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भोपाल में बिना बताए लोगों पर कोरोना वैक्सीन का ट्रायल करने का मामला
- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, भोपाल से
- प्रकाशित
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक निजी अस्पताल पीपल्स हॉस्पिटल पर आरोप हैं कि उसने कोरोना वैक्सीन के ट्रायल के दौरान गैस पीड़ितों को अंधेरे में रखकर उन पर कोरोना की वैक्सीन का ट्रायल कर दिया.
इस मामले ने तूल तब पकड़ा जब कुछ गैस पीड़ित सामने आये और उन्होंने कहा कि उन्हें पूरी जानकारी दिये बग़ैर ही उन पर कोरोना वैक्सीन का ट्रायल कर दिया गया.
शहर के छोला रोड पर रहने वाले 37 साल के जितेंद्र नरवरिया उन्हीं में से एक हैं. जितेंद्र को मंगलवार को पीपल्स हॉस्पिटल में ही भर्ती किया गया.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "जब में अस्पताल में गया था तब तक मुझे नहीं मालूम था कि वहां पर टीका लगाया जा रहा है. मैंने उनसे पूछा भी कि इसको लगाने से कोई साइड इफ़ैक्ट तो नहीं होगा तो उन्होंने कहा कि नहीं कोई परेशानी नहीं होगी बल्कि जो पुरानी बीमारी है वो पूरी तरह से ठीक हो जायेगी."
लेकिन, जितेंद्र नरवरिया ने बताया कि जब उन्हें टीका लग गया तो उन्हें पीलिया हो गया और उसके बाद सर्दी, ज़ुक़ाम और बढ़ गया.
जितेंद्र नरवरिया अब पीपल्स अस्पताल में भर्ती हैं जहां पर अस्पताल प्रबंधन उनका इलाज कर रहा है.
अस्पताल प्रबंधन पर आरोप लग रहे हैं कि वैक्सीन लगने के बाद जब लोगों को दिक्क़तें आयीं तो उन्होंने मुफ़्त में इलाज करने के बजाय उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया. हालांकि, अस्पताल ने ऐसे किसी भी आरोप से इनकार किया है.
कुछ इसी तरह हरि सिंह के साथ भी हुआ. शंकर नगर में रहने वाले हरि सिंह को भी पीपल्स हॉस्पिटल के प्रबंधन ने भरोसा दिलाया कि उन्हें कुछ नहीं होगा बल्कि टीका लगने से उनकी दूसरी बीमारियां ठीक हो जायेंगी. इसके बाद उन्हें टीका लगा दिया गया.
क़रीब 700 लोगों पर किया ट्रायल
आरोप है कि गैस पीड़ित बस्तियों में रहने वाले लगभग 700 लोगों को कोविड वैक्सीन ट्रायल में टीके लगाये गये. इन लोगों को अस्पताल प्रबंधन ने क्षेत्र में गाड़ी भेजकर वैक्सीन ट्रायल का हिस्सा बनाया.
गैस पीड़ितों के बीच काम करने वालीं भोपाल ग्रुप फ़ॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा ने आरोप लगाया है कि इन पीड़ितों के साथ जो किया गया है वो पूरी तरह से वैक्सीन ट्रायल के नियमों का उल्लंघन है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "इन लोगों को गाड़ी में भरकर ले जाया गया और बग़ैर जानकारी दिए इन पर वैक्सीन का ट्रायल कर दिया गया. इसके एवज़ में इन लोगों को 750 रुपये दिये गये. ट्रायल के बाद आने वाली परेशानियों पर भी अस्पताल प्रबंधन ने कुछ नहीं किया बल्कि इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया गया."
उन्होंने कहा, "ये लोगों के अधिकारों का हनन है क्योंकि उनकी सहमति नहीं ली गई है. इसमें बहुत सारे गैस पीड़ित और भूजल पीड़ित इलाक़ों के लोग शामिल हैं. ये वो ग़रीब बस्तियां हैं जो पीपल्स अस्पताल के पास है."
क़ानून कहता है कि जो लोग ग़रीब हैं और पढ़-लिख नहीं सकते उनसे आपको केवल हस्ताक्षर नहीं करवाना है बल्कि उन्हें बताना है कि अध्ययन के क्या फ़ायदे और नुक़सान हैं. यह भी बताना है कि वे एक ट्रायल का हिस्सा हैं.
रचना ढींगरा कहती हैं, "लेकिन यहां पर ऐसा कुछ भी नहीं किया गया बल्कि गाड़ियां आयीं और घोषणा कर दी कि कोरोना से बचाव का इंजेक्शन लग रहा है और साथ में 750 रुपये मिलेंगे. अगर बाद में लगायेंगे तो आपको पैसे देने पड़ेंगे. किसी को भी सूचित सहमति की कॉपी नहीं दी गई जो कि इसका अनिवार्य हिस्सा है."
अस्पताल का आरोपों से इनकार
लेकिन, अस्पताल प्रबंधन ने कहा है कि लोगों की सहमति के बग़ैर कोई ट्रायल नहीं किया गया है.
पीपल्स यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर राजेश कपूर ने कहा कि वैक्सीन का ट्रायल पूरी तरह से नियमों के तहत किया गया है. यह आरोप सरासर ग़लत हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "पहला प्रोसेस यह होता है कि हम कम से कम आधा घंटा काउंसलिंग करते हैं. ट्रायल में शामिल व्यक्ति को बताते हैं कि यह वैक्सीनेशन नहीं है बल्कि ट्रायल है. उसके बाद वो व्यक्ति सहमति पत्र भरता है. वो सहमति पत्र दोनों बार भरता है. पहली बार भी और दूसरी बार भी."
राजेश कपूर ने कहा, "हम पर आरोप लग रहा है कि हम सहमति पत्र और अन्य दस्तावेज़ नहीं दिखा रहे हैं. लेकिन भारत सरकार के जो नियम हैं उसके तहत सहमति पत्र अस्पताल में जमा रहते हैं और गोपनीय होते हैं. उन्हें न तो शेयर किया जा सकता है और न ही किसी सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर डाला जा सकता है."
अस्पताल प्रबंधन का यह भी कहना है कि वैक्सीन ट्रायल के लिये जो भी नियम है उनका पूरी तरह से पालन किया गया है.
प्रबंधन ने यह भी कहा कि अस्पताल के क़रीब रहने वाले लोगों को ट्रायल में प्राथमिकता दी गई इसलिये इन बस्तियों के लोग ट्रायल में ज़्यादा दिख रहे हैं.
भोपाल के पीपल्स मेडिकल कॉलेज में पिछले महीने कोरोना वायरस की वैक्सीन 'कोवैक्सिन' का ट्रायल शुरू हुआ था. इस वैक्सीन ट्रायल में ज़्यादा लोगों ने रुचि नहीं दिखाई थी. शुरुआत में वैक्सीन लगवाने वालों में किसान, शिक्षक और डॉक्टर थे.
जिन वॉलेंटियर्स ने ट्रायल में भाग लेने की पहले सहमती दी थी उनमें से ज़्यादातर बाद में टीका लगवाने के लिये तैयार नहीं हुए.
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