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गूगल पर 2274 करोड़ का जुर्माना, क्या मोदी सरकार वसूल पाएगी
- Author, आलोक जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
- प्रकाशित
भारत में स्वस्थ व्यापार प्रतिस्पर्धा या हेल्दी कॉम्पिटिशन सुनिश्चित करने के लिए बनी संस्था कॉम्पिटिशन कमिशन ऑफ़ इंडिया सीसीआई ने गूगल पर जुर्माना लगाया है.
जुर्माना भी एक बार नहीं, एक ही हफ़्ते में दो बार लगा दिया. कुल मिलाकर 2274 करोड़ रुपए का जुर्माना लगा है गूगल पर.
20 अक्टूबर को सीसीआई ने गूगल पर 1337.76 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था.
इल्ज़ाम था एंड्रॉयड मोबाइल उपकरणों के कारोबार में अपने दबदबे का ग़लत फ़ायदा उठाना.
और फिर 25 अक्टूबर को इसी आयोग ने उस पर 936.44 करोड़ रुपए का नया जुर्माना जड़ दिया.
इस बार वजह थी गूगल प्ले स्टोर पर भुगतान लेने से जुड़ी गूगल की पॉलिसी.
सीसीआई इन दोनों मामलों की जांच 2019 और 2020 से अलग-अलग कर रही थी.
2274 करोड़ रुपए या लगभग 28 करोड़ डॉलर का यह जुर्माना ऊंट के मुंह में ज़ीरा ही लगेगा अगर आप देखें कि गूगल की सालाना कमाई पिछले साल 257 अरब डॉलर यानी क़रीब 21 लाख करोड़ रुपए रही है.
लेकिन फिर भी गूगल के लिए यह जुर्माना परेशानी का सबब बन सकता है.
आख़िर क्यों?
यह समझने की कोशिश करने के पहले समझना ज़रूरी है कि गूगल आख़िर है क्या.
किसी भी सवाल का जवाब चाहिए, या कोई भी नाम टाइप करके कुछ भी खोजना हो, किसी की जन्मपत्री तलाशनी हो या फिर इतिहास खंगालना हो.
आज की तारीख़ में इन सभी कामों के लिए सबसे भरोसेमंद रास्ता है गूगल.
लेकिन गूगल अब सिर्फ़ एक सर्च इंजन, एक इंटरनेट ब्राउज़र, एक मेल सर्विस या ऐसी कोई भी एक सर्विस नहीं रह गया है.
गूगल इस वक़्त एक सहस्त्रबाहु की तरह है जिसने हमारी आपकी ज़िंदगी को चारों ओर से घेर रखा है और दुनिया भर की सरकारें तक अब गूगल से मुक़ाबले में ख़ुद को मुश्किल में पा रही हैं.
गूगल ऐसी अकेली कंपनी नहीं है. मेटा यानी फ़ेसबुक चलानेवाली कंपनी, एमेज़ॉन और नेटफ़्लिक्स जैसी कंपनियां भी हैं, जिन्हें बिग टेक कहा जाता है.
बिग टेक कंपनियों के बेलगाम होने का ख़तरा
यानी भीमकाय टेक्नॉलजी कंपनियां. इनका आकार, इनके संसाधन और इनके हाथों में जिस टेक्नॉलजी की लगाम है, उसके बेलगाम हो जाने का ख़तरा अब लगभग पूरी दुनिया की सरकारें ख़ूब समझने लगी हैं.
इसीलिए समय-समय पर इन पर अंकुश लगाने की कोशिशें सुर्ख़ियां बटोरती दिखती हैं.
भारत में इस तरह के फ़ैसले शायद पहली बार आए हैं लेकिन एंड्रॉयड फ़ोन या एंड्रॉयड पर चलनेवाला कोई भी डिवाइस इस्तेमाल करनेवाले जानते हैं कि आप डिवाइस किसी भी कंपनी या ब्रैंड का ख़रीदें उसे चलानेवाला ऑपरेटिंग सिस्टम गूगल का ही होता है.
अपने ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ-साथ गूगल अपने कई ऐप भी फ़ोन में इंस्टॉल कर देता है.
ओएस हमेशा गूगल का ही होगा
सीसीआई ने अपनी छानबीन में पाया कि गूगल का ऑपरेटिंग सिस्टम लेने के साथ ही मोबाइल बनानेवाली कंपनी पर पाबंदी हो जाती है कि वो गूगल का एप स्टोर यानी प्ले स्टोर, गूगल मैप्स और जीमेल जैसी वेब सेवाएं, उसी का ब्राउज़र क्रोम और उसी के वेब वीडियो होस्टिंग प्लेटफ़ॉर्म यू ट्यूब को भी फ़ोन पर साथ-साथ ही इंस्टॉल कर दें.
सिर्फ़ यही नहीं, यह इंतज़ाम भी करना होता है कि फ़ोन ख़रीदनेवाला बिना इन सर्विसेज़ को अपनी लोकेशन और बाकी ज़रूरी जानकारी दिए बिना फ़ोन चालू भी नहीं कर पाता.
और उसके पास बाद में भी इन ऐप्स और सेवाओं को अनइंस्टॉल करने का विकल्प नहीं रहता है.
भारत में लगभग साठ करोड़ लोग स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करते हैं जिनमें से क़रीब 95 फ़ीसद एंड्रॉयड फ़ोन ही हैं.
गूगल पर बेजा फ़ायदा उठाने का आरोप
दिखने में यह बात मामूली लगती है लेकिन सीसीआई ने पाया कि यहां गूगल बाज़ार पर अपनी पकड़ का बेजा फ़ायदा उठा रहा है.
इसके साथ ही उसके इस तरह के व्यवहार से इस तरह के ऐप्स और सेवाएं बनाने और चलानेवाले दूसरे लोगों के लिए कारोबार करना मुश्किल हो गया है.
सीसीआई ने न सिर्फ़ गूगल पर जुर्माना लगाया बल्कि उसे यह इंतज़ाम करने का निर्देश भी दिया है कि दूसरे ऐप डेवेलपर्स के रास्ते की अड़चनें तुरंत ख़त्म की जाएं और फ़ोन ख़रीदने वालों के लिए भी यह रास्ता खोला जाए कि वो चाहें तो गूगल के ऐप्स और सेवाओं को अपने फ़ोन से हटा सकें.
दूसरा मामला उन लोगों से जुड़ा है, जिन्होंने एंड्रॉयड पर इस्तेमाल होनेवाला कोई ऐप बनाया है और उसे वो गूगल प्ले स्टोर के ज़रिए ग्राहकों तक पहुंचाना चाहते हैं.
यहाँ फिर गूगल ने एक नई शर्त लगा दी.
उसने कहा है कि ऐसे किसी भी ऐप के लिए ज़रूरी होगा कि वो ग्राहकों से पैसे लेने के लिए सिर्फ़ गूगल प्ले बिलिंग सर्विस का इस्तेमाल करे.
यह गूगल की अपनी पेमेंट सर्विस है और ज़ाहिर है कि इसके इस्तेमाल के लिए फ़ीस या कमिशन भी भरना पड़ता है.
यह शर्त सिर्फ़ ऐप के शुरुआती भुगतान के लिए ही नहीं बल्कि उसके इस्तेमाल के दौरान होनेवाले किसी भुगतान यानी इन ऐप पेमेंट के लिए भी ज़रूरी कर दी गई थी.
सीसीआई ने इस मामले में भी गूगल को अपनी हैसियत का बेजा फ़ायदा उठाने का दोषी माना और जुर्माने के साथ-साथ उसे आगे से थर्ड पार्टी पेमेंट सर्विसेज़ के इस्तेमाल की भी इजाज़त देने को कहा है.
इसके बाद गूगल की तरफ़ से जारी एक बयान में कहा गया है कि गूगल और एंड्रॉयड के ज़रिए जो टेक्नोलॉजी, सिक्योरिटी और ग्राहकों की सुरक्षा मिली है और जितने सारे विकल्प और आसान रास्ते खुले हैं, उनका भारतीय डेवेलपरों को बहुत फ़ायदा मिला है.
भारत की डिजिटल क्रांति में योगदान दिया: गूगल
यही नहीं, उनका कहना है कि क़ीमतें कम रखकर उन्होंने भारत की डिजिटल क्रांति में योगदान किया है और लाखों भारतीय उपभोक्ताओं तक इसका लाभ पहुंचाया है.
लेकिन साथ ही गूगल की तरफ़ से यह भी कहा जा रहा है कि वो इन आदेशों का अध्ययन करके आगे का रास्ता तय करेंगे.
सीसीआई की तरफ़ से गूगल को अपना पक्ष रखने और दस्तावेज़ी सबूत वग़ैरह दिखाने के लिए तीस दिन का वक़्त मिला है. उसके पास ऊपरी अदालत में अपील का रास्ता भी खुला है.
गूगल पर भारत के बाहर भी इस तरह के मामलों में जुर्माना लग चुका है.
भारत के बाहर भी गूगल पर कई आरोप
दक्षिण कोरिया ने भी गूगल प्ले स्टोर को निर्देश दिया था कि वो थर्ड पार्टी पेमेंट का रास्ता खोले और साथ ही क़रीब 18 करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया था.
आख़िरकार कंपनी ने सरकार की बात मान ली.
उधर यूरोपीय संघ में तो एंटीट्रस्ट कमिशन ने 2018 में गूगल पर 434 करोड़ यूरो का जुर्माना लगाया था.
गूगल ने इसके ख़िलाफ़ अपील की थी लेकिन वहाँ भी पिछले महीने उसकी अर्ज़ी नामंज़ूर हो गई है.
भारत में गूगल के सामने अब राह मुश्किल हो गई है.
आज नहीं तो कल वो इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेगा ही.
हालांकि जुर्माने की रक़म उसके लिए ख़ास चिंता का कारण नहीं है.
लेकिन अगर वो सीसीआई के फ़ैसले को यूं ही मान लेता है तो इसका अर्थ यह होगा कि उसने बाज़ार में अपने दबदबे का ग़लत इस्तेमाल करने का आरोप भी स्वीकार कर लिया.
ऐसा करना उसके लिए बेहद ख़तरनाक हो सकता है क्योंकि किसी भी एक देश में यह मान लेने से दुनिया के दूसरे हिस्सों में चल रहे ऐसे ही मुक़दमों में उसकी स्थिति कमज़ोर हो जाएगी.
यही वजह है कि वो सारे क़ानूनी रास्ते आज़माने और सभी स्तर पर अदालती लड़ाई हारने के बाद ही पटरी पर आता दिखेगा.
लेकिन दूसरी तरफ़ यह मांग भी ज़ोर पकड़ रही है कि उस पर जुर्माना लगाने के लिए जो फ़ॉर्मूला इस्तेमाल किया गया है उस पर पुनर्विचार हो और ऐसा फ़ॉर्मूला इस्तेमाल किया जाए ताकि जुर्माना भी इन बड़ी कंपनियों को सज़ा की तरह लगे.
अधिक जुर्माने की मांग
अभी इस काम के लिए रिलेवेंट टर्नओवर का इस्तेमाल होता है, यानी उनके भारतीय कारोबार से होने वाली कमाई का एक हिस्सा ही जुर्माने के तौर पर वसूला जाता है.
इसी वजह से भारत में जो जुर्माना लगा है वो उसकी वैश्विक आय के मुक़ाबले बहुत कम दिख रहा है.
लेकिन क़ानून बिरादरी का कहना है कि भारत अब ऐसी कंपनियों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार बन चुका है और इससे होने वाली कमाई कहीं ज़्यादा है.
इसीलिए उनकी मांग है कि इन कंपनियों पर जुर्माना लगाने के लिए उनकी पूरी दुनिया की कमाई को पैमाना बनाना चाहिए न कि सिर्फ़ भारत की.
तभी इनके भीतर क़ानून का डर पैदा होगा.
यूरोपीय संघ जुर्माने की रक़म तय करने के लिए यही पैमाना मानता है.
अगर यह मामला आगे बढ़ा तो फिर गूगल के लिए ही नहीं, अनेक बिग टेक कंपनियों के लिए मुसीबतें बढ़ सकती हैं.
लेकिन अगर इस डर से ही सही, इन्होंने अपने कारोबारी तौर तरीक़े सुधारे तो फिर यह भारत और बाक़ी दुनिया के उपभोक्ताओं के लिए भी बड़ी ख़ुशख़बरी होगी.
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