राजस्थानः इस्लामपुर का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने की सिफ़ारिश, स्थानीय लोग नाराज़

    • Author, मोहर सिंह मीणा
    • पदनाम, झुंझुनूं से बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

राजस्थान के झुंझुनू ज़िले का एक गांव, इस्लामपुर, इन दिनों प्रदेश की राजनीति और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है.

गांव का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने की अनुशंसा के बाद से इसकी चर्चा, गांव की गलियों से लेकर राजधानी जयपुर तक हो रही है.

एक पक्ष इसे सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे गांव के इतिहास और विरासत के साथ छेड़छाड़ बता रहा है.

कई ग्रामीण भारतीय जनता पार्टी सरकार पर माहौल खराब करने का आरोप लगा रहे हैं. हालांकि गांव के कुछ लोग नाम बदले जाने की सिफ़ारिश से सहमत भी हैं.

वहीं, अनुशंसा करने वाले बीजेपी के स्थानीय विधायक राजेंद्र भाम्बू ने बीबीसी हिन्दी से दावा किया, "गांव का नाम मुगल काल से पहले श्रीरामपुर ही था, इसलिए कुछ लोग इसे फिर से यही नाम देना चाहते हैं."

हालांकि, जब उनसे इससे जुड़ा कोई दस्तावेज़ दिखाने के बारे में कहा गया, तो उन्होंने कहा कि वो ऐसे दस्तावेज़ जुटाने की कोशिश कर रहे हैं.

कैसे शुरू हुआ विवाद

इस्लामपुर गांव झुंझुनूं ज़िला मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर स्थित है. यहां सरकारी स्कूल से लेकर हाईवे के साइनबोर्ड तक इस गांव का नाम इस्लामपुर दर्ज है. गांव की संकरी गलियों में बेहद पुरानी हवेलियां और खंडहर में तब्दील हो चुकी इमारतें भी मौजूद हैं.

इन गलियों और लगभग हर घर में इन दिनों गांव का नाम बदलने को लेकर चर्चाएं सुबह से देर शाम तक चलती रहती हैं.

मामले की शुरुआत उस समय हुई, जब इस्लामपुर का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने का प्रस्ताव सामने आया. प्रस्ताव के सार्वजनिक होने के बाद गांव और आसपास के क्षेत्रों में विरोध शुरू हो गया.

सरपंच आमीन मनियार ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "17 फरवरी 2026 को स्थानीय भाजपा विधायक राजेंद्र भाम्बू ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस्लामपुर का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने की अनुशंसा की थी. इसके बाद 3 जून को तहसीलदार ने फ़ोन कर ग्राम सभा में नाम परिवर्तन का प्रस्ताव पारित कर तत्काल भेजने को कहा."

सरपंच ने पंचायत में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित होने से इनकार किया. पंचायत की ओर से तहसीलदार को पत्र लिखकर सूचित किया गया कि ग्राम पंचायत इस्लामपुर का नाम परिवर्तन करने के संबंध में पंचायत द्वारा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है.

आमीन मनियार ने झुंझुनूं ज़िला कलेक्टर डॉ. अरुण गर्ग को भी पत्र लिखकर सूचित किया कि नाम बदलने की अनुशंसा की जानकारी मिलने के बाद ग्रामीणों में आक्रोश है. गांव की बड़ी आबादी इस प्रस्ताव का विरोध कर रही है.

इसके बाद से इस मामले में ग्रामीणों का विरोध लगातार जारी है.

मुख्यमंत्री कार्यालय ने कलेक्टर को लिखा पत्र

विधायक राजेंद्र भाम्बू के पत्र का संदर्भ देते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के कार्यालय से 29 मई को झुंझुनूं ज़िला कलेक्टर को एक पत्र भेजा गया. पत्र के विषय में लिखा गया था, "ग्राम इस्लामपुर का नाम परिवर्तित कर श्रीरामपुर करने के संबंध में."

नाम बदलने की अनुशंसा के सवाल पर झुंझुनू विधायक राजेंद्र भाम्बू दावा करते हैं, "मुगल काल के दौरान आए आक्रांताओं से पहले गांव का नाम श्रीरामपुर था. वर्ष 1990 में विश्व हिंदू परिषद के पत्राचार में भी श्रीरामपुर नाम का उल्लेख मिलता है."

उनका कहना है कि वो गांव के लोगों से इसके प्रमाण एकत्र करेंगे और फिर सौंपेंगे. भाम्बू ने कहा, "गांव के हिंदू निवासियों के पास इसके प्रमाण हैं और वे चाहते हैं कि नाम बदला जाए. जो भी निर्णय होगा, वह विधि-सम्मत प्रक्रिया के अनुसार लिया जाएगा."

झुंझुनूं ज़िला कलेक्टर डॉ. अरुण गर्ग ने बीबीसी से कहा, "इस्लामपुर गांव का नाम बदलने संबंधी प्रतिवेदन प्राप्त हुआ है. नाम परिवर्तन के लिए निर्धारित मानकों के अनुसार फिलहाल आवश्यक सूचनाएं एकत्रित की जा रही हैं."

उन्होंने कहा कि प्रशासन को कुछ ज्ञापन नाम परिवर्तन के समर्थन में मिले हैं, जबकि कुछ इसके विरोध में हैं. ज्ञापनों के साथ दस्तावेजी साक्ष्य भी प्रस्तुत किए गए हैं. प्रशासन अपने रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेज़ों की भी जांच कर रहा है. नियम के मुताबिक ही आगे की कार्रवाई की जाएगी.

डॉ. अरुण गर्ग ने इस बात पर भी जोर दिया कि गांव के नाम को लेकर अभी जांच जारी है. फिलहाल कोई रिपोर्ट सरकार को नहीं भेजी गई है. जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर रिपोर्ट तैयार की जाएगी.

क्या बोले ग्रामीण

शेखावाटी क्षेत्र में लोग अपने नाम के साथ अपने गांव का नाम भी जोड़ते हैं. इसका कारण यह है कि यहां के लोग अपने गांव के नाम को अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं.

गांव के मौजूदा माहौल को समझें तो यहां इन दिनों बातचीत का सबसे बड़ा विषय नाम परिवर्तन का प्रस्ताव ही है. एक बुजुर्ग, जिन्होंने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बात की, कहते हैं कि जब गांव में विकास, शिक्षा, पानी और रोजगार जैसी समस्याएं मौजूद हैं, तो प्राथमिकता नाम बदलने को क्यों दी जा रही है.

उनके अनुसार, इसके पीछे आपसी सौहार्द के ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है.

इस्लामपुर निवासी 66 वर्षीय मनीराम अपने घर में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाते हैं.

उन्होंने बताया कि वह गांव का नाम इस्लामपुर से बदलकर श्रीरामपुर करने के प्रस्ताव का विरोध करते हैं.

वह कहते हैं, "सदियों से हमारे गांव का नाम इस्लामपुर है और यहां हिंदू-मुसलमान भाईचारे के साथ रहते आए हैं."

गांव की एक युवती, सबा खानम, बीएड की पढ़ाई कर रही हैं. उनका कहना है कि गांव का नाम इस्लामपुर ही रहना चाहिए. उनके अनुसार, नाम परिवर्तन के मुद्दे के जरिए लोगों को आपस में बांटने की कोशिश की जा रही है.

साठ वर्षीय सोनी देवी स्थानीय भाजपा विधायक राजेंद्र भाम्बू पर नाम परिवर्तन के मुद्दे के माध्यम से लोगों को बांटने का आरोप लगाती हैं. वह कहती हैं कि इससे गांव में आपसी तनाव बढ़ सकता है.

भारतीय सेना से सेवानिवृत्त 82 वर्षीय कैप्टन इस्माइल खान का जन्म भी इसी गांव में हुआ था. उनका कहना है कि नाम बदलने का प्रस्ताव उचित सोच और व्यापक सहमति के बिना आगे बढ़ाया जा रहा है.

उन्होंने कहा, "पिछले कुछ समय से देश में एकतरफा सोच को बढ़ावा मिला है और लोगों के बीच एक विशेष प्रकार की भावना पैदा की जा रही है. उनके अनुसार, इसी वजह से नाम परिवर्तन का प्रस्ताव भेजा गया है."

इब्राहिम खान 52 वर्ष के हैं और गांव के मुस्लिम समुदाय में प्रभावशाली माने जाते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "ग्रामीणों ने कलेक्टर को पुरानी किताबें, स्कूल की पुरानी रसीदें, लगान जमा करने से संबंधित दस्तावेज और शिक्षा विभाग का वर्ष 1904 का रिपोर्ट कार्ड समेत कई प्रमाण उपलब्ध कराए हैं. उनके अनुसार, इन सभी दस्तावेजों में गांव का नाम इस्लामपुर दर्ज है."

सरकार को चेतावनी

यह विवाद अब केवल गांव तक सीमित नहीं रहा है. चर्चाओं से आगे बढ़कर लोग नाम परिवर्तन के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं. 15 जून को ग्रामीणों ने करीब 18 किलोमीटर की पदयात्रा कर ज़िला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा.

ग्रामीणों के इस विरोध को पूर्व मंत्री और झुंझुनूं की राजनीति में प्रभाव रखने वाले नेता राजेंद्र सिंह गुढ़ा का भी समर्थन मिला है. उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाते हुए इसे लोगों को आपस में लड़ाने का प्रयास बताया है.

सरपंच आमीन मनियार ने कहा, "हमने पैदल मार्च निकालकर ज़िला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है. हमने उन्हें एक शताब्दी से भी पुराने ऐसे दस्तावेज दिए हैं, जिनमें गांव का नाम इस्लामपुर दर्ज है."

सरपंच मनियार ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा, "यदि हमारी मांगें नहीं मानी गईं तो हम जयपुर तक कूच करेंगे और राजस्थान सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा करेंगे."

उन्होंने कहा, "हमने कलेक्टर को ज्ञापन देकर मांग की है कि हमारे गांव का नाम नहीं बदला जाए. यदि ऐसा किया जाता है तो हम अनिश्चितकालीन धरना देंगे और आमरण अनशन पर भी बैठेंगे."

हालांकि, सरपंच के अनुसार कलेक्टर ने उन्हें आश्वासन दिया है कि प्रशासन इस मामले में कोई जल्दबाजी नहीं करेगा.

मनियार ने कहा, "मैंने विधायक से मुलाकात कर नाम परिवर्तन का विरोध दर्ज कराया था, लेकिन उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि गांव का नाम बदला जाए."

कुछ लोग समर्थन में भी

हालांकि गांव के कुछ लोग इसका नाम बदलकर श्रीरामपुर करने के समर्थन में भी हैं. इस्लामपुर के ही रहने वाले सुमेर सिंह का दावा है कि नाम बदलने के पक्ष में क़रीब पांच हज़ार लोग हैं.

वह बीबीसी से कहते हैं कि, "गांव का नाम श्रीरामपुर हुआ करता था, लेकिन फिर इसका नाम मुग़लों के दौरान सलामपुर हुआ. साल 1958 में पंचायती राज के दौरान प्रभावशाली पठान लोगों ने गांव का नाम बदलकर इस्लामपुर कर दिया."

सुमेर सिंह कहते हैं कि, "गांव का नाम श्रीरामपुर ही होना चाहिए. हम इसके समर्थन में कुछ तथ्य भी जुटा रहे हैं जो जल्द ही प्रशासन को सौपेंगे."

गांव के ही एक अन्य शख़्स सौरभ योगी बीबीसी से कहते हैं कि, "हमें श्रीरामपुर नाम ही चाहिए. हमने चुनावों के दौरान ही हमारे विधायक से यह मांग रखी थी. गांव का नाम श्रीरामपुर ही हुआ करता था, हम अगले दो दिन में हरिद्वार जा रहे हैं, वहां से भी पूर्वजों के रिकॉर्ड लेकर आएंगे. हम वापस से अपने गांव के नाम को श्रीरामपुर करा कर ही रहेंगे."

बीजेपी पर राजनीति के आरोप

मनीराम कहते हैं, "कुछ असामाजिक तत्व नाम बदलने के जरिए विवाद पैदा कर गांव का माहौल बिगाड़ना चाहते हैं."

वह बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहते हैं, "इसमें राजनीति हो रही है. भाजपा ने कभी लोगों को भाईचारे के साथ रहने नहीं दिया. भाजपा सांप्रदायिक तनाव चाहती है. जब से वह सत्ता में आई है, माहौल खराब हुआ है."

सरपंच आमीन मनियार नाम बदलने की पहल के पीछे का कारण बताते हुए कहते हैं, "भारतीय जनता पार्टी की नीति नाम बदलने की रही है और अब वही हमारे गांव में अपनाई जा रही है."

साठ वर्षीय सोनी देवी नाम परिवर्तन की चर्चा के बीच नाराज़गी जताते हुए कहती हैं, "मर जाएंगे या मार देंगे, लेकिन नाम नहीं बदलने देंगे. हम कागज़ों में नाम बदलवाने के लिए पैसे कहां से लाएंगे?"

वह आगे कहती हैं, "भाजपा की सरकार है, इसलिए नाम बदलना चाहती है. स्थानीय विधायक भी यही चाहते हैं. हमारे लिए मुसलमान हमारे भाई हैं. हम एक-दूसरे के सभी कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और हमेशा परिवार की तरह मिल-जुलकर रहते हैं."

इस्लामपुर गांव की एक ढाणी में रहने वाले 82 वर्षीय सेवानिवृत्त कैप्टन स्माइल खान बताते हैं कि उस बस्ती में उनका परिवार ही एकमात्र मुस्लिम परिवार है. वह कहते हैं, "मुझे कोई परेशानी नहीं है और हम सब भाईचारे के साथ रहते हैं. जब हमें आपस में कोई परेशानी नहीं है, तो गांव के नाम से परेशानी क्यों होनी चाहिए?"

इब्राहिम खान कहते हैं, "यदि नाम बदलना ही था, तो लोगों की राय ली जानी चाहिए थी. लोगों की सहमति होती तो नाम बदला जा सकता था. लेकिन इससे किसी को प्रचार नहीं मिलता और न ही विरोध तथा तनाव का माहौल बनता। यह राजनीतिक फायदे के लिए माहौल खराब करने का प्रयास है."

ग्रामीणों का आरोप है कि इस मुद्दे के जरिए हिंदू-मुसलमानों को बांटने की राजनीति की जा रही है. बीबीसी के इस सवाल पर विधायक राजेंद्र भाम्बू कहते हैं, "नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. हमारे ज़िले में सौहार्दपूर्ण माहौल है. पहले जो भाईचारा था, वह आज भी कायम है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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