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#ChristChurch: न्यूज़ीलैंड की मस्जिद पर हमले के बाद पाकिस्तान के चर्च में लगाई गई आग?
- Author, फ़ैक्ट चेक टीम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
- प्रकाशित
न्यूज़ीलैंड की मस्जिद में हुए हमले के जवाब में 'पाकिस्तान के इस्लामिक कट्टरपंथियों ने एक चर्च में आग' लगा दी है.
इस गंभीर दावे के साथ 30 सेकेंड का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है.
वीडियो में कुछ लोग चर्च के मुख्य द्वार के ऊपर चढ़े हुए दिखाई देते हैं और वीडियो का अंत होते-होते वो चर्च के धार्मिक चिह्न को तोड़कर नीचे गिरा देते हैं.
वीडियो में लोगों के चिल्लाने की आवाज़ सुनी जा सकती है और इसके एक हिस्से में चर्च की इमारत से धुआँ उठता हुआ भी दिखाई देता है.
फ़ेसबुक और ट्विटर पर अभी इस वीडियो को कम ही लोगों ने शेयर किया है, लेकिन व्हॉट्सऐप के ज़रिए बीबीसी के कई पाठकों ने हमें यह वीडियो भेजकर इसकी सत्यता जाननी चाही है.
यूके के लंदन शहर में रहने वाली एक ट्विटर यूज़र @TheaDickinson ने भी इस वीडियो को पोस्ट करते हुए यही दावा किया है.
लेकिन 'पाकिस्तान के चर्च में आग लगाए जाने' के इस दावे को अपनी पड़ताल में हमने फ़र्ज़ी पाया है. वायरल वीडियो क़रीब 6 साल पुराना है.
वीडियो पाकिस्तान का नहीं
न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों (अल नूर और लिनवुड मस्जिद) में 15 मार्च को ब्रेंटन टैरंट नाम के एक हमलावर ने गोलीबारी की थी.
इस घटना में क़रीब 50 लोगों की मौत हो गई थी और 50 से ज़्यादा लोग घायल हुए थे.
न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न मस्जिद में हुए इस हमले को 'आतंकवादी हमला' और देश के लिए 'काला दिन' बता चुकी हैं.
लेकिन जिस 30 सेकेंड के वीडियो को क्राइस्टचर्च हमले के 'बदले का वीडियो' बताया जा रहा है वो साल 2013 का वीडियो है.
रिवर्स इमेज सर्च से पता चलता है कि ये वीडियो पाकिस्तान का भी नहीं है, बल्कि मिस्र का है.
यू-ट्यूब पर 29 अगस्त 2013 को पब्लिश किये गए 6:44 सेकेंड के एक वीडियो में वायरल वीडियो का 30 सेकेंड का हिस्सा दिखाई देता है.
कॉप्टिक चर्चों पर हमला
अगस्त 2013 में मिस्र के कम से कम 25 चर्चों में ईसाई-विरोधी गुटों ने हिंसा की थी. ये वायरल वीडियो उसी समय का है.
साल 2013 में ही कॉप्टिक ऑर्थोडॉक्स चर्च को भी निशाना बनाया गया था जिसके बारे में मान्यता है कि ये पचासवीं ईस्वी के आसपास बना था और अलेक्जेंड्रिया में स्थापित ईसाई धर्म के सबसे पुराने चर्चों में से एक रहा है.
मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के तख़्ता पलट को ईसाई विरोधी हिंसा का मुख्य कारण माना जाता है.
जुलाई 2013 में सेना के मिस्र पर क़ब्ज़ा कर लेने के बाद जब जनरल अब्दुल फ़तेह अल-सीसी ने टीवी पर राष्ट्रपति मोर्सी के अपदस्थ होने की घोषणा की थी, तब पोप टावाड्रोस द्वितीय उनके साथ खड़े नज़र आए थे.
उसके बाद से ही ईसाई समुदाय के लोग कुछ इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं.
तख़्ता पलट के समय पोप ने कहा था कि जनरल सीसी ने मिस्र का जो रोडमैप (ख़ाका) दिखाया है, उसे मिस्र के उन सम्मानित लोगों द्वारा तैयार किया गया है जो मिस्र का हित चाहते हैं.
पोप के इस बयान के बाद उन्हें कई दफ़ा मारने की धमकी दी गई थी. जबकि कई ईसाइयों की हत्या कर दी गई थी और उनके घरों को निशाना बनाया गया था.
मिस्र के अधिकतर ईसाई कॉप्टिक हैं जो प्राचीन मिस्रवासियों के वंशज हैं.
मिस्र की कुल जनसंख्या में लगभग दस प्रतिशत ईसाई हैं और सदियों से सुन्नी बहुल मुसलमानों के साथ शांति से रहते आए हैं.
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