ईरान की ज़ब्त की गई अरबों डॉलर की संपत्ति किन देशों में है, भारत में कितनी है?

    • Author, सारा फ़ैयाद
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ अरबी
    • Author, अली रमज़ानियन
    • पदनाम, ईरान के अर्थव्यवस्था विश्लेषक
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

ईरान की ज़ब्त की गई संपत्तियों को वापस करना ईरान और पश्चिम के बीच संबंधों में सबसे विवादास्पद और जटिल मुद्दों में से एक रहा है.

यह हाल ही में अमेरिका के साथ समझौता ज्ञापन का एक प्रमुख तत्व है, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच युद्ध को समाप्त करना है.

ईरान लंबे समय से विदेशों में रखे गए धन तक पहुंच प्राप्त करने की कोशिश कर रहा है, जिसका अधिकांश हिस्सा प्रतिबंधों और बैंकिंग पाबंदियों के कारण उसकी पहुंच से बाहर है.

हालांकि अधिकांश संपत्तियां अमेरिका में नहीं हैं, लेकिन अमेरिका यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि क्या उन तक पहुंच संभव है.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस धनराशि का कुछ हिस्सा भी जारी करने से सालों के प्रतिबंधों, आर्थिक अलगाव, बढ़ती मुद्रास्फीति और गिरती मुद्रा को एक सहारा मिलेगा. अमेरिका और इसराइल के साथ हाल के संघर्ष से हुए नुक़सान से ईरान की अर्थव्यवस्था जूझ रही है.

हालांकि, वे चेतावनी देते हैं कि क़ानूनी, वित्तीय और राजनीतिक बाधाओं को देखते हुए, किसी भी समझौते को असली ट्रांसफ़र में बदलना धीमा और जटिल होगा.

तो आख़िर ये फ़ंड क्या हैं, और ईरान कितनी आसानी से इन तक पहुंच सकता है?

इन संपत्तियों में क्या-क्या शामिल है?

ईरान की ज़ब्त की गई संपत्तियों के कुल मूल्य का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन अनुमान लगभग 27 अरब डॉलर से लेकर 100 अरब डॉलर से अधिक तक है.

ये धनराशि किसी एक सुलभ खाते में नहीं रखी जाती है. इसके बजाय, इसमें तेल से आने वाला पैसा, तेल-गैस और बिजली निर्यात से प्राप्त आय, विदेशी बैंकों में जमा विदेशी मुद्रा भंडार और क़ानूनी विवादों में फंसी संपत्तियां शामिल हैं - जिनमें से कुछ विवाद दशकों पुराने हैं.

जब ईरान विदेशों में तेल बेचता है, तो भुगतान आमतौर पर ख़रीदार देश के खातों में जमा किया जाता है. हालांकि, प्रतिबंधों के कारण ईरान अक्सर इन पैसों को वापस अपने देश में लाने में असमर्थ रहा है.

संपत्ति ज़ब्त करने की पहली बड़ी शुरुआत साल 1979 में तेहरान में अमेरिकी दूतावास बंधक संकट के बाद शुरू हुआ था. हालांकि बाद के एक समझौते के तहत कुछ संपत्तियां जारी कर दी गईं, लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले सैन्य अनुबंधों से संबंधित कुछ दावे और संपत्तियां अभी भी अनसुलझी हैं.

प्रतिबंधों की दूसरी बड़ी लहर साल 2011-12 में शुरू हुई, जिसमें परमाणु प्रतिबंधों को और कड़ा किया गया और ईरान को वैश्विक बैंकिंग प्रणाली के कुछ हिस्सों से बाहर कर दिया गया.

साल 2018 में अमेरिका द्वारा 2015 के परमाणु समझौते (जेसीपीओए) से हटने के बाद इन्हें और मज़बूत किया गया.

जैसे-जैसे प्रतिबंधों का विस्तार हुआ, राजस्व की बढ़ती मात्रा विदेशों में फंसती चली गई, या तो औपचारिक रूप से रोक दी गई या उसके उपयोग पर सख्त सीमाएं लगा दी गईं.

मिडिल ईस्ट काउंसिल ऑन ग्लोबल अफेयर्स के अर्थशास्त्री फ्रेडरिक श्नाइडर के मुताबिक़, "ज़ब्त करने के अलग-अलग तरीक़े" होते हैं, जिनमें औपचारिक रूप से रोका गया धन, वह राजस्व जिसे वापस नहीं लाया जा सकता है, और चल रहे कानूनी विवादों में फंसा हुआ पैसा शामिल है.

धनराशि कहाँ रखी जाती है?

ईरान के प्रतिबंधित फ़ंड्स का अधिकतर हिस्सा अमेरिका के बाहर रखा हुआ है.

इसका एक बड़ा हिस्सा चीन में है, जो ईरान का सबसे बड़ा तेल ग्राहक है, और एक अनुमान के मुताबिक़ यह रक़म 20 अरब डॉलर से 50 अरब डॉलर के बीच है. गैस और बिजली निर्यात के भुगतान से जुड़ी अन्य बड़ी रक़म इराक़ में है, जिसका अनुमान 10 अरब डॉलर से 15 अरब डॉलर के बीच है.

अमेरिकी कांग्रेस के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण कोरिया के पास ईरान से प्राप्त तेल राजस्व में लगभग 6 अरब डॉलर थे, जिन्हें 2023 में क़तर के खातों में ट्रांसफ़र कर दिया गया था.

हालांकि, अमेरिका ने बाद में संकेत दिया कि ईरान निकट भविष्य में इन फ़ंड्स तक पहुंच नहीं पाएगा, जिससे वे दोहा में ही रहेंगे.

बाक़ी फ़ंड्स भारत, जापान और लक्ज़मबर्ग सहित अन्य देशों में रखे गए हैं. भारत में ईरान की सात अरब डॉलर की संपत्ति है.

इसके उलट अमेरिकी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत रखी गई राशि अपेक्षाकृत कम है - अमेरिकी कांग्रेस के मुताबिक़ लगभग 2 अरब डॉलर - और इसका अधिकतर हिस्सा अदालती फ़ैसलों और मुआवज़े के दावों से जुड़ा है, जिससे इसका जारी होना विशेष रूप से संवेदनशील हो जाता है.

अमेरिका की भूमिका क्या है?

हालांकि ये फ़ंड्स अधिकतर अमेरिका के बाहर स्थित हैं, फिर भी इन पर अमेरिका का प्रभाव काफ़ी हद तक तथाकथित सेकंडरी सैंक्शंस से पैदा होता है.

ये प्रतिबंध सिर्फ़ ईरान को ही निशाना नहीं बनाते, बल्कि उन विदेशी बैंकों, कंपनियों और सरकारों को भी निशाना बनाते हैं जो ईरान के साथ कारोबार करते हैं.

ईरान के धन के लेन-देन में मदद करने वाला कोई भी बैंक या वित्तीय संस्थान अमेरिकी वित्तीय प्रणाली तक अपनी पहुंच खोने या अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करने का जोखिम उठाता है.

नतीजतन जिन देशों के पास ईरान का पैसा जमा है, वे अक्सर अमेरिका की स्पष्ट मंज़ूरी के बिना उस धन को जारी करने या किसी अन्य जगह ट्रांसफर करने से हिचकिचाते हैं.

इस समझौते से ईरान को क्या फ़ायदा हो सकता है?

समझौता ज्ञापन में ईरान को दी जा सकने वाली आर्थिक राहत के दो मुख्य तरीकों का उल्लेख किया गया है:

  • ऐसी छूट जिसके तहत ईरान को तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात की अनुमति मिले, साथ ही शिपिंग, बीमा और बैंकिंग जैसी संबंधित सेवाओं की भी अनुमति हो.
  • ईरान के फ्रीज़ या प्रतिबंधित फ़ंड तक पहुंच, जिससे ईरान के केंद्रीय बैंक को यह तय करने का अधिक अधिकार मिले कि उस पैसे का इस्तेमाल कैसे किया जाए.

इसमें कम से कम 300 अरब डॉलर की व्यापक पुनर्निर्माण योजना का भी ज़िक्र है, जिसके तहत क्षेत्रीय साझेदार देशों के सहयोग से ईरान की अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण और विकास किया जाएगा. इस योजना को लागू करने का तरीका अंतिम समझौते के ढांचे में तय किया जाएगा.

अमेरिका ने ज़ोर देकर कहा है कि वह ईरान को सीधे कोई पैसा नहीं देगा. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह 2015 के ईरान परमाणु समझौते से बिल्कुल अलग है, जो ओबामा प्रशासन के दौरान हुआ था. इसके बजाय अमेरिका बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, परिवहन और अन्य क्षेत्रों में निवेश पर ध्यान देगा.

क्या ये धनराशि ईरान तक पहुंचेगी?

हालांकि, व्यवहार में इन फंड तक पहुंच अब भी सीमित रह सकती है. यह बात ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक बोर्स एंड बाज़ार फाउंडेशन के संस्थापक एस्फंदियार बतमंगेलिद्ज़ ने कही.

उन्होंने बीबीसी से कहा कि ऐसी व्यवस्थाओं के सामने "बेहद जटिल मुश्किलें" हैं. इसका मतलब है कि ईरान किसी ख़ास देश के भीतर तो इन पैसों का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रांसफ़र करना उसके लिए मुश्किल होगा.

विशेषज्ञ श्नाइडर एक और बड़ी समस्या की ओर इशारा करते हैं. उनका कहना है कि यह स्पष्ट नहीं है कि कोई भी समझौता कितने समय तक टिकेगा.

उनके मुताबिक़, अमेरिका के कुछ प्रतिबंध कांग्रेस द्वारा क़ानून के रूप में लागू किए गए हैं. इसलिए कोई भी राष्ट्रपति उन्हें अपने स्तर पर पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकता और सिर्फ अस्थायी छूट ही दे सकता है.

श्नाइडर का कहना है कि इसी वजह से यह संदेह बना रहता है कि ईरान को मिलने वाली राहत कितने समय तक जारी रहेगी.

2015 के परमाणु समझौते के बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ था, जब ईरान को अपने कुछ फ़ंड तक दोबारा पहुंच मिली थी.

हालांकि, कई बैंक तब भी सतर्क रहे और 2018 में अमेरिका समझौते से बाहर निकल गया तथा ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगा दिए.

पिछले सप्ताह ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया कि अमेरिका 12 अरब डॉलर की फ्रीज़ संपत्तियां जारी करने पर सहमत हो गया है, लेकिन अमेरिका ने इसकी पुष्टि नहीं की है.

इस बात को लेकर भी अनिश्चितता है कि क्या अमेरिका ईरान की कुछ संपत्तियों का इस्तेमाल खाड़ी देशों को युद्ध से हुए नुक़सान की भरपाई के लिए करेगा.

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने जून की शुरुआत में एक्स पर कहा था कि ऐसे नुक़सान की भरपाई "ईरानी खातों से निकाले गए धन" से की जाएगी.

हालांकि, ईरान ने इस सुझाव को ख़ारिज कर दिया. उप विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने कहा कि ईरान की संपत्तियां "वॉशिंगटन के लिए युद्ध की लूट नहीं हैं और न ही उसके सहयोगी देशों का ख़र्च उठाने के लिए कोई फ़ंड हैं."

इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक़, 2024 में ईरान की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 475 अरब डॉलर था.

ईरानी अधिकारियों का अनुमान है कि युद्ध के कारण देश को 300 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुक़सान हुआ है और इस साल अर्थव्यवस्था करीब 10% तक सिकुड़ सकती है.

अगर फ्रीज़ किए गए फ़ंड का कुछ हिस्सा भी जारी कर दिया जाता है, तो इससे ईरान को अल्पकालिक राहत मिल सकती है.

ईरान चैंबर ऑफ कॉमर्स के एक सदस्य ने बीबीसी से कहा कि देश में विदेशी मुद्रा की कमी इतनी गंभीर हो गई है कि कई आयात ऑर्डर या तो रोक दिए गए हैं या उनमें लंबी देरी हो रही है. अब आयात लगभग केवल ज़रूरी सामान और खाद्य पदार्थों तक सीमित रह गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा तक पहुंच मिलने से ईरान की मुद्रा रियाल को स्थिर करने, ज़रूरी सामान समेत आयात के लिए धन उपलब्ध कराने और वित्तीय बाज़ारों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है.

हालांकि, उनका कहना है कि इससे अर्थव्यवस्था की गहरी संरचनात्मक समस्याएं दूर नहीं होंगी.

तेहरान की इमाम सादिक़ यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर कमरान नेदरी का कहना है कि "किसी भी पुनर्निर्माण कार्यक्रम से पहले महंगाई पर काबू पाना और बढ़ती जीवनयापन लागत के संकट से निपटना प्राथमिकता होनी चाहिए."

वह कहते हैं कि बिना आर्थिक सुधार किए केवल पैसा झोंकने से उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा.

वहीं, पेरिस-13 यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मेहरदाद वहाबी का कहना है कि ईरान की चुनौती इससे कहीं बड़ी है. पिछले दो दशकों में निवेश में आई भारी गिरावट और उद्योगों के पुराने पड़ जाने की समस्या को दूर करना ज़रूरी है.

उनका कहना है, "आर्थिक सुरक्षा के बिना निवेश संभव नहीं है. और वास्तविक निवेशकों के बिना ईरान की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ेगी और आर्थिक विकास ठहर जाएगा."

जर्मनी की लीपज़िग यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शोधकर्ता रज़ा तालेबी भी इससे सहमत हैं.

उनका कहना है कि ईरान को क्षेत्रीय तनाव कम करना होगा ताकि निवेशकों को भरोसा हो सके कि उनका पैसा राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी जोखिमों से सुरक्षित रहेगा.

वह कहते हैं, "युद्ध और शांति के बीच की अनिश्चित स्थिति ही ईरान की अर्थव्यवस्था में निवेश आने की सबसे बड़ी बाधा है."

हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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