होर्मुज़ स्ट्रेट में फंसे जहाज़ कैसे बन सकते हैं 'सुपर स्प्रेडर', वैज्ञानिकों की चेतावनी

    • Author, सोफी अब्दुल्ला
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस, क्लाइमेट एंड साइंस
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

'बायोलॉजिकल इनवेज़न्स' जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में समुद्री जीव-वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने चेतावनी दी है कि होर्मुज़ स्ट्रेट का बंद होना एक ऐसा संकट है जो एक बहुत बड़े बायोसिक्योरिटी (जैव सुरक्षा) के ख़तरे को जन्म दे सकता है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि बड़ी संख्या में जहाज़ कई महीनों से समुद्र में फंसे हुए हैं. इस दौरान समुद्री जीव और दूसरी बाहरी प्रजातियों को जहाज़ों के ढांचे से चिपकने के लिए असामान्य रूप से लंबा समय मिल रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, जब ये जहाज़ दोबारा दुनिया के अलग-अलग देशों की ओर रवाना होंगे, तो उनके साथ ये जीव भी नए इलाक़ों में पहुंच सकते हैं. इससे बड़े पैमाने पर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है और एक तरह की "सुपर-स्प्रेडर" जैविक घुसपैठ की स्थिति पैदा हो सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, फ़रवरी से अब तक फ़ारस/अरब की खाड़ी में करीब 1,500 जहाज़ फंसे हुए हैं. वहीं गल्फ़ ऑफ़ ओमान में भी सैकड़ों जहाज़ रुके हुए हैं.

कई समुद्री सूक्ष्मजीव, शैवाल और अकशेरुकी जीव लंबे समय तक स्थिर रहने पर जहाज़ों से तेज़ी से चिपक जाते हैं और वहीं बढ़ने लगते हैं. इसे बायोफाउलिंग कहा जाता है.

'सबसे ख़राब स्थिति'

स्टडी के प्रमुख लेखक और मरीन इकोलॉजिस्ट प्रोफेसर मारियो तांबुरी अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड से जुड़े हुए हैं.

वह कहते हैं, "जीवों का एक पूरा समूह होता है आमतौर पर अकशेरुकी और शैवाल. इन्हें हम सेसाइल या सेडेंटरी कहते हैं. ये अपना जीवन किसी सतह से चिपके हुए बिताते हैं."

तांबुरी ने यह चेतावनी अमेरिका, अर्जेंटीना, पुर्तगाल, सऊदी अरब, न्यूज़ीलैंड, फ़िनलैंड, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा और इसराइल के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पब्लिश की है.

तांबुरी बताते हैं कि जब भी समुद्र में कोई नया स्ट्रक्टचर डाला जाता है, तो सबसे पहले उस पर बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव बसना शुरू कर देते हैं, जो आगे चलकर एक माइक्रोबियल फ़िल्म में बदल जाते हैं.

उन्होंने कहा, "फिर उस बायोफ़िल्म पर केल्प जैसे मैक्रोएल्गी के स्पोर्स, या बार्नेकल और कीड़ों जैसे अकशेरुकी के लार्वा बस जाते हैं. ये कम्युनिटीज़ फिर बढ़ती और फैलती हैं क्योंकि उन्हें रहने के लिए सख्त सतह की ज़रूरत होती है."

तांबुरी बताते हैं कि खाड़ी में पानी के नीचे बहुत कम जगह पर ठोस ज़मीन है. यहां समुद्र की सतह ज़्यादातर कीचड़, गाद और रेत से बनी है. इसलिए जैसे ही इन जीवों को चिपकने के लिए जहाज़ जैसी कोई ठोस जगह मिलती है, वे उस पर चिपक जाते हैं.

दुनिया भर में शिपिंग रूट में अपनी अहम भूमिका की वजह से खाड़ी एक ऐसी जगह है जहां जहाज़ दुनिया के दूसरे हिस्सों से इन बायोफ़ाउलिंग जीवों को लाते हैं. साथ ही जब जहाज़ यहाँ रुके होते हैं तो ये जीव उन पर जमा भी हो सकते हैं.

होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने की वजह से बहुत सारे बड़े जहाज़ लंबे समय से बेकार खड़े हैं.

रिसर्चर इस स्थिति को आधुनिक इतिहास में "अनोखा" बताते हैं. तांबुरी बताते हैं कि उदाहरण के लिए 2021 में मिस्र में स्वेज़ नहर का ब्लॉक होना छह दिनों तक चला था, जबकि 2024 में अमेरिका के बाल्टीमोर बंदरगाह पर पुल गिरने से लगभग 11 हफ़्तों तक कुछ जहाज़ों को रुकावट का सामना करना पड़ा.

वैज्ञानिकों के मुताबिक़, खाड़ी क्षेत्र में जहाज़ आमतौर पर रवाना होने से पहले बंदरगाह पर एक से तीन दिन तक रुकते हैं. उनका कहना है कि 10 दिनों से ज़्यादा समय तक रुके रहने पर जहाज़ों पर बाहरी प्रजातियां तेज़ी से जमा हो सकती हैं.

2023 में इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइज़ेशन ने सलाह दी थी कि जो जहाज़ लंबे समय तक बिना चले खड़े रहते हैं, उन्हें दोबारा रवाना होने से पहले बायोफ़ाउलिंग (जहाज़ की सतह पर समुद्री जीवों का जमा होना) की समस्या से निपटने के लिए उपाय करने चाहिए.

खाड़ी में कई जहाज़ अब महीनों से एक ही जगह पर खड़े हैं.

तांबुरी कहते हैं, "अगर आपको जहाज़ों पर जमा होने वाले जीवों (बायोफ़ाउलिंग) और बाहरी प्रजातियों के फैलने के मामले में सबसे ख़राब स्थिति का खाका तैयार करना होता, तो आप इससे बेहतर कुछ नहीं सोच सकते थे."

इसके अलावा समुद्र में रहने वाले कई रीढ़-विहीन जीव और शैवाल मौसम में बदलाव के साथ प्रजनन करते हैं.

जब फ़रवरी के आखिर में होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद किया गया तब गर्मियों के मौसम से पहले पानी का तापमान बस बढ़ना शुरू ही हुआ था.

तांबुरी बताते हैं, "तापमान बढ़ने से अक्सर जीवों में प्रजनन, अंडे देने, बढ़ने और रहने के लिए नई जगहें या पनपने के लिए नई सतहें खोजने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. अगर यह रास्ता सर्दियों के बीच में बंद किया गया होता तो जोखिम कम होता."

रिपोर्ट के अनुसार, एम्फीबैलानस इम्प्रोवाइसस नाम का एक बहुत आसानी से ढलने वाला खारे पानी का बार्नेकल (एक तरह का समुद्री जीव), जो जहाज़ों के ज़रिए दुनिया भर में फैल गया है और खाड़ी जैसे इलाकों में पाया जाता है. 30 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ये हर वयस्क जीव रोज़ाना 36 लार्वा तक छोड़ सकता है.

इसमें यह भी कहा गया है कि एक जगह रुके रहने के दौरान अलग-अलग जहाज़ों ने लाखों लार्वा छोड़े होंगे.

तांबुरी कहते हैं, "बात बस इसके बहुत बड़े आकार, पैमाने और दायरे की है. और उस इलाके से निकलने वाले जहाजों की पहुंच की वजह से, वे हर जगह जाते हैं."

'भारी' क्षति

तांबुरी का कहना है कि अगर इन जीवों को नई जगहों पर ले जाया जाए, तो ये बहुत ज़्यादा आर्थिक और पर्यावरण संबंधी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

वह कहते हैं कि ये जीव वहां के मूल जीवों को हटाकर उनकी जगह ले सकते हैं और स्थानीय प्रजातियों के खत्म होने का कारण बन सकते हैं.

साथ ही ये मछली पकड़ने और मछली पालन के काम पर बुरा असर डाल सकते हैं और यहां तक कि पावर प्लांट के कूलिंग सिस्टम को भी जाम कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, "एक बार जब बाहरी प्रजातियां (इनवेसिव स्पीशीज़) कहीं जम जाती हैं, खासकर समुद्री इलाकों में, तो उन्हें हटाना बहुत मुश्किल होता है."

रिपोर्ट पब्लिश करने वालों का कहना है कि ये जीव अपने साथ नुकसानदायक परजीवी और रोगाणु भी ला सकते हैं. खाड़ी इलाके का गर्म पानी गर्मी सहने वाली प्रजातियों के लिए अनुकूल हो सकता है.

अगर इन्हें कहीं और ले जाया जाए और भविष्य में तापमान बढ़े, तो ये मूल प्रजातियों की तुलना में ज़्यादा मज़बूत साबित हो सकती हैं.

और जहाज़ों पर इस तरह की गंदगी जमा होना खुद जहाज़ों के लिए भी अच्छा नहीं है.

जब ये जीव बढ़ते हैं तो ये जहाज़ों का वज़न और पानी में उनके आगे बढ़ने में रुकावट बढ़ा देते हैं, जिससे उनकी रफ़्तार धीमी हो जाती है.

तांबुरी बताते हैं, "अपनी रफ़्तार बनाए रखने के लिए जहाज़ों को ज़्यादा ईंधन जलाना पड़ता है."

वह समझाते हैं, "यहां तक कि जहाज़ के निचले हिस्से पर जमने वाली माइक्रोबियल बायोफ़िल्म की परत के कारण भी आपको दो से पांच फीसदी ज़्यादा ईंधन खर्च करना पड़ सकता है. अगर उस पर बार्नेकल और मसल्स जैसे जीवों की भारी परत जम जाए, तो ईंधन का खर्च 25 फीसदी तक बढ़ सकता है."

समुद्र में होने वाली इस अनचाही बढ़ोतरी को रोकने के लिए ज़हरीले बायोसाइड्स वाला एंटीफ़ाउलिंग पेंट बनाया गया है.

तांबुरी बताते हैं, "ये पेंट तब अच्छा काम करते हैं जब जहाज़ ज़्यादा चलते-फिरते रहते हैं. लेकिन जब जहाज़ लंबे समय तक एक ही जगह खड़े रहते हैं, तो ये पेंट ठीक से काम नहीं करते. क्योंकि इन पर बायोफ़ाउलिंग का असर ज़्यादा हो जाता है.

शिपिंग ट्रैफ़िक, यात्रा के समय और पर्यावरण की स्थितियों जैसी बातों को ध्यान में रखते हुए रिसर्चर्स ने ऐसे कई बंदरगाहों की पहचान की, जहां इन प्रजातियों के पहुंचने का ख़तरा ज़्यादा हो सकता है.

इनमें सऊदी अरब का जेद्दा, भारत का मुंबई, श्रीलंका का कोलंबो, सिंगापुर, मिस्र का अलेक्जेंड्रिया, ग्रीस का पिराएअस, स्पेन का अल्जेसिरास और नीदरलैंड्स का रॉटरडैम शामिल हैं.

तांबुरी का कहना है कि गर्म और खारे पानी जैसे एक जैसे पर्यावरण वाले बंदरगाहों पर भी "बहुत ज़्यादा ख़तरा" हो सकता है.

अंतरराष्ट्रीय सहयोग

वैज्ञानिकों का कहना है कि आदर्श स्थिति में खाली पड़े जहाज़ों को खाड़ी से निकलने से पहले साफ किया जाना चाहिए.

लेकिन बड़ी संख्या में मौजूद विशाल और बुरी तरह से गंदगी या समुद्री जीवों से ढके जहाज़ों की सफाई करना एक चुनौती है.

जानकारों का कहना है कि इन जीवों को पानी में फैलने से रोकने और एंटी-फाउलिंग पेंट के टुकड़ों को झड़ने से बचाने के लिए इन जीवों को इकट्ठा करके उनका सही निपटान करना ज़रूरी है.

तांबुरी बताते हैं कि रोबोटिक्स जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके जीवों को इकट्ठा करते हुए जहाज़ों की सफाई करना संभव है. लेकिन खाड़ी में पानी के अंदर सफाई करने वाली ज़्यादातर सेवाएं मलबे को इकट्ठा नहीं करतीं क्योंकि यह तकनीक अभी भी अपेक्षाकृत नई है.

वह यह भी कहते हैं कि बुरी तरह से गंदगी या जीवों से ढके जहाज़ों की भारी संख्या के कारण क्षमता की भी समस्या है.

समस्या के बड़े पैमाने, शिपिंग को फिर से शुरू करने और फंसी हुई क्रू को निकालने की ज़रूरत के अलावा कई तरह की लॉजिस्टिकल मुश्किलों को देखते हुए वैज्ञानिकों का कहना है कि रवाना होने से पहले जहाज़ों को अच्छी तरह से साफ़ करना शायद कोई व्यावहारिक समाधान नहीं होगा.

उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग ज़रूरी होगा और जो बंदरगाह इस इलाके से जहाज़ों के आने की उम्मीद कर रहे हैं, उन्हें बाहरी प्रजातियों के फैलने के जोखिम को कम करने के लिए उनके आने पर उन्हें साफ़ करने के लिए तैयार रहना चाहिए.

तांबुरी कहते हैं, "हमें काफ़ी हद तक यकीन है कि स्ट्रेट के फिर से खुलने से बाहरी प्रजातियों का आगमन होगा."

"कुछ बाहरी प्रजातियां शायद चुपचाप बनी रहती हैं. वे वहां होती तो हैं, लेकिन उन पर ध्यान नहीं जाता या वे कोई खास असर नहीं डालतीं. जबकि कुछ प्रजातियां ऐसा करती हैं."

रिसर्चर का कहना है कि क्या यह घटना दुनिया भर में 'बायोइनवेज़न सुपर-स्प्रेडर इवेंट' बन जाएगी, यह अब इस बात पर कम निर्भर करता है कि जहाज़ों पर क्या पनपा है, और इस बात पर ज़्यादा कि आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या प्रतिक्रिया होती है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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