You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
छत्तीसगढ़: मीसाबंदियों को पेंशन नहीं देने पर क्यों उठ रहे हैं सवाल
- Author, आलोक पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
छत्तीसगढ़ में आपातकाल के दौरान जेल गए लोगों को पिछले 12 सालों से मिलने वाली सम्मान निधि बंद किए जाने के राज्य सरकार के फ़ैसले को अदालत में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है.
राज्य सरकार ने 2008 के उस लोकनायक जयप्रकाश नारायण सम्मान निधि नियम को ही रद्द कर दिया है, जिसके तहत ये सम्मान निधि दी जाती थी.
राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि आपातकाल में जेल गए लोग कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं थे. इसलिए उन्हें दी जाने वाली पेंशन बंद करना सही है.
दूसरी ओर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने सरकार के इस फ़ैसले की आलोचना की है.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस सरकार का यह फ़ैसला लोकतंत्र की हत्या है और सरकार को इस मसले पर पुनर्विचार करते हुए अपने फ़ैसले को वापस लेना चाहिए."
सम्मान निधि
कांग्रेस पार्टी के शासन काल में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया था. भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत घोषित आपातकाल 21 मार्च 1977 तक जारी रहा.
इस दौरान देश भर में बड़ी संख्या में विपक्षी दलों और विरोधी संगठनों के लोगों को डिफ़ेंस ऑफ इंडिया रूल्स यानी डीआईआर और मेंटीनेंस ऑफ़ इंटर्नल सिक्योरिटी एक्ट यानी मीसा क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया था.
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में 2008 से ही आपातकाल के दौरान डीआईआर और मीसा क़ानून के तहत जेल भेजे गए लोगों को सम्मान निधि दी जा रही थी. इसके अलावा राजस्थान में 2014 से मीसा बंदियों को पेंशन सहित अन्य सुविधाएं मिल रही थीं.
छत्तीसगढ़ में डीआईआर और मीसा क़ानून के तहत छह महीने से कम अवधि तक जेल में रहने वाले लोगों को हर महीने 15 हज़ार रुपए और 6 महीने से अधिक समय तक जेल में रहने वाले लोगों को हर महीने 25 हज़ार रुपये की सम्मान निधि दी जा रही थी.
लेकिन तीनों ही राज्यों में दिसंबर 2018 में कांग्रेस सरकार की वापसी के बाद इस पेंशन पर रोक लगा दी गई.
सरकार ने कहा कि जिन मीसा बंदियों को पेंशन दी जा रही है, उसकी जांच की जाएगी. सरकार का तर्क था कि कई अपात्र लोगों को भी पेंशन दी जा रही है. लेकिन मामला जब हाई कोर्ट में पहुंचा तो हाई कोर्ट ने सरकार को पेंशन जारी करने के आदेश दिए.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि जब पेंशन देने का नियम है तो पेंशन दी जानी चाहिए.
सम्मान निधि का नियम रद्द
इसके बाद पिछले सप्ताह छत्तीसगढ़ सरकार ने एक आदेश जारी कर 2008 के उस नियम को ही समाप्त कर दिया, जिसके तहत ये पेंशन दी जा रही थी.
राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, "मीसाबंदी कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं क्या, जिन्हें पेंशन दिया जाना चाहिए?"
लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा के प्रवक्ता और मीसाबंदियों के संगठन लोकतंत्र सेनानी संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सच्चिदानंद उपासने का कहना है कि मीसाबंदियों की तुलना स्वतंत्रता सेनानियों से नहीं की जा सकती.
उन्होंने कहा, "मीसाबंदियों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नेतृत्व में अपनी लड़ाई लड़ी और सरकार ने हमें लोकतंत्र सेनानी माना."
उपासने आरोप लगाते हैं, "आपातकाल में जैसे इंदिरा गांधी ने अदालत के निर्णय को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था, उसी तरह भूपेश बघेल की सरकार ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के लगभग 150 मामलों में दिये गये उस फ़ैसले को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है, जिसमें मीसाबंदियों को सम्मान निधि दिये जाने का आदेश दिया गया था."
आपातकाल के दौरान कई महीनों तक जेल में रहे सच्चिदानंद उपासने का कहना है कि यह सम्मान निधि कोई पारिश्रमिक या वेतन नहीं है, यह उन लोगों की मदद है, जिनसे आपातकाल ने रोज़गार, शिक्षा जैसी सुविधायें छीन ली थीं.
उपासने ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "प्रतिशोध की भावना से लिए गए कांग्रेस सरकार के इस फ़ैसले को हम अदालत में चुनौती देने जा रहे हैं."
सरकार के साथ
हालांकि मीसाबंदियों में से कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो राज्य सरकार के इस फ़ैसले से सहमत हैं. समाजवादी नेता आनंद मिश्रा कहते हैं, "मीसाबंदियों को दिया जाने वाला पेंशन तो पहले ही बंद कर दिया जाना चाहिये था. देर से ही सही, सरकार ने एक सही फ़ैसला लिया है."
बिलासपुर के रहने वाले आनंद मिश्रा आपातकाल के दौरान 19 महीनों तक जेल में रहे.
आपातकाल के दौरान युवा जनता के अध्यक्ष रहे आनंद मिश्रा बताते हैं कि आपातकाल के बाद जब नई सरकार बनी तब भी यह बात उठी थी और हम जैसे लोगों ने विरोध किया था.
छत्तीसगढ़ में 2008 से शुरु की गई मीसाबंदियों को सम्मान निधि के नाम पर पेंशन दिये जाने की योजना का कभी लाभ नहीं लेने वाले आनंद मिश्रा कहते हैं, "आप जब देश और समाज के लिये कुछ करते हैं तो इस उम्मीद से नहीं करते कि इसके बदले आपको कोई मुआवज़ा दिया जायेगा. आपातकाल जैसी राजनीतिक लड़ाइयों में अगर कोई आर्थिक रुप से कमज़ोर हो गया तो उसकी मदद के कई तरीक़े थे, जो पहले ही किये जा चुके थे."
छत्तीसगढ़ में मीसाबंदियों को सम्मान निधि पर अब सबकी निगाहें अदालत पर लगी हुई हैं और ज़ाहिर है, अदालत का कोई भी फ़ैसला राजस्थान और मध्यप्रदेश सरकार के भी निर्णयों को प्रभावित करेगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)