्रों का राजनीतिक लाभ के हिसाब से पुनर्गठन करना था.''

''लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान पहले ही संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम के ज़रिए किया जा चुका है. इसलिए महिलाओं के आरक्षण के लिए नए संविधान संशोधन बिल की न पहले ज़रूरत थी और न अब है.''

''तृणमूल कांग्रेस में विभाजन के बाद अब बीजेपी कथित तौर पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है, ताकि इस विधेयक के नए संस्करण को पारित कराने के लिए ज़रूरी वोट जुटाए जा सकें. एनसीपी (एसपी) और डीएमके पहले भी इस बिल के वास्तविक मक़सद को समझते रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि वे आगे भी अपने रुख़ पर कायम रहेंगे.''

''इस बिल के किसी नए संस्करण का समर्थन करना, जिसका वास्तविक मक़सद परिसीमन है, उन सिद्धांतों और अंतरात्मा के साथ विश्वासघात होगा, जिनके आधार पर इन दलों ने अप्रैल 2026 में इसका विरोध किया था. मौजूदा परिसीमन के प्रस्तावित फॉर्मूले के तहत निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन उन राज्यों के अधिकारों के साथ गंभीर अन्याय होगा, जिन्होंने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का ईमानदारी से पालन किया और अपनी जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित रखा. ऐसे में राज्यों के अधिकारों की रक्षा करना ज़रूरी है और उन्हें बीजेपी की इस पहल के सामने मज़बूती से खड़ा होना चाहिए.''

सरकार समर्थन कहाँ से जुटाएगी?

मौजूदा 540 सदस्यीय लोकसभा में एनडीए के पास 293 सांसद हैं, जबकि इस संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए 360 सांसदों के समर्थन की ज़रूरत होगी. वहीं 245 सदस्यीय राज्यसभा में एनडीए के पास फ़िलहाल 149 सदस्य हैं जबकि विधेयक पारित कराने के लिए उसे 164 मतों की ज़रूरत होगी.

हालांकि अब राजनीतिक स्थिति पहले से बदल चुकी है. तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 सांसद नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया में शामिल हो चुके हैं और उन्होंने एनडीए को समर्थन देने की बात कही है.

वहीं द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके), जिसके लोकसभा में 22 सांसद हैं, का कांग्रेस से मतभेद हो गया है. उसने इंडिया गठबंधन की बैठकों में हिस्सा लेना बंद कर दिया है. हाल ही में शिव सेना (यूबीटी) के छह सांसद भी शिव सेना में शामिल हो गए.

मोदी सरकार अब वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और डीएमके जैसे दलों और यहाँ तक कि इंडिया गठबंधन के सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के समर्थन की भी उम्मीद कर रहा है.

लोकसभा में 22 और राज्यसभा में आठ सांसदों वाली डीएमके के अलावा लोकसभा में 37 और राज्यसभा में 10 सांसदों वाली समाजवादी पार्टी का समर्थन अब भी बेहद अहम माना जा रहा है.

अगर मतदान के दौरान सभी सांसद सदन में मौजूद रहते हैं, तो संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए एनडीए को लोकसभा में 360 मतों की ज़रूरत होगी.

24 जुलाई के बाद राज्यसभा में बीजेपी की संख्या बढ़कर 117 होने की उम्मीद है, जो अब तक का उसका सबसे बड़ा आंकड़ा होगा. सात मनोनीत सदस्यों, तीन निर्दलीय सांसदों और एनडीए के सहयोगी दलों के समर्थन के साथ सत्तारूढ़ गठबंधन को उम्मीद है कि राज्यसभा में उसकी संख्या 153 तक पहुंच जाएगी.

इसके बावजूद संविधान संशोधन के लिए ज़रूरी 164 सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से वह अब भी 11 सदस्य कम रहेंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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