गुजरात के गिर में इंसानों और शेर के बीच संघर्ष क्यों बढ़ गया है

    • Author, गोपाल कटेशिया
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

गुजरात के गिर जंगल के आसपास अमरेली, भावनगर (बृहद गिर) जैसे जिलों में पिछले छह हफ्तों में शेरों के इंसानों पर कथित हमलों की आठ घटनाएं सामने आई हैं. इन हमलों में छह लोगों की मौत हुई है.

छठी मौत की जानकारी बुधवार 8 जुलाई, 2026 को अमरेली जिले के लिलिया तालुका के अंतालिया गांव से मिली.

यह शायद पहली बार है कि इतने कम समय में शेरों के कथित हमलों में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई है.

विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती आबादी के कारण बीते 25 सालों में शेर खाने और रहने की जगह की तलाश में जंगल से निकलकर मानव आबादी वाले क्षेत्रों की तरफ आ रहे हैं. मनुष्यों के साथ उनका सह-अस्तित्व काफी हद तक संभव हो पाया है.

अधिकारियों का कहना है कि जिस तरह से बृहद गिर क्षेत्र में शेरों और तेंदुओं जैसे बड़े शिकारी जानवरों और मनुष्यों का एक साथ रहना वो अभूतपूर्व घटना है. दुनिया में अभी ऐसा कोई उदाहरण नहीं है.

उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में मनुष्यों और जंगली जानवरों के बीच संघर्ष की संभावना बहुत अधिक हो जाती है.

हालांकि अधिकारियों का दावा है कि इन छह घटनाओं की परिस्थितियां, जानवर और स्थान अलग-अलग हैं. इसलिए ये घटनाएं बृहद गिर क्षेत्र में शेरों के व्यवहार या स्थितियों में किसी अचानक बड़े बदलाव का संकेत नहीं देती हैं.

गिर क्षेत्र में शेरों के हमले कब-कब हुए?

इसकी शुरुआत 25 मई को अमरेली के जाफराबाद तालुका के तटीय इलाके में स्थित वराहस्वरूप गांव से हुई.

दो दिन तक लापता रहने के बाद वराहस्वरूप के भरत बारैया नामक एक युवक के शव के अवशेष गांव के नज़दीक 25 मई को मिला था.

वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि शुरुआती तौर पर ऐसा जाहिर होता है कि भरत बारैया की मौत शेरों के हमले से हुई.

12 जून की शाम को वराहस्वरूप से लगभग 127 किलोमीटर दूर अमरेली के बगसरा तालुका के घंटियान गांव में शेरों ने कथित तौर पर नानूराम दिनेश मानकर पर हमला किया और उसे मार डाला.

नानूराम दिनेश मानकर मध्य प्रदेश के धार जिले के मूल निवासी एक किसान मजदूर परिवार का सात वर्षीय बेटा था. वह खुले में शौच करने गया था.

16 जून को अमरेली के राजुला तालुका के तटीय इलाके में कोवाया गांव में प्रकाश चंद्र हरगोविंद नामक एक युवक पर कथित तौर पर शेरों ने हमला कर दिया.

पुलिस के अनुसार, प्रकाश चंद्र कोवाया के चाहत रेस्टोरेंट में काम करते थे और उत्तराखंड में अपने घर जाने के लिए आधी रात को सड़क पर कोई वाहन मिल जाए उसकी राह देख रहे थे. तभी गांव के बाहर के इलाके में शेरों ने उन पर हमला कर दिया.

उसी दिन कोवाया से लगभग 80 किलोमीटर उत्तर में अमरेली के सावरकुंडला तालुका के जूना सावर गांव में दिलीप देसाई नामक 61 वर्षीय किसान के खेत में उनके शरीर के कुछ हिस्से मिले और उनके पास शेर के पदचिह्न पाए गए.

पुलिस और वन विभाग को संदेह है कि दिलीप देसाई की मौत भी शेर के हमले के कारण हुई थी.

18 जून को भावनगर जिले के महुवा तालुका के तटीय गांव गढ़ड़ा में नागजीभाई गुजारिया नामक एक युवक दो दिनों तक घर नहीं लौटा. जिसके बाद वह अपने खेत की झोपड़ी के पास मृत पाया गया.

उस समय इलाके में शेर मौजूद थे और पुलिस का कहना है कि नागजीभाई की मौत शेर के हमले में हुई.

25 जून को अमरेली के खांम्भा तालुका के चतुरी गांव में पांच साल के जियान सिंधा नामक एक लड़के को कथित तौर पर शेर खींच गए और उसे मार डाला. वो अपने दादा के साथ डेयरी में दूध पहुंचाने जा रहा था.

वन विभाग की एक प्रेस रिलीज के अनुसार, इस घटना के नौ दिन बाद 4 जुलाई को, अमरेली के सावरकुंडला के थावी गांव में बकरियों और कुत्तों के साथ एक झोपड़ी में सो रहा राजुभाई वाघेला नामक एक युवक शेर के हमले में घायल हो गया.

दो दिन बाद 6 जुलाई को भावनगर के पालीताना तालुका में शेत्रुंजय पर्वत की तलहटी में स्थित गराजिया गांव में कालूभाई परमार नामक एक व्यक्ति उस समय घायल हो गया जब एक शेर ने उस पर हमला कर दिया. वह उस दिन सुबह अपने घर में बंधी गायों को चारा खिलाने जा रहा था.

8 जुलाई की शाम को अमरेली शहर के निवासी सोहिल मुंजावर नामक एक युवक की शेर के हमले में मौत हो गई. लेकिन यह हमला उन आरक्षित वन विस्तार में हुआ था.

शेत्रुंजी वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक चिराग अमीन ने घटना के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि अंतालिया में एक शेर और शेरनी संभोग कर रहे थे. उन्होंने कहा कि इस बात की जांच की जा रही है कि क्या संभोग के दौरान किसी ने उनको परेशान किया था या नहीं.

क्या गिर क्षेत्र में शेरों के हमले बढ़ रहे हैं?

अंग्रेजी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020-21 में गुजरात में शेरों के हमले में दो लोगों की मौत हुई थी.

इस रिपोर्ट के अनुसार, यह आंकड़ा 2024-25 में बढ़कर सात हो गया था, लेकिन 2025-26 में घटकर पांच हो गया.

लेकिन इस साल मार्च 2026 से अब तक बीते चार महीनों में ही कम से कम छह लोगों की मौत हो चुकी है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में शेरों के हमले से 42 लोग घायल हुए और 2025-26 में 13 लोग घायल हुए थे.

वन्यजीव मानवों के हस्तक्षेप के बिना जी सके यह सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारें वन, घास के मैदान, रेगिस्तान, तटीय क्षेत्र आदि जैसे इलाकों में मानवीय गतिविधियों को प्रतिबंधित करती हैं.

इन्हें राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, संरक्षित वन, आरक्षित वन आदि घोषित किया जाता है. ऐसे क्षेत्र वन विभाग के नियंत्रण में होते हैं.

इसके विपरीत, निजी स्वामित्व वाली खेती की जमीन, चरागाह की जमीन, सरकारी बंजर जमीन आदि सहित सभी तरह की जमीन व्यक्तियों, समितियों, कंपनियों, ग्राम पंचायतों आदि के नियंत्रण में होती है.

सरकार इन जमीनों पर राजस्व वसूल करती है. इसलिए इन क्षेत्रों को रेवेन्यू लैंड कहा जाता है.

लेकिन अगर स्वतंत्र रूप से घूमने वाले वन्यजीव संरक्षित वनों को छोड़कर रेवेन्यू लैंड में प्रवेश कर जाते हैं, तब भी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत उन्हें दिया गया कानूनी संरक्षण लागू रहता है और सरकार को इसे लागू करना होता है.

गुजरात सरकार ने अमरेली और भावनगर के रेवेन्यू लैंड में रहते शेरों और अन्य वन्यजीवों की उचित सुरक्षा के लिए 2019 में शेत्रुंजी वन्यजीव विभाग का गठन किया था.

इस वर्ष मई और जुलाई के बीच दर्ज की गई आठ घटनाओं में से छह शेत्रुंजी वनविभाग में दर्ज की गईं.

इन कथित हमलों के बाद वन विभाग ने कम से कम 19 शेरों को पकड़कर पिंजरों में डाल दिया है.

लेकिन सवाल है कि शेरों और के बीच संघर्ष की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं?

शेत्रुंजी वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक चिराग अमीन कहते हैं, "बृहद क्षेत्र में मनुष्य और शेर और तेंदुए जैसे बड़े शिकारी जानवरों के सह-अस्तित्व का दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं है."

"इस क्षेत्र में शेरों और मनुष्यों के बीच जितना इन्टरेक्शन है, उतना कहीं और वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच नहीं है. एसी स्थिति बाघों और हाथियों वाले क्षेत्रों में भी नहीं है. यह एक सच्चाई है कि शेरों की आबादी बढ़ने के कारण वे रेवेन्यू लैंड में घूम रहे हैं."

"साथ ही इंसानों की जनसंख्या भी बढ़ी है. इसलिए, शेरों और मनुष्यों के बीच संपर्क भी बढ़ गया है. दुर्भाग्य से इस तरह के संपर्क कभी-कभी संघर्ष का कारण बन जाते हैं."

शेरों के हमलों की बढ़ते हमलों के बारे में विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

गुजरात के सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक अशोक कुमार शर्मा 1980 के दशक में गिर में उप वन संरक्षक थे.

उनका कहना है की शेर-तेंदुए जैसे शिकारी प्राणी अगर मानववस्तीवाले रेवेन्यू लैंड के इलाकों में रहने लग जाए तो कैसी समस्याएं पैदा हो सकती है उसका उदाहरण है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "लगभग 2000 के वर्ष से शेर रेवन्य लैंड के इलाकों में रहने लगे हैं और उनकी आबादी बढ़ रही है."

"यह एक भ्रम है कि शेर और मनुष्य इन इलाकों में भी शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रह सकते हैं. यह भी एक भ्रम है कि शेर मनुष्यों पर हमला नहीं करते हैं. हाल की घटनाएं इसका एक उदाहरण हैं. शेरों का स्वभाव ही मूल रूप से शिकार करना होता है."

"इसमें इंसान भी शामिल हैं. भूखे होने और मौका मिलने पर शेरों का इंसान पर हमला करना स्वाभाविक है."

लेकिन जाने-माने वन्यजीव फोटोग्राफर भूषण पंड्या पिछले चार दशकों से शेरों का अवलोकन कर रहे हैं.

उनता कहना है कि अवैध रूप से हो रहे 'लायन शो' (अवैध रूप से शेरों को दिखाने ले जाना) इन बढ़ते हमलों का सबसे बड़ा कारण हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "शेर पिछले 25 वर्षों से मनुष्यों के बीच रह रहे हैं और संघर्ष की घटनाएं बहुत कम हुई हैं."

"शेर आम तौर पर इंसानों पर हमला नहीं करते. लेकिन हाल की घटनाएं अवैधरुप से चल रहे 'लायन शो' से जुड़ी हैं."

"इस तरह से जब लोग शेर देखने जाते है तब वे रात में शेरों पर रोशनी डालते हैं, उनके पीछे वाहन चलाते हैं, और उन्हें शिकार के समय डिस्टर्ब करते है. तो फिर शेर क्या करेंगे? इस तरह के 'लायन शो' में छेड़े जाने वाले शेर कभी-कभी दूसरे लोगों पर हमला कर देते हैं."

चिराग अमीन कहते हैं, "अभी जैसी घटनाएं हो रही है वो रातोंरात नहीं घटित होतीं. ये एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और संभवतः वर्षों पहले शुरू हुई होंगी."

अधिकारी ने कहा कि हमलों में वृद्धि के पीछे कई कारण हैं और जमीन के इस्तेमाल का बदलता पैटर्न भी उनमें से एक हैं.

उन्होंने कहा, "अगर आप 10 साल पहले ली गई किसी गांव की सैटेलाइट तस्वीर की तुलना आज ली गई तस्वीर से करेंगे, तो आपको बहुत बड़ा अंतर दिखाई देगा. गांव बड़े हो गए हैं. जहां खेती नहीं होती थी, वहां जंगली बबूल के पेड़ होते थे और शेर उन्हें अपने आवास के रूप में इस्तेमाल करते थे."

"अमरेली में स्थित लिलिया इलाका इसका एक उदाहरण है. लोगों की बढ़ती आर्थिक क्षमता के कारण वो अब इन पेड़ो को निकालकर वहां खेती करने लगे है. "

चिराग अमीन कहते हैं, "कानूनी तौर पर इसमें कुछ भी गलत नहीं है. लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि शेरों के लिए जगह कम हो गई है."

अमरेली-भावनगर में कितने शेर और कितने इंसान रहते हैं?

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अमरेली और भावनगर जिलों का भौगोलिक क्षेत्रफल क्रमशः 6760 वर्ग किलोमीटर और 7034 वर्ग किलोमीटर है.

2011 की जनगणना के अनुसार, मानव जनसंख्या क्रमशः 15.14 लाख और 24.10 लाख थी. जनसंख्या घनत्व क्रमशः 270 और 757 प्रति वर्ग किलोमीटर था.

गुजरात वन विभाग हर पांच साल में शेरों की जनगणना करता है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शेरों की संख्या 2001 में 327 से बढ़कर 2010 में 411 हो गई.

2015 में यह संख्या 523 थी. 2020 में यह बढ़कर 674 हो गई. अगले पांच वर्षों में शेरों की आबादी में लगभग 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 2025 में यह 891 तक पहुंच गई.

891 शेरों में से 339 शेर अमरेली में और 116 शेर भावनगर में दर्ज किए गए.

इस प्रकार इन दोनों जिलों में कुल 455 शेर दर्ज किए गए, जो कुल आबादी का 51 प्रतिशत है.

2015 में अमरेली और भावनगर में शेरों की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा था.

खास बात यह थी कि 891 शेरों में से अब केवल 497 शेर ही राष्ट्रीय उद्यानों या अभयारण्यों और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में दर्ज किए गए थे.

रेवेन्यू लैंड के इलाको में, आरक्षित विस्तारो के बाहर के इलाकों में 394 शेर दर्ज किए गए. इस प्रकार, शेरों की कुल आबादी का 44 प्रतिशत रेवेन्यू लैंड के में रहता है.

2015 में संरक्षित क्षेत्रों के अंदर या उसके आसपास 356 शेर दर्ज किए गए और 167 शेर संरक्षित क्षेत्रों के बाहर दर्ज किए गए.

इस प्रकार 10 साल में रेवेन्यू लैंड में रहने वाले शेरों की आबादी में 227 शेरों की बढ़ोतरी हुई.

अमरेली जिले में गिर राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य के कुछ हिस्से, पानिया वन्यजीव अभयारण्य और मितियाला वन्यजीव अभयारण्य जैसे संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं. साथ ही वन्यजीव अभयारण्य के रूप में संरक्षित और आरक्षित वन भी शामिल हैं.

भावनगर में वेलावदर के पास स्थित कालियार राष्ट्रीय उद्यान एकमात्र संरक्षित क्षेत्र है.

लेकिन वेलावदर में शेरों की कोई आबादी नहीं है. शेर भावनगर के शेत्रुंजय पर्वत सहित कुछ आरक्षित वनों में बस गए हैं.

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई शेर सरकारी बंजर जमीन, चारागाहों और कृषि की बंजर जमीनों में रह रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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