अहमदाबाद प्लेन क्रैश का एक सालः हादसे की वजह पर क्यों है इतना विवाद, क्या कहते हैं विशेषज्ञ

    • Author, थियो लेगेट
    • पदनाम, अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 15 मिनट

पिछले साल 12 जून को जब एयर इंडिया की फ़्लाइट 171 गुजरात के अहमदाबाद स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल हवाई अड्डे से टर्मिनल छोड़कर रवाना हुई, वो गर्म और सूखी दोपहर थी. लंदन की नौ घंटे तीस मिनट की यात्रा के लिए अपनी-अपनी सीटों पर 230 यात्री बैठ गए थे, जिनमें 169 भारतीय और 53 ब्रिटिश नागरिक शामिल थे. उनकी देखभाल के लिए केबिन क्रू के 10 सदस्य थे.

फ़्लाइट डेक पर थे दशकों के अनुभव वाले कैप्टन सुमीत सबरवाल थे और उनके साथ फ़र्स्ट ऑफ़िसर के तौर पर थे युवा सहयोगी क्लाइव कुंदर. टेक-ऑफ़ के सिर्फ़ 32 सेकंड बाद विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिससे प्लेन पर मौजूद सभी लोग मारे गए, सिवाय एक के. ज़मीन पर भी 19 लोग अपनी जान गंवा बैठे.

हवाई अड्डे की सीसीटीवी फ़ुटेज और सोशल मीडिया पर मौजूद एक वीडियो में विमान सामान्य तरीके से उड़ान भरता दिखाई देता है, लेकिन ऊँचाई हासिल करने के बजाय वह हवा में ठहरा हुआ सा लगता है और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर आने लगता है.

कुछ ही पलों में वह इमारतों और पेड़ों के पीछे ओझल हो जाता है. कुछ सेकंड बाद आग और काले धुएँ का विशाल गुबार उठता है और हादसे की भयावहता साफ़ हो जाती है. हालांकि फ़ुटेज से यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं होता कि दुर्घटना की असली वजह क्या थी.

इतने लोगों की मौत क्यों हुई, यह पता लगाना भारत के विमान दुर्घटना जाँच ब्यूरो (एएआईबी) का काम है, जो नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अंतर्गत आता है. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत, (जो अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संधि के अनुच्छेद 13 में तय है), जिस देश में दुर्घटना होती है वही आधिकारिक जाँच के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार होता है.

अन्य पक्ष भी, जैसे वह देश जहाँ विमान या उसके इंजन बनाए गए हों, 'मान्यता प्राप्त प्रतिनिधि' के रूप में सक्रिय भाग ले सकते हैं. एआई-171 के मामले में इसका मतलब है अमेरिकी राष्ट्रीय परिवहन सुरक्षा बोर्ड (एनटीएसबी).

एनटीएसबी ने एक प्रतिनिधिमंडल भेजा जिसमें बोइंग (जिसने विमान बनाया), जीई एयरोस्पेस (जिसने इंजन बनाए) और अमेरिकी विमानन नियामक, फ़ेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन के तकनीकी विशेषज्ञ शामिल थे.

अनुच्छेद 13 के अनुसार, "किसी दुर्घटना या घटना की जाँच का एकमात्र उद्देश्य दुर्घटनाओं या घटनाओं की रोकथाम होना चाहिए. इस गतिविधि का उद्देश्य दोष या ज़िम्मेदारी तय करना नहीं है."

फिर भी, बहुत कुछ दाँव पर लगा हुआ है.

पहले से ही वर्षों से सुरक्षा घोटालों से जूझ रहे बोइंग के लिए, यह उसके एक प्रीमियम उत्पाद की साख का सवाल है: 787 ड्रीमलाइनर, जिसका अब तक का सुरक्षा रिकॉर्ड बेदाग़ रहा है.

टाटा समूह की घाटे में चल रही एयरलाइन एयर इंडिया, अपनी ब्रांड छवि को धूमिल होते नहीं देख सकती.

वहीं, जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, वे जानना चाहते हैं कि वास्तव में हुआ क्या था.

जाँच की अंतिम रिपोर्ट अभी प्रकाशित नहीं हुई है, हालांकि आने वाले दिनों में और बातें सामने आ सकती हैं. लेकिन इसने पहले ही गहन विवाद पैदा कर दिया है, जिसने यह गहरे सवाल उजागर किए हैं कि बड़े हवाई हादसों की जाँच किस तरह की जाती है.

क्या राष्ट्रीय प्राधिकरणों पर भरोसा किया जा सकता है कि वे ऐसी जाँच निष्पक्षता से करेंगे? क्योंकि आलोचकों का कहना है कि यह धारणा है कि वे राजनीतिक दबाव और कॉर्पोरेट प्रभाव में आ सकते हैं.

जाँच पर उठी आपत्तियाँ

सैद्धांतिक तौर पर तो जाँच निष्पक्ष और जानकारी देने वाली होनी चाहिए- सीखने की एक ऐसी प्रक्रिया, जिसका मक़सद सिर्फ़ यात्रियों की सुरक्षा को बेहतर बनाना हो. लेकिन एआई-171 के मामले में अब तक सामने आई जानकारी को लेकर सुरक्षा के लिए अभियान चलाने वालों, पायलट समूहों और मृतकों के परिजनों की ओर से काम कर रहे वकील विरोध पर उतर आए हैं.

इसका एक अहम कारण था दुर्घटना के एक महीने बाद एएआईबी द्वारा जारी की गई प्रारंभिक रिपोर्ट. 15 पन्नों के इस दस्तावेज़ ने दुर्घटना के कारणों पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला और न ही कोई सिफ़ारिश की.

फिर भी, सिर्फ़ दो छोटे पैराग्राफ़ ने भारी विवाद खड़ा कर दिया.

पहला, रिपोर्ट में दर्ज था कि विमान के फ़्लाइट डेटा रिकॉर्डर के अनुसार, दो फ़्यूल कटऑफ़ स्विच- जिन्हें सामान्यतः उड़ान से पहले इंजन चालू करने और बाद में बंद करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है - टेक-ऑफ़ के कुछ सेकंड बाद ही रन से कटऑफ़ स्थिति में चले गए. इससे इंजनों को ईंधन मिलना बंद हो गया और उनका थ्रस्ट तेज़ी से घट गया.

रिपोर्ट आगे कहती है: "कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डिंग में एक पायलट दूसरे से पूछता है कि उसने कटऑफ़ क्यों किया. दूसरा पायलट जवाब देता है कि उसने ऐसा नहीं किया."

बिना ट्रांसक्रिप्ट दिए और बिना यह बताए कि कौन बोल रहा था, इस संक्षिप्त बयान ने पायलटों की कार्रवाइयों पर अटकलों की बारिश शुरू कर दी.

उदाहरण के तौर पर न्यूज़वीक ने इस "चिंताजनक संभावना: पर फ़ोकस किया कि एक अनुभवी कैप्टन ने जानबूझकर अपने विमान और लगभग 250 ज़िंदगियों को ख़त्म कर दिया".

पूर्व एनटीएसबी अध्यक्ष रॉबर्ट सुमवाल्ट ने सीबीएस न्यूज़ को बताया कि रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि "यह विमान या इंजन की समस्या नहीं थी. बल्कि…किसी ने कॉकपिट में जाकर उन इंजनों का फ़्यूल बंद कर दिया था."

कुछ दिनों बाद वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भी इसी पक्ष पर ज़ोर दिया. मामले से परिचित लोगों का हवाला देते हुए दावा किया गया कि पायलटों के बीच हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग से संकेत मिलता है कि फ़्यूल स्विच कैप्टन सुमीत सबरवाल ने ही बंद किए थे.

यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह केवल प्रारंभिक रिपोर्ट थी. कुछ ही दिनों में एएआईबी ने एक बयान जारी कर अंतरराष्ट्रीय प्रेस में 'चुनिंदा और अप्रमाणित रिपोर्टिंग' को 'ग़ैर-ज़िम्मेदाराना' बताया. उसने जनता और मीडिया से अपील की कि "आधी-अधूरी कहानियाँ फैलाने से बचें. ये जाँच प्रक्रिया की साख को कमज़ोर करने का ख़तरा पैदा करती हैं."

लेकिन कहा जा सकता है कि तब तक नुक़सान हो चुका था.

फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन पायलट्स (एफ़आईपी) के अध्यक्ष कैप्टन सी.एस. रंधावा कहते हैं, "जब पायलट ज़िंदा होता है तो वह अपना बचाव कर सकता है. जब पायलट मर जाता है, तो सारी एजेंसियाँ मिलीभगत कर सकती हैं- और वे निर्माता को बचाने के लिए पायलट पर ही दोष डाल देती हैं. और यह पहली बार नहीं है, यह पूरी दुनिया में देखा गया है."

उनका संगठन, जो लगभग 6,000 पायलटों का प्रतिनिधित्व करता है, ने प्रारंभिक रिपोर्ट को 'स्थायी रूप से पक्षपाती' करार दिया. सुमीत सबरवाल के 91 वर्षीय पिता, पुष्कर राज सबरवाल के साथ मिलकर उन्होंने अपनी चिंताएँ भारत के सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचाईं और दुर्घटना की न्यायिक जाँच की माँग की.

पूर्व ब्रिटिश विमान दुर्घटना अन्वेषक टिम एटकिंसन भी मानते हैं कि गंभीर दुर्घटनाओं में मृत पायलट को दोषी ठहराने का हमेशा एक प्रलोभन रहता है.

एटकिंसन कहते हैं, "यह सभी संबंधित पक्षों के लिए बेहद सुविधाजनक होता है. आप जानते हैं, नियामक बच गया, ऑपरेटर बच गया, निर्माता बच गया. और यही वजह है कि इसके ख़िलाफ़ इतनी मज़बूती से खड़ा होना पड़ता है."

हालाँकि, उनका व्यक्तिगत मानना है कि इस मामले में कोई और विश्वसनीय व्याख्या नहीं है - और यह दृष्टिकोण विमानन पेशेवरों में आम है.

वह कहते हैं, "मुझे बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि यह हत्या-आत्महत्या है. और अगर आप इसे ऐसे ही जाँचने निकलते हैं और इसे विमानन दुर्घटना साबित करने की कोशिश करते हैं, तो आप असफल होंगे - क्योंकि यह है ही नहीं."

फिर भी, भारत और अमेरिका के सुरक्षा अभियानकर्ता, साथ ही एफ़आईपी, ने पायलट आत्महत्या सिद्धांत (इस सिद्धांत के मुताबिक पायलट ने जानबूझकर विमान दुर्घटनाग्रस्त किया) का ज़ोरदार विरोध किया है. वे उन रिपोर्टों की ओर इशारा करते हैं जिनमें विमान में पहले से मौजूद ख़ामियों का आरोप लगाया गया है, कि दुर्घटना वास्तव में किसी गंभीर इलेक्ट्रिकल फ़ेलियर से हो सकती थी. इसके साथ ही प्रारंभिक रिपोर्ट में दर्ज घटनाक्रम की विसंगतियों को भी सबूत मानते हैं.

वीटी-एएनबी के रूप में पंजीकृत यह विमान 2014 में एयर इंडिया को सौंपा गया था. बोइंग के पूर्व वरिष्ठ प्रबंधक और व्हिसलब्लोअर एड पियर्सन अमेरिकी संस्था, फ़ाउंडेशन फ़ॉर एविएशन सेफ़्टी, का नेतृत्व करते हैं. उनके अनुसार इस विमान में अपने पूरे जीवनकाल में कई गंभीर इलेक्ट्रिकल समस्याएँ रही थीं. एयर इंडिया इसे नकारता है.

बीबीसी ने वह दस्तावेज़ देखे हैं जिनमें 2022 में विमान के मुख्य पावर पैनलों में से एक में 'जलने' की घटना दर्ज है. एयर इंडिया का कहना है कि मरम्मत 'बोइंग-स्वीकृत रखरखाव प्रक्रियाओं के अनुसार की गई' और 'विमान को तभी सेवा में लौटाया गया जब लागू होने वाली उड़ान योग्यता आवश्यकताओं (एयरवर्दिनेस रिक्वायरमेंट्स) को पूरा कर लिया गया.'

प्रारंभिक रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि विमान को उसके 'कोर नेटवर्क' में ख़ामी का पता होने के बावजूद उड़ान भरने की अनुमति दी गई थी. यह ढाँचा विमान के कंप्यूटरों और संबंधित इलेक्ट्रॉनिक्स को जोड़ता है और अक्सर इसे विमान की 'केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली' कहा जाता है.

बोइंग ने इस मामले से जुड़े सभी सवाल भारतीय एएआईबी को भेज दिए हैं.

परस्पर विरोधी सिद्धांत

सुरक्षा अभियानकर्ताओं का पेश किया गया एक अहम सिद्धांत यह है कि दुर्घटना शायद इसलिए हुई क्योंकि टेक-ऑफ़ के कुछ सेकंड बाद बड़े इलेक्ट्रिकल फ़ेलियर के कारण विमान के मुख्य फ़्लाइट कंप्यूटरों में रीबूट हो गया.

उनका कहना है कि इससे ऐसी स्थिति बनी जिसमें विमान की प्रणालियों ने कुछ क्षणों के लिए यह मान लिया कि विमान ज़मीन पर है, जबकि वह हवा में था.

इस सिद्धांत का तर्क है कि एक सुरक्षा प्रणाली ने इंजन थ्रस्ट के ख़तरनाक स्तर का पता लगाया, इसे ख़राबी समझा और ईंधन आपूर्ति बंद करने का आदेश दिया.

इस परिदृश्य में, कॉकपिट के फ़्यूल स्विच वास्तव में छुए ही नहीं गए थे - फ़्लाइट डेटा रिकॉर्डर ने संभवतः ईंधन आपूर्ति बंद करने का इलेक्ट्रॉनिक आदेश दर्ज किया, न कि स्विच की भौतिक हलचल.

भारत में तकनीकी रूप से विस्तृत लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित करने वाली खोजी पत्रकार रशेल चित्रा ने इस सिद्धांत का समर्थन किया है. वह प्रारंभिक रिपोर्ट की कई विसंगतियों की ओर इशारा करती हैं.

इनमें से एक यह है कि रिपोर्ट में बताया गया है कि ईंधन आपूर्ति बहाल होने के बाद इंजनों ने रिस्टार्ट होने की कोशिश की.

रिपोर्ट में दर्ज है, "इंजन 1 का कोर डीसलेरेशन रुका, उलटा और रिकवरी की ओर बढ़ने लगा. इंजन 2 दोबारा शुरू होने में सक्षम था लेकिन कोर स्पीड डीसलेरेशन को रोक नहीं पाया…". लेकिन चित्रा का दावा है कि इंजीनियरिंग दस्तावेज़ों से समर्थित उनके शोध से पता चलता है कि जिस गति तक विमान पहुँच चुका था, उस स्थिति में उपलब्ध ऊर्जा स्रोतों के साथ इंजनों को दोबारा शुरू करना भौतिक रूप से असंभव था.

इस बीच, पीड़ित परिवारों की ओर से काम कर रहे वकीलों ने उस क्षण पर ध्यान केंद्रित किया जब आपातकालीन ऊर्जा प्रणाली काम करने लगी.

रैम एयर टर्बाइन (आरएटी) एक छोटा प्रोपेलर है जो हवा के प्रवाह में घूमकर बिजली और हाइड्रोलिक दबाव तब प्रदान करता है जब विमान की अन्य प्रणालियाँ विफल हो जाती हैं. एआई-171 पर, सीसीटीवी फ़ुटेज दिखाता है कि आरएटी टेक-ऑफ़ के तुरंत बाद ही सक्रिय हो गया था.

प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, आरएटी ईंधन स्विच बंद होने के पाँच सेकंड के भीतर हाइड्रोलिक शक्ति प्रदान कर रहा था. हालाँकि, सिम्युलेटर परीक्षण- जिनके परिणाम बीबीसी के साथ साझा किए गए हैं- यह दर्शाते हैं कि वास्तव में इसमें 14-18 सेकंड लगते.

इसका मतलब यह हुआ कि आरएटी वास्तव में बहुत पहले सक्रिय हो गया था, संभवतः विमान ज़मीन पर रहते हुए ही, और ईंधन बंद होने से काफ़ी पहले.

माइक एंड्रयूज़, दुर्घटना के 135 पीड़ित परिवारों का प्रतिनिधित्व करने वाली बीज़ली एलन लॉ फ़र्म के वकील हैं. उनके अनुसार ये निष्कर्ष अहम सवाल उठाते हैं, जो 'पायलट आत्महत्या सिद्धांत ' की कहानी को संदेहास्पद बनाते हैं.

वह कहते हैं."आरएटी का सक्रिय होना किसी और गड़बड़ी का लक्षण है. इसके बाहर होने का मतलब है कि कुछ हुआ है… अगर यह ईंधन स्विच किए जाने के आरोप से पहले बाहर है, तो हमारा सवाल अब भी यही है: क्यों?"

"यह किसी गड़बड़ी का लक्षण है."

सुरक्षा सलाहकार और लेखक एकहार्ड जान मानते हैं कि ऐसे मामले में विवाद अपरिहार्य है.

वह कहते हैं, 'हम सुरक्षित हवाई यात्रा के आदी हो गए हैं', और अहमदाबाद में बी787 दुर्घटना का कारण पता न चलना 'दुनिया को हिला देता है'.

पूर्व अन्वेषक टिम एटकिंसन मानते हैं कि 'बेहद जटिल मल्टीपल-इलेक्ट्रिकल फ़ेलियर परिदृश्य' अवास्तविक है. उनका विश्वास है कि विमान की प्रणालियों का भौतिक ढांचा इसे होने ही नहीं देता.

उनके लिए, एआई-171 पर विवाद अंततः 'सिर्फ़ उस कठिनाई तक सिमट जाता है जो हमें हत्या और आत्महत्या पर बात करने में होती है'.

अनुच्छेद 13 के तहत, गंभीर विमान दुर्घटना की जाँच करने वालों को यदि संभव हो तो 12 महीनों के भीतर अंतिम रिपोर्ट प्रकाशित करनी होती है.

हालाँकि, यह हमेशा संभव नहीं होता. यदि अंतिम रिपोर्ट जारी नहीं की जा सकती, तो दुर्घटना की बरसी पर एक अंतरिम रिपोर्ट प्रकाशित करनी अनिवार्य है.

इसका मतलब है कि भारत का एएआईबी शुक्रवार, 12 जून तक किसी न किसी रूप में अपडेट प्रकाशित करेगा.

हालांकि अब इसके निर्णायक होने को लेकर बहुत ज़्यादा संदेह है. मई में, भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री ने स्थिति को और उलझा दिया जब उन्होंने पत्रकारों से कहा कि दुर्घटना की जाँच अपने 'अंतिम चरण' में है और अंतिम रिपोर्ट 'लगभग…एक महीने बाद आएगी'.

विवाद और अविश्वास

जो भी रिपोर्ट प्रकाशित होगी, उससे एआई-171 की जाँच को घेरे हुए विवाद और अविश्वास की लहर थमने की संभावना बेहद कम दिखती है.

इसकी बड़ी वजह यह धारणा है कि इसमें शामिल कंपनियों को दोष से बचाया जा रहा है.

निश्चित रूप से बोइंग के लिए यह बर्दाश्त करना मुश्किल है कि 787 की सुरक्षा पर सवाल उठें. शुरुआती दिनों में इसे गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा था. 2013 में बोस्टन हवाई अड्डे पर एक विमान में बड़ी बैटरी आग लग गई थी, लेकिन उसके बाद से 787 ने बेहद प्रभावशाली सुरक्षा रिकॉर्ड बनाया.

एआई-171 हादसे में ऐसा पहली हुआ जब कोई 787 दुर्घटना की वजह से नष्ट हुआ. हालाँकि, वर्षों से इस विमान का उत्पादन गहरी समस्याओं से घिरा रहा है, ख़राबियों और निर्माण संबंधी मुद्दों की रिपोर्टें आती रही हैं. जबकि व्हिसलब्लोअर्स ने उत्पादन लाइन पर खतरनाक कार्यप्रणालियों की ओर ध्यान दिलाया है.

बोइंग ने लगातार इस बात से इनकार किया है कि उसने संभावित ख़तरनाक विमानों को इस्तेमाल के लिए जाने दिया है.

हालाँकि, निर्माता की कॉर्पोरेट संस्कृति की तीखी आलोचना हुई है और इसकी वजह छोटे 737 मैक्स से जुड़ी समस्याएं हैं- जिनमें दो घातक दुर्घटनाएँ भी शामिल हैं. नियामकों ने इसे व्यापक सुरक्षा और गुणवत्ता सुधार योजना लागू करने के लिए मजबूर किया है.

इस बीच, एयर इंडिया वर्षों से संघर्ष कर रही है और भारी घाटे झेल रही है. 2022 तक सरकारी स्वामित्व में रहने के बाद इसे विशाल टाटा समूह ने अधिग्रहित किया. इस बदलाव को सुधार का संकेत माना गया था.

लेकिन यह अब भी उन हालातों से जूझ ही रही है जो पूरी इंडस्ट्री के लिए ही मुश्किल परिस्थितियां माने जा रहे हैं. ऐसे में यह ब्रांड छवि को और नुकसान पहुँचने देने की स्थिति में नहीं है.

यह पहली बार नहीं है कि बड़े हवाई हादसों की जाँच की मौजूदा प्रणाली आलोचना के घेरे में आई हो. लेकिन इसने हाई-प्रोफ़ाइल और अक्सर राजनीतिक रूप से संवेदनशील जाँचों की साख को लेकर जारी चिंताओं को उजागर किया है.

ग़ैर-लाभकारी संस्था फ़ाउंडेशन फ़ॉर एविएशन सेफ़्टी के अनुसार, जिस देश में दुर्घटना होती है, उसी से जाँच कराना "प्रक्रिया को स्थानीय नौकरशाही या राजनीतिक दबावों में फँसा सकता है.

इससे भी चिंताजनक बात यह है कि निर्माता के तकनीकी विशेषज्ञ, जो दिखावे के लिए जाँचकर्ताओं की मदद कर रहे होते हैं, उन पर कॉर्पोरेट को दोषरोपण से बचाने का बहुत ज़्यादा दबाव हो सकता है."

संस्था के कार्यकारी निदेशक एड पियर्सन कहते हैं, "एक बेहद जटिल विमान को पुराने तरीक़े से जाँचना असंभव है."

एकहार्ड जॉन बताते हैं कि मौजूदा प्रणाली मोटे तौर पर अब भी 1944 में तय सिद्धांतों पर आधारित है. उनका मानना है कि आज की वैश्वीकृत दुनिया में "जाँच प्राधिकरणों को- स्वतंत्र जाँच करना और ठोस सिफ़ारिशें देना ताकि विमानन सुरक्षा बेहतर हो सके- की अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने में लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है."

अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा की देख-रेख करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी, अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आईसीएओ), अच्छी तरह जानती है कि जाँच हितों के टकराव से प्रभावित हो सकती है.

मार्च में उसने अनुच्छेद 13 में कई बदलावों की पेशकश की. इनमें देशों को जाँच किसी तीसरे पक्ष को सौंपने का अधिकार देना और पारदर्शिता बढ़ाने के कई कदम शामिल हैं. नए नियम 2028 के अंत में लागू होंगे.

लेकिन जॉन के अनुसार, यह सिर्फ़ एक अस्थायी मरहम है.

वह कहते हैं, "आईसीएओ जो भी बदलने और सुधारने की कोशिश कर रहा है, वह केवल लक्षणों को कम करने की कोशिश है, लेकिन वैश्विक विमानन, वैश्विक निर्माता और वैश्विक एयरलाइंस एक वैश्विक समाधान की माँग करते हैं."

उनके अनुसार, ऐसा समाधान होगा "एक वैश्विक जाँच प्राधिकरण, जिसके पास इतनी शक्ति हो कि वह अपनी सिफ़ारिशों के आधार पर बदलाव की माँग कर सके."

लेकिन अन्य लोग सवाल उठाते हैं कि आधुनिक दौर में इतनी लागत और मेहनत वाली जाँचें वास्तव में सार्थक भी हैं या नहीं. इनमें पूर्व जांचकर्ता टिम एटकिंसन भी शामिल हैं.

"यह चक्र कि दुर्घटना होती है, आप निष्पक्ष जाँच करते हैं, सिफ़ारिशें देते हैं, भविष्य की घटनाओं को रोकते हैं… अब वास्तव में नहीं होता. आजकल लोगों की जान बचाने वाली चीज़ों का इससे कोई लेना-देना नहीं है. इसका संबंध बेहतर तकनीक से है."

हालाँकि, वह कहते हैं कि अगर जाँचें जारी रहनी हैं तो कहीं अधिक पारदर्शिता की ज़रूरत है, जिसमें शुरुआती चरण में ही जानकारी कहीं अधिक खुले तौर पर दी जाए.

वह कहते हैं, "मैं हमेशा यही मानता रहा हूँ और मैंने कभी इसके नकारात्मक परिणाम नहीं देखे."

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