मीनाक्षी नटराजन मामले में सुप्रीम कोर्ट से कांग्रेस को नहीं मिली राहत, अदालत ने दिया ये तर्क

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन रद्द किए जाने को चुनौती दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना और ख़ारिज कर दिया.

हालांकि अदालत ने उन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव याचिका दायर कर इस फ़ैसले को चुनौती देने की अनुमित दी है.

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 329 में निहित प्रतिबंध का हवाला देते हुए अपने रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया.

बेंच ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी ख़ारिज कर दिया कि नामांकन रद्द करने में हुई 'स्पष्ट और गंभीर' त्रुटियों को सुधारने के लिए अनुच्छेद 32 का सहारा लिया जा सकता है.

अदालत ने कहा, "अगर अदालत यह तय करने लगे कि किन मामलों में खामियां स्पष्ट हैं कि अनुच्छेद 32 या 226 के तहत हस्तक्षेप किया जाए और किन मामलों को चुनाव याचिका के लिए छोड़ दिया जाए, तो यह अनुच्छेद 329 में ऐसी व्यवस्था पढ़ने जैसा होगा जो वहाँ मौजूद ही नहीं है."

बेंच ने कहा कि ऐसा कोई सिद्धांत स्वीकार नहीं किया जा सकता, जिसके तहत कुछ मामलों में अदालत सीधे हस्तक्षेप करे और अन्य मामलों में चुनाव न्यायाधिकरण का दरवाज़ा खटखटाने के लिए कहा जाए.

इसलिए अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान नामांकन से जुड़े विवादों का समाधान सामान्यतः चुनाव याचिका के माध्यम से ही किया जाना चाहिए.

मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीनों सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्वाचित हो चुके हैं.

कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के बाद बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार की जीत भी तय मानी जा रही थी.

कांग्रेस इस फ़ैसले को चुनौती देते हुए चुनाव आयोग में शिकायत की थी और सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. .

केंद्रीय चुनाव आयोग को कांग्रेस ने 10 जून की सुबह ही शिकायत की थी, लेकिन चुनाव की पूरी प्रक्रिया हो जाने के बाद भी आयोग ने कोई दख़ल नहीं दिया.

बीजेपी उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने के बाद दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की मौजूदगी में हुई बैठक में पार्टी नेताओं ने चुनाव आयोग और बीजेपी दोनों पर सवाल उठाए.

राहुल गांधी ने कहा, "बीजेपी और चुनाव आयोग की जुगलबंदी ने सीट चोरी की है."

घटनाक्रम

कांग्रेस का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन बिना पर्याप्त क़ानूनी आधार के और राजनीतिक कारणों से रद्द किया गया. पार्टी का आरोप है कि रिटर्निंग अधिकारी का फ़ैसला मनमाना और पक्षपातपूर्ण था.

वहीं बीजेपी का कहना है कि नामांकन पत्र के साथ दाख़िल हलफ़नामे में ज़रूरी जानकारी नहीं दी गई थी, जिसके आधार पर यह कारवाई की गई.

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मीनाक्षी नटराजन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि उनका नामांकन ग़लत क़ानूनी आधार पर और बिना पर्याप्त विचार किए ख़ारिज कर दिया गया.

कांग्रेस ने अदालत से तत्काल दख़ल की मांग की थी क्योंकि गुरुवार को नामांकन वापसी की समय सीमा समाप्त हो रही थी.

सुप्रीम कोर्ट से थी कांग्रेस को उम्मीद

नौ जून की रात नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस पार्टी के केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, सचिन पायलट और भूपेश बघेल सहित कई नेता नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के दफ्तर पहुँचे थे.

कांग्रेस नेताओं का कहना था कि वे आयोग को अपना पक्ष बताना चाहते हैं. कुछ समय तक नेताओं को आयोग के दफ़्तर में प्रवेश नहीं मिला, जिसके बाद वे बाहर ही धरने पर बैठ गए.

केसी वेणुगोपाल ने कहा था, "यह लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे पर संकट का सवाल है."

बाद में कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग को अपना ज्ञापन सौंपा और मामले में हस्तक्षेप की मांग की.

इस मामले में चुनावी प्रक्रिया पूरी होने तक चुनाव आयोग ने कोई फ़ैसला नहीं सुनाया था. वहीं बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों को निर्वाचन प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया.

ऐसे में कांग्रेस की उम्मीदें अब मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी थीं.

नामांकन रद्द होने पर उठे सवाल

मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक्स पर लिखा, "चुनाव आयोग चुप्पी साधे हुए है और मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पर पुनर्विचार करने की कांग्रेस की मांग का जवाब नहीं दे रहा है, जबकि उपलब्ध सभी सबूत पहली नज़र में यह संकेत देते हैं कि यह ऐसा मामला नहीं था जिसमें नामांकन ख़ारिज किया जाना चाहिए था."

"कम से कम देश की एक शीर्ष संवैधानिक संस्था से स्पष्टता की उम्मीद की जा सकती थी. इस बीच बीजेपी के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए हैं. अब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी और उम्मीद है कि 'तारीख़ पर तारीख़' का सिलसिला और लंबी सुनवाई देखने को मिलेगी. यह उस संस्था के ताबूत में एक और कील की तरह है, जिसे कभी निष्पक्ष निर्णायक के रूप में देखा जाता था."

एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "चुनाव आयोग का कहना है कि अगर किसी उम्मीदवार के ख़िलाफ़ कोई एफ़आईआर दर्ज है, तो उसके बारे में नामांकन पत्र में बताना अनिवार्य है. अब वे कह रहे हैं कि कोई एफ़आईआर थी ही नहीं."

"तेलंगाना से राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह एक निजी शिकायत (प्राइवेट कंप्लेंट) का मामला था. बीएनएसएस के तहत प्रक्रिया इसी तरह काम करती है. अगर कोई निजी शिकायत दर्ज की जाती है, तो अदालत आपको नोटिस जारी कर यह जानकारी देती है कि आपके ख़िलाफ़ एक शिकायत की गई है."

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने 12 जून को इस मुद्दे पर संपादकीय प्रकाशित किया है.

इस संपादकीय में कई अहम सवाल उठाए गए हैं.

द हिन्दू ने अपने संपादकीय में लिखा है, ''मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किया जाना, अब केवल एक उम्मीदवार का मामला नहीं रह गया है. इसने संस्थागत निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.''

''सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को करने पर सहमति जताई है. इस बीच बीजेपी के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए जा चुके हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता और तटस्थता पर बहस तेज़ हो गई है."

"रिटर्निंग अफ़सर ने मीनाक्षी नटराजन का नामांकन इस आधार पर ख़ारिज किया कि उन्होंने अपने चुनावी हलफ़नामे में हैदराबाद में लंबित एक मामले का ज़िक्र नहीं किया था. यह शिकायत सीधे तौर पर मीनाक्षी नटराजन के ख़िलाफ़ नहीं थी."

"शिकायत एक अन्य कांग्रेस नेता के कथित अनुचित व्यवहार और आपराधिक धमकी से संबंधित थी. याचिका में मीनाक्षी नटराजन का नाम इस आरोप के साथ जोड़ा गया था कि उन्होंने संबंधित नेता के ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई नहीं की.''

द हिन्दू ने लिखा है, ''महत्वपूर्ण बात यह है कि मीनाक्षी नटराजन के ख़िलाफ़ तेलंगाना पुलिस ने कोई आपराधिक एफ़आईआर दर्ज नहीं की थी. सामान्य पुलिस मामलों के उलट, निजी शिकायत सीधे अदालत में दायर की जाती है."

"इस मामले में अदालत ने शिकायत में नामित सभी व्यक्तियों, जिनमें मीनाक्षी नटराजन भी शामिल थीं, को नोटिस जारी किया था. रिटर्निंग अफ़सर की ओर से इस मामले को नामांकन रद्द करने का आधार बनाना मनमाना फ़ैसला प्रतीत होता है और इससे साज़िश की आशंका तक पैदा होती है.''

द हिन्दू ने लिखा है, ''जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत केवल उन्हीं मामलों का उल्लेख करना अनिवार्य है, जिनमें दो साल या उससे अधिक की सज़ा का प्रावधान हो और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जिन मामलों में अदालत आरोप तय कर चुकी हो."

"आरोप तय किया जाना एक न्यायिक प्रक्रिया है, जो आरोप पत्र दाखिल होने के बाद होती है. ऐसे में रिटर्निंग अफ़सर का यह कहना कि महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए और नामांकन पत्र अधूरा था, केवल क़ानून की ग़लत व्याख्या नहीं बल्कि सामान्य समझ के भी उलट है.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.