ट्रंप के दौरे पर दिल्ली में सीएए को लेकर हुई जानलेवा हिंसा का क्या असर पड़ा है?

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत दौरा ख़त्म हो चुका है. इस दौरे पर दोनों देशों में कोई ट्रेड डील तो नहीं हुई, लेकिन भारी-भरकम डिफेंस डील ज़रूर मुकम्मल हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच निजी बातचीत की भी तमाम व्याख्याएं की गईं. ट्रंप के इस दौरे का क्या हासिल रहा, इस पर वॉशिंगटन में बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने वरिष्ठ पत्रकार सीमा सिरोही से बातचीत की.

ट्रंप के दौरे पर नज़रिए के बारे में सीमा कहती हैं, "सबसे बड़ी बात तो यही है कि ट्रंप भारत आए. ये उनका चुनावी साल है और उनके पास समय कम है. उन्हें लंबी फ्लाइट्स पसंद नहीं है और वो बाहर जाना पसंद नहीं करते हैं. वह लगातार चौथे राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने भारत का दौरा किया. तो अब ये परंपरा सी बन गई है. दो खरब रुपए की डिफेंड डील भी साइन की गई है. ट्रेड डील नहीं हो पाई है, लेकिन आशा है कि इस साल के आख़िर में हो जाएगी."

ट्रेड डील न होने की सूरत में लिमिटेड ट्रेड डील की बातें भी की जा रही थीं.

इस बारे में सीमा कहती हैं, "लिमिटेड डील नहीं हो पाई, क्योंकि दोनों ही तरफ़ अभी भरोसा थोड़ा कम है और मुद्दे ज़्यादा हैं. दोनों के अपने वोटबैंट हैं, जिन्हें वो संतुष्ट करना चाहते हैं. हां, भारत अब अमरीका से तेल और गैस बहुत ख़रीद रहा है. पिछले साल भारत ने अमरीका से पाँच खरब रुपए का तेल और गैस ख़रीदा. इस साल ये व्यापार 6.5 खरब रुपए का होने की उम्मीद है. इससे दोनों के बीच व्यापार घाटा कम हुआ है. राष्ट्रपति ट्रंप को इस बात की ख़ुशी तो होगी ही."

ट्रंप ने मोटेरा स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में पीएम मोदी के सामने कश्मीर और पाकिस्तान का भी ज़िक्र किया था. इसे भारत, पाकिस्तान और अमरीका में अपने-अपने तरह से देखा जाएगा.

इसे लेकर सीमा बताती हैं, "मोदी सरकार ट्रंप को अच्छी तरह समझती है. ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि अगर दोनों पक्ष चाहें, तो वो मध्यस्थता करना चाहेंगे. इस बार भी उन्होंने यही कहा. भारत इसकी उम्मीद कर रहा था. इससे कोई ज़्यादा सरप्राइज़ नहीं हुआ. लेकिन एक और संदर्भ है कि अफ़ग़ानिस्तान में जो पीस डील हो रही है, उसके तहत ट्रंप पाकिस्तान को कुछ ख़ुशी की बात कहना चाहते हैं. पाकिस्तान हमेशा उन्हें यही गुज़ारिश करता है कि आप इंडिया पर दबाव डालिए कि हमसे बातचीत शुरू करे. कश्मीर के बारे में कुछ करे. तो ट्रंप सार्वजनिक रूप से ये बात कह देते हैं. उससे पाकिस्तान ख़ुश हो जाता है. उनकी जनता ख़ुश हो जाती है. उससे भारत सरकार को कोई ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता है."

क्या अमरीकी प्रशासन सोच-समझकर भारत और पाकिस्तान को बैलेंस करके चलते हैं? इस बारे में सीमा मानती हैं कि यह कोई गंभीर बात नहीं है. अमरीकी भी जानते हैं कि अगर भारत तैयार नहीं है, तो वो मध्यस्थता नहीं कर सकते. इन मुद्दों पर भारत का स्टैंड मोदी ही नहीं, बल्कि उनके पहले से भी बहुत तगड़ा है. अमरीकी प्रशासन भी इसे समझता है.

ट्रंप अपने भारत दौरे के दूसरे दिन दिल्ली में थे. इसी समय दिल्ली में सीएए के समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसक संघर्ष चल रहा था. सीएए को लेकर अमरीका में भी विरोध प्रदर्शन हुआ और मीडिया में भी काफ़ी कुछ लिखा गया. भारत में भी ट्रंप से इस बारे में सवाल पूछे गए, लेकिन उन्होंने कोई ठोस जवाब नहीं दिया.

सीएए पर अमरीका के रुख़ पर सीमा कहती हैं, "ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले ही कह दिया था कि मैं किसी भी विवादित मुद्दे पर नहीं बोलूंगा. लेकिन मोदी और ट्रंप की जो निजी बातचीत हुई, उसमें ये मुद्दा ज़रूर उठाया गया होगा. मुझे ऐसा इसलिए लगता है, क्योंकि दौरे से पहले जब वॉशिंगटन में अमरीकी अधिकारियों ने ब्रीफिंग की, तो उन्होंने इसका ज़िक्र किया था. इस बात को निजी बातचीत में उठाना ज़्यादा सही है. ट्रंप ने बताया कि मोदी ने उन्हें विस्तार से बताया कि भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के तहत क्या दिक्क़त है. उन्होंने बताया कि पहले 14 मिलियन मुस्लिम होते थे, अब बढ़ गए हैं. तो इसमें आप कुछ भी पढ़ सकते हैं कि इसका क्या मतलब था. लेकिन ट्रंप ने इसके बारे में ज़्यादा चर्चा नहीं की."

हालांकि आज़ाद भारत में मुसलमान 14 मिलियन कभी नहीं रहे. इस समय भारत में मुसलमान कुल जनसंख्या के 14 फ़ीसदी हैं, यानी क़रीब 20 करोड़.

सीमा बताती हैं कि अमरीका में विदेश सचिव की ब्रीफिंग में भी सीएए की कोई बात नहीं हुई थी.

ट्रंप के दौरे के वक़्त दिल्ली में हिंसा से क्या संदेश जाएगा, इस सवाल पर सीमा कहती हैं, "ये बहुत ही परेशान करने वाली बात है. मुझे लगता है कि अमरीकी इसे नोटिस करेंगे और उनसे ज़्यादा बिज़नेसमेन नोटिस करेंगे. अगर देश में स्थिरता नहीं है, तो निवेश पर फ़र्क़ पड़ेगा. लोग देखेंगे कि राजधानी दिल्ली में हिंसा हो सकती है और इतने बड़े दौरे के समय इस तरफ़ से हिंसा हो सकती है, तो इसका यही मतलब होगा कि कुछ चीज़ें ठीक नहीं हैं. भारत सरकार इस पर सफ़ाई पेश करेगी, लेकिन अमरीकी अपना निष्कर्ष ख़ुद निकालेंगे. निजी तौर पर अमरीकी अधिकारी पूछने लगे हैं कि भारत किस तरफ़ जा रहा है. जिन लोकतांत्रिक मूल्यों को हम साझा मूल्य कहते हैं, जिसके आधार पर हमारा रिश्ता बना है, अब क्या वो कमज़ोर हो रहा है. ये सवाल तो उठेगा ही."

सीमा हमें इसकी भी झलक देती हैं कि सीएए पर हिंसा को अमरीका में सियासी रूप से कैसे देखा जा रहा है.

उन्होंने बताया, "डेमोक्रेटिक पार्टी ने इसे मुद्दा बना लिया है. वो देख रहे हैं कि भारत में क्या हो रहा है. उन्होंने बहुत सवाल पूछे हैं. अमरीकी संसद में एक रिजोल्यूशन भी चल रहा है, जो भारतीय-अमरीकी सांसद प्रमिला जयपाल ने शुरू किया है. तो ये चिंता करने वाली बात तो है ही. लोग देख रहे हैं और हम छिपा तो नहीं सकते."

भारत-अमरीका के लंबी अवधि के रिश्तों में इन चीज़ों का कैसा असर पड़ेगा, इसके जवाब में सीमा कहती हैं, "अगर हम कड़वा सच कहें, तो अमरीका को एशिया में चीन को बैलेंस करने के लिए भारत की ज़रूरत है. तो मेरे ख्याल से रणनीतिक साझेदारी पर इतना बड़ा असर नहीं पड़ेगा. अगर यह बिल्कुल ही नियंत्रण के बाहर हो जाता है कि भारत एक देश के तौर पर अस्थिर हो जाए. ऐसा तो अभी नहीं है और आशा है कि मोदी सरकार जल्द इसका कोई हल ढूंढेगी. लेकिन मोटी बात यही है कि अमरीका चीन को बैलेंस करना चाहता है, क्योंकि अमरीका में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों ही पार्टी समझ रही हैं कि चीन उनका मुख्य प्रतिद्वंदी है. उसके लिए भारत के साथ साझेदारी बहुत महत्वपूर्ण है."

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