कोरोना लॉकडाउन: राहत शिविरों में रहने के बजाय पैदल ही निकले मज़दूर

    • Author, आलोक पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

छत्तीसगढ़ में लॉकडाउन के महीने भर बाद अब दूसरे राज्यों के मज़दूरों को राहत शिविरों में रखे जाने के बजाय उन्हें पैदल उनके घरों की ओर रवाना किया जा रहा है.

हर दिन बड़ी संख्या में मज़दूर ओडिशा और महाराष्ट्र की सीमा से छत्तीसगढ़ में दाख़िल हो रहे हैं और पैदल ही अपने राज्यों के लिये रवाना हो रहे हैं. राहत शिविरों में रहने वाले मज़दूर भी अब अपने राज्यों की ओर पैदल ही निकल पड़े हैं.

हालांकि सूरजपुर ज़िले के राहत शिविर में रखे गये दूसरे राज्यों के कुछ मज़दूरों के कोरोना से संक्रमित होने की ख़बरों के बीच, राज्य के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने बीबीसी से बातचीत में स्वीकार किया कि जो मज़दूर अपने राज्य जा रहे हैं, उन्हें सरकार रोक नहीं रही है.

जय सिंह अग्रवाल ने कहा, "हम मज़दूरों को रोक नहीं रहे हैं. जो जहां जाना चाहता है, उसे जाने दे रहे हैं. कल हमने कोरबा ज़िले से कुछ मज़दूरों को झारखंड की सीमा तक पहुंचवाया भी है."

लेकिन तेज़ गर्मी और बारिश के बीच सैकड़ों मज़दूर बोरे और थैलों में अपना पूरा वजूद समेटे, अपने-अपने घरों की ओर लौटने की उम्मीद में पैदल ही चले जा रहे हैं.

इधर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि राज्य में हज़ारों की संख्या में प्रवासी मज़दूर आ रहे हैं, किसी की रास्ते में मौत हो जा रही है तो कोई नदी पार करते बह जा रहा है.

डॉ. रमन सिंह ने बीबीसी से कहा, "सीमा में प्रवेश करने वाले मज़दूरों की मेडिकल जांच और वहीं उनके रहने-खाने का प्रबंध राज्य सरकार को करना चाहिये. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. सरकार की लापरवाही का ही नतीजा है कि महाराष्ट्र से चल कर राजनांदगांव तक पहुंचे मज़दूरों को सूरजपुर ज़िले में पहुंचा दिया गया और अब उनमें से 10 लोगों के कोरोना संक्रमित होने की बात सामने आ रही है."

1300 किलोमीटर पैदल चलने का हौसला

घरों की ढलाई में मिस्त्री का काम करने वाले बंगाल के मुर्शिदाबाद के गोइरीपुर गांव के रहने वाले हलीम शेख़ अपने साथी मज़दूरों के साथ सोमवार को नागपुर से पैदल निकले और मंगलवार को छत्तीसगढ़ पहुंचे.

32 साल के हलीम कहते हैं, "तीन महीने गांव में गुज़ारने के बाद नागपुर पहुंचा ही था कि चार दिन बाद लॉकडाउन हो गया. काम-धाम सब ठप्प. कुछ दिन तो सरकार से राशन मिला. उम्मीद थी कि कोई रास्ता निकलेगा. लेकिन जब दिक़्क़त होने लगी तो हमारे पास गांव लौटने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं था."

हलीम और उनके 21 साथी, थोड़े पैसे और बड़े हौसले के साथ महाराष्ट्र के नागपुर से पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद की लगभग 1300 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करने का फ़ैसला कर के नागपुर से रवाना हो गये.

हलीम शेख़ और उनके साथियों ने बताया कि मंगलवार को जब वे छत्तीसगढ़ की सीमा में पहुंचे तो उन्हें सीमा पर उपस्थित पुलिसकर्मियों ने राजनांदगांव के राहत शिविर में खाना खिलाया. इसके बाद उन्हें वहां से रवाना कर दिया गया.

मंगलवार की दोपहर में जब रायपुर पहुंचे तो रायपुर में पुलिस ने उन्हें रोका और उन्हें एक बस में बिठा कर रायपुर के लाभांडी स्थित राहत शिविर में भेज दिया.

लाभांडी स्थित राहत शिविर का कामकाज देख रहीं मनजीत कौर बल कहती हैं, "पश्चिम बंगाल के 21 लोगों को लेकर पुलिस राहत शिविर में आई थी, जहां हमने उन्हें सूखा नाश्ता और पानी उपलब्ध कराया. इसके बाद पुलिसकर्मियों ने ही बताया कि ऊपर का आदेश है कि उन्हें ओडिशा की सीमा तक छोड़ दिया जाये."

मज़दूरों को पुलिस ने बस ड्राइवर के हवाले किया और बस वाले ने कुछ किलोमीटर दूर ले जाकर उन्हें बीच रास्ते में छोड़ दिया.

हलीम कहते हैं, "हमें ऐसी सड़क पर छोड़ दिया गया, जिसका कोई ओर-छोर ही नहीं था. कई घंटों तक चलने के बाद पता चला कि हम ग़लत रास्ते पर हैं. फिर किसी तरह हम दूसरे रास्ते पर पहुंचे."

बुधवार की शाम तक हलीम शेख़ और उनके साथ 600 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर किसी तरह झारसुगुड़ा तक पहुंचे थे.

राहत शिविर में रखना संभव नहीं

जब लॉकडाउन की घोषणा के कुछ ही दिन हुये थे और प्रवासी मज़दूरों को लेकर सवाल उठे थे, तब राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक ट्वीट कर कहा था, "छत्तीसगढ़ में रुका हुआ बाहर का प्रत्येक व्यक्ति हमारा मेहमान है. आपके खाने, रहने, दवाई इत्यादि की सारी व्यवस्था हम कर रहे हैं. परेशान होने की कोई बात नहीं है."

लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. इन शिविरों में रहने वाले लोगों को भी उनके राज्य भेजा जा रहा है और बाहर से आने वाले नये प्रवासी मज़दूरों की भी राज्य में रहने की कोई व्यवस्था नहीं की जा रही है.

रायपुर में लॉकडाउन से प्रभावित मज़दूरों के राहत शिविरों के प्रभारी गौरव सिंह ने मीडिया से बातचीत में स्वीकार किया कि बाहर से आने वाले सभी मज़दूरों को राहत शिविरों में रख पाना संभव नहीं है.

उन्होंने कहा कि इन राहत शिविरों में हम केवल छत्तीसगढ़ में रह रहे मज़दूरों को ही रख रहे हैं.

लेकिन रायपुर के खमतराई में एक फ़ैक्ट्री में काम करने वाले झारखंड के रुपेश यादव का कहना था कि लॉकडाउन के बाद काम बंद हो गया तो उन्होंने खाने के लिये कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई. जहां-जहां से जो-जो नंबर मिला, सबको फ़ोन किया.

पलामू ज़िले के बभंडी पंचायत की गहौरा गांव के रहने वाले रुपेश कहते हैं, "जब कहीं से कोई मदद नहीं मिली तो मैं अपनी तीन और आठ साल की दो बेटियों और पत्नी के साथ पैदल ही रायपुर से निकल पड़ा. बच्चे छोटे हैं, इसलिये जल्दी थक जाते थे. बीच में बच्चों पर तरस खा कर कुछ बाइक वालों ने हमें लिफ़्ट दी. अब तो याद भी नहीं है कि कितने दिन लगे. चार दिन या पांच दिन."

वो रामानुजगंज और झारखंड के गढ़वा की सीमा पर पहुंचे तो वहां मेडिकल जांच हुई और उसके बाद वे किसी तरह अब जाकर घर पहुंचे हैं.

लेकिन नागपुर से निकल कर छत्तीसगढ़ के रास्ते, पैदल झारखंड के जामताड़ा पहुंचने की कोशिश में जुटे हुये जावेद अपने साथियों के साथ अभी रास्ते में ही हैं. मंगलवार को जब हमारी जावेद से मुलाक़ात हुई तो वो रायपुर पहुंचे थे.

जामताड़ा के नारायणपुर विकासखंड के अपने गांव नूरगी पहुंचने की कोशिश में लगे हुये जावेद बुधवार की दोपहर तक ओडिशा की सीमा में पहुंच चुके थे. नागपुर से जामताड़ा की दूरी लगभग 1200 किलोमीटर है और वहां से 36 किलोमीटर दूर उनका गांव है.

थकी-थकी सी आवाज़ में उन्होंने फ़ोन पर कहा, "तीन-चार दिन में किसी तरह घर पहुंच जाऊंगा, बस और कुछ नहीं चाहिये."

अब सीमा पर रोक

छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि छत्तीसगढ़ की सीमा में किसी को भी प्रवेश की इजाज़त नहीं है. जो लोग प्रवेश कर रहे हैं, उन्हें राहत शिविरों में रखा जा रहा है.

इस बीच मंगलवार को ही राज्य सरकार ने एक आदेश जारी कर कहा कि यदि कोई व्यक्ति बिना जानकारी दिए छत्तीसगढ़ में प्रवेश करते पाया जाएगा तो उसके विरुद्ध कठोर दण्डात्मक कार्रवाई की जाएगी.

इस आदेश के अनुसार, छत्तीसगढ़ राज्य में प्रवेश के पूर्व लोगों को चेकपोस्ट में जानकारी और यात्रा विवरण दर्ज कराना होगा और यहां उनके प्रारंभिक स्वास्थ्य जांच के बाद ही राज्य में प्रवेश दिया जाएगा.

लेकिन बुधवार को भी बड़ी संख्या में हमें ऐसे लोग मिले, जो महाराष्ट्र से पैदल आ रहे थे. इन्हें न तो किसी किस्म की जांच से गुज़रना पड़ा ना ही इन्हें कहीं रोका गया.

छत्तीसगढ़ के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री जयसिंह अग्रवाल कहते हैं, "मज़दूर पैदल जा रहे हैं, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन हमारी सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि मज़दूरों को उनके राज्य की सीमा तक पहुंचा दिया जाये. उसके बाद उनके राज्य की सरकार उन्हें ले जाये."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.