पाकिस्तान के धुरंधर बल्लेबाज़ जावेद मियांदाद की शरारतों की कहानियां

    • Author, रशीद शकूर
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, कराची से, बीबीसी हिन्दी के लिए
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एक समय था, जब क्रिकेट के मैदानों में जावेद मियांदाद अपनी शानदार बल्लेबाज़ी से ही नहीं बल्कि अपनी दिलचस्प हरकतों और जुमलों से भी प्रशंसकों के दिलों पर राज करते थे.

लेकिन अब उनके मिजाज में असाधारण गंभीरता आ चुकी है.

कराची के गिज़री इलाक़े में अपने निवास स्थान पर वह बीते दिनों की ख़ूबसूरत यादों के साथ शांतिपूर्ण जीवन बिता रहे हैं. 12 जून को मियांदाद 69 साल के हो गए हैं.

इस उम्र में भी वह अपना पुराना सेंस ऑफ ह्यूमर नहीं भूले हैं और मौक़ा मिलने पर चुटकुले सुनाते हैं; खुद भी हँसते हैं और दूसरों को भी हँसा देते हैं.

मैंने जावेद मियांदाद से, जिन्हें हम सब प्यार से जावेद भाई कहते हैं, पूछा, "आजकल क्या व्यस्तताएं हैं?"

जावेद ने जवाब दिया, "कोई ख़ास नहीं. आजकल कुछ नहीं कर रहा, घर पर ही होता हूँ. हाँ! किसी का निमंत्रण आता है तो उसकी ख़ुशी में ज़रूर शामिल हो जाता हूँ."

मैंने पूछा, "आजकल क्रिकेट को फॉलो कर रहे हैं?" जावेद बोले, "नहीं. टीवी पर हाइलाइट्स आ जाएं तो देख लेता हूँ."

"अपने पुराने साथी क्रिकेटरों से तो संपर्क रहता होगा?" यह मेरा अगला सवाल था.

जावेद का जवाब था, "रहता है. अगर मुलाक़ातें न हों तब भी फोन पर एक-दूसरे का हाल-चाल मालूम करते रहते हैं."

छह वर्ल्ड कप खेलने वाले खिलाड़ी

यहाँ पाकिस्तान कस्टम्स क्रिकेट टीम के पूर्व मैनेजर वक़ार हुसैन का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है, जो जावेद मियांदाद से लगातार संपर्क में रहते हैं, बल्कि उनका नियम है कि वह हफ़्ते में तीन-चार दिन नियमित रूप से जावेद मियांदाद से मिलने उनके पास जाते हैं.

घर पर गपशप के बाद दोनों खाना खाने बाहर निकल जाते हैं.

मैंने बातचीत को थोड़ा सा और आगे बढ़ाया और पूछा, "आपने खिलाड़ी, कप्तान और कोच के रूप में मैदान में समय बिताया. कुछ समय क्रिकेट बोर्ड में भी रहे. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के किस चेयरमैन के साथ काम करके मज़ा आया?"

जावेद मियांदाद ने बिना किसी देरी के लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) तौकीर ज़िया का नाम लिया. वह कहने लगे, "जनरल साहब की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्हें प्रशासन की समझ-बूझ थी. उन्हें अपने साथियों से काम लेना आता था."

"वह हर एक की बात और सुझाव धैर्यपूर्वक सुनते थे और जो चीज़ क्रिकेट के लिए अच्छी होती उसे अमल में लाते थे. मेरी उनके साथ काफी अच्छी अंडरस्टैंडिंग रही थी, उनके दौर में पाकिस्तान के क्रिकेट को बहुत तरक़्क़ी मिली."

जावेद मियांदाद जैसे क्रिकेटर से औपचारिक बातचीत के बाद मेरे लिए यह संभव नहीं था कि मैं एक चुभता हुआ सवाल न करूँ जो काफ़ी समय से मेरे दिमाग़ में था और यही वह सवाल था, जिसके जवाब में जावेद मियांदाद का लहजा तुरंत बदल गया.

मैंने पूछा, "क्या यह सही बात है कि 1996 के वर्ल्ड कप की टीम में आपको चुनने के लिए चयनकर्ताओं पर बहुत ज़्यादा राजनीतिक दबाव था?"

जावेद चौंके और कहने लगे, "यह कौन कहता है?"

मैंने कहा, "यह मैं नहीं कह रहा बल्कि वसीम अकरम ने अपनी किताब सुल्तान में लिखा है कि हमने उस समय सुना था कि चयनकर्ताओं पर सिंध प्रांत के मुख्यमंत्री सैयद अब्दुल्ला शाह का दबाव था कि जावेद मियांदाद को टीम में वापस लाया जाए ताकि वह सभी छह वर्ल्ड कप खेलने वाले पहले खिलाड़ी बन जाएं."

जावेद इस बात पर भावुक हो गए और कहने लगे, "पूरी दुनिया को पता है कि मैंने अपनी पूरी क्रिकेट गरिमापूर्ण अंदाज़ में खेली है. किसी सिफ़ारिश से नहीं खेली और न ही किसी ने मुझे धक्के देकर आगे बढ़ाया था."

"मैं जब भी खेलता था, पाकिस्तान की जनता को मुझ पर भरोसा रहता था कि जावेद क्रीज़ पर खड़ा है तो मैच जिताएगा भी और मैच बचाएगा भी. यह अल्लाह का मुझ पर विशेष करम और मेरे माता-पिता की दुआओं का परिणाम था."

शारारतें, जिनसे कोई नहीं बचा

पूर्व टेस्ट क्रिकेटर हारून रशीद, जावेद मियांदाद के बचपन के दोस्त हैं. वह जावेद मियांदाद को एक ऐसे बच्चे के रूप में जानते हैं, जो अपनी मासूम शरारतों की वजह से मशहूर रहा है.

हारून रशीद बताते हैं, "मैं और जावेद कराची के चर्च मिशन स्कूल में पढ़ते थे. यह वही स्कूल है, जहाँ पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने भी शिक्षा हासिल की थी."

"जावेद के सबसे बड़े भाई बशीर मियांदाद हमारे स्कूल की टीम के कप्तान थे. जावेद मियांदाद के एक और भाई हनीफ़ मियांदाद नौवीं क्लास में मेरे साथ थे जबकि जावेद मियांदाद छठी क्लास में थे."

"बशीर मियांदाद के स्कूल से जाने के बाद मैं स्कूल की टीम का कप्तान बना. बशीर भाई ने मुझसे कहा कि मेरे छोटे भाई जावेद को भी देख लेना, वह भी बहुत अच्छा क्रिकेटर है. जब स्कूल की टीम बनाने का समय आया तो मैंने अपने शिक्षक सर पॉल से बात की. उन्होंने जब जावेद को देखा तो कहने लगे कि यह तो बहुत छोटा है, अगर इसे खिलाया तो गेंद लगने का ख़तरा है, इसे इस साल टीम में नहीं रखते."

बचपन से ही जावेद असाधारण क्षमताओं के मालिक थे. मैं पहले शाहीन जिमखाना की तरफ़ से खेलता था, फिर मैंने मुस्लिम जिमखाना की सदस्यता ली, जहाँ जावेद खेलते थे. शुरुआत में तो वे इतने छोटे थे कि उनसे सिर्फ़ फ़ील्डिंग कराते थे."

हारून रशीद कहते हैं, "हम दोनों का निवास स्थान एक-दूसरे के क़रीब था. हम अक्सर जावेद की बिल्डिंग की छत पर क्रिकेट खेला करते थे, लेकिन हमारे खेलते समय शोर मचाने पर पड़ोसी परेशान हो जाते थे और हमें खेलने से मना करते थे, जिस पर जावेद को बहुत ग़ुस्सा आ जाता और वह उस पड़ोसी के दरवाज़े पर कोई न कोई चीज़ रख कर आ जाते कि ये हमें क्यों मना करते हैं."

हारून रशीद ने यह भी बताया, "जब हम पाकिस्तान की क्रिकेट टीम में आ गए तो उस समय भी जावेद की शरारतों में कमी नहीं आई थी, बल्कि जब हम हवाई जहाज़ में सफ़र कर रहे होते तो वह कुछ ऐसी आवाज़ें निकाला करते कि क़रीब से गुज़रने वाले स्टीवर्ड और पर्सर यह समझते कि कोई कीड़ा या मेंढक उनके कोट या शर्ट में आ गया है और वे परेशान होकर कोट और शर्ट उतारकर देखने पर मजबूर हो जाते."

जावेद मियांदाद के सेंस ऑफ ह्यूमर और सामने वाले व्यक्ति को हैरान-परेशान कर देने की एक घटना वसीम अकरम से भी संबंधित है.

वसीम अकरम ने अपनी किताब सुल्तान में लिखा है, "जब मैं पहली बार न्यूज़ीलैंड के दौरे के लिए पाकिस्तान टीम में चुना गया तो मैंने जावेद मियांदाद को फोन किया जो कप्तान थे. मैंने उनसे पूछा कि इस दौरे पर मेरे कितने पैसे ख़र्च होंगे? मुझे कितने पैसे साथ रखने होंगे? जावेद मियांदाद ने बहुत ही गंभीरता से जवाब दिया, 'एक लाख रुपये'."

यह सुनना था कि वसीम अकरम परेशान हो गए और बोले, 'जावेद भाई, इतनी रक़म तो मेरे पास नहीं है, इसलिए मैं यह दौरा नहीं कर सकता'. दूसरी तरफ़ जावेद मियांदाद का ठहाका गूंजा और वह बोले: 'बेवकूफ! तुम्हें एक भी पैसा देने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि तुम्हें खेलने के पैसे मिलेंगे'."

खिलाड़ियों से नोंक-झोंक

सुनील गावसकर और जावेद मियांदाद में बहुत गहरी दोस्ती है. गावसकर ने युवा जावेद मियांदाद को पहली बार 1975 के वर्ल्ड कप के अवसर पर लंदन के होटल की लॉबी में देखा था, जब अंग्रेज़ी पर पकड़ न होने के कारण उन्हें चाइनीज़ रेस्टोरेंट का रास्ता पूछने में कठिनाई हो रही थी.

गावसकर जावेद मियांदाद के बड़े प्रशंसक भी रहे हैं. वह न केवल उनकी क्रिकेट की क्षमताओं को खुले दिल से स्वीकार करते हैं, बल्कि उनके सेंस ऑफ ह्यूमर को भी हमेशा पसंद करते रहे हैं.

उन्हें जब भी मौक़ा मिलता है, वह जावेद मियांदाद की दिलचस्प घटनाएं टीवी शोज़ और निजी महफ़िलों में उन्हीं की आवाज़ में सुनाकर सबको ख़ूब हँसाते हैं. इनमें स्पिनर दिलीप दोशी के साथ मियांदाद की बयानबाज़ी अहम है.

जावेद मियांदाद ने 1982 में भारत के ख़िलाफ़ घरेलू सिरीज़ में दिलीप दोशी को निशाने पर रखा था और उनकी हर गेंद पर वह फ़ब्तियां कसने थे और कहते थे: "तुम्हारा रूम नंबर क्या है?".

जब बात बढ़ी तो शांत स्वभाव के मालिक दिलीप दोशी ने कप्तान गावसकर से मियांदाद की शिकायत भी की थी.

एक और मैच में जावेद मियांदाद विकेटकीपर किरण मोरे की ओर से लगातार कमेंट्स करने और अपील करने से काफी परेशान थे. उन्होंने अंपायर से शिकायत भी की, इस दौरान उन्होंने यह भी कहा, "यहाँ इंसान खेल रहे हैं".

इस अवसर पर मियांदाद को न जाने क्या सूझी कि तेज़ी से रन लेने के बाद उन्होंने अपने बल्ले को दोनों हाथों में थामकर ऊपर-नीचे कूदना शुरू कर दिया. यह वास्तव में किरण मोरे की अपील करने के अंदाज़ की नक़ल थी.

1981 में पाकिस्तान टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे में तेज़ गेंदबाज़ डेनिस लिली के जावेद मियांदाद को लात मारना और मियांदाद का बल्ला लहराते हुए लिली की तरफ़ झपटना सबको याद है, लेकिन एक और ऑस्ट्रेलियाई तेज़ गेंदबाज़ मर्व ह्यूज से मियांदाद की नोक-झोंक भी दिलचस्प है.

मियांदाद ने बल्लेबाज़ी के दौरान अपनी आदत के अनुसार, मर्व ह्यूज को यह कहकर छेड़ दिया, "तुम इतने मोटे हो, तुम्हें क्रिकेट नहीं खेलना चाहिए. तुम तो बस, बस-कंडक्टर लगते हो."

मर्व ह्यूज अपने भारी-भरकम शरीर और घनी मूंछों के कारण ख़तरनाक रेसलर जैसे लगते थे, उन्होंने मियांदाद को तुरंत ही आउट कर दिया.

जब मियांदाद उनके क़रीब से गुज़रते हुए ड्रेसिंग रूम की तरफ जा रहे थे, तो मर्व ह्यूज ने भी मौक़ा हाथ से नहीं जाने दिया और उन्हें संबोधित करते हुए कहा: "टिकट प्लीज".

जावेद मियांदाद कहते हैं, "बल्लेबाज़ी हो या फील्डिंग, मैं ख़ामोश नहीं रहता था और बोलता रहता था, इसका मक़सद विरोधी खिलाड़ियों को मानसिक रूप से परेशान करना था."

"ऑस्ट्रेलियाई टीम यहाँ आई हुई थी. मैंने अपनी आदत के अनुसार, बल्लेबाजी के दौरान ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटरों से बात करने की कोशिश की तो डेविड बून और दूसरे खिलाड़ियों ने मुँह फेर लिए."

"डीन जोंस से मेरी अच्छी दोस्ती थी. वह एक मैच पहले तक मुझसे बात कर रहे थे लेकिन फिर वह भी शांत दिखाई दिए, तो मैंने लाहौर से कराची की फ्लाइट के दौरान उनसे पूछा कि आख़िर माज़रा क्या है?"

"तो डीन जोंस ने जवाब दिया: 'जब मैंने तुमसे बात की थी, तो मुझ पर मेरी टीम ने जुर्माना लगा दिया था क्योंकि हम सबने मीटिंग में यह तय किया था कि मियांदाद की किसी बात का जवाब नहीं देना है, क्योंकि वह हमारा ध्यान भटका देता है'."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.