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कोरोना वायरस: झारखंड लौटे मज़दूरों ने की खुद किराया चुकाने की बात
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, राँची से बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में यात्रा करने वाले मज़दूरों को अपनी जेब से टिकट के पैसे का भुगतान करना पड़ा है.
अपने घर लौटने वाले मज़दूरों ने बीबीसी से बातचीत में यह बात बताई है कि इनसे किराये की पूरी रक़म वसूली गई थी.अलबत्ता केरल के तिरुवनंतपुरम से झारखंड के जसीडीह पहुँची विशेष ट्रेन के इन यात्री मज़दूरों को उनके घरों तक पहुँचाने के लिए झारखंड सरकार ने बसों का इंतज़ाम किया था.
केरल से चली ऐसी दो ट्रेनें सोमवार दोपहर झारखंड पहुँची. इन ट्रेनों में सफर करने वाले मज़दूरों का कहना है कि उन्होंने अपना किराया खुद भरा.
ऐसी ही एक ट्रेन सोमवार की रात कर्नाटक के बंगलुरु से झारखंड के हटिया आई.
तिरुवनंतपुरम से जसीडीह आए मज़दूर संजीव कुमार सिंह झारखंड के साहिबगंज जिले के राजमहल इलाके के मूल निवासी हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि उन्हें टिकट के बदले 875 रुपये का भुगतान करना पड़ा. यह यात्रा नॉन एसी बोगियों में कराई गई. रास्ते में उन्हें खाने के पैकेट और पानी की बोतलें भी दी गईं थीं.
ऐसे ही एक और यात्री मिताई घोष ने बीबीसी को बताया कि स्टेशन पहुँचने के बाद रेलवे के अधिकारियों ने उनसे 875 रुपये लेकर टिकट दिया. उनका गाँव साहिबगंज जिले के उधव में है.
बीबीसी ने ऐसे कई मज़दूरों से बात की. सबने किराया देकर यात्रा करने की बात कही.कुछ ही देर बाद देवघर प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने पत्रकारों को मज़दूरों से बात करने से मना कर दिया और कोशिश की गई कि कोई मज़दूर रेल किराया के संबंध में पत्रकारों से बात नहीं कर सके.
हालाँकि, मज़दूर दिवस के मौके पर तेलंगाना के लिंगमपल्ली से झारखंड के हटिया आए मज़दूरों से किराये के पैसे नहीं लिए गए थे.
राजस्थान के कोटा से झारखंड के हटिया और धनबाद आई ट्रेनों के यात्रियों को भी पैसे नहीं देने पड़े थे. झारखंड सरकार ने दावा किया कि कोटा से आई ट्रेनों के किराये का भुगतान एडवांस में ही कर दिया गया था.
लॉकडाउन के दौरान 1 मई को लिंगमपल्ली से चली पहली ट्रेन के किराया अदायगी को लेकर कोई भी बात सार्वजनिक नहीं की गई है. हालांकि सरकार बार-बार मजदूरों से किराया नहीं लेने की बात दोहरा रही है.
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