जंतर-मंतर पर पुलिस का फ़ायरिंग से इनकार, फिर नूतन टोप्पो को कैसे लगी 'गोली'?

    • Author, मोहम्मद सरताज आलम
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए रांची से
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

"मुझे अच्छी तरह से पता है कि एक गोली मेरे दाहिने कान को छूकर निकली, मेरा कान कई हिस्सों में फट चुका था, हाथ लगाया तो सिर्फ़ ख़ून ही ख़ून था."

ये दावा है झारखंड के गुमला ज़िले के पुग्गू करमदीपा गांव की रहने वालीं नूतन टोप्पो की. वह 20 जुलाई को नई दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और स्टूडेंट्स संगठनों के नेतृत्व में हज़ारों युवाओं के जंतर-मंतर से संसद तक 'चलो संसद' मार्च का हिस्सा थीं.

नूतन टोप्पो के इस दावे को राम मनोहर लोहिया अस्पताल की डिस्चार्ज समरी सही ठहराती है. इसी अस्पताल में उन्हें घायल अवस्था में भर्ती कराया गया था.

20 जुलाई की डिस्चार्ज समरी में लिखा हुआ है कि नूतन के "कान में गनशॉट लगा है."

हालांकि दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि इस विरोध प्रदर्शन के दौरान गोली नहीं चलाई गई है.

इसे लेकर विवाद भी हो रहा है, लेकिन इस प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से घायल होने वाले कुछ दूसरे मामले भी सामने आए हैं.

प्रदर्शन में कैसे पहुंचीं नूतन टोप्पो?

32 साल की नूतन टोप्पो पिछले कई साल से गुरुग्राम में रहकर पार्ट-टाइम जॉब के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थीं.

जब स्टूडेंट्स ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किया तो नूतन भी देशभर के युवाओं की तरह प्रदर्शन से प्रभावित हो गईं. नूतन ने प्रोटेस्ट में शामिल होने के लिए अपने परिजनों से इजाज़त मांगी.

वह कहती हैं, "परिजनों का कहना था कि मैं बच्चों के लिए इलेक्ट्रॉल लेकर जाऊं, उनको सहयोग करूं और उनके साथ समय गुज़ारूं."

उसके बाद नूतन भी 19 जुलाई को छुट्टी लेकर जंतर मंतर पहुंच गईं. नूतन के मुताबिक़, उन्होंने सभी स्टूडेंट्स को शांतिपूर्ण तरीके से पूरे अनुशासन में प्रदर्शन करते देखा.

इस दौरान उनकी मुलाक़ात उन परिजनों से हुई जिनके बच्चों ने नीट पेपर लीक की वजह से खुदकुशी की थी.

नूतन कहती हैं, "उन्हें देखकर मुझे बहुत दुख हुआ कि कैसे अपने बच्चे के बग़ैर ये लोग रह रहे हैं. तब मैंने तय किया कि 20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च का हिस्सा बनूंगी."

'सामने बंदूक़ें थीं, पीछे से चली गोली'

नूतन 20 जुलाई की सुबह साढ़े नौ बजे जंतर-मंतर पहुंचीं. नूतन वहां का मंज़र याद करती हैं और भावुक हो जाती हैं.

उनका दावा है कि जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में मौजूद बच्चे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, जबकि पिछले कई दिनों से कुछ युवा अनशन पर थे.

युवाओं की भीड़ उस समय 'चलो संसद' मार्च के लिए बढ़ना चाहती थी लेकिन एक तरफ़ बैरिकेडिंग थी तो दूरी तरफ सुरक्षाबलों की मौजूदगी के कारण कोई आगे नहीं बढ़ पा रहा था.

नूतन टोप्पो के अनुसार, वहां मौजूद सुरक्षाबलों ने सभी को आगे बढ़ने से रोकने के लिए लगातार अंतराल पर आंसू गैस के गोले छोड़े.

वह कहती हैं, "आंसू गैस से पूरी त्वचा जलने लगी थी. आंख, मुंह और चेहरा सब झुलस रहा था. ऐसा लगा कि हम वापस चले जाएं, लेकिन हम डटे रहे."

नूतन दावा करती हैं कि 20 जुलाई को साढ़े तीन-चार बजे के बीच लाठीचार्ज शुरू हो गया.

वह कहती हैं, "पुलिसबल पूरी सुरक्षा किट के साथ आया था, जबकि हमारे (स्टूडेंट्स के) हाथों में क्या था? सिर्फ किताबें, बैनर और छोटे-मोटे पोस्टर."

उन्होंने बताया कि लाठीचार्ज से भीड़ तो बिखर जाती, लेकिन कुछ ही देर के बाद किसी अन्य नज़दीकी स्थान पर फिर इकट्ठा हो जाती.

नूतन के मुताबिक़, सुरक्षाबलों की ओर से लगातार खदेड़े जाने की वजह से युवाओं की बड़ी संख्या कनॉट प्लेस के चौराहे पर पहुंच गई और सुरक्षाबलों से घिर गई.

नूतन दावा करती हैं, "वहां सभी स्टूडेंट्स की तरफ़ सुरक्षाबल बंदूक़ तानकर खड़े थे. उन्हें देखकर हम लोग पीछे भागने लगे, तभी पीछे से हमारे ऊपर शूट किया गया. एक गोली मेरे कान को छूते हुए और पूरे कान को चीरते हुए निकल गई."

नूतन के मुताबिक़, ये घटना 20 जुलाई की शाम लगभग पांच से साढ़े पांच बजे के बीच की है.

नूतन ने बताया, "जब मैंने घबराकर अपने कान पर हाथ रखा, तो देखा कि हाथ ख़ून से पूरी तरह लथपथ हो चुका था."

नूतन का दावा है कि उस दौरान भी लगातार फ़ायरिंग हो रही थी लेकिन उनके साथियों ने इसकी परवाह किए बग़ैर नूतन को कवर करते हुए एंबुलेंस मंगवाई और दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया.

झारखंड में बहन को मिली ख़बर

नूतन के घायल होने के बाद उनके साथियों ने सबसे पहले उनकी छोटी बहन नूपुर टोप्पो को फोन कर घटना की जानकारी दी.

नूपुर टोप्पो उस पल को याद करते हुए बताती हैं कि अचानक नूतन के नंबर से फोन आया कि नूतन को चोट लग गई है.

लेकिन नूपुर समझ नहीं सकीं कि कैसी चोट लगी है.

वह बताती हैं, "थोड़ी देर बाद ख़ुद नूतन का फोन आया और उसने बताया कि उसे गोली लग गई है. मैं पूरी तरह डर गई. समझ नहीं आ रहा था कि इतनी दूर से मैं तुरंत दिल्ली कैसे पहुंचूं."

नूपुर ने घटना की जानकारी 68 साल के अपने बीमार पिता को तुरंत नहीं दी. उन्हें डर था कि पिता यह ख़बर सुनकर घबरा जाएंगे.

नूपुर ने आगे बताया कि उन्होंने हिम्मत जुटाकर वहां मौजूद नूतन के साथियों से गुज़ारिश की कि वे नूतन को अकेला न छोड़ें और अस्पताल में उसका ध्यान रखें.

राम मनोहर लोहिया अस्पताल में शाम पौने छह से छह बजे के क़रीब भर्ती कराए जाने के बाद नूतन के कान की लगभग दो घंटे तक सर्जरी चली.

लेकिन सर्जरी के महज़ 15 मिनट बाद ही अस्पताल ने उन्हें डिस्चार्ज कर दिया.

नूतन कहती हैं, "19 और 20 जुलाई को पूरे दिन हम प्रदर्शन में थे, हमें ज़रा भी आराम नहीं मिला था. ऊपर से गनशॉट इंजरी के बाद मुझे सबसे ज़्यादा आराम की ज़रूरत थी, लेकिन अस्पताल में मुझे नहीं रखा गया और सर्जरी के 15 मिनट बाद ही डिस्चार्ज कर दिया गया."

इसके बाद लगातार तीन दिनों तक नूतन को गुरुग्राम स्थित अपने कमरे से हर रोज़ राम मनोहर लोहिया अस्पताल इलाज और पट्टी कराने आना पड़ता था.

केवल आने-जाने में हर रोज़ लगभग 600 रुपये ख़र्च हो रहे थे, जो पार्ट-टाइम जॉब करके अपनी पढ़ाई का ख़र्च निकालने वाली एक छात्रा के लिए बेहद तकलीफ़देह था.

लगातार भागदौड़, जंतर-मंतर पर उपलब्ध पानी और उचित आराम न मिलने से नूतन गहरे संक्रमण का शिकार हो गईं.

उन्हें तेज़ बुख़ारर ने जकड़ लिया. हालत बिगड़ती देख साथियों की मदद से नूतन 25 जुलाई की शाम रांची पहुंचीं.

रांची आने के बाद प्रदर्शन से जुड़े स्टूडेंट्स ने रांची कांग्रेस के महानगर अध्यक्ष कुमार राजा से संपर्क किया.

कुमार राजा ने नूतन की स्थिति को देखते हुए तुरंत उन्हें रांची के सिनर्जी ग्लोबल अस्पताल में भर्ती कराया और इलाज का पूरा ख़र्च ख़ुद दिया.

कुमार राजा ने बताया कि नूतन के कान में 10 टांके लगे थे, इन्फे़क्शन बहुत बढ़ गया था, नूतन को सुनाई देना भी बंद हो गया था.

वह कहते हैं, "27 जुलाई को हमने अस्पताल में एमआरआई और सीटी स्कैन समेत कई टेस्ट कराए. कान का पर्दा डैमेज हुआ है, इसलिए 10 दिनों बाद एक हियरिंग टेस्ट होना है. हमारी कोशिश है कि उनका बेहतर इलाज हो और वह पूरी तरह ठीक होकर ही अपने गांव लौटें."

इस अस्पताल की ओर से जारी डिस्चार्ज समरी में कान में चोट की वजह पैलेट गन बताई गई है.

परिवार का हाल

30 जुलाई की शाम अस्पताल से डिस्चार्ज होने वालीं नूतन टोप्पो के परिवार में उनके बीमार बुज़ुर्ग पिता और चार बहनें हैं. उनकी बड़ी बहन का विवाह हो चुका है जो रांची में रहती हैं.

नूतन जब पांचवीं कक्षा में थीं तो उनकी मां का सड़क हादसे में देहांत हो गया. उसके बाद पिता टैरेस टोप्पो ने अपनी अर्धसैनिक बल की नौकरी छोड़ दी.

उनकी छोटी बहन खुशबू टोप्पो सिकल सेल की मरीज़ हैं. उन्हें ज़रूरत के अनुसार हर कुछ महीने में खून चढ़ाना पड़ता है जबकि नूपुर टोप्पो एक फुटबॉल कोच हैं. इससे होने वाली आय से वह परिवार की आर्थिक मदद करती हैं.

क्या ऐसे प्रोटेस्ट से युवाओं को लाभ होगा? इस सवाल पर नूतन का मानना है कि आज के जेन-ज़ी बच्चे पहले जैसे नहीं हैं कि जो ग़लत हो रहा है, उसे चुपचाप होने दें.

वह कहती हैं, "आज के युवा मानते हैं कि जो ग़लत हो रहा है, उसे बदलो. मैं इस बदलाव का हिस्सा बनने और देश के युवाओं के भविष्य को बदलते हुए देखने के लिए जंतर-मंतर गई थी."

रांची के अस्पताल डिस्चार्ज होने के बाद नूतन रांची में कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में शामिल हुईं.

वह कहती हैं, "प्रेस कॉन्फ़्रेंस में लोग जंतर-मंतर की ज़मीनी सच्चाई और मेरा अनुभव सुनना चाहते थे, ताकि उनकी आवाज़ देश के सामने आ सके. मैं किसी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करती."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.