You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड कर रहा है 'स्टैंड विद पीटीआई'
समाचार एजेंसी प्रेस ट्र्स्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई) में प्रकाशित एक इंटरव्यू और इससे जुड़े प्रसार भारती के पत्र को लेकर भारतीय सोशल मीडिया पर रविवार को चर्चा गर्म है.
सोशल मीडिया पर #StandwithPTI (स्टैंड विद पीटीआई यानी पीटीआई का साथ दें) ट्रेंड कर रहा है.
प्रेस एसोसिएशन और ऑल इंडिया वुमेंस प्रेस कोर (आइडब्ल्यूपीसी) ने प्रसार भारती के रवैए पर चिंता प्रकट की है और कहा है कि पीटीआई अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारी निभा रही है.
दोनों मीडिया संगठनों की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह विडंबना ही है कि इमरजेंसी की 45वीं बरसी के घंटों के भीतर पीटीआई जैसी संस्था को निशाना बनाया जा रहा है.
बयान में कहा गया है कि "ऐसा लगता है कि प्रशासन इस बात को समझ पाने में नाकाम रहा है कि स्वतंत्र, वस्तुपरक और निष्पक्ष मीडिया लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है."
इससे पहले प्रसार भारती ने समाचार एजेंसी पीटीआई को चेतावनी दी थी कि वो उसकी सेवाएँ लेना बंद कर सकता है क्योंकि प्रसार भारती के मुताबिक़ समाचार एजेंसी "राष्ट्रीय हितों के अनुरूप काम नहीं कर रही है".
पिछले दिनों समाचार एजेंसी पीटीआई ने लद्दाख में भारत-चीन के बीच चल रहे तनाव के सिलसिले में भारत में चीनी राजदूत का इंटरव्यू किया था. इस इंटरव्यू को प्रसार भारती ने "राष्ट्रहित के खिलाफ़" बताया था.
प्रसार भारती ने शनिवार को एक पत्र भेजकर कहा था कि पीटीआई की न्यूज़ रिपोर्टिंग राष्ट्र हित में नहीं है. पत्र में कहा गया था, "पीटीआई के संचालन को लेकर संपूर्णता में चीज़ों को देखा जा रहा है.
प्रसार भारती पीटीआई से अपने संबंधों को आगे भी जारी रखने को लेकर समीक्षा कर रहा है. इस संदर्भ में जल्द ही फ़ैसले से अवगत करा दिया जाएगा."
पूरा विवाद भारत और चीन में सीमा पर तनाव को लेकर उपजा है. 15 जून को दोनों देशों की सेना में हिंसक झड़प हुई थी और इसमें भारत के 20 जवानों की मौत हो गई थी.
सोशल मीडिया और देश में मीडिया के हलकों में इस विवाद को लेकर चर्ची चल रही है.
द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता ने लिखा, "पीटीआई धारा 8 के तहत बनी एक क़ानूनी तौर पर गै़र-लाभकारी कंपनी है. देश के प्रमुख समाचार पत्र समूह इसके शेयरधारक हैं. वो अपने मालिकों और सीईओ के ज़रिए बोर्ड में प्रतिनिधित्व करते हैं. साथ ही यहां कम से कम तीन स्वतंत्र निदेशक हैं. अगर पीटीआई को चरित्र बदलने के लिए मजबूर किया गया तो यह दुखद होगा."
द हिंदू की नेशनल एडिटर सुहासिनी हैदर ने ट्वीट में कहा, "अगर दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार सत्ता हथिया रही है."
एक और ट्वीट में सुहासिनी हैदर ने कहा, "पीटीआई की हालिया कवरेज को राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय अखंडता के ख़िलाफ़ बताकर प्रशासन स्वतंत्र, निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ मीडिया, जो लोकतंत्र का अहम अंग है, उसकी प्रशंसा करने में नाकाम रहा है."
पत्रकार माया मीरचंदानी ने लिखा, "पीटीआई को राष्ट्र विरोधी कह कर प्रशासन ये समझने में नाकाम रहा है कि किसी गणतंत्र में स्वतंत्र, वस्तुपरक और निष्पक्ष मीडिया बेहद ज़रूरी होता है. फ्री प्रेस हमारे देश के संविधान का और आईडिया ऑफ़ इंडिया का अभिन्न हिस्सा है."
पत्रकार जेपी राजन ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा कि "पत्रकारों को अपना काम करने दें."
जागृति चंद्रा ने लिखा, "मैंने दो साल पीटीआई के साथ काम किया. मैंने जाना कि विश्वसनीय पत्रकारिता का अर्थ क्या होता है. मैंने यही जाना कि यह बात मायने नहीं रखता कि आप कहानी सरकार के समर्थन में कोई कहानी लिख रहे हैं या फिर विरोध में, बस आपकी सोर्सिंग उचित होनी चाहिए."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)