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ऑस्ट्रेलिया के साथ यूरेनियम समझौता भारत के लिए कितनी बड़ी बात?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ऑस्ट्रेलिया की अपनी यात्रा के दौरान यूरेनियम आपूर्ति से जुड़ा एक अहम समझौता किया है.
इससे भारत को ऐसा ईंधन स्रोत मिलेगा, जो उसकी परमाणु ऊर्जा संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा.
दुनिया में यूरेनियम संसाधन का एक बड़ा हिस्सा ऑस्ट्रेलिया में है लेकिन क़ानूनी बाधाओं और राजनीतिक संवेदनशीलताओं के कारण भारत को इसका निर्यात बाधित रहा है.
पीएम मोदी ने कहा, "आज हमने परमाणु ऊर्जा पर एक अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. इससे ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की आपूर्ति का रास्ता खुलेगा और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े हमारे लक्ष्यों को नई गति मिलेगी."
दोनों नेताओं के संयुक्त बयान में कहा गया कि यह व्यवस्था "सिर्फ़ शांतिपूर्ण उद्देश्यों" के लिए दीर्घकालिक यूरेनियम निर्यात की अनुमति देती है.
यह निर्यात अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के तय सुरक्षा प्रावधानों के तहत होगा.
समझौते के बारे में बात करते हुए ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने पत्रकारों से कहा, "यह व्यवस्था ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम निर्यात की सुविधा देती है, जिससे गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता का हिस्सा बढ़ाने में मदद मिलेगी."
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 2014 में परमाणु सहयोग समझौता किया था, जिसने यूरेनियम निर्यात का रास्ता साफ़ किया था.
ऑस्ट्रेलियाई सरकार की एक वेबसाइट के मुताबिक़, ऑस्ट्रेलिया के पास विश्व का लगभग 32 प्रतिशत यूरेनियम भंडार है और उसने भारत के ऊपर लंबे समय से लगे यूरेनियम निर्यात प्रतिबंध को 2012 में ख़त्म कर दिया था.
हालांकि ऑस्ट्रेलिया पहले से चीन, जापान, ताइवान और अमरीका को यूरेनियम देता रहा है लेकिन उसने भारत को इस सूची से बाहर कर रखा था.
हिंद महासागर में 'अंतरिक्ष ट्रैकिंग टर्मिनल'
हाल के वर्षों में भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध काफ़ी क़रीबी हुए हैं. जानकारों के मुताबिक़ इसकी एक वजह बीजिंग की सैन्य महत्वाकांक्षाओं पर नज़र बनाए रखने की साझा इच्छा और चीन के बाहर व्यापारिक साझेदार विकसित करने की कोशिश भी है.
मोदी और अल्बनीज़ ने रक्षा सहयोग मज़बूत करने और महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन को मज़बूत बनाने पर भी सहमति जताई.
संयुक्त बयान के अनुसार, दोनों देश हिंद महासागर में ऑस्ट्रेलिया के कोकोस (कीलिंग) द्वीपसमूह पर एक "अस्थायी अंतरिक्ष ट्रैकिंग टर्मिनल" बनाएंगे, जो भारत की अंतरिक्ष उड़ान परियोजनाओं को सहयोग देगा.
इन घोषणाओं से पहले दोनों नेताओं ने कुछ देर रुककर एक सेल्फ़ी भी ली. उस दौरान अल्बनीज़ के चेहरे पर चौड़ी मुस्कान थी.
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री पहले भी मोदी को 'द बॉस' कह चुके हैं. उन्होंने मज़ाक में कहा था कि मोदी अमेरिकी रॉक संगीत के दिग्गज ब्रूस स्प्रिंगस्टीन से भी बड़ी भीड़ जुटा सकते हैं.
अल्बनीज़ ने दोनों देशों के बीच मज़बूत होते संबंधों में मोदी के नेतृत्व की सराहना की.
अल्बनीज़ ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी, आपके नेतृत्व और ऑस्ट्रेलिया के साथ आपके व्यक्तिगत जुड़ाव ने इस बदलाव में बिल्कुल केंद्रीय भूमिका निभाई है."
हाल के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों की संख्या काफ़ी बढ़ी है, जिससे देश में मोदी के समर्थकों का एक बड़ा आधार बना है.
जून में जारी पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार, पहली बार ऑस्ट्रेलिया में विदेश में जन्मे निवासियों का सबसे बड़ा समूह भारत में जन्मे लोगों का था.
ऑस्ट्रेलिया इंडिया इंस्टीट्यूट की तीस्ता प्रकाश ने एएफ़पी को बताया, "2014 में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोगों का समुदाय अपेक्षाकृत छोटा था. लेकिन 2026 में यह ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय बन गया है. इसने ब्रिटिश मूल के समुदाय को पीछे छोड़ दिया है. ये एक बड़ा परिवर्तन है."
जयराम रमेश ने क्या कहा
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस समझौते का श्रेय पूर्व की मनमोहन सरकार को दिया.
उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "यह सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग समझौते की वजह से संभव हो पाया है, जो 8 अक्टूबर 2008 को क़ानून बना था. जुलाई 2005 में डॉ. मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मुलाक़ात से ही इस समझौते पर बातचीत की शुरुआत हुई थी."
उन्होंने कहा, "बीजेपी ने संसद के भीतर और बाहर, दोनों जगह इस समझौते का लगातार विरोध किया था. कांग्रेस इतिहास में निर्णायक मोड़ लाती है, जबकि बीजेपी यू-टर्न लेने में माहिर है."
उधर, मिनरल्स काउंसिल ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) तानिया कॉन्स्टेबल ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, "ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच व्यापार और निवेश का लंबा इतिहास रहा है. अब इस साझेदारी को और मज़बूत करने का अवसर है. इसमें भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम का निर्यात भी शामिल है, जो उसकी महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा."
ग़ौरतलब है कि भारत सरकार ने साल 2047 तक परमाणु ऊर्जा को 100 गीगा वॉट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. पीएम मोदी ने भी गुरुवार को इस लक्ष्य का ज़िक्र किया.
भारतीय संसद में दिसंबर 2025 में सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ़ न्यूक्लिटर एनर्जी फ़ॉर ट्रांस्फ़ॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) विधेयक को पास किया गया था.
सरकार का कहना था कि यह नया क़ानून भारत को 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने में मदद करेगा.
निजी कंपनियों को लाइसेंस मिलेगा कि वे परमाणु बिजलीघर या रिएक्टर बना सकें, उसका मालिकाना हक़ रख सकें, उसे चला सकें या बंद कर सकें. उन्हें परमाणु ईंधन बनाने की अनुमति भी होगी - जिसमें यूरेनियम-235 का रूपांतरण, शोधन और निर्धारित सीमा तक संवर्धन शामिल है.
इसके अलावा, केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य पदार्थों का उत्पादन, उपयोग, प्रसंस्करण या निपटान भी वे कर सकेंगी.
क्या कहते हैं जानकार
विज्ञान मामलों के जानकार पल्लव बागला ने बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा से बातचीत में कहा कि परमाणु ऊर्जा के मामले में भारत को यूरेनियम की बहुत ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, "भारत अभी कुल 8 गीगा वाट परमाणु ऊर्जा बनाता है और 2047 तक इसे 100 गीगा वाट करने का लक्ष्य है. इसके लिए भारत को यूरेनियम की ज़रूरत है और इस वक़्त इसका सबसे बड़ा भंडार ऑस्ट्रेलिया के पास है."
"उसका यूरेनियम उच्च क्वालिटी का है. साल 2014 में भारत ने क़रार किया था लेकिन तबसे भारत को निर्यात नहीं हो पाया था. लेकिन अब भारत अपने एनर्जी प्रोग्राम के लिए यूरेनियम आयात कर सकेगा. भारत ने इसी तरह का करार रूस और कनाडा से भी कर रखा है."
पल्लव बागला ने बताया कि दिलचस्प है कि ऑस्ट्रेलिया अपने लिए ज़रा सा भी यूरेनियम इस्तेमाल नहीं करता है सिर्फ एक्सपोर्ट करता है.
भारत ने जब 1974 में पहला और 1998 में दूसरा परमाणु बम परीक्षण किया था तब बहुत सारे देशों ने व्यापक प्रतिबंध लगाए थे और भारत को यूरेनियम मिलना बंद हो गए थे.
लेकिन अमेरिका के साथ नागरिक परमाणु समझौते के बाद यूरेनियम आयात की इजाज़त मिल गई और न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप ने भी मंज़ूरी दे दी.
पल्लव बागला कहते हैं, "जहां तक परमाणु बम बनाने का सवाल है तो भारत के पास परमाणु बम बनाने लायक पर्याप्त यूरेनियम है. उसे ज़रूरत है उर्जा के लिए यूरेनियम की."
यूरेनियम क्या है और इसका क्या इस्तेमाल होता है?
यूरेनियम एक भारी धातु है, जिसका इस्तेमाल 60 साल से भी ज़्यादा समय से ऊर्जा के सघन स्रोत के रूप में किया जा रहा है.
वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक़, यूरेनियम ज़्यादातर चट्टानों में 20 से 40 लाखवें हिस्से (2 से 4 पार्ट्स प्रति मिलियन) की मात्रा में पाया जाता है.
यह पृथ्वी की ऊपरी परत में टिन, टंगस्टन और मोलिब्डेनम जितना ही सामान्य है. यूरेनियम समुद्री पानी में भी मौजूद होता है और इसे महासागरों से भी निकाला जा सकता है.
यूरेनियम की खोज 1789 में जर्मन रसायन वैज्ञानिक मार्टिन क्लापरोथ ने पिचब्लेंड नामक खनिज में की थी. इसका नाम यूरेनस ग्रह के नाम पर रखा गया, जिसकी खोज इससे आठ साल पहले हुई थी.
माना जाता है कि यूरेनियम का निर्माण लगभग 6.6 अरब साल पहले सुपरनोवा विस्फोटों के दौरान हुआ था. हालांकि यह सौर मंडल में बहुत अधिक मात्रा में नहीं पाया जाता, लेकिन आज इसका धीमा रेडियोधर्मी क्षय पृथ्वी के भीतर गर्मी का मुख्य स्रोत है.
इसी गर्मी की वजह से पृथ्वी के अंदर महाद्वीपों का खिसकना (कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट) संभव होता है.
यूरेनियम का घनत्व बहुत अधिक होता है. इसी कारण इसका इस्तेमाल विमान के नियंत्रण तंत्र में और विकिरण से सुरक्षा के लिए शील्डिंग सामग्री के रूप में भी किया जाता है.
यूरेनियम का मेल्टिंग प्वाइंट 1132 डिग्री सेल्सियस है. इसका रासायनिक प्रतीक यू (U) है.
भारत के लिए कितना अहम?
भारत की ऊर्जा मांगों की पूर्ति के लिए ये एक बहुत अहम करार है.
संसद में सरकार पिछले मार्च में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह ने कहा था कि वित्त वर्ष 2008-09 से 2024-25 तक भारत में (आईएईए) की निगरानी वाले रिएक्टरों के लिए कुल 18,842.60 मीट्रिक टन यूरेनियम का आयात किया गया.
इसमें यूरेनियम अयस्क, प्राकृतिक यूरेनियम डाईऑक्साइड (UO₂), पेलेट्स और समृद्ध UO₂ पेलेट्स शामिल हैं.
जवाब में कहा गया था, सरकार ने 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लिए मौजूदा 8.78 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता के साल 2031-32 तक बढ़कर करीब 22 गीगावाट होने की उम्मीद है.
इसके बाद 2032 से 2047 तक एनपीसीआईएल की ओर से 32 गीगावाट अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा क्षमता स्थापित करने की योजना है.
भारत की आर्थिक प्रगति को लेकर सभी सरकारों के लिए के मामले में आत्मनिर्भरता एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है.
पीआईबी के अनुसार, हाल के सालों में भारत की ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ी है और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने लक्ष्य भी बनाया गया है. परमाणु ऊर्जा से बनने वाली बिजली, कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन के मुक़ाबले अधिक स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है.
यह डेटा केंद्रों, उन्नत उद्योगों और उभरती प्रौद्योगिकियों की निरंतर बनी रहने वाली बिजली ज़रूरतों को पूरा करने में बहुत मददगार है.
पीआईबी के बयान के अनुसार, परमाणु क्षमता का विस्तार भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव के लिए केवल एक रणनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक ज़रूरत है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.