कोरोना वायरस की जंग में भारत का हर मॉडल नाकाम क्यों हो रहा?

    • Author, विकास पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

भारत कोरोना वायरस से लड़ाई में जुटा हुआ है. लेकिन, देश में कुछ 'सफल मॉडलों' का जश्न मनाया गया है और इन्हें पूरे देश में लागू करने की बातें की गई हैं. लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस तरह के हड़बड़ी में जश्न मनाने से आगे चलकर हालात ख़तरनाक हो सकते हैं.

उत्तर प्रदेश का आगरा पूरी दुनिया में ताजमहल के लिए मशहूर है. लेकिन, आगरा भारत के उन चुनिंदा शहरों में रहा जहां कोरोना वायरस महामारी का पहला पॉजिटिव केस मार्च की शुरुआत में ही सामने आ गया था.

आगरा मॉडल के चर्चे

पूरे मार्च भर यहां कोरोना के मामले सामने आते रहे, लेकिन संक्रमण फैलने की रफ़्तार में कमी ज़रूर आई. यहीं से कोरोना के ख़िलाफ़ जंग में 'आगरा मॉडल' का जन्म हुआ.

यह सोशल मीडिया पर हैशटैग के तौर पर ट्रेंड करने लगा. केंद्र सरकार ने भी इसकी जमकर तारीफ़ की और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस सफलता का क्रेडिट दिया जाने लगा.

लेकिन, चंद दिनों में ही चीज़ें बदलने लगीं. अप्रैल शुरू होने के साथ ही कोरोना संक्रमितों के मामले तेज़ी से दोगुने होने लगे और शुरुआती सफलता धराशायी हो गई. यह मॉडल बड़े तौर पर प्रभावित इलाक़ों को सख्ती को बंद करने और कोरोना के संदिग्धों को आइसोलेट करने पर टिका हुआ था. लेकिन, वायरस नए इलाक़ों में फैल गया. ऐसे में सरकार को दूसरे विकल्पों के बारे में सोचना पड़ा जिनमें आक्रामक रूप से टेस्टिंग करना भी शामिल था.

आगरा में अब 600 से ज़्यादा मामले हैं जो कि राज्य में किसी भी ज़िले से ज़्यादा हैं. इसके साथ ही बहुप्रचारित आगरा मॉडल भी ख़बरों से ग़ायब हो गया.

जश्न की जल्दबाजी में सावधानी हटना ख़तरनाक

प्रमुख वायरोलॉजिस्ट डॉक्टर शाहिद जमील कहते हैं कि इससे साबित होता है शुरुआती जश्न में बड़े रिस्क शामिल होते हैं.

वह कहते हैं, "जश्न की हड़बड़ी में लोग सावधानी में ढील देने लगते हैं और यह काफ़ी ख़तरनाक साबित हो सकता है."

डॉक्टर जमील जैसे कई एक्सपर्ट इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इस नोवल कोरोना वायरस के बारे में अभी बेहद कम जानकारी है. इसके बारे में पता ही पिछले साल के आख़िर में चला है. इसका मतलब यह है कि वैज्ञानिकों को इसके बारे में अध्ययन करने का पर्याप्त वक़्त ही नहीं मिला है.

वो कहते हैं, "यही चीज़ कोविड-19 को बेहद ख़तरनाक बनाती है." मिसाल के तौर पर, यह खोज कि प्रभावित लोगों के थूक में यह वायरस 30 दिन तक पाया जा सकता है.

वह बताते हैं, "ऐसे में आप अपने मरीज़ों का सफलतापूर्वक इलाज करने मात्र से यह जंग जीती हुई नहीं मान सकते हैं. आपको और ज़्यादा सतर्क रहना होगा और यही एकमात्र विकल्प है."

आगरा में अधिकारियों ने कंटेनमेंट ज़ोन्स तय करने में कोई देरी नहीं की और उन्होंने आक्रामक तरीक़े से कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग भी की.

डॉक्टर जमील कहते हैं, "लेकिन, इसका मतलब यह नहीं था कि हम जश्न मनाना शुरू कर देते क्योंकि इससे अधिकारियों के किए गए पूरे काम पर पानी फिरने का ख़तरा था."

हर जगह एक ही मॉडल की कामयाबी मुमकिन नहीं

इस तरह के मॉडलों का जश्न मनाने में एक और दिक्क़त यह है कि दूसरे राज्य और ज़िले भी इन्हें अपनाना शुरू कर देते हैं.

महामारी विज्ञान से जुड़े हुए ललित कांत इस तरह की प्रैक्टिस से आगाह करते हैं.

वो कहते हैं, "इस तरह के मॉडल्स अपने-अपने इलाक़ों पर आधारित हैं और इन्हें दूसरी जगहों पर ज्यों का त्यों लागू नहीं किया जा सकता. निश्चित तौर पर हमें अलग-अलग मॉडलों से सीखने की कोशिश ज़रूर करनी चाहिए."

केरल का उदाहरण लेते हैं. केरल सालों से अपने हेल्थकेयर नेटवर्क पर भारी निवेश कर रहा है. जब राज्य में कोरोना वायरस ने दस्तक दी तो वह इससे लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार था.

अधिकारियों ने मरीज़ों को पहचाना, उन्हें आइसोलेट किया और उनका इलाज किया. केरल ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए टेक्नोलॉजी का भी इस्तेमाल किया और साथ ही तेज़ी से हॉटस्पॉट्स की पहचान की ताकि वायरस को फैलने से रोका जा सके.

लेकिन, क्या इससे केरल एक सफल मॉडल बन जाता है?

एर्णाकुलम ज़िले में कोविड-19 के इलाज के लिए नोडल अफ़सर डॉ. फतेहउद्दीन किसी भी जगह के मॉडल को सफल मॉडल कहना ग़लत मानते हैं.

वो कहते हैं, "हमने केरल के कुछ इलाक़ों में फिर से मामले आते देखे हैं. कुछ ऐसे भी मामले हैं जहां हम संक्रमण का ज़रिया भी नहीं जान पाए हैं."

वो कहते हैं कि इस वायरस के साथ चीज़ें इतनी तेज़ी से बदल रही हैं कि कोई भी आराम करने का जोखिम नहीं ले सकता है.

वो कहते हैं, "अगर आप इस तरह के मॉडल्स पर जश्न मनाते हैं तो आपको मरने वाले लोगों को जवाब देना पड़ेगा."

कई फैक्टर्स पर गौर करने के बाद ही तय हो रेस्पॉन्स

डॉक्टर फ़तेहउद्दीन कहते हैं कि इस तरह के मॉडल्स का अध्ययन वैज्ञानिकों को करना चाहिए, लेकिन उनके पास ऐसा करने के लिए वक़्त नहीं है.

वो कहते हैं कि समस्या तब शुरू होती है जब राजनेता बिना किसी वैज्ञानिक मंजूरी के सफलता का ऐलान करने लगते हैं.

उन्होंने कहा, "राजनेता अक्सर यह नहीं समझ पाते हैं कि केरल में जो चीज़ काम कर रही है वह मुंबई के धारावी जैसे घने बसे इलाक़े में काम नहीं करेगी."

इसकी बजाय डॉक्टर कांत मानते हैं कि इनमें से ज़्यादातर मॉडल्स लोगों को बाहर निकलने से रोकने पर भरोसा करते हैं. लेकिन ये अभी भी वायरस को रोकने में नाकाम रहे हैं.

वह कहते हैं, "ऐसे में इस अंतर को समझना होगा. लोगों के व्यवहार, आबादी की डेंसिटी, ट्रैवल हिस्ट्री और हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सभी फैक्टर्स पर नज़र डाली जानी चाहिए. ऐसे में मॉडल्स को तैयार किया जा सकता है, इन्हें अपनाया नहीं जा सकता."

पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट अनंत भान इस बात से सहमत हैं. वह मानते हैं कि हर राज्य और यहां तक कि हर ज़िले को अपने ख़ुद के रेस्पॉन्स का आकलन करना चाहिए.

वह कहते हैं, "भारत जैसे बड़े और विविधता वाले देश में कोई एक मॉडल काम नहीं कर सकता है."

भान कहते हैं कि मॉडल्स की इस तरह की सफलता पर हो-हल्ला खड़ा करना फ्रंटलाइन वर्कर्स को भी जोखिम में डालता है.

इसी वजह से आपको पॉजिटिव मामलों को मानने और ऐसी जगहों से सीखने की कोशिश करनी चाहिए जहां चीजें ठीक हो रही हैं, लेकिन किसी भी सूरत में जश्न नहीं मनाना चाहिए.

भीलवाड़ा में जो सफल हुआ, वही जयपुर में नहीं चला

राजस्थान एक ऐसा राज्य है जो साबित करता है कि केवल एक मॉडल को दो जगहों पर लागू नहीं किया जा सकता है.

राज्य सरकार भीलवाड़ा में वायरस को फैलने से रोकने में सफल रही, लेकिन राज्य की राजधानी जयपुर में ऐसा करने में मुश्किलें आ रही हैं.

कुछ ग्लोबल मॉडल्स की भी कामयाबी का जश्न मनाया जा रहा है और सिंगापुर उनमें से एक है.

पूरी दुनिया में सिंगापुर के वायरस को रोकने की फैल गई. हर जगह से बधाई दी जाने लगी. लेकिन, सिंगापुर में वायरस की दूसरी लहर आ गई और अब उसे लॉकडाउन का ऐलान करना पड़ा है.

सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ नोवेना हॉस्पिटल के संक्रामक बीमारियों के एक्सपर्ट डॉ. लियोंग हो नाम ने कहा कि सिंगापुर ने सोशल डिस्टेंसिंग जैसे उपायों में अच्छा काम किया है.

वह कहते हैं, "लेकिन, यह वायरस तेजी से दाखिल होता है. इसके आने का जोखिम हमेशा बना हुआ है और वापसी भी करता है."

वह कहते हैं कि शॉर्टकट्स या जश्न मनाने से बाद में आपको बड़ी मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं. वह कहते हैं, "केवल एक सुपर-स्प्रेडर ही आपकी सफलता को खत्म कर सकता है और दुनिया का कोई देश ऐसा जोखिम उठाने की हालत में नहीं है."

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